| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 1 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः अग्निः गायत्री ॥
अग्ना॑आ᳒याहीवी᳒ता᳒ये । गृ᳒णा᳒नोहव्यादा॑तये । नीहो᳒ता॑सत्सीबर्हीषि॑ ॥ १ ॥
ओतग्नातइश। आ याथाच्ही वाचाइश। ता याटाइशता याटिइश। गृ णाचानोशह व्या दाचि। ता याटाइशता याटिइश। ना इ होकिताच। साटत्साटइ बाखाऔ हो वाशि। हीखषिश ॥१॥
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भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
अग्ना॑आ᳒याहीवी᳒ता᳒ये । गृ᳒णा᳒नोहव्यादा॑तये । नीहो᳒ता॑सत्सीबर्हीषि॑ ॥ १ ॥
अ ग्न आ या ही वीतू। ता या इ गृ णा नोषूह व्य दा ताटीयातइश। नी हो ताचिस त्सी ब र्हाटीइ षीता। ब र्हाटाइ षाखाऔ हो वाशि। बचर्ही षीखा ॥२॥
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भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
अग्ना॑आ᳒याहीवी᳒ता᳒ये । गृ᳒णा᳒नोहव्यादा॑तये । नीहो᳒ता॑सत्सीबर्हीषि॑ ॥ १ ॥
अ ग्न आ या ही वातूइ ता यातिइश। गृ णा नो ह व्य दायूतापयेश। नि हो ताखिसाणत् । साटइ बाताॠ हापाआ इ षोप्लि। हा इशा ॥३॥
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भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः अग्निः गायत्री ॥
त्वा॑माग्नेयज्ञा᳒नां । हो॑ताविश्वे॑षांहितः । देवेभि॑र्मानूषे॑जने ॥ २ ॥
त्व म ग्ने य ज्ञा नांषूत्व म ग्नातिइश। य ज्ञा नां हो ता वि श्वेषृषां हाटाइ ताःता। देकवा इ भाटिइ र्माता। नु षेताच्जकना औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥४॥
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मेधातिथिः काण्वः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ मेधातिथिः काण्वः अग्निः गायत्री ॥
अग्निंदूतं᳒वृ॑णीमहे । हो᳒ता॑रंविश्वा᳒वे॑दसं । अस्या᳹यज्ञास्या॑सुक्रा॑तुम् ॥ ३ ॥
अ ग्नि न्दूटितातम् । वृ णी म हा इषूहो ता रांटिवीतश्वा वेचाद साचाम् । अ स्य याटिज्ञातओ औकाहोतवात। स्या सूचाकृ तू मि ळाटीभाखण। ओपइ ळाप्ला ॥५॥
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| 4 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः अग्निः गायत्री ॥
अग्निर्वृ॑णि॑जङ्घनात् । द्रविणास्यु᳹र्वीपन्या᳒या । सामी᳒द्धश्शुक्रा᳒आहूतः ॥ ४ ॥
अ ग्नि र्वृ त्राती। णाटइ जाखाऔ हो वाशि। घाखनाशत् । द्रचविशणाकस्यु र्वी पकिन्या याटाओ इ स मि द्धाटुश्शूत। क्रा याचाहु ता इ ळाटीभाखण्। ओपइ ळाप्ला ॥६॥ अ ग्नीखारौ हो वाशिहा इ वृ त्रा णीशु। ज ङ्घाटानातदौ होटावातइश। द्र वि णापिस्यूःण। ओ इ वा इषीप न्या याटि। सा मा इ द्धाटीट्श्शूखऔ हो वाशि। क्रा या हूटिताःख ॥७॥ ओतग्नीःत। वृ त्रा णीकिज ङ्घ ना दौकीहो औ होखिवाश। द्र वीचाणाकस्यु र्वी पकिन्य याचाऔकहो औ होखिवाश। स मि द्धाचिश्शु क्र याचिऔकहो औ होखिबाप्लहू तोप्ला। हा इशा ॥८॥
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उशना काव्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ उशनाः अग्निः गायत्री ॥
प्रेष्ठं᳸वोआतीथिं । स्तू᳒षे᳒मित्रामीवाप्रीयं । अ᳒ग्नेराथन्ना᳒वेद्यम् ॥ ५ ॥
प्रे ष्ठं वाःति। अ ताटाइ थीताम् । स्तु षेचामि त्र मि व प्राटुयातम् । अ ग्ना इ राभीथातन्ना वाटाहाखणइश। दापआ याप्लाम् । हा इशा ॥९॥
