| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 427 |
इरिम्बिठिः काण्वः |
आदित्यः |
उष्णिक् |
॥ इरिम्बिठः काण्वः आदित्याः उष्णिक् ॥
अभ्रा᳒तृ᳒व्योआना᳒त्वं᳒ । आनापिरिन्द्राजनु᳹षा॑साना᳒द॑सि । यू᳸थे᳹दापित्वामी॑च्छासे ॥ १ ॥
आ भ्रा तृ व्योफीअ ना तु वाकीम् । आ ना पि रा इ न्द्राकूच्जकनु षाSटास नाखाणफप्ल्। दाखसीशयू धेचादाकपि त्वा मि च्छ सेकुयु धाताच् ॥१॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 428 |
वसिष्ठो मैत्रावरुणिः |
इन्द्रः |
विराडुष्णिक् |
॥ वसिष्ठो मैत्रावरुणिः इन्द्रः विराडुष्णिक् ॥
यो᳸ना॑ईदामी॑दंपूरा । प्रव᳒स्याआ॑नीना᳒याता॑मू॑वस्तूषेसाखा᳒याइ᳹न्दामूताये ॥ २ ॥
यो नोताहातबुश। ई दा मि द म्पू राटूहातबुश। प्रा वा प्र व स्य याटूहातइश। नी ना नी नाषीय त मु वोटीहातबुश। स्तु षा इषिस खा य याटीहातइश। न्द्रा मू ताटियाखण्इश। ओपइ ळाशा ॥२॥ यो नाणाफ्इ द मि दाखीम्पू राशा। यो न इ द मि दायूम्पूपराश। प्रा व स्य या नी नाकूय ताखामू वा स्तुकिषाफइश। नीचना य ताखिमू वा स्तूकिषा इफाइश। सा खा याटियाटइ न्द्र मू ताखी। यात्रइश ॥३॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 429 |
सौभरि: काण्व: |
इन्द्रः |
ककुप् |
॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥
आ᳸ग॑न्तामारिषण्यत । प्रस्था॑वानोमापा॑स्थातासमन्यवः । दृढा᳒श्चिद्यामायिष्णावाः ॥ ३ ॥
आ ग न्ताति। मातच्रीकष ण्याटातात। प्र स्थाकावा नोकामा पाचास्था ताथासाचमायन्य वाःटा। द्र ढा श्चीभिद्यात। म यो वाप्लिष्णा वोप्ला। हा इशा ॥४॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 430 |
सौभरि: काण्व: |
इन्द्रः |
ककुप् |
| 431 |
सौभरि: काण्व: |
मरुतः |
ककुप् |
॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥ ॥ सोभिरः काण्वः मरुतः ककुप् ॥
आ᳸या॑ह्यायामिन्दा॑वे । आ॑श्वा॑पा᳒तेगो᳹पा॑ताउर्वारापते । सो᳒मं॑सोमपतेपीबा॑ ॥ ४ ॥
त्वाया॑हस्वीद्युजावायं᳒ । प्रातिश्व᳒स॑न्तंवृषभब्रूवीमही॑ । संस्थे᳹ज ᳹नास्यागोमा॑तः ॥ ५ ॥
आ या हीति। आ य मि न्दषीवे श्व पाटितातइश। गो पा ताकिउ र्वाकारायपा तापाइ सो मातिम् । सो मा पाटिट्ताखऔ हो वाशि। पीखबाश ॥५॥ अ या हि याती। यातमा इ न्दापिवेश। आ श्व प तेकीगो प ताकिउ र्व राटिहा इ पाखिताणइश। सोपमं हाणाइश। सो म प तेटीहातइ पापाई बा एप्लिहि या हाशि। होप्लइ ळाश ॥६॥ आ या ह्य य मि न्दातूवातइश। अ श्वाचापायताटइ गो पा ताचीउ र्व राटिपाखताणइश। सो मं सो माकीओ पाकाता इ पी बाकीओपबाप्ल। ऊखपाशप्ल्ऊखपाण ॥७॥ त्व या ह स्वीतीत् । यू जा व यंकीप्रा तीयाश्वा साटान्तं वृकाषा भकाब्रू वीयामा हापाइ सं स्थातिइश। जा ना स्य गोपीबाप्ल। माखताःप्ल ॥८॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 432 |
सौभरि: काण्व: |
इन्द्रः |
ककुप् |
॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥ ॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥
गावा᳒श्चित्घासमन्यवः । सा᳒जात्येनामारूतस्साब॑न्धवः । रिहाते॑काकू᳹भो॑मीथः ॥ ६ ॥
