| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 147 |
श्रुतकक्षः आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्रुतकक्षः (सुकक्षः) आंगिरसः इन्द्रः गायत्री ॥
आपा॑दूशिप्रि᳒यन्धा॑साः । सूदक्षा॑स्याप्राहोषीणाः॑ । इ᳒न्दोरिन्द्रोया᳒वा॑शिरः ॥ १ ॥
आ पा दु शीती। प्रि य न्ध सातीस्सू द क्षाटिस्यातप्र होकाषी णाःचा। इ न्दोकाराटइ न्द्राःता। या वा शाटिइ राःता। ऐकहि याटाइ हि याखिऔ हो वाशि। एतच्ऊटपाख ॥१॥ अ पाफादु शि प्रि याखीन्ध साःशा। सू द क्ष स्याषीप्र हो षि णाकीइ न्दौ हौटिहु वापाइ न्द्रो य वाफीशाङ्इ राःशा। ऐकहाटएटहि याखाऔ हो वाशि। एतऊ पाटाच् ॥२॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 148 |
मेधातिथिः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ मेधातिथिः (शय्युबार्हस्पत्यः) काण्व इन्द्रः गायत्री ॥
ईमा᳒उत्वापूरोवासो । आ᳒भिप्रा᳒नो॑नावुत्गीराः॑ । गा᳸वो॑वत्स᳒न्ना᳒धेना᳒वाः॑ ॥ २ ॥
इ मा उ त्वाती। पु रोटाव साटाबुश। आ भि प्र नो न वूटूत्गा इ राःटि। औथहोचइश। गा वोथावा त्साटान्नापधेश। नाखवोप्ल। हा इशा ॥३॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 149 |
गोतमो राहूगणः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ गोतमो राहूगणः काण्व इन्द्रः गायत्री ॥
अ᳒त्रा᳒हागो᳒रा॑मन्वत । नामत्वष्टू॑रा᳹पीठच्यं । इत्था᳒चन्द्रा᳒मा॑सोगृ᳒हे ॥ ३ ॥
अ त्राता। हाकगोषर म न्व ता उ वाटूहा उ वाटिहोचइश। ना म त्व ष्टुषीर पी च्या मु वाटुहा उ वाटिहोचइश। इ त्था च न्द्र म सोषीगृ हा उ वाटीहा उ वाटिहोटट्याखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥४॥ हा व त्राति। हाकगो रषाम न्व ता उ वाटुहो इ याटिहो वाथाउ वोचाइश। ना म त्व ष्टु रषुपी च्य मि या उ वाटूहो इ याटिहो वाथाउ वोचाइश। इ त्था च न्द्र म सोषूगृ हा उ वाटीहो इ याटिहो वाथाउ वोटायाखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥५॥
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| 150 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः इन्द्रः गायत्री ॥
य᳒दि᳒न्द्रोआ᳹ना॑यद्रीताः । माही᳒रापो᳒वृ᳒ष॑न्तमः । तत्रा॑पूषा᳹भू॑वत्सा᳒चा ॥ ४ ॥
य दि न्द्रो याती। ना याटादोंचओंटओखवाश। री तो म ही रा पाटूओंटओखवाश। वृ षा वृ षाटीन्त माखाऔ हो वाशि। त त्रा पूकिषाचभु वातात्साटचाख ॥६॥ य दि न्द्रो आ नाषुय द्री तातीएत। मा ही रा पोटीच्माकही रा पोटिवा र्षाकान्ताखमाःण। त त्रा पूटिषा पूटाट्षाखऔ हो वाशि। भु वातात्साटचाख ॥७॥
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| 151 |
बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः |
मरुतः |
गायत्री |
॥ बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः मरुतः गायत्री ॥
गौ᳒र्धायतीमारुतां॑ । श्रवस्यु᳒र्मातामाघो᳒नां॑ । युक्ता᳒व᳒न्ही᳸रा᳒था॑नाम् ॥ ५ ॥