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| 5 |
उशना काव्यः |
अग्निः |
गायत्री |
प्रेष्ठं᳸वोआतीथिं । स्तू᳒षे᳒मित्रामीवाप्रीयं । अ᳒ग्नेराथन्ना᳒वेद्यम् ॥ ५ ॥
प्रे ष्ठं व योतीहातइश। अ ताटाइ थीताम् । स्तू षाताइशमी त्रातामी वाटाप्राखयाणम् । औथहोचइश। अ ग्नेथारा थाटान्नापवेश। दाखयाशम् । हा इशा ॥१०॥ प्रे ष्ठं वोतिहातबुश। आ ति था इं स्तूषुषे मि त्रा मी व प्राटूयातम् । अ ग्ना इ राटीट्थाखऔ हो वाशि। ना वे दीटियाखम् ॥११॥
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| 6 |
सुदीतिपुरुमीढावाङ्गिरसौ तयोर्वान्यतरः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ सुदीतिपुरुमीढा वांगिरसौ तयोर्वाऽन्यतरः अग्निः गायत्री ॥
त्वन्नोआग्नेमा᳒हो॑भिः । पाहीविश्वा॑स्याआ᳒रा॑तेः । ऊत᳒द्वीषोमर्क्त्या॑स्या ॥ ६ ॥
त्व न्नो याति। ग्नेचमा होथाभिः पा हा इ वीटुश्वात। स्याचआ रा तेथिच्रू ताचाद्वायइ षाःटा। माकर्त्याथस्या इ ळाटिभाखण्। ओपइ ळाशा ॥१२॥ त्वां त्व न्नोषिअ ग्ने म होतीभातइःश। पाकहि वि श्वा औटीहोतस्या औटाहोतआ रा तेकिच्रू ताचाद्वायइ षाःटा। म र्तोटाट्याखऔ हो वाशि। स्याख ॥१३॥
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भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः अग्निः गायत्री ॥
एह्यू᳒षुब्रा᳒वा॑णिते । अग्नाइत्थे᳹ता॑रा॑गीराः । ए᳒भिर्वार्धा॑साइ᳒न्दू॑भिः ॥ ७ ॥
ए ह्यूफाषु ब्रा वाखिणा इ ता इशी। अ ग्न इ त्थेषीत रा गाटिइ राःचा। ए भाटाइ र्वा धाचि। स याटाहाखण्इश। दोपभोप्ल। हा इशा ॥१४॥ ए ह्यू षूषिब्र वौ हो णातीइ ताताइश। अ ग्न इ त्थे त रायूगीपराःश। ए भि र्वाखिर्द्धाण। स याटाहाखण्इश। दोपभोप्ल। हा इशा ॥१५॥
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| 8 |
वत्सः काण्वः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ वत्सः काण्वः अग्निः गायत्री ॥
आ᳸तेवात्सो᳒मानोयमात् । परामा᳹ञ्चित्साधास्थात् । अ᳒ग्ने᳒त्वांकामयोगी᳒रा॑ ॥ ८ ॥
आ ते व त्साःती। माचनोशय म त्पा राचीमाथच्चि त्सा धाटिस्थातत् । अ ग्ना इ त्वाभीङ्कात। म योपाबाप्लगा इ रोप्लि। हा इशा ॥१६॥ आ ते व त्सोषीम नो य म द य्यातूहातइश। पा रा माषिच्चि त्स ध स्था द य्याटूहोकच्इ याशा। अ ग्ने त्वा ङ्काषीमा या अ य्याटूच्होकचइ याशा। गी राकाइ ळाटाभाखण्। ओपइ ळाशा ॥१७॥
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| 9 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः अग्निः गायत्री ॥
त्वामाग्नेपु᳹ष्काराद᳒धी॑ । आ᳸थ॑र्वाणीरा॑मन्धत । मूर्ध्नो᳒विश्वास्यावाघा᳒ताः॑ ॥ ९ ॥
त्वा म ग्ने पु ष्कातुरा द धीति। आचथ र्वाचाना इ रा माटीन्धाखताण। मूखर्ध्नोप्लवाखइ श्वाणा। स्या वोपाबाप्लघा तोप्ला। हा इशा ॥१८॥
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वामदेवः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ वामदेवः अग्निः गायत्री ॥
अग्नेवी᳸वा᳒स्वादा᳒भारा । अस्मभ्यामू᳒ता᳹ये॑माहे᳒ । देवोह्यासी॑नोदृशे ॥ १० ॥
अ ग्ने वि वषीस्व दा भ रो वातूहातइश। अ स्माचाभ्या मूकाच्ता याचाइ म हाटिओ वाटाहातओ वाटाहातइश। दाचइ वोयाहि याटाओ वाटाहातओ वाटाहातइश। साटइ नाखाऔ हो वाशि। दृ शेताच् ॥१९॥