| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 216 |
शुनः शेप आजीगर्तिः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ शुनः शेप आजीर्गितः इन्द्रः गायत्री ॥
आ᳒वाइन्द्रङ्कृवींया᳒था॑ । वजय᳒न्ताश्शा॑ताक्रातुं । मंहीं॑ष्ठंसिञ्चाइन्दुभिः ॥ १ ॥
आवइ न्द्रातीम् । कृवींय थाषीवाज याटिन्तातच्श्शा ताचाक्रा तुंशा। मंहि ष्ठांटिसीत। ञ्चा याटाउ वाता। दूखभिःप्ल॥ १ ॥
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छन्दः (Chandas) |
| 217 |
श्रुतकक्षः आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ श्रुतकक्ष आंगिरसः (सुकक्षो आंगिरसो वा) इन्द्रः गायत्री ॥
आताश्चिदिन्द्राना᳒ऊ᳒पा॑ । आ᳒या॑हीसातावा॑जया । इळा᳒साहा᳒स्रा॑वाजया ॥ २ ॥
अतश्चिदिन्द्र नषूउ पाताएत। आ याचाहिशशातावा जाटीयाखई षाखास हाता। स्राकवोपबाप्लजा योप्ला। हा इशा॥ २ ॥
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| 218 |
त्रिशोकः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ त्रिशोकः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
आबुन्दं᳹वृ ᳹त्राहाददे । जातः᳹प्र॑च्छद्वीमाता᳒रं । का᳒उग्रःकेहा॑शृण्विरे᳒ ॥ ३ ॥
आबुन्दं वृती। त्राचहाददाइजा ताःकूपाकच्छर्द्वि माटिताखरणम् । काउ ग्राटिकेत। हा श्रुचाण्विराइ ळाटीभाखण्। ओपइ ळाशा॥ ३ ॥
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| 219 |
मेधातिथिः काण्वः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ मेधातिथिः काण्वः इन्द्रः गायत्री ॥
बृबदू॑क्थंहवा॑महे । सृप्रा᳒का॑रस्नामू᳒ता᳒ये । सा᳸धाः॑कृण्व᳒न्ता᳒मा᳒वा॑से ॥ ४ ॥
ब्रबदुक्थं हातुवाम हातिइश। स प्राटाका राटास्ना मूकाता याचाइश। सा धाःटाका र्ण्वाटाच्न्ताकमोपबाप्लवा सोप्ला। हा इशा॥ ४ ॥
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| 220 |
गोतमो राहूगणः |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ गौतमो राहूगणः इन्द्रः (विश्वे देवाः) गायत्री ॥
ऋजु॑नीतीनोवारू॑णः । मि᳒त्रो᳒नायति᳒विद्वांसः । अर्यामा॑देवै᳒स्साजो᳒षाः ॥ ५ ॥
ऋजुनीती नोषुवरूणइ हातु। मि त्रोचाना याचातीवि द्वांटिसाइ हाति। अ र्याथामा दाटाइवाइ हाती। साजो षाटिउ वाता। ईखहाश॥ ५ ॥
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| 221 |
ब्रह्मातिथि काण्वः |
अश्विनौ मित्रावरुणौ |
गायत्री |
॥ ब्रहमातिथिः काण्वः अश्विनौ मित्रावरुणौ गायत्री ॥
दूरा᳒दीहे᳒वायात्सातः । आरूणा᳒स्पूरा᳒शिश्वीतात् । विभा᳹नूंविश्वाथातनात् ॥ ६ ॥
दू राकादीपहेवयत्सा ताःशु। आ रूचाणाचप्सूराशि श्वाटीइ तातात् । वीभा नूंटिवीत। श्वा थाचातनादि ळाटीभाखण्। ओपइ ळाप्ला॥ ६ ॥
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| 222 |
विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा |
इन्द्रः |
गायत्री |
॥ विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निवा इन्द्रः गायत्री ॥
आनो॑मित्रावरुणा । घृतैः᳒गव्यूतिमुक्षतं । मध्वारा᳒जां॑सिसुक्रतू ॥ ७ ॥
आनोमित्राव रुकूणा औथाहो वाटा। घृ तैतार्गव्यूतिमु क्षाकुता मौथाहो वाटा। मा ध्वाथारा जांटासीकसु औथाहो वाटा। कृ तूकाइ ळाटाभाखण्। ओपइ ळाप्ला॥ ७ ॥
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| 223 |
प्रस्कण्वः काण्वः |
मरुतः |
गायत्री |
॥ प्रस्कण्वः काण्वः (कण्वो घौराः) मरुतः गायत्री ॥
ऊ᳒दूत्ये᳒सूना᳒वोगी᳒राः॑ । काष्ठार्यज्ञेष्वात्नता । वा᳒श्रा᳹आ॑भीजुया᳒ता॑वे ॥ ८ ॥
उदुत्येसू नातुवोगि राःति। का ष्ठाथाच्य ज्ञाकाइषु वाटित्नाखताण। वाकश्रा आटाभीत। ज्ञूपयाशताखवोप्ल। हा इशा॥ ८ ॥
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| 224 |
मेधातिथिः काण्वः |
विष्णुः |
गायत्री |
॥ मेधातिथिः काण्वः विष्णुः गायत्री ॥
ईदंविष्णुर्विचा॑क्रमे । त्रेधा᳒नी᳒दे॑थेपादंसा᳒मू॑ढमस्यपांसूले᳒ ॥ ९ ॥
इदा मेति। वि ष्णूटार्विचा क्राखिमाणइश। त्राइ धाचिनि दकाधाचइ पायादांटस मूटाहोयढाटमात। स्याटपाखऔहो वाशि। एंतसू लेताच्॥ ९ ॥