| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 497 |
अमहीयुराङ्गिरसः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ अमहीयुराङ्गिरसः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आ᳒चिक्रादत्वृषाहा᳒रीः॑ । माहा᳒न्मित्रो᳹ना ᳹द॑र्शातः । संसू᳒र्येणदिद्युते ॥ १ ॥
अ चि क्र दातीदा चीकाच्क्राकदाखद चि क्र दा देप्लु। वृ षा ह रातीइशवा र्षाकाच्हाकराखइ वृ षा ह रा एप्लू। म हा न्मि त्रोतीमा हाकान्मिकत्रोखाम हा न्मि त्रा एप्लु। न द र्श तातीना दकार्शाकताखन द र्श ता एप्लु। सं सू र्यातिइशसं सूकाच्रीकयाखइ सं सू र्या एप्ल। ण दि द्यु तातीइशणा दीकाच्द्यूकताखइ णा दाशिइ द्यु ता बूप्ली। बाश ॥१॥
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छन्दः (Chandas) |
| 498 |
उचथ्य आङ्गिरसः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ उचथ्य आङ्गिरसः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आ᳒तेदक्षं॑मायोभू᳒व॑म् । व᳒न्ही᳒मद्या᳒वृ॑णीमहे᳒ । पा᳒न्तामा᳹पू॑रूस्पृह॑म् ॥ २ ॥
आ ते द क्षातीम् । म यो भूभिवातम् । व न्हि म द्या वृ णीटूमाखहाणइश। पा न्ताकामा ईटायात। पू रू स्पृटिट्हाखऔ हो वाशि। उ ऊखापाश ॥२॥ आ ते दाखिक्षांशमा यो भूखिवणम् । व न्हि म द्या वृ णिफूम होखाहा इशा। पा न्ताटामातईटयातपूटट्रूखऔ हो वाशि। स्पृखहशम् ॥३॥ आ ते द क्ष म्म योफूभु वांखाहा इशा। व न्हि म द्या वृ णीफूम होखाहा इशा। पा न्तायामाटपू रूकास्पृ हा मी ळाटीभाखण्। ओपइ ळाशा ॥४॥
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| 499 |
मेधातिथिः काण्वः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ मेधातिथिः काण्वः पवमानः सोमः गायत्री ॥
अ᳸ध्व॑र्योआ᳒द्री॑भीस्सूतं । सो᳸मं॑पावी᳒त्रा᳒आ᳒नाया । पुनाही᳹न्द्रा॑यापा᳒ता॑वे ॥ ३ ॥
अ ध्व र्योपिआण। द्रि भा इ स्सूभीतांतसो मंकापाखवीण। त्रा आयाना याटा। पु नाटाही न्द्राखाऔ हो वाशि। या पा ताटिवेख ॥५॥ अ ध्व र्योषिऔ हो अ द्री भीःतु। सूचत मौटाहोतवातइशसो मंकापाखवीण। ओ इ त्रा यायीना याटा। पु ना हाटिट्इ न्द्राखाऔ हो वाशि। एतच्याकपा ताटावेख ॥६॥
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छन्दः (Chandas) |
| 500 |
भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा पवमानः सोमः गायत्री ॥
ता᳒रत्सा᳒मन्दीधा॑वती । धा᳸रासूतस्या᳒न्धा॑सः । ता᳒रत्सा᳒मन्दीधावती ॥ ४ ॥
त र त्स मातीन्दीतधा वायाताटइश। धा राटासूखताण। स्या न्धाटाट्साखऔ हो वाशि। ता र त्स म न्दी धाकुव तीखी ॥७॥
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| 501 |
उचथ्य आङ्गिरसः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ उचथ्य आङ्गिरसः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आ᳒पा॑वस्वा᳒साहास्री᳒णं । रा᳒यिंसो॑मासूवी᳒र्यम् । अस्मेश्रा᳒वां᳸सिधारया ॥ ५ ॥
आ प व स्वाती। साचह स्रि णांटिहु वाटाइ हु वाटिहोचइश। र यिंकासो माकासु वी र्यांटिहु वाटाइ हु वाटिहोचइश। अ स्मैथाश्र वां सि धाकीरा याटाहु वाटाइ हु वाटिहोटट्याखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥८॥
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| 502 |
अवत्सारः काश्यपः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ अवत्सारः काश्यपः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आनूप्रत्ना᳹सा॑आया᳒वाः॑ । पादन्ना᳒वी॑योअक्रमुः । रुचे᳒ज॑नान्तासूर्य॑म् ॥ ६ ॥
आ नु प्र त्नाषीस आ यातिवाःत। पा द न्न वीषीयो अ क्र मूःची। रू चे ज ना न्तापुसूशहि म्मा एभि। रीखयशम् ॥९॥
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| 503 |
निध्रुविः काश्यपः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ निध्रुविः काश्यपः पवमानः सोमः गायत्री ॥
अ॑र्षासोमा᳒धूमात्ता॑मः । आभीद्रो᳹णा॑नीरो᳒रूवात् । सी᳒दन्यो᳒नौवा᳒नेष्वा ॥ ७ ॥
