| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 437 |
सौभरि: काण्व: |
इन्द्रः |
ककुप् |
॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥
विश्वा॑तोदाव᳒न्विश्वा᳹तो॑नआभा॑रा । य᳒न्त्वाशा᳹विष्ठामी᳒मा॑हे । ॥ १ ॥
वि श्व तोतिहातबुश। दाकवथन्वि श्व तोकिन याताहा ओखाहाण। आ भ राकिभाटरात। य न्त्वाटाश वीकाष्ठा माचाइश। मा हाटाऔ हो औ होखीवाश। ऐ ही ऐ हीतीच् ॥१॥ वि श्व तो दा वषुन्वि श्व तो न यातु। भ राकाभाटरात। य न्त्वाटाश वीकाष्ठा माचाइश। मा हा औटिहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥२॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 438 |
सौभरि: काण्व: |
इन्द्रः |
ककुप् |
॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥
एष᳒ब्रह्मा᳒याऋत्वी᳒याः । इन्द्रो᳒ना᳒माश्रू᳹तो॑गृणे᳒ ॥ २ ॥
ए षाःता। ब्र ह्माकाय याताआ उ वाटि। एतत्वि यातायाख। आटइ न्द्रातानाकम श्रू तातिआ उ वाटि। एतगृ णातायाख ॥३॥ ए षा ए षाःती। ब्र ह्माटाच्ब्र ह्माटाच्याकऋ त्वि या उ वाकूआ उ वाकि। आ इ न्द्रोटिआ इ न्द्रोटिनाकम श्रू ताकिउ वाकाआ उ वाकि। गृ णा औटिहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥४॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 438 |
सौभरि: काण्व: |
इन्द्रः |
ककुप् |
एष᳒ब्रह्मा᳒याऋत्वी᳒याः । इन्द्रो᳒ना᳒माश्रू᳹तो॑गृणे᳒ ॥ २ ॥
ए षा ओ वाती। ब्र ह्माकायाटऋ त्वि याःचि। आ इ न्द्रोटिहातइशनातमातश्रूपतोशगृ णा औटिहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥५॥ ओटहाखओखहाण। एकष ब्र ह्मापियाशऋ त्वि याःखि। ओटहाखओखहाण। इकन्द्रो ना मापिश्रुशतो गृ णाखिइश। ओटहाखओखहाण। एतस्व र्व तेटिख् ॥६॥ एथष ब्र ह्मौ हो याकुऋ त्वि याःचि। इ न्द्रोथाना मौ हो श्रूकीतो गा र्णाकिआ उ वाटि। ऊखपाश ॥७॥
| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 439 |
त्रसदस्युः |
इन्द्रः |
द्विपदा विराट् |
| 440 |
त्रसदस्युः |
इन्द्रः |
द्विपदा विराट् |
॥ त्रसदस्युः इन्द्रः द्विपदा विराट् ॥
ब्रह्माणाइ॑न्द्रं॑मा॑हा᳒य॑न्तोअर्कैः । आ᳒वा᳒र्धायन्ना᳹हा॑येहं᳒तावा᳒ऊ॑ ॥ ३ ॥
आ᳒नावस्ते᳒राथामश्वा᳒यतक्षुः । त्वष्टव᳒ज्रंपूरुहूताद्युम᳒न्तम् ॥ ४ ॥
हा बु स्व र तातु। ब्र ह्मा णाटिओ वाकाइ न्द्र म्माकिह याटान्तोखर्कैःण। आ वाटाच्र्धा याचान्न ह ये हकीन्ता वाखाऊत्र। श्योखकाःप्ल ॥८॥ हा व भि स्व र तातू। ब्र ह्मा ण आ इ न्द्राटूचमाकह याटान्तोखर्कैःण। आ व र्धाचियाटन्न ह ये हकीन्ता वापाऊत्र। श्योतच्काकय ताःटाख् ॥९॥ हा बु स्व र तातु। स्वा राचात स्वा राटितात। आ ना व स्तेकीर थ म श्वाकीयाचतायक्षूपर्हा बु स्व र ताशु। स्वा राचात स्वा राटितात। त्व ष्टाकाव ज्रकाम्पु रु हूकिता द्यु मा न्तांपीहा बु स्व र ताशु। स्वा राचात स्वा राटिताखऔ हो वाशि। स्वा राचाताटख् ॥१०॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 441 |
