| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 97 |
दीर्घतमा औचथ्यः |
अग्निः |
उष्णिक् |
॥ दीर्घतमा औचथ्यः अग्निः उष्णिक् ॥
पूरू᳒त्वा॑दाशीवं᳒वो॑चे᳸त् । आरीरग्नेता᳹वास्वीदा᳒ । तोद᳒स्ये᳒वशारणआ॑माहास्या॑ ॥ १ ॥
पु रूता। त्वाकदा शि वं वो चा एपूदा री र ग्ना इशु। ताकव स्वि दाचि। तोकद स्ये व श र ण याटूहोचइश। म हाटाहो येटास्यो याखाऔ हो वाशि। ईख ॥१॥ पु रू त्वा दाषीशि वं वो चेतुत् । आ री राखिग्ना इशाता वा स्वाखिइ दाणा। तो द स्ये वषीश र ण याखीहाणइश। माटहातहो येटास्यो याखाऔ हो वाशि। ईख ॥२॥
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| 97 |
दीर्घतमा औचथ्यः |
अग्निः |
उष्णिक् |
पूरू᳒त्वा॑दाशीवं᳒वो॑चे᳸त् । आरीरग्नेता᳹वास्वीदा᳒ । तोद᳒स्ये᳒वशारणआ॑माहास्या॑ ॥ १ ॥
पु रु त्वा दाषीशि वं वोतिचेतत् । आ रा इ रापीग्ना इशा। ता वा स्वाखिइ दाणा। तो दा स्याखिइ वाशाशा रा णाखियाण। मा हाखास्यात्र। एतच् ॥३॥ पु रू त्वाखिदा शि वं वो चेशुत् । अ रि र ग्नाषीइ त वाटिस्वाखइ दाणा। तोखदाप्लस्याखइ वाशाशा रा णाखियाण। मा हाखा। स्यात्र ॥४॥ । पु रू त्वापिदा शि वं वो चे द्धा बुशृ। हाकबु होटाहा उ वोखिवाण। अ रि र ग्नेकीत वा स्वीकिदाच। हाकबु होटाहा उ वोखिवाण। तोकद स्येकाव श राकिणा याचा। हाकबु होटाहा उ वोखिवात्र। एतचमाकहाटस्याख ॥५॥
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| 98 |
विश्वामित्रो गाथिनः |
अग्निः |
उष्णिक् |
॥ विश्वामित्रो गाथिनः अग्निः उष्णिक् ॥
प्र᳸होत्रे॑पूर्वीयंवाचाः॑ । अग्नाये॑भरताबृहा᳒त् । वीपांज्योती॑षिबि᳹भ्रा॑तेना᳒वेधासे॑ ॥ २ ॥
प्र हो त्रे पूती। व्यं व चो ग्न याटुइ भाचाराकताचबृ हाचात् । वी पा न्जोटितीतम् । षी बा इ भ्राटीट्ताखऔ हो वाशि। न वेताच्धाटसेख ॥६॥ प्र हो त्रा इ पूखुर्वी यं वा चाःप्ली। आ ग्न येटिभाचर ताकाच्बृकहाटत् । वी पा न्जो ती षी बीफूभ्र ताताइश। नापवेशधाखसोप्ल। हा इशा ॥७॥
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| 99 |
गोतमो राहूगणः |
अग्निः |
उष्णिक् |
॥ गौतमो राहूगणः अग्निः उष्णिक् ॥
अग्नेवाज॑स्यागोमा॑तः । ई᳒शा॑नस्सहसोयहो । अ᳸स्मे᳒देहीजातवेदोमा᳒हिश्रावाः ॥ ३ ॥
अ ग्ने वा जाफीस्या गो मा तोचीवाश। ईकशा न स्सा ह सोकुया होकाअ स्मेकादे हीकाजा ताचावे दोथाम हाटाइ श्र वाटिउ वाता। श्रोचधि याटाएटहि याखाण्। ओपइ ळाशा ॥८॥ अ ग्ने वा जषीस्य गो म तोतीहोतवात। ईकशा न स्सा ह सोकुयाखहोश। आचस्मेयदा इ हीपिजा ताप्लावे दोता। मापहीशश्राखवोप्ल। हा इशा ॥९॥
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| 100 |
विश्वामित्रो गाथिनः |
अग्निः |
उष्णिक् |
॥ विश्वामित्रो गाथिनः अग्निः उष्णिक् ॥
अ᳸ग्ने᳒या᳒जीष्ठोआध्वारे । देवान्दे॑वायातेयाजा । होता॑मन्द्रो᳹वी॑राज᳒स्यातिसृधाः ॥ ४ ॥