आ र्षाचाइ हाशा। सो मा द्यु माटीक्ता माचाइ हाशा। आ भाचाइशइ हाचा। द्रो णा नि रोटीच्रूकवाचदि हाशा। सीकदाचनि हाशा। यो नौ व नाटीच्इशषू वाचाइ हाशा ॥१०॥ आ र्षाकाहातबुश। सो म द्यु म क्त मोषूअ भि द्रोटिणातनि रो औभिहोतरू वाटात्सी दा उ वाती। यो नौ वापिनेशहि म्मा एभि। षूखवाश ॥११॥ अ र्षा सो मा द्यु माफूक्त मोखाअ र्षा सो माशी। द्यु म क्त मोकीअ भि द्रोकिणाटहातहातइश। नी रोचारू व त्साकिइ द न्यो नौटीहातहातइश। वा ना इ षुटीवाखण्। ओपइ ळाशा ॥१२॥
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| 504 |
असितः काश्यपो देवलो वा |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ असितः काश्यपो देवलो वा पवमानः सोमः गायत्री ॥
वृ᳒षा॑सोमाधूमंआ॑सी । वृषा᳒देवावृ᳒षाव्रा॑तः । वृषाध᳒र्मा॑णिदध्री᳒षे᳒ ॥ ८ ॥
वृ षा सो माती। द्यू मंचाआयसाटइश। वृ षा दा इ वोटुहातइशवा र्षाकाव्राखताःण। वृ षा ध र्माकीइटयात। णा इ दकिद्रि षा इ ळाटीभाखण्। ओपइ ळाशा ॥१३॥
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| 505 |
भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा पवमानः सोमः गायत्री ॥
ईषे᳒पा॑वा᳸स्वाधा᳒रा॑या । मृज्या᳒मा॑नोमानीषी᳒भिः॑ । इ᳸न्दो॑रूचा᳒भीगा᳒ईहि ॥ ९ ॥
इ षे प वाती। स्व धा र यौकीहो वा हाखिऔ हो वाशि। मृ ज्य मा नोकीम नी षी भीःटीख्। इ न्दोचारूकचाफभि गा औशिहो वा हाखिऔ हो वा हीख ॥१४॥
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| 506 |
कश्यपो मारीचः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ कश्यपो मारीचः पवमानः सोमः गायत्री ॥
मन्द्राया॑सोमाधा᳒रा॑य । वृषा॑पवस्वदे᳒वा᳒युः । अव्यावा᳒रे॑भिरास्मायुः ॥ १० ॥
म न्द्र या सोती। मा धा र याषीवृ ष पाटिवातच्। स्वाकदा इ वाटियूःत। अ व्या वाटिट्राखऔ हो वाशि। भि र स्म यूःतीच् ॥१५॥
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| 507 |
कश्यपो मारीचः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ कश्यपो मारीचः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आया᳒सोमसूकृत्या᳒या । माहा᳒न्सन्नाभ्या॑वर्धथाः । म᳸न्दा॑नाइ॑द्वृषायसे ॥ ११ ॥
आ याणाफ्सोखम सू कृ त्य याशु। मा हा न्स न्ना भ्य वाटूर्द्धाखथाःण। मायन्दाटनायईटद्वृ षा याखि। सात्रइश ॥१६॥
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| 508 |
असितः काश्यपो देवलो वा |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ असितः काश्यपो देवलो वा पवमानः सोमः गायत्री ॥
आया᳒वीचर्षणीर्हितः᳒ । पावा॑मानस्साचे॑तति । हिन्वाना᳹आ᳸प्यंबृहात् ॥ १२ ॥
आखबु हौ हो वा हाषुअ या वि चाशी। र्ष णा इ र्हाटीइ ताःखा। आखबु हौ हो वा हाषुइ प व मा नाःशु। सा चा इ ताटीताखइश। आखबु हौ हो वा हाषुइ हि न्वा न याशु। पि यौटाहौ हा होखिबाप्लबृ हाप्लात् । हा इशा ॥१७॥
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| 509 |
कविर्भार्गवः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ कविर्भार्गवः पवमानः सोमः गायत्री ॥
प्राणा॑इन्दोमाहेतू᳒नाः॑ । ऊर्म्मि॑न्नाबिभ्रादर्ष॑सि । आभिदेवं᳒आयास्याः॑ ॥ १३ ॥
प्र ण इ न्दोफीऐ ही ऐ हीखीयाश। मा हे तु न ऐटुही ऐटहीटयात। ऊकर्म्मि न्न बि भ्रषीद र्ष सी ऐटूऐ ही ऐ हीखीयाश। आ भा इ दाटीट्इ वंखाऔ हो वाशि। आ याटास्याःख ॥१८॥ प्र ण इ न्दोफीइ याखाईखयाश। मा हे तु न इ याटूईटयात। ऊकर्म्मि न्न बि भ्रषीद र्ष सी याटीईटयात। आ भा इ दाटीइ वंखाऔ हो वाशि। एतच्आकयाटस्याःख ॥१९॥
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| 510 |
जमदग्निर्भार्गवः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ जमदग्निर्भार्गवः पवमानः सोमः गायत्री ॥
अपध्नन्पा॑वाते᳒मृधाः॑ । आ᳒प᳸सो᳒मोआ᳒राब्णः᳒ । गच्छन्निन्द्रा॑स्यनिष्कृतम् ॥ १४ ॥
हो ईखायाप्लहो ईखाया ई या हा इशु। अ प घ्नाटिन्पाखहो ईखायाप्लहो ईखाया ई या हा इशु। वा ता इ माटीट्र्द्धाखऔ हो वाशि। अ प सोकिमो अ राटिवि ण्णाःखाहो ईखायाप्लहो ईखाया ई या हा इशु। ग च्छ न्नाटिइ न्द्राखाहो ईखायाप्लहो ईखाया ई या हा इशु। स्या ना इ ष्काटीट्र्क्ताखऔ हो वाशि। ईख ॥२०॥