| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 206 |
त्रिशोकः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ त्रिशोकः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
ता᳹रा ᳹णिवोज᳒ना॑नां । त्रादं᳹वा ᳹ज॑स्यागो᳒मा॑तः । समाना᳒मुप्रा᳒शंसिषः ॥ १ ॥
तरणिं वाःती। ज नाटाना मतम् । त्रादंवा जाटीहातस्या गोकामाखताःण। समा नाटिमूत। प्रशांसि षाःप्ली। होप्लइ ळाशा॥ १ ॥
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| 207 |
मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः इन्द्रः गायत्री ॥
आसृ॑ग्रमिन्द्राते᳒गीराः॑ । प्रा᳒तीत्वा᳒मू᳒दा॑हासता । सा᳒जो᳒षा॑वृषा᳸भं᳒पा᳒तिम् ॥ २ ॥
असृग्रमाइ न्द्रातूतेगि राःति। प्रा तीटात्वा मूटाद हाकास ताशा। सा जोटाषा वृटाष भांकाच्पाति मोपिइ ळाप्ला॥ २ ॥
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| 208 |
वत्सः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वत्सः काण्वः (वशोऽश्वयः) इन्द्रः गायत्री ॥
सुनीथोघासामार्त्याः॑ । य᳒म्मा᳸रूतोया᳹मर्यामा । मित्रःपा᳒न्त्यद्रू᳒होआ᳒तीद्वीषाः॑ ॥ ३ ॥
सुनीथो घाफीस माशार्क्त्याःक। यम्मरू तोटीच्य मचार्या माचामित्राः पाचिन्त्यद्रु हाटिउउ वाटिच्हायउ वाटा। आथतिद्वी षाःटिख्॥ ३ ॥
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| 209 |
त्रिशोकः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ त्रिशोकः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
य᳒द्वीळा᳹वि॑न्द्राया᳒त्स्थि॑रे । य᳸त्प᳸र्शा॑नेपा᳒रा॑भृतं । वा᳸सु॑स्पार्हं॑ता᳒दा᳒भा॑रा ॥ ४ ॥
औहोवाऔ होखुवाशओ हाप्लाइश। यद्विळा वीखीन्द्रा याकिस्थी राफाइश। औहोवाऔ होखुवाशओ हाप्लाइश। यत्पर्शा नेखुपा राकाभृ तंफा। औहोवाऔ होखुवाशओ हाप्लाइशवसुस्पा र्हाखीन्ता दाकाभा राफ। औहोवाऔ होखुवाशओ हाप्लाइश। होप्लइ ळाशा॥ ४ ॥
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| 210 |
सुकक्ष आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ सुकक्ष आंगिरसः इन्द्रः गायत्री ॥
श्रूतं᳒वो॑वृत्रा॑ह᳒न्ता॑मं । प्र᳒श᳒र्धञ्चर्षो॑णीनां । आ᳒शी᳒षेरा᳒धा॑सेमाहे ॥ ५ ॥
श्रू ताताम् । वोवृत्रहन्त मंषूप्रशद्धञ्च ऋकुषा णाटाइ नाताम् । आ शाकाइ षाटाइ राता। ध सेकाच्माकहा औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा॥ ५ ॥
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| 211 |
वामदेवो गौतमः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वामदेवो गौतमः इन्द्रः गायत्री ॥
आर॑न्तइन्द्राश्रा᳒वा॑से । गमे᳒मा॑शूरत्वा᳒वातः । आ᳒रं॑शाक्रापा᳒रेमणि ॥ ६ ॥
अरन्तइ न्द्रषूश्रव सेतिएत। ग माचाइशमाथशूर त्वाकिव तोटाहो वाटाहातइश। आ रांचाशायक्राटहो वाटाहातइश। पारे माटिणाखण्इश। ओपइ ळाप्ला॥ ६ ॥
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| 212 |
विश्वामित्रो गाथिनः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ विश्वामित्रो गाथिनः इन्द्रः गायत्री ॥
धानाव॑न्तंकारंभीणम् । आ᳒पू᳒पाव॑न्तामुक्थी᳒न॑म् । इ᳸न्द्राप्राता᳒र्जु॑षस्वनः ॥ ७ ॥
धा नाफावन्तङ्क राखीम्भि णशाम् । आपूपवन्त मूयूत्थीपनाशम् । इन्द्रा प्राखिताशप्ल्ओखहाणइश। जुषो बाप्लिस्वा नोप्ला। हा इशा॥ ७ ॥
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| 213 |
गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ गोषूकश्वसूनूकाण्वायनाै इन्द्रः गायत्री ॥
आ᳒पांफे᳹ने॑नानामू॑चेः । शी॑रा॑इ॑न्द्रोद॑वर्क्तया । वि᳒श्वा᳒या᳹दजयस्पृधाः॑ ॥ ८ ॥
अपाम्फे नेषीननमु चेःती। शीर इचिन्द्रोद वाटिर्क्ताखयाःण। वाइश्वा याटीट्दाखऔहो वाशि। ज यातास्पाटर्धाःख॥ ८ ॥
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| 214 |
वामदेवो गौतमः |
इन्द्रः |
गायत्री |
| 215 |
श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वामदेवो गौतमः इन्द्रः गायत्री ॥ ॥ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आंगिरसः इन्द्रः गायत्री ॥
ईमे᳒ताइन्द्रासो᳒माः । सूता᳒सोयेचासो᳒त्वाः॑ । तेषांमत्स्वप्रभूवसो ॥ ९ ॥ तुभ्यंसूतासस्सोमाः॑ । स्तीर्ण॑म्बर्ही॑र्वी॑भवसो । स्तो᳒तृभ्या॑इन्द्रमृडया ॥ १० ॥
इमेत याती। न्द्रासो मोटिहो वाकाहोचइश। सूकतासो येटिचा सोकातूखवाःण। तेखषांप्लहातहातइश। मात्स्वप्र भूकीओपबाप्लवा सोप्ला। हा इशा॥ ९ ॥ तु भ्यांताहातबुश। सूतासस्सो माषुस्तीर्णां बाटिर्हीतवी भाटाच्होयइ वाटासोत। स्तो तृपाआशभ्याटइन्द्र मृखिऔहो वाशि। डाखयाश॥ १० ॥