| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 137 |
कण्वो घौरः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ कण्वो घौरः इन्द्रः (मरुतः) गायत्री ॥
ईहे᳒वा॑शृण्वाएषां । काशाह᳹स्तेषूयद्वादा॑न् । निया᳸मैःचित्रा᳒मृन्जते ॥ १ ॥
ई हे वापिश्रु ण्व ए षाशीम् । का शा ह स्ते षु यायूद्वापदाशन् । नि या मै श्चीखीत्रा मृकिन्जकताफइश। नी या मैषिश्चा इ त्रा माटीन्जाखताणइश। ए हि याखिऔ होता। एकहि यौ हो एकीहि यौ हो वाकी। एखहिश ॥१॥
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ऋषिः (Rishi) |
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छन्दः (Chandas) |
| 138 |
त्रिशोकः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ त्रिशोकः इन्द्रः गायत्री ॥
ईमा᳹ऊत्वावीचा॑क्षते । सा᳒खा॑याइन्द्रासोमीनाः॑ । पुष्टावन्तोया᳹था॑पाशु᳒म् ॥ २ ॥
इ मा उ त्वाषीवि च क्ष तेखीस खाखायाःश। इ न्द्र सो माभीइ नाताहो येटाहोटवात। पु ष्टा वाटिन्तोतहो येटाहोकवात। याकथोपबाप्ल्पा शुप्लाम् । हा इशा ॥२॥
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| 139 |
वत्सः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वत्सः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
सा᳒मा॑स्यामन्या᳒वेवीशाः॑ । विश्वे॑नमन्ताकृष्टा᳒याः । समुद्रा᳹ये॑वासिन्धावः ॥ ३ ॥
सा म स्या माटीन्यातवे वी शाःचि। वि श्वे ना माटीन्तातकृ ष्टा याःचि। सा मु द्रा येटीचवाकसि न्धाटावाःखण्। ओपइ ळाशा ॥३॥
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| 140 |
कुसीदी काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ कुसीदी काण्वः इन्द्रः (विश्वेदेवाः) गायत्री ॥
देवा᳒नामी᳹दावो॑माहा᳒त् । ता᳒दा᳒वृणीमहेवायं । वृष्णा॑मस्मा᳹भ्या॑मूता᳒ये ॥ ४ ॥
दे वा नाफिमि दा उ वोखीवाश। आ वाटाउ वोखावाश। माखहाशत् । ता दा वृ णा इषमा हाटाउ वोखावाश। वाखयशम् । वृ ष्णा म स्मा भ्या माटूउ वोखावाश। ताखयेश ॥४॥ हा बु दे वा नाषुमि द वो म ह द्धातूबुश। ता दाकावा र्णाटाइ माचाहेकवाखयणम् । ऐटचहाययाटऐ हीता। वृ ष्णा माभिस्मात। भ्या मू ताटिट्याखऔ हो वाशि। हा वी ष्माटितेख ॥५॥
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| 140 |
कुसीदी काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
देवा᳒नामी᳹दावो॑माहा᳒त् । ता᳒दा᳒वृणीमहेवायं । वृष्णा॑मस्मा᳹भ्या॑मूता᳒ये ॥ ४ ॥
दे वा ना मि द वोषूहा बु मातिहातत् । ता दा वृ णा इषुमा हा इ वाटीयातम् । वृ ष्णांटाच्होययाटस्मात। भ्या मू ताटिट्याखऔ हो वाशि। हा वि ष्काटिर्तेख ॥६॥ दे वा ना मि द वोषूमातहातत् । ता दा वृ णीकीच्माकहा इ वाटियातम् । वृ ष्णा माभिस्मातच्भ्याकमोपबाप्लता योप्ला। हा इशा ॥७॥
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| 141 |
मेधातिथिः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ मेधातिथिः काण्वः इन्द्रः (ब्रह्मणस्पतिः) गायत्री ॥
सोमानांस्वा᳒रा॑णां । कृ᳒णू᳒ही॑ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तंया᳹औशीजः᳒ ॥ ५ ॥
सो माखानां स्व र णशीम् । कृ णू हिषिब्र ह्म ण स्पाकीता येटाओखहाप्लहातइश। क क्षा इ वाभीन्तातम् । य औ होतिच्औकहोखबाप्ल्शा इ जोप्लि। हा इशा ॥८॥
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| 142 |
श्रुतकक्षः आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्रुतकक्षः (सुकक्षः) आंगिरसः इन्द्रः गायत्री ॥
बोध᳒न्माना᳒इद᳒स्तुनः । वृत्राहा᳸भू᳒र्या॑सुतिः । श्रृणो᳹तू॑शक्रा᳒आशी᳒ष॑म् ॥ ६ ॥
बो ध न्म नाःती। इ दाटास्तू नोट्वृ त्र हाकिभू र्याट्सूखतीःण। श्रु णोखाऔ होता। तु शाचाक्राकआ शि षा मौपीहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥९॥