त्रसदस्युः |
इन्द्रः |
द्विपदा विराट् |
| 442 |
त्रसदस्युः |
इन्द्रः |
द्विपदा विराट् |
॥ त्रसदस्युः इन्द्रः द्विपदा विराट् ॥ ॥ त्रसदस्युः इन्द्रः द्विपदा विराट् ॥
शं᳒पादम्माघं᳹रायी॑षीणे । नाका᳒मामाव्रातो᳒ही॑नोतिना᳒स्पृशाद्रायिम् ॥ ५ ॥
सादागावश्शूचायोविश्वा᳒धा॑यसः । सादा॑देवा᳹आरे᳒पासाः॑ ॥ ६ ॥
औ हो इ शचीम्पाकदंफमा घं रा याकीओपई षी णातिइश। ना का म म व्र तोषूहि नो ति न स्पृ शाकूद्र यि मोखिइ ळाशा ॥११॥ सा दाता। गा व श्शु च योकुवि श्वा धा याटीसा स्साखादात्रन् । दा इ वाटिअ रोपाबाप्ल। पाखसाःप्ल ॥१२॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 443 |
त्रसदस्युः |
इन्द्रः |
द्विपदा विराट् |
॥ त्रसदस्युः इन्द्रः द्विपदा विराट् ॥ ॥ त्रसदस्युः विश्वेदेवाः द्विपदा विराट् ॥
आ᳒याहीवा᳒नासासाहा᳒ । गा᳒वा॑स्सचन्तवा॑र्तानींयादू᳒धा॑भिः ॥ ७ ॥
आ या हीति। व नाटासाचस हाशा। गा व स्स चकीन्ताचवायर्ता नीटाम् । या दूटाध भि रोखिइ ळाशा ॥१३॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 444 |
त्रसदस्युः |
विश्वेदेवाः |
द्विपदा विराट् |
॥ त्रसदस्युः इन्द्रः द्विपदा विराट् ॥ ॥ त्रसदस्युः विश्वेदेवाः द्विपदा विराट् ॥
उपप्रक्षेमा᳒धू॑मतिक्षी॑यन्ताः । पु᳒ष्ये॑मारायिन्धीमा᳒हे॑तइन्द्र ॥ ८ ॥
ओ वा उ प प्र क्षे म धु म तिषेक्षि य न्त ओतीवात। ओ वा इ पु ष्येषुम र इ न्धी म हेकूता आटाइ न्द्राता। ओ वा या उ वाकुओ वाटाच्हायउ वाटा। ऊखपाश ॥१४॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 445 |
संवर्त आङ्गिरसः |
उषाः |
द्विपदा विराट् |
॥ सम्वर्त आङ्गिरसः उषाः द्विपदा विराट् ॥
अ᳸र्चन्त्यर्कम्मारू᳹ता॑स्त्वर्कः । आ᳒स्तोभतीश्रूतो᳒यूवासइ᳒न्द्राः ॥ ९ ॥
अ र्च न्ति याती। र्क म्म रू ताकीस्सू वाटार्काःत। आ स्तोटाभा ताचाइश। श्रूकतो यु वा स आकुइ न्द्राकाउ वाता। ऊखपाश ॥१५॥
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देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 446 |
त्रसदस्युः |
इन्द्रः |
द्विपदा विराट् |
॥ त्रसदस्युः इन्द्रः द्विपदा विराट् ॥
प्रा᳒वाइ᳒न्द्रायवृत्राह᳒न्ता॑माया । वि᳒प्रा॑या᳒गा॑थंगायाताय᳒ञ्जुजो᳒षाते ॥ १० ॥
प्र वाःताआ इ न्द्रा यषीवृ त्र हा न्त माटुयात। वि प्रा य गा था ङ्गायूयापताश। य ञ्जू जोकिउ वाकि। उ प षाटितोख। हात्रइश ॥१६॥