| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 187 |
कण्वो घौरः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ कण्वो घौरः इन्द्रः (वरुणमित्रा-यर्मणः) गायत्री ॥
यं᳸रा॑क्ष᳹न्तिप्रा᳒चे॑तसःवा᳒रू॑णोमित्रो᳹अर्यामा᳒ । ना᳒कीस्सा᳒दभ्यातेज᳒नाः॑ ॥ १ ॥
यं र क्ष न्तिषीप्र चे त साःती। वा रू णो मि त्रोषुअ र्याटामात। ना का इ स्साटीदात। हि म्मा इ भ्याटीट्ताखऔ हो वाशि। जाखनाःप्ल ॥१॥
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छन्दः (Chandas) |
| 188 |
वत्सः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वत्सः (वशोऽश्वयः) काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
ग᳒व्योषू᳒णो॑या᳹था॑पूरा । अश्वायो᳹तारा॑थाया᳒ । वरिवास्या᳒माहो᳒ना॑म् ॥ २ ॥
ग व्यो षु णोषीय था पु राती। अ श्व योकित र था याकीवा रीकाव स्या म हो माटुहो नाखाऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥२॥ ग व्यो षु णोषीय था पु रातीएत। अ श्व योकित र थाटियाकथ्वा रीटावा स्या म हो मा होटूटनाखऔ हो वाशि। ईख ॥३॥
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| 189 |
वत्सः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वत्सः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
ईमा᳒स्ता॑इन्द्रापृ᳒श्ना॑यः । घृतन्दू॑हाता᳒आशी᳒रं । एनामृ᳹ता ᳹स्या॑पिष्यूषीः ॥ ३ ॥
इ मा स्त याती। न्द्रा पृ श्न योकीघृ त न्तूटिहातबु होटाहातहातइ त याटिशाखइ रणाम् । ए नाखामृ ताता। स्याकपोपबाप्लप्यू षाप्लाइश। हा इशा ॥४॥
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| 190 |
श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आंगिरसः इन्द्रः गायत्री ॥
आ᳒या᳒धीया᳒चर्चा॑गव्याया᳒ । पू᳒रू॑नामन्पुरूष्ठूत । यत्सो᳒मे॑सोमआ᳒भू॑वः ॥ ४ ॥
अ या धि या चषुग व्य यातिएत। पु रू नाकिम न्पूखारूण। ष्टू तौकावातत्। य त्सो मे सो म यातू। य त्सो मेटिसो म योपिबाप्लभू वोप्ला। हा इशा ॥५॥
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| 191 |
मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः इन्द्रः गायत्री ॥
पवाका᳒नस्सा᳒रा᳒स्वती । वा᳒जे॑भिर्वाजि॑नीवति । यज्ञां᳒वा॑ष्टूधीया᳒वा॑सुः ॥ ५ ॥
पा व का न ई यातू। सा राचास्वायतीट। वा जेचाभि र्वाथाच्जी नाकाइ वायातीट। य ज्ञां वाटिट्ष्टूखऔ हो वाशि। धि यातावाटसूःख ॥६॥
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| 192 |
वामदेवो गौतमः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वामदेवो गौतमः इन्द्रः गायत्री ॥
का᳒ईम᳹न्ना᳹हू॑षीष्वा । इ᳒न्द्रंसो᳒मा᳒स्यतर्पयात् । सा᳒नो॑वासून्या᳒भा॑रात् ॥ ६ ॥
क इ म्मु हु वातुहातइश। नातच्हू षाकाइ षूयावाट। आ इ न्द्रंकिसो माकास्या ता र्पायियाटत्स नोटाव सूटाच्नी याकाभायराटत्स नोटाव सूकानि याटाभ राकाउ वाता। आ ग ह्ये हीषीत इ मेटिख् ॥७॥
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| 193 |
इरिम्बिठिः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ इरिम्बिठः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
आया॑हीसूषूमा᳒ही॑ते᳒ । इ᳒न्द्रासो᳹मंपीबा᳒इमं । ए᳒दंबर्हि᳹स्सादोमा᳒मा ॥ ७ ॥
आ या हि सूती। षू माचाहायइ तेटाच्षू माकाहायइ तेटा। आ इ न्द्राचिसो मंथापि बाकाआयइ मांटाच्पि बाकाआयइ मांटा। ए द म्बकिर्हा इ स्साकिदो माटामाखण्। ओपइ ळाप्ला ॥८॥
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| 194 |
सत्यधृतिर्वारुणिः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ सत्यव्रतबाऱुणिः इन्द्रः (आदित्यः) गायत्री ॥
माहि॑त्रीणा᳒मा᳒वा॑रस्तु । धुक्षंमित्र᳹स्या॑र्यम्णः । दूराध᳒ऋषंवा᳒रूणस्या ॥ ८ ॥
म हा इ त्राखीइ णणाम् । आ वाटार स्तु द्यु क्षाकीर्माखइ त्राणा। स्याटर्य म्नाटादु राकाधाखर्षणम् । वाकरोपबाप्लणा स्योप्ला। हा इशा ॥९॥ म हि त्री णाषीम व र स्तुतीएत। द्यु क्ष र्म्मि त्रषीस्या र्य म्णाकिदु रा धाटिर्षातम् । वा रौ हो वाकीहि म्माटाणा स्योटाट्याखऔ हो वाशि। हातओ वाटाओ वाटाख् ॥१०॥
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| 195 |
वत्सः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वत्सः (वशोऽश्वयः) काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
त्वा᳒वा॑तःपुरोवसो । वा᳒या᳒मिन्द्रः॑प्रणेता । अस्मासी॑स्थातर्हरीणाम् ॥ ९ ॥
त्वा वा तोकिहा बु होकिओचइश। पु रो व सोकीहा बु होकिओचइश। वा य मि न्द्राकीहा बु होकिओचइश। प्र णे त ॠकीहा बु होकिओचइश। स्म सि स्था त ॠकुहा बु होकिओचइश। हा री णांकिहा बु होकि। ओपइ ळाशा ॥११॥