| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 127 |
सुकक्षश्रुतकक्षौ |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ सुकक्षत्रुतकाै (सुकक्ष आंगिरसः) इन्द्रः गायत्री ॥
उ᳒त्घेदभी᳒श्रूता᳒मा॑घं । वृषाभ᳒न्नर्या॑पसं । अस्तारमेळिसूर्या ॥ १ ॥
उ त्घे द्भ्योतीवात। श्रू ताकामाखघणम् । वृ षा भ न्ना र्याटुपाखसणम् । आटस्ता राटामेत। षा इ सूकिर्या औटाहोखबाप्ल्व होप्लइ ळाशा ॥१॥ उ त्घे द भिषीश्रू ता मातघातम् । वृ षा भचिन्नकर्याफप्ल्हिंच। पापसशम् । आ स्ताप्लाउ वाशा। राकमा इ षि सूकीओपबाप्ल्रा योप्ला। हा इशा ॥२॥ उ त्घे द भि श्रू ताषूम घ मि य इ यातुहातइश। वृ षा भचिन्नकर्याफप्ल्हातहातइशपापसशम् । आ स्ताप्लाउ वाशा। राटमाखऔ हो वाशि। षि सू र्याटिख् ॥३॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 128 |
सुकक्षश्रुतकक्षौ |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ सुकक्षत्रुतकाै (सुकक्ष आंगिरसः) इन्द्रः गायत्री ॥
यादद्याकाच्चावृत्रहन् । ऊदगाआभी᳒सूर्या᳒ । स᳒र्वन्ता᳒दिन्द्राते॑वा᳒शे ॥ २ ॥
य द द्य काफीच्च वृ त्र हाकीन् । ऊ द गा आ भीकुसू राटायात। सा र्वा न्ता दिकीन्द्र ता येटिहिंच। वाखशोप्ल। हा इशा ॥४॥
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| 129 |
भारद्वाजः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ भारद्वाजः (शय्युबार्हस्पत्यः) इन्द्रः गायत्री ॥
य᳒आ᳒ना॑यत्पारावा᳒ताः । सू᳒नी॑तीतूर्वा᳒शं᳒या᳒दुं॑ । इ᳒न्द्रस्सा᳒नोयू॑वासा᳒खा॑ ॥ ३ ॥
य याताहातबुश। आ ना याटिदा ना याटित्पा राकावाखताःण। सू नी ती तूटीच्सूकनी ती तूटिच्र्वा शंकायाखदूणम् । इ न्द्रा स्सा नोटीच्इकन्द्रा स्सा नोटिच्यूटवाखऔ हो वाशि। साखखाश ॥५॥ य आ नषिय त्प रा वातीताःत। सू नी ति तु र्व शांयूयापदूशम् । इ न्द्र स्स नो यू वायूसापखाश। इ न्द्रोखाग्निःश। इकन्द्रा औकाहोखग्नाणइःश। आ इ न्द्रोकिग्नाटयाखऔ हो वाशि। ईखन्द्राःप्ल ॥६॥
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| 130 |
श्रुतकक्षः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्रुतकक्षः (सुकक्षो वा आंगिरसः) इन्द्रः गायत्री ॥
मा᳒ना॑इन्द्राभ्याटट्यदीशः॑ । सू᳹रोअत्तुष्वाया॑मात् । त्वा᳒यूजा᳒वानेमाता᳒त् ॥ ४ ॥
मा न इ न्द्राषीभ्या दा इ शाःती। सू रो आ त्तुकीष्वा याटामाखतु वाखायू जाता। वा ना इ माटीताखण्त् । ओपइ ळाशा ॥७॥ माणनाफइ न्द्राखाभ्या दि शःशि। सू रो आखित्तुशष्वा याखामाणत् । त्वा यु जाकिवा नौटाहोथमा तौकाहू वा दौकिहोखवात्र। एतय यूःटाख् ॥८॥
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| 131 |
मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः इन्द्रः गायत्री ॥
ए᳒न्द्रा॑सानासिं᳒रायिं᳒ । सा᳒जी᳒त्वा॑नंसादासा᳒हं । वर्षी॑ष्ठामू᳒ताये᳒भरा ॥ ५ ॥
ए न्द्र साति। ना सिं र यिंषीस जि त्वा नंकीसा दा साटिहातम् । वाटर्षीतष्ठा मूकात याताआ उ वा एभी। भाखराश ॥९॥ ए न्द्र सा न सातु। इं रा याटिइं स जि त्वा नंकुसा दा साटिहातम् । वा र्षीटाष्ठा मूटाच्ताचयोपबाप्लभा रोप्ला। हा इशा ॥१०॥
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| 132 |
मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः इन्द्रः गायत्री ॥
इ᳸न्द्रं᳒वाय᳒म्माहाधाने᳒ । इन्द्रा᳒मर्भे॑हवामहे । यूजं॑वृ᳸त्रे᳹षुव᳒ज्रीण॑म् ॥ ६ ॥
