| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 21 |
प्रयोगो भार्गवः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ प्रयोगो भागर्वः अग्निः गायत्री ॥
अग्निंवोवृधन्तं । अध्वाराणांपुरूतामं । अच्छानाप्नेसाहा᳒स्वते ॥ १ ॥
अ ग्निं वो वृ धातुन्तातम् । आ ध्वाचारा णांथाच्पू रूकातायमौटहो वाटाहातइश। आ च्छाटाना प्त्रेटा। साकहोपबाप्लस्वा तोप्ला। हा इशा ॥१॥ अ ग्निं वातिएत। वृ ध न्ताषिम ध्व रा णां पु रूकूत म म च्छाटीच्होयइ नाटाप्त्रेत। सा हा स्वापितात्रइश। ईखतिश ॥२॥ अ ग्निं वोतिहातइश। वृ धाटान्तातम् । आ ध्व रा णां पु रूयूतापमाशम् । अ च्छा न प्त्रोखीहाणइश। साकहोपहाचइश। स्वाकता औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥३॥
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| 22 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ भाद्वाजो बार्हस्पत्यः अग्निः गायत्री ॥
अग्निस्तिग्मे᳹ना॑शोचीषा॑ । यंसद्वि᳒श्वंन्याटट्यत्रीणं । अ᳒ग्नि᳒र्नो॑वंसतेरायिम्᳸ ॥ २ ॥
आ ग्नाटाउ वोखावाश। ति ग्मेथाच्नाकशो चा इ षाटीउ वोखावाश। यं साटाउ वोखावाश। वा इ श्वा न्या त्रा इ णाटूउ वोखावाश। अ ग्नि र्नोटिवं स तेकिच्रा यीचाम् ॥४॥ ओ हा या ग्नीःती। ताखइ ग्मेशाना शो चाखिइ षाणा। यं साटाद्वाखइ श्वाशानी या त्राखिइ णणाम् । अ ग्नि र्नोटिवं साटाट्ताखऔ हो वाशि। राखयिशम् ॥५॥
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| 22 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
अग्निस्तिग्मे᳹ना॑शोचीषा॑ । यंसद्वि᳒श्वंन्याटट्यत्रीणं । अ᳒ग्नि᳒र्नो॑वंसतेरायिम्᳸ ॥ २ ॥
अ ग्नि स्ति ग्मेषीन शो चि षा इ हातू। यं स द्वि श्वषीन्न्य त्री णाटिमि हाता। अ ग्नि र्नो वं स ताटूइ हाता। रापआ या इंप्लि। हा इशा ॥६॥
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वामदेवो गौतमः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ वामदेवो गौतमः अग्निः गायत्री ॥
अग्नेमृ᳹ळामाहंआ॑सि॑ । आ᳒याआ᳹दे॑वायुन्ज॑नम् । ईये᳸थाबर्ही॑रासादम् ॥ ३ ॥
अ ग्ना इ मृ ळाटुम हं याखिसीण। आ य आ दाटीइ व यु न्जाखीनणम् । ई ये था बाटीर्हि रा साखि। दात्रम् ॥७॥ आणग्नेफमृ ळा माफिहं या सिफिओ हाखाओखहाश। आणयाफआ दे वाफियु न्ज नाफिमोखहा ओखाहाश। इ या ई थाटीब र्हि रा साखा। दात्रम् ॥८॥
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वसिष्ठो मैत्रावरुणिः |
अग्निः |
गायत्री |
| 25 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ वसिष्ठो मैत्रावरुणिः अग्निः गायत्री ॥ ॥ भाद्वाजो बार्हस्पत्यः अग्निः गायत्री ॥
अ᳒ग्नेर᳹क्षाणोअं᳒हा॑सः । प्रा᳒तीस्मदेवरिषाताः । ता᳒पीष्ठैराज᳒रोदहा ॥ ४ ॥
अ᳸ग्नेयुंक्ष्वाहीयेता᳒वा॑ । अश्वा॑सोदेवासाधावाः । आ᳒रं॑वा᳹ह॑न्त्याशा᳒वाः॑ ॥ ५ ॥
अ ग्ने रा क्षाखीणोशअं हा सःप्लि। प्रा ति स्म देकीवा री षाटिताःत। ता पा इ ष्ठाटीइ राता। ज रो दाटिहाखण्। ओपइ ळाशा ॥९॥ अ ग्ने यू ङ्क्ष्वाखीहीशये ता वाप्लि। अ श्वा सो देचीवा सा धाटिवाःत। आ रं वाटिहातन्तीकया शाटावाःखण्। ओपइ ळाशा ॥१०॥
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वसिष्ठो मैत्रावरुणिः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ वसिष्ठो मैत्रावरुणिः अग्निः गायत्री ॥
नित्वा॑नक्ष्यविस्पते । धू᳒म॑न्त᳒न्धीमहेवायम् । सु᳒वी᳒रामग्नआ᳸हुतः ॥ ६ ॥
नि त्वा होखिइ न क्ष्याशि। वाचइ स्पा ताचिइशद्यूकम न्तथान्धा इ माचिहेकवाखयणम् । सु वोताहातइश। रा म ग्नाचिओपबा हू तोप्लि। हा इशा ॥११॥
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विरूप आङ्गिरसः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ विरूप आंगिरसः अग्निः गायत्री ॥