अ ग्ने य जि ष्ठोषुअ ध्व रातिएत। दे वा न्दे वाचीया ताकाइ यायाजाटहु वाताहो वाका। हो ताचाम न्द्रोथाच्वी राकाजायसीटहु वाताहो वाका। आ ति स्राटिइ धाःखाण। ओपइ ळाशा ॥१०॥ आ ग्नाफाइ याखाईखयाश। या जि ष्ठो अ ध्वा राषूइ दे वा न्देतीवा य तेटिहा बु हो वाकी। या जाटाहो ताटाम न्द्रोथावीकरा जापासीश। आटती याखाऔ हो वाशि। स्रीखधाःप्ल ॥११॥ अ ग्नि या ओ वातु। या जि ष्ठो अ ध्व राषूइ दे वा न्दाटीइ वाता। आ या तेचिया जाटाहो तापाउ वाशा। म न्द्रोथाच्वी राकाजाटसाखऔ हो वाशि। आथति स्री धाःटिख् ॥१२॥
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| 101 |
त्रित आप्तयः |
पवमानः सोमः |
उष्णिक् |
॥ त्रित आत्यः पवमानः सोमः उष्णिक् ॥
जज्ञान᳒स्सप्ता᳒मातृ᳒भिः । मे᳒धामाशा॑सातश्रिये᳒ । आ᳸यन्ध्रुवोरायीणां᳹चीके॑तादा ॥ ५ ॥
ज ज्ञा न स्साती। प्त माकाच्तृकभा इ र्मे धाकीमाखशाण। सा त स्राचियाटअ याटान्ध्रुखवाःण। र याटाइ णाताञ्चि का इ ताटीट्दाखऔ हो वाशि। ऊखपाश ॥१३॥
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| 102 |
इरिम्बिठिः काण्वः |
अदिति |
उष्णिक् |
॥ इरिम्बिठः काण्वः अदितिः उष्णिक् ॥
ऊत᳒स्या᳒नोदीवामातिः । आदी॑तीरूत्यगमात् । साश᳸न्तातामायास्कारादपश्री᳒धाः ॥ ६ ॥
उ त स्या नोखीदी वा मा तिःप्ली। आकदी ति रूकिति याचागायमाटत्सा शा न्ताटितात। मा याफास्क रा उ वोखीवाश। अ पा स्रि धाःप्ली। होप्लइ ळाशा ॥१४॥
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| 103 |
विश्वमना वैयश्वः |
अग्निः |
उष्णिक् |
॥ विश्वमना वैयश्वः अग्निः उष्णिक् ॥
ईळि॑ष्वाहि᳹प्रा॑तिव्यम्॑ । या᳒ज॑स्वाजातावे॑दसं । चरिष्णू॑धूमामागृभीतशोचिषम् ॥ ७ ॥
ई ळाकाइ ष्वापाहि प्र ति व्याशिम् । या ज स्वाकिजा ता वेकिद साटाञ्च रि ष्णु धू माखुम ग्र भातिइश। ताटशोखऔ हो वाशि। चीखषशम् ॥१५॥
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| 104 |
विश्वमना वैयश्वः |
अग्निः |
उष्णिक् |
॥ विश्वमना वैयश्वः अग्निः उष्णिक् ॥
नत᳒स्यामाया᳹याचाना᳒ । री᳒पू᳒रीशीतामाक्र्त्याः । यो᳒अग्ना᳹ये॑ददा᳹शाहव्या᳒दा॑तये ॥ ८ ॥
न तोतावात। स्याखमाश। या या चा नाटीरीचपु री शीकित माताआ उ वाटि। र्तीखयाःप्ल। यो अ ग्न येषीद दा श ह व्य दोपूबाप्ल। ताखयेश ॥१६॥
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| 105 |
ऋजिश्वा भारद्वाजः |
विश्वेदेवाः |
उष्णिक् |
॥ ऋजिश्वा भारद्वाजः विश्वेदेवाः उष्णिक् ॥
अपत्यं᳹वृ॑जीनंरिपुं᳒ । स्ते᳒ना᳒मा॑ग्नेदूराध्यं । दे᳒वीष्ठमत्स्यस॑त्पतेकृधीसूगम् ॥ ९ ॥
अ प त्यं व्र जि नंषूरि पुं स्ते नाखीम ग्नाताइश। दू रा धाटियाखन्दि वि ष्ठ म त्स्या साफूत्प ताताइश। कापर्द्धीशसूखगाप्लम् । हा इशा ॥१७॥
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| 106 |
विश्वमना वैयश्वः |
अग्निः |
उष्णिक् |
॥ विश्वमना वैयश्वः अग्निः उष्णिक् ॥
श्रु᳒ष्ट्या᳒ग्नेना᳒वा॑स्यमे । स्तोमा॑स्यवीरविस्पते । नीमा᳒यिनस्तपा᳒सारक्षा᳒सो॑दह ॥ १० ॥
हा बु श्रु ष्ट्या ग्नेषुन व स्या मेतहातबुश। स्तोकमा स्य वाकिई र वि स्प ता येपूऐ हि हा बु हो वाशू। नी माकाई नाकास्ता प सा रापीऐ हि हा बु हो वाशू। क्षा सापऐ ही हा बु हो वाशू। द ह ए हि याप्लुहाश। होप्लइ ळाशा ॥१८॥