| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 400 |
अंहोमुग्वामदेव्यः |
विश्वेदेवाः |
बृहती |
॥ अङ्होमुग्वामदेव्यः (कुल्मलबर्हिषः शैलूषिर्वा) विश्वेदेवाः बृहती ॥
पा᳒रिप्राध॑न्वाइन्द्रा॑यसोमा᳒ । स्वादु᳒र्मित्रा᳒य । पू᳒ष्णेभा᳒गा॑य ॥ १ ॥
प रि प्र ध व न्वातु। इ न्द्रा य सो मा स्वायूदूपर्हाणइशमि त्रा याचिपूकष्णे भापाहाणइश। गापयोप्ल। हा इशा ॥१॥ प रि प्र ध न्वातु। इ न्द्रा य सो मा ओटूहातओटहातइश। स्वा दु र्मि त्रा याटूओटहातओटहातइश। पू ष्णाखाऔ हो वाशि। भ गातायाख ॥२॥ प रीताहोचइशप्र धाखान्वाश। इ न्द्राताहोचय सोखामाश। स्वा दूतार्होचइशमि त्राखायाश। पू ष्णेताहोचइशभ गाखायाश। पू ष्णे भ गा यषुपू ष्णेटाहोखइ भ गाखियात्र। एतस्व र्वा तेखि ॥३॥ हातहा इ पा रीचीप्रा ध न्वाटिएखहि याप्लाहातहातइश। हातहाकइकथ्न्द्रा य सोकिमाटएखहि याप्लाहातहातइश। हातहा इ स्वाकिदूथच्र्मि त्राकायाटएखहि याप्लाहातहातइश। हातहातहा इकापू ष्णेथाच्भा गाकायाटएखहि याप्लाहातहाखण्इश। ओपइ ळाशा ॥४॥ प र्ये पा रीती। प्रा ध न्वा हो वाकुहो इकान्द्रा य सो मा हो वाकु। हो इ स्वाकिदु र्मि त्रा या हो वाकूहो येटापू ष्णौकावा उ वोखिवाश। भ गा याप्लिबुश। बाश ॥५॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 401 |
ऋण त्रसदस्यू |
पवमानः सोमः |
द्विपदा विराट् |
॥ ऋण – त्रसदस्यू पवमानः सोमः द्विपदा विराट् ॥
पर्यू᳹षु ᳹प्रा᳹ध॑न्वा᳒वा᳒ज॑सातये । पारी॑वृ॑त्रा᳹णी॑सक्षा᳒णीः॑ । द्वीष᳹स्ता॑राधी᳒या᳸ऋणाया᳒ना॑ईरसे ॥ २ ॥
प र्यू षुषिप्र ध न्वा वाती। ज सा ता याकीओ इ पा रीकीओ इ वृ त्राटीच्णीकस र्क्ष णी द्वा इ षायूस्ता राटा। धी याटाऋ णा याभिनाक। ई रा साभिआटइ रा साखिण्इश। ओपइ ळाप्ला ॥६॥ प र्यू षूति। प्रा धा न्वा वाटीज साकाताखयाणइश। प रि वृ त्रा णिषुसा क्षाचाणि द्वि षाकिस्तापराश। धि य्याचाऋ णायाया नापाईशहिंच। राखसोप्ल। हा इशा ॥७॥ प र्ये पा रीती। ऊ षु प्र ध न्वा वा ज सा त येषेप रि वृ त्रा णि साकूक्षा णि द्वाटिइ षातास्ताटरात। धी य ऋ ण याषुन या उ वाकीओपबा रा सोप्लि। हा इशा ॥८॥
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ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 402 |
ऋण त्रसदस्यू |
पवमानः सोमः |
त्रिपदा अनुष्टुप्पिपी लिकामध्या |
| 403 |
ऋण त्रसदस्यू |
पवमानः सोमः |
द्विपदा विराट् त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या |
॥ ऋण – त्रसदस्यू (त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्सः) पवमानः सोमः त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या ॥ ॥ ऋण – त्रसदस्यू पवमानः सोमः द्विपदा विराट् ॥ ॥ ऋण – त्रसदस्यू पवमानः सोमः द्विपदा विराट् ॥
पा᳒वा॑स्वसोमा᳒ । माहा᳹न्सा॑मुद्रः । पीता᳒दे॑वानां॑ । विश्वाभि᳒धामा ॥ ३ ॥
पा᳒वा॑स्वसोमा᳒ । माहे᳒दक्षा॑य । अ᳒श्वो᳒ना᳒निक्तः । वाजी᳒धा᳒नाय ॥ ४ ॥