अ᳒ग्नि᳒र्मूर्द्धादीवाःकाकू᳒त् । पा᳒तीःपृथिव्या᳒आ᳒यम् । आपांरेतांसिजिन्वति ॥ ७ ॥
अ ग्नि र्मू र्धा दीतुवः क कूतित् । पा तीःटापा र्त्थीटाव्या अ याचिम् । आ पांटारा इ तांटिसीकजि न्वाटाताखण्इश। ओपइ ळाप्ला ॥१२॥
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शुनः शेप आजीगर्तिः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ शुनः शेप आजीर्गितः अग्निः गायत्री ॥
ई᳒मामू॑षुत्वाम᳒स्मा॑कम् । सा᳒नि᳹ङ्गा॑यात्र᳒न्नव्या॑सम् । अग्ने॑दे᳒वे᳒षुप्रा᳒वोचः ॥ ८ ॥
इ म मू षूती। त्वा मा स्माटिकातम् । सा निंटाहो इ गा याटीहोकतृथन्न व्यांटासाताम् । आ ग्नेटाहो इ दे वाटीहोकथ्षु प्रा वोटिचाःखण्। ओपइ ळाप्ला ॥१३॥
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गोपवन आत्रेयः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ गोपवन अत्रयेः अग्निः गायत्री ॥
तन्त्वा॑गोपा᳒वा॑नोगिरा । जा᳒नि॑ष्ठदग्नेअङ्गिरः । सा᳒पा॑वकाश्रू॑धीहा᳒व॑म् ॥ ९ ॥
त न्त्वा गो पाती। वा नोटागाखइ राःणा। ज नाचाइ ष्ठा द ग्ना याटूङ्गाखइ राःणा। स पौ वा उ वोखुवाशकौ वा उ वोखिवाण। श्रु धी ह वांप्ली। होपइ ळाशा ॥१४॥
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वामदेवो गौतमः |
अग्निः |
गायत्री |
| 31 |
प्रस्कण्वः काण्वः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ वामदेवो गौतमः अग्निः गायत्री ॥ ॥ प्रस्कण्वः अग्निः गायत्री ॥
पा᳒रिवा᳒जपतीःकाविः᳒ । अ᳒ग्नि᳒ऋ᳒हव्या᳒न्या॑क्रमीत् । दध᳒द्रत्ना᳒नीदाशू᳒षे᳒ ॥ १० ॥
ऊदूत्यं᳒जाता᳒वे॑दसम् । दे᳒वं᳒वाहन्तींकेता᳒वाः॑ । दृशे᳹वि ᳹श्वा॑यासूर्यम् ॥ ११ ॥
प रि यौ होषीइ वा जाति। पा ताचाइः कायावीःट। अ ग्नीचार्ह व्याथान्नाटयः क्र मीटित् । द धा द्राटिट्त्ना औ हो वाशि। नि दाताशू षेटाख् ॥१५॥ उ दु त्य मोतीहातइश। जा ता वेकिदाखसणम् । देकवं व ह न्ती केकुताखवाःण। दा र्शेपाहाणइश। वा इ श्वाकिच्याकसू र्या मौपिहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥१६॥
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मेधातिथिः काण्वः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ मेधातिथिः काण्वः अग्निः गायत्री ॥
का᳒वी᳒माग्नी᳒मू᳒पा॑स्तुहि । स᳒त्या᳒धर्मा॑णमाध्वारे । दे᳒वा᳒मा॑मीवाचा᳒ता॑नम् ॥ १२ ॥
क वि म ग्नीतीम् । उ पा स्तूटिट्हाखऔ हो वाशि। स त्याचाधकर्मा ण माचिध्वा रेचा। दे वा म मीती। वा चा ताटिनाखण्म् । ओपइ ळाप्ला ॥१७॥
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सिन्धुद्वीप आम्बरीषः त्रित आप्त्यो |
अग्निः |
गायत्री |
॥ सिन्धुद्वीप आम्बरीषः त्रित आत्यो वा अग्निः गायत्री ॥
श᳸न्नो॑देवी᳒राभीष्टा॑ये । श᳒न्नो॑भूवन्तूपीता᳒ये॑ । श᳒य्योराभि᳒स्रावन्तूनः ॥ १३ ॥
श न्नो दे वीःती। आ भी ष्टाटियाखइ श न्नो भु वाशुम् । तू पी ताटियाखइ श य्यो र भीःशु। श्रा वा न्तूटिट्नाखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥१८॥ हु वाताहोपइ श न्नो दे वीप्लुर भि ष्ट याङिइश। हु वाताहोपइ श न्नो भु वाप्लुन्तू पी ता याङीइश। हु वाताहोपइ श य्यो र भीप्लुस्र व न्तुङिनाःश। हु वाताहोटयाखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥१९॥
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उशना काव्यः |
अग्निः |
गायत्री |
॥ उशना काव्यः अग्निः गायत्री ॥
कस्यानू᳒नम्पारी॑णसि । धीयो॑जिन्वसिसत्पते । गो᳒षा᳒तायस्यातागी᳒राः᳒ ॥ १४ ॥
क स्या नू नाटीम्पा री णाखिसीण। धी यो जि न्वाटीसी सा त्पाखिताणइश। गोचषा ताचाया स्याटाट्ताखऔ हो वाशि। उ प्गीखाराःश ॥२०॥ ओकहो वाथाइ हु वाटिइ हु वाचिएत। क स्य नू नाखीम्पा रीचाणा सीफा। ओकहो वाथाइ हु वाटिइ हु वाचिएत। धी यो जि न्वाखीसी साचात्पा तीफाम् । ओकहो वाथाइ हु वाटिइ हु वाचिएत। गोषषा ता य स्य ता गाखूइश। राःत्र ॥२१॥