गा व श्चि त्घा सातुम न्य वाःति। स जा त्ये न मषुरू त स्स ब न्ध वाटूहोचइश। री ह तेकिका कुपाभोशमी था औटिहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥९॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 433 |
सौभरि: काण्व: |
इन्द्रः |
ककुप् |
॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥ ॥ सोभिरः काण्वः इन्द्रः ककुप् ॥
त्व᳸न्ना॑इन्द्रा᳒भा॑रा । ओजो॑निर्म्णं᳒शाताक्रतोविचर्षणे । आ᳒वीरं᳒पृ॑तनासा᳒हम् ॥ ७ ॥
त्व न्न ईति। न्द्रा भाटारात। ओ जोचानृ म्णांथाश ता क्रा तोटीच्वीकच र्षाखाणाणइश। आकवी रां पृभिहातइश। ताटनाखऔ हो वाशि। साखहाशम् ॥१०॥ त्व न्न इ न्द्राती। आ भाटारात। ओ जोचानृ म्णांथाशा ता क्रा तोटीवी च र्षाखिणाणइश। आकवी रांटापातर्क्ता नाकाच्साकहा मौपाहो बाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥११॥
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| 434 |
सौभरि: काण्व: |
मरुतः |
ककुप् |
॥ सोभिरः काण्वः मरुतः ककुप् ॥
आ᳒थाहीन्द्रगिर्वणः । ऊपा॑त्वाका᳹मा॑ईमा᳒हे॑सासृग्माहेऊदेवग्म᳹न्ता॑ऊद᳒भीः ॥ ८ ॥
अ था हि याती। न्द्रा गि र्वाटिणाःत। उ प त्वाकिकातच्मा ईकामाटहातइशसाकसृ ग्माटाहातइश। ऊ देकावा ग्माटान्ताःत। उ दापाभि रि ळा ह भीःप्लु। होप्लइ ळाशा ॥१२॥ अ धा ही न्द्र गि र्वातूणाःत। ऊ प त्वा काकीमा ईयामा हाटाइ साचासृयग्मा हाटाइश। ऊचदेयवा ग्माटाच्न्ताकओपबाप्लदा भोप्ला। हा इशा ॥१३॥ अ धा ही न्द्रषीगि र्व णातिएत। ऊ प त्वाचिकायमाटई मा हाटिइ साचासृ ग्माखाहाणइश। उ दौटाहोतइ वाटाहातग्माटन्ताखऔ हो वाशि। ऊ दचाभि रेटाख् ॥१४॥
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छन्दः (Chandas) |
| 435 |
नृमेध आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
ककुप् |
॥ नृमेध आंगिरसः इन्द्रः ककुप् ॥
सी᳒दन्त॑स्ते᳹वायोया᳒था । गो᳒श्री᳒स्तेमा᳒धोर्मा᳒दीरोवी॑वक्षणः । आ᳒भित्वा᳒मिन्द्रनोनुमः ॥ ९ ॥
सापई द न्त स्ते व योप्लूयाङथाश। गोकश्रा इ स्तेकिम धोकाच्र्म्माकदि रो वापिई वाप्लाक्ष णाःता। आ भी त्वा माचीइ न्द्ना नोकिनूफमाःख ॥१५॥ सी द न्त स्ते व योफूय थातागोपश्री स्ते र्म धो र्म्माप्लीदि राःङा। वि वाताहातबुशक्षापणाःश। अ भीताहोतइशइ त्वापामाशइ न्द्न नोतिनूपमाशउ हु वा हाप्लीबु । बाश ॥१६॥
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छन्दः (Chandas) |
| 436 |
नृमेध आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
ककुप् |
॥ नृमेध आंगिरसः इन्द्रः ककुप् ॥
वा᳒या᳒मुत्वामा॑पूर्व्या॑ । स्थूरन्न᳒का᳒च्चिद्भा᳒र॑न्तोवस्या॑वाः᳸ । वज्रि᳒ञ्चित्रंहा॑वामहे ॥ १० ॥
वा याणाफ्मु त्वा मा पूखीर्वि याशा। स्थुकर न्न क श्ची त्भ राकूचता आकावायस्या वाःपा। व ज्रिं श्चि त्रांतीहापवाशमाप्खहोप्ला। हा इशा ॥१७॥ व य मु त्व म पू र्व्य स्थू र न्नषोक श्चि त्भ र न्त ओतूवात। हातहा अ वाचिस्यापवाःश। हातहा इ व ज्रिं श्चि त्राटूम् । हातहा इ ह वाचीमापहा उ हु वा हाप्लुबुश। बाश ॥१८॥