| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 487 |
असितः काश्यपो देवलो वा |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ असितः काश्यपो देवलो वा पवमानः सोमः गायत्री ॥
ऊ᳒पोषू᳒जा᳒तामप्तू᳒रम् । गो᳸भि॑र्भङ्ग᳒म्पारी॑ष्कृतम् । इ᳸न्दु॑न्देवा᳒आ॑यासिषुः ॥ १ ॥
इ हाटाच्इकहाशउ पो षु जा त माटूच्प्तूकराचमि हाशा। इ हाटाच्इकहाशगो भि र्भ ङ्ग म्प राटूच्इ ष्कृकाताचमि हाशा। इ हाटाच्इकहाशइ न्दु न्दे वा अ याटूच्सीकषूःचइकहाश ॥१॥ आषउ पो षु जा त माटूच्प्तुकराचमु पाशा। गो भाटाइ र्होकाच्इश। भ ङ्ग म्प राटीइ ष्कृ ताचिमु पाशा। इ न्दुंटाच्होकइश। दे वा अ याटीसि षु रातिआ उ वाटि। उ ऊखापाश ॥२॥ उ पो ष्वौ हो इषुजा ताताम् । आ प्तूटारातमौ होटावातइ गोचाभि र्भाखागणम् । ओ इ पा रीयीष्कृ ताटाम् । इ न्दूटान्दे वाखाऔ हो वाशि। अ या सि षूःखी ॥३॥
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ऋषिः (Rishi) |
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| 488 |
असितः काश्यपो देवलो वा |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ असितः काश्यपो देवलो वा पवमानः सोमः गायत्री ॥
पुनानो᳒आ॑क्रामीदाभिः᳒ । वि᳒श्वामृधोवी᳒चऋ᳒षणिः । शुम्भ᳒न्तीवी᳹प्र॑न्धीतीभीः॑ ॥ २ ॥
पु ना नो याती। क्रा मी दाखिभीःण। वि श्वाटामाखर्द्धोशवी च र्षाखिणाणइःश। शु म्भाटान्ताखवीण। प्राटट्न्धाखऔ हो वाशि। तीखभीःप्ल ॥४॥
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| 489 |
अमहीयुराङ्गिरसः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ अमहीयुराङ्गिरसः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आवीश᳒न्काला᳹शं॑सू॑तः᳒ । विश्वाअ᳹र्ष॑न्ताभि᳒श्री᳒याः॑ । इन्दूरि᳒न्द्रा॑यधीयते ॥ ३ ॥
आ वि श न्का लातुशं सु ताःति। वा इ श्वाकिअकर्षथन्नाकभा इ श्रा याटीओटहातओ वाटाओखहाण। इ न्दू राटिट्इ न्द्राखाऔ हो वाशिय धी य तेखी ॥५॥ आ वीफाश ङ्काफाल शंफाप्ल्सु तो वाखिइ श्वाणा। अ र्षथाच्न्नाकभा इ श्रा याटीऔ हो औ होखीवाश। औटहो औ होतिच्इ न्दूकारायइ न्द्राटा। या धी याटिट्ताखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥६॥
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| 490 |
बृहन्मतिरांगिरसः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ बृहन्मतिराङ्गिरसः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आ᳸स॑र्जिरथ्यो᳒या᳒था॑ । पावी᳹त्रेचमूवोठ॑सूतः । का᳹र्ष्ण॑न्वा॑जीन्या॑क्रमीत् ॥ ४ ॥
अ स र्जि राती। थि यो यापिथाश। पा वि त्रेचिचा मु वोटिस्सूखताःण। काकर्ष्म न्न्वाटाजीत। नि याचाक्राकमा इ दौपिहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥७॥
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| 491 |
जमदग्निर्भार्गवः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ जमदग्निर्भार्गवः पवमानः सोमः गायत्री ॥
प्र()य᳸त्गा॑वोनभू᳒र्णायः । त्वेषा᳒आया᳒सोआ᳒क्रा᳒मुः । घ्न᳸न्तः॑कृष्णा᳒मापत्वा᳒च॑म् ॥ ५ ॥