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| 143 |
श्यावाश्वः आत्रेयः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्यावाश्व आत्रयेः इन्द्रः (सविता) गायत्री ॥
अ᳒द्या᳒नो॑देवसवितः । प्रा᳒जा᳒वा॑त्सा᳒वीसौ᳒भा॑गं । पा᳸रा᳸दुष्वा᳒प्न्यिं॑सुवा ॥ ७ ॥
अ द्य नो दे वषुस वि त रौ होतुवातइश। इ ह श्रु धा इषुप्र जा वाटित्सातवी स्सौटाभ गाचा। म्पायरा दूटाष्वातहो वाटाहातइश। प्नि यं सूपिवात्र। द क्षातायाटख् ॥१०॥ अ द्याखानो दे व स वि तःशू। प्र जाकाव त्सा वी सौकीभ गा म्पाटिरा दूखाष्वाण। प्नि यं सु वा उ वाकूओटट्वाखऔ हो वाशि। अ स्मा भ्यचिङ्गाततु वि त्तकमाखम् ॥११॥
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| 144 |
प्रगाथः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ प्रगाथः इन्द्रः गायत्री ॥
क्वाट्ट्यस्या᳹वृ॑षाभोयू॑वा । तुविग्री᳒वोआ᳒नानतः । ब्रह्मा᳒कस्तंसा᳒पर्यति ॥ ८ ॥
कोपव स्य वाफिर्ष भो यू वाशी। तु वि ग्रीचिवोकआकना न तोकिब्र ह्मा काटिस्तातम् । ऐटच्हाययाटऐ हीता। साकप र्याटाताखण्इश। ओपइ ळाशा ॥१२॥ कू वा कू वाती। स्या वृचाषा भो यू वाटीओखहाप्लहातइश। तु वीकाग्री वोथाच्आ ना न ताटीओखहाप्लहातइश। ब्र ह्मा काटिट्स्ताखऔ हो वाशि। स प र्या तीखी ॥१३॥ ऐ ही ऐ हीती। क्वा स्य वृ ष भोषुयू वा ऐ ही ऐ हीतू। तु वि ग्री वो आ नाषून ता ऐ ही ऐ हीतू। ब्र ह्मा क स्तं स पषूर्या ता ऐ ही ऐ हीतू। आटइ हाखाऔ हो वाशि। आखइ हीशा ॥१४॥
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| 145 |
वत्सः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ वत्सः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
ऊपह्वारे᳹गी॑रीणां᳒ । संगमे᳹चा॑नादी᳒नां॑ । धी॑या᳒विप्रो॑अजायत ॥ ९ ॥
उ पाचाह्वा राकाई गि राटिच्ईकणाचम् । सकङ्ग मे चाथिना दाटाईकनाचम् । धी याटावि प्रोटाच्आ जाकाया ता याकिमा याताआ उ वाटि। ऊखपाश ॥१५॥ इ दा मीखिदंशई दाचामि द क मी दा मीखूदशम् । उ प ह्वा रेचीगी राचाइ णांटाइ दा मीखिदंश। ई दाचामि द क मी दा मीखूदशम् । सं ग मे चाचीना दा ई नाटीम् इ दा मीखिदंश। ई दाचामि द क मी दा मीखूदशम् । धि याटावि प्रोकाच्आ जाकाया ताकाइ दा मीखिदंश। ई दाचामि द क मि दा माखूइ दात्राम् । गोचष्पा देचाप्रशट् ॥१६॥
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| 146 |
इरिम्बिठिः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ इरिम्बिठः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
प्रा᳒सम्म्रा᳒जं᳒चऋषाणीनां᳒ । इ᳸न्द्रं॑स्तोतान᳹व्यंगीर्भिः॑ । ना᳸रंनृळा᳒हम्मंही॑ष्ठम् ॥ १० ॥
प्र स म्रा जातीम् । च र्षाटाणा इ नाटिम् । आ इ न्द्राटिम् स्तो ताटान व्याटाङ्गाखइ र्भीःणा। ना राटान्ना र्षाटाच्हकम्मोपबा हा इ ष्ठाप्लीम् । हा इशा ॥१७॥ प्र स म्म्रा जोतीहातइश। च र्षा णीभिनातम् । आ इ न्द्रां स्तोटीतातन व्याटाङ्गाखइ र्भीःणा। ना र मोणिइशन्नृ षा ह मोणीइश। मं हा इ ष्ठाप्ली। होप्लइ ळाशा ॥१८॥
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| 146 |
इरिम्बिठिः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
प्रा᳒सम्म्रा᳒जं᳒चऋषाणीनां᳒ । इ᳸न्द्रं॑स्तोतान᳹व्यंगीर्भिः॑ । ना᳸रंनृळा᳒हम्मंही॑ष्ठम् ॥ १० ॥
प्र स म्म्रा ज ञ्च ॠतूषा णाखाइ नाशाम् । इ न्द्रां स्तोभितातन व्यांटागाखइ र्भीःणा। न र न्नृ षाषीह म्मं हि याफीहाप्लउ वाशा। ष्ठाखम् ॥१९॥ प्र स म्म्रा ज ञ्च र्ष णी ना मिषृन्द्रं स्तो ता न व्यं गातूइ र्भीःता। इ न्द्रं स्तो ताषीन व्य ङ्गाटिइ र्भीखान्न र नृ षा ह म्मां हि ष्ठाशॄम् । सा हचामै हाकाइ होटायाखऔ हो वाशि। मंथही ष्ठाटाख्म् ॥२०॥