इ न्द्रा मि न्द्रं वा याटूमा हा म हा धा नाटूइश। इ न्द्रा मि न्द्रं म र्भाटूइषहा वा ह वा मा हाटूइश। यू जा यु जं वृ त्राटूइ षु वा षु व ज्री णापण्म् । ओपइ ळाशा ॥११॥ इ न्द्रं वा यातीम् । मा हा म हा धा नाटूओ औकाहोतइ हाता। ई ही बा लाटीउ वोखावाश। ईखहाशइ न्द्र म र्भा इशू। हा वा ह वा मा हाटूओ औकाहोतइ हाता। ई ही बा लाटीउ वोखावाश। ईखहाशयु जं वृ त्रा इशु। षू वा षू व ज्रि णांटूओ औकाहोतइ हाता। ई ही बा लाटीउ वोखावाश। ईखहाश ॥१२॥
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| 133 |
त्रिशोकः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ त्रिशोकः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
आपी॑बत्काद्रू᳹वा॑स्सुतं᳒ । इन्द्रा᳸सा॑हा᳒स्रा॑वांभे । तत्राददी॑ष्टापौंठस्यम् ॥ ७ ॥
अ पि ब त्का द्रूतुव स्सु तातिम् । इ न्द्रा होभिइ साकाहा हो वाकस्राकिवांयभेट। त त्रा दाटिदीतष्टाकपौटहौटहु वाटाईटयांतसीतया मौपाहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥१३॥
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| 134 |
वसिष्ठो मैत्रावरुणिः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वसिष्ठोः मैत्रावरुणिः इन्द्रः गायत्री ॥
वा᳒यामिन्द्रात्वाया᳒वाः॑ । आभि᳒प्रानो॑नुमोवृषन् । विद्धीत्वाटट्यस्या᳒नोवसो ॥ ८ ॥
व य मापिइ न्द्राणा। त्वा याटाट्वाखऔ हो वाशि। आ भि प्र नोटिनु मो वृ षाखीन्वि द्धाखाइ तु वाति। स्याटट्नाखऔ हो वाशि। वाखसोश ॥१४॥ व य मि न्द्राती। त्वा याप्लावाःश। आ भि प्र नो नु मोप्लूवापर्षाशन् । वि द्धि तूखिवाप्ल्आ ओखाहाणइश। स्या नो बापिवा सोप्ला। हाप्लइश ॥१५॥
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| 134 |
वसिष्ठो मैत्रावरुणिः |
इन्द्रः |
गायत्री |
वा᳒यामिन्द्रात्वाया᳒वाः॑ । आभि᳒प्रानो॑नुमोवृषन् । विद्धीत्वाटट्यस्या᳒नोवसो ॥ ८ ॥
व य मौ हो इ न्द्रातू। त्वा याप्लवाःश। आ भि प्र नो नु मोयूवापर्षाशन् । वि द्धि तु वोखीहाणइश। स्या नोप्लाहा इशा। वाकसा औटाहोखबाप्ल्। होप्लइ ळाशा ॥१६॥ वा याखामौ हो वा हाशीइ न्द्र त्वाखिऔ हो वा हा या वाःशू। आटभीतप्राटनोतओ इ नु मो वाटुर्षातन् । वाटइ द्धीतातूटवातस्याटनाखऔ हो वाशि। वाखसोश ॥१७॥ हा बु व य मि न्द्रातू। त्वाटवा याःटा। आ भि प्र नो नु मोटूवा र्षाटान् । वि द्धाटाइ तु वाटिस्या नो वाटिट्साखऔ हो वाशि। अ स्माचाभ्यकङ्गाततु वि त्तकिमाखम् ॥१८॥
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| 135 |
त्रिशोकः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ त्रिशोकः काण्वः इन्द्रः (अग्नीन्द्रौ) गायत्री ॥
आ᳒घाये᳒अग्नी᳒मिन्धा᳒ते । स्तृणन्तीबही᳹रानूषाक् । ए᳒षा᳒मि᳒न्द्रोयूवासाखा᳒ ॥ ९ ॥
आ घा ये आ ग्निषुमि न्धातातातइश। स्तृकण न्ति बटिर्हि रा नु षा ग्येकुषा मि न्द्रोचियु वाशा। इ हा उ वा उ वोपुबाप्लसा खोप्ला। हा इशा ॥१९॥ आ घा ये इ हातु। ग्नी मा इ न्धा ताटुउ वोखावाश। ईखहाश। स्तृ ण न्तीकिबतर्ही रा नु षाटीउ वोखावाश। ईखहाश। एकषा मा इ न्द्राटीउ वोखावाश। ईखहाश। यू वा यु वाटिसाखखात्र। ईखहाश ॥२०॥ औ हो आ घा यातुएत। ग्नी मा इ न्धा ताटुऔ होखावाशस्तृ ण न्तीकिबथर्ही रा नु षाटीऔ होखावाश। एकषा मा इ न्द्राटीऔ होखावाश। यू वाकासापखा उ वा हाप्लीबुश। बाश ॥२१॥
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| 136 |
त्रिशोकः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ त्रिशोकः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
भि᳒न्धि॑विश्वा᳒आपद्वी᳒षाः । पा॑रीबाधो᳹जही॑मृ᳒धाः॑ । वा᳸सु॑स्पार्हंतादाभा॑रा ॥ १० ॥
भि न्धि योतिहातइश। वा इ श्वाकिच्आ पाकाद्वा इ षाटिउ वोखावाश। पा राटाउ वोखावाश। बा धो ज हा इषुमा र्द्धाटाउ वोखावाश। वा सु स्पाकिर्ह न्त दाकिभ राखा ॥२२॥