गौ र्ध यातिएत। ति म रू तांतीच्श्राकव स्यु र्माटिता म घोखिनाशम् । यु क्ता व न्हाचीइश। र थाकानाटमाखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥८॥ गौ र्ध य तिषीम रु तातिमेत। श्रा व स्यु र्मटीता म घो नाटीच्मु हु वाटिहातइश। यु क्ता वाचिन्हीथरू हु वाटिहातइश। र थाकाना मौपाहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥९॥ ॥
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ऋषिः (Rishi) |
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छन्दः (Chandas) |
| 152 |
श्रुतकक्षः सुकक्षो वा |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा इन्द्रः गायत्री ॥
ऊ᳒पा॑नोहा᳒रीभीस्सू᳒तं । याही᳒मा᳒दानांपते॑ । ऊ᳸पानोहा᳒री॑भीस्सू᳒तम् ॥ ६ ॥
उ पा नोपिह रि भीप्लिस्सू तोङावाश। या हि म दाटीना म्पा ताटिउ प नोतिहातओपबाप्ल। राखइ भीःप्ला। सू ता मौपिहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥१०॥ उ प नोषिहा बु हो रातीइ भीःता। सूटतातम् । या हि म दाकीना म्पाटाता उ पा नोखीहाण। राटइ भाखाऔ हो वाशि। सू तंकाराचइ ष्ठाःटाख् ॥११॥
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| 153 |
श्रुतकक्षः सुकक्षो वा |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा इन्द्रः गायत्री ॥
इष्टाहोत्राअसृक्षत । इ᳸न्द्रं॑वृधन्तो॑आध्वा॑रे᳒ । अच्छावाभृथमो᳒ज॑सा ॥ ७ ॥
इ ष्टा हो त्राती। आचसृ क्षाखाताण। इकन्द्रं वृ धा न्तोटीअ ध्वाखाराणइश। अ च्छा वाखिभाशर्त्थ मो जाखिसात्र। एतऊकद धि र्नि धीःटीख् ॥१२॥
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| 154 |
वत्सः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वत्सः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
अ᳒ह᳒मि᳒द्धि᳒पीतुःपा॑री । मेधा᳒मृता᳹स्या॑जग्रा᳒हा॑ । अहं᳒सू॑र्या᳒इवा᳒जनी ॥ ८ ॥
अ ह मि द्धाफीइ पि तुः प राकुइश। मेकधा मृ त स्य ज ग्र हाषृआ हं सू र्याकीइ वापाहाप्लहाङ्इश। ज नि हो इ हो औकूहो औकाहो वापाहा बुप्ला। बाश ॥१३॥
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देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 155 |
शुनः शेप आजीगर्तिः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ शुनः शेप आजीगर्तिः इन्द्रः गायत्री ॥
रेवातीर्ण॑स्साधामादे॑ । इन्द्रे॑सन्तूतूवी᳒वा॑जाः । क्षुम᳒न्तोयाभिर्मा॑दे॑मा ॥ ९ ॥
रे व ती र्णाःती। स धाटामाखदाणइश। इ न्द्राटाइ साखान्तूण। तू वि वाटिजाःच। क्षूटमातन्तोटयाक। भिकर्म्मोपबा दा इ मोप्ली। हा इशा ॥१४॥
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छन्दः (Chandas) |
| 156 |
शुनः शेप आजीगर्तिः वामदेवो वा |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ शुनः शेप आजीगर्तिः इन्द्रः गायत्री ॥
सो᳹माः॑पूषा᳒चा॑चेततुः । वि᳒श्वा᳸सांसुक्षी᳒तीनां᳒ । देवात्रा᳒रथ्योरहितः॑ ॥ १० ॥
सो मः पू षाती। चा चा ईषित तू र याकीव योखावाश। वा इ श्वा सांकीसु क्षी ती ना म याटूव योखावाश। दाचइ वायात्रा राटाथी यो र्हाखिर् इ ताःत्रा। गा वोथाअ श्वाःटाख् ॥१५॥