प व स्व सो मातु। माचहाकन्सा मू द्राःकिपी ता दे वा नां वाटूइ श्वाखाऔ हो वाशि। भी धाटामाख ॥९॥ औ हो वा औ होकुवा औथाहोटवाखऔ हो वाशि। पा वा स्व सोचीम मा हाचिन्सा मु द्राःचिपी ताकादे वा नांटिवि श्वाकाच्भिकधाटमाख। औ हो वा औ होकुवा औथाहोटवाखऔ हो वाशि। एतधटर्माख ॥१०॥ ओ हो वा ओ होकुवा ओथाहोटवाखओ हो वाशि। पा व स्व सो मा माकूहे द क्षाचिया श्वोकाना नि क्तोचिवाटजी ध नाकियाख। ओ हो वा ओ होकुवा ओथाहोटवाखऔ हो वाशि। एतवि धकार्माख ॥११॥ प व स्व सो मातु। माकहेथद क्षा याटिआ श्वो न नि क्तोकुवा जाखाऔ हो वाशि। ध नातायाख ॥१२॥
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छन्दः (Chandas) |
| 404 |
ऋण त्रसदस्यू |
पवमानः सोमः |
द्विपदा विराट् |
॥ ऋण – त्रसदस्यू पवमानः सोमः द्विपदा विराट् ॥ ॥ ऋण – त्रसदस्यू पवमानः सोमः द्विपदा विराट् ॥
इ᳒न्दूः॑पविष्टा । चारूर्मा॑दा॑य । आपा᳒मूपा᳒स्थे॑ । का᳒विर्भा॑गा॑य ॥ ५ ॥
इ न्दुः प वि ष्टातु। चाटरू र्मा दाकिया अ पाकिमु पाटास्थातइश। काटट्वाखऔ हो वाशि। भ गातायाटख् ॥१३॥
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| 404 |
ऋण त्रसदस्यू |
पवमानः सोमः |
द्विपदा विराट् |
इ᳒न्दूः॑पविष्टा । चारूर्मा॑दा॑य । आपा᳒मूपा᳒स्थे॑ । का᳒विर्भा॑गा॑य ॥ ५ ॥
अ न्व नूति। हा इ त्वाकिसू तं सोकिमा म दाचिम सि म दाकीच्मा साकाएटम हा इ साखीमाण। री याचारा ज्येटावा जंटाच्आकभी प व मा नषुप व माकिनाःच। प्रा गाटाच्हाकसा औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥१४॥
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| 405 |
ऋण त्रसदस्यू |
पवमानः सोमः |
द्विपदा विराट् |
॥ ऋण – त्रसदस्यू पवमानः सोमः द्विपदा विराट् ॥
आ᳒नूहित्वा᳸सूतं᳹सो॑मा᳒मा᳒दा॑मसि । मा᳒हं᳒सा॑मरियारा᳒ज्ये॑ । वा᳸जं॑आभि᳒पा॑वमानप्रागा॑हसे ॥ ६ ॥
क ईं व्य क्ताःती। ना र स्सा नाचीइ ळाटाच्रू द्र स्य म र्या याटूट्थाखऔ हो वाशि। स्वतश्वाःटख् ॥१५॥ का ईंणाफ्वि याखाक्ताःप्ल। ना राणाफ्स्साखना इ ळाःप्लि। रू द्र स्य म र्या याटूट्थाखऔ हो वाशि। सु वाताश्वाःख ॥१६॥ का ईंथावि याटाओकवाखक्ता ना राःशि। स नाटाओकवाखइ ळा रू द्राशी। स्य माटाओकवाखर्या या थाशि। सु वाटाओकवाखश्वाःप्ल। होप्लइ ळाशा ॥१७॥
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| 406 |
ऋण त्रसदस्यू |
पवमानः सोमः |
त्रिपदा अनुष्टुप्पिपी लिकामध्या |
॥ ऋण – त्रसदस्यू (त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्सः) पवमानः सोमः त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या ॥
का᳒ईंव्याठ॑क्ताः । ना᳒रस्सा᳒नी॑ळाः । रु᳒द्रा᳒स्साम᳒र्याः । या᳒थास्व᳒श्वाः॑ ॥ ७ ॥
अ ग्ने त म द्यातु। अ श्वथान्न स्तो मा इः कृ तूकूच्न्नाकभा द्राटाम् । हा र्द्दिटास्पृकशाचमृ द्ध्याटाट्माखऔ हो वाशि। ता ओटाहैःख ॥१८