प्र य द्धातिबुश। गा वोथाच्ना भूकार्णाययापस्त्वे षाता। अ या सो अ क्राकुमु घ्नाचान्ताः काटार्ष्णातम् । आ पा त्व च मौकुहोटट्हाखऔ हो वाशि। उ ऊखापाश ॥८॥ प्र य त्गाकिवोखन भू र्णा याःशी। त्वा इ षाचिअ याकासोटअ क्र मूकिघ्नापतो हाणाइश। काटट्र्ष्णाखऔ हो वाशि। आथप त्वाटाचाखम् ॥९॥
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| 492 |
प्रभूवसुरांगिरसः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ प्रभूवसुराङ्गिरसः पवमानः सोमः गायत्री ॥
अपध्नन्पा॑वासेमृ᳒धाः । ऋतूवित्सो॑मा᳒मात्सारः᳒ । नुतस्वा᳒दे॑वायुञ्ज᳒न॑म् ॥ ६ ॥
अ प घ्न न्हो इषुपा वाता। साचइ मायार्धाःट। क्र तू वि त्सोकीच्मा माकात्सायराःट। नु द स्वाटिट्दाखऔ हो वाशि। व युकान्ज नाटाख्म् ॥१०॥
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| 493 |
मेध्यातिथिः काण्वः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ मेध्यातिथिः काण्वः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आया᳒पा॑वास्वाधा᳒रा॑या । या᳒या᳒सू᳒र्यामरो॑चयः । हिन्वानो᳒मानू॑षीरापाः᳒ ॥ ७ ॥
ए आ या प वातु। स्व धाकारा याटाच्हायउ वाटाच्ऊखपाश। या या सूकिर्य म रोकिचा याटाच्हायउ वाटाच्। ऊखपाश। हि न्वा नो मा नु षाटूइ र्होकाच्याकप याताआ उ वाटि। उ ऊखापाश ॥११॥
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| 494 |
निध्रुविः काश्यपः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ निध्रुविः काश्यपः पवमानः सोमः गायत्री ॥
सापा॑वास्वायआ॑वी॑था । इ᳸न्द्रं᳸वृत्राया᳒ह᳒न्ता॑वे । वब्रीवां᳹स॑म्माहीरापः᳒ ॥ ८ ॥
स होताइ प व स्वाशी। या याटावीकथा इथान्द्र वृ त्राटिया हकान्ताखवाणइश। ओ वाटाओखवाण। व ब्री वांटिसांत। मा हीकाराकपा औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥१२॥
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| 495 |
निध्रुविः काश्यपः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ निध्रुविः काश्यपः पवमानः सोमः गायत्री ॥
आया᳒वीतीपा᳒रिस्रावा । यस्ताइन्दो॑मातेष्वा । आवा᳒ह॑न्नावातीर्ना᳒वा ॥ ९ ॥
अ या वी तीती। पाकरि स्र वा य स्ताकुइ न्दो मा दाकीइ षु वाटिअ वा हाभिन्नात। वाततोपबाप्लना वोप्ला। हा इशा ॥१३॥ अ या वीकिता औथाहो वाटा। औ होथाच्औकहोटट्वाखऔ हो वाशि। प रिकास्रा वाकाय स्त इ न्दोकीच्औकहो वाटा। औ होथाच्औकहोटट्वाखऔ हो वाशि। म देटाच्षु वाकाअ वाकाहा न्नाकाच्औकहो वाटा। औ होथाच्औकहोटट्वाखऔ हो वाशि। व ती र्न वाटीख् ॥१४॥ आ याणावी ताणाफ्इ पाखारि स्र वाशि। या स्ताचाइ न्दोथाच्मा दाकाइ षूयावाट। अ वा हाभिन्नात। व तीकार्न्नाकवा औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥१५॥
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| 496 |
अमहीयुराङ्गिरसः |
पवमानः सोमः |
गायत्री |
॥ अमहीयुराङ्गिरसः पवमानः सोमः गायत्री ॥
पारी॑धुक्षं᳹सा᳸ना॑द्रायि᳒म् । भारद्वा᳹ज॑न्नोअ᳒न्धा॑सा । स्वानोअ॑र्षपावी᳒त्राआ᳒ ॥ १० ॥
प रि द्यु क्षातीम् । ओ इ स न द्रा यीटूम् । ओ इ भ र द्वा जाटूम् । ओ इ नो अ न्ध सापूस्वा नोखाअ र्षाता। वाकवोपबाप्लत्रा योप्ला। हा इशा ॥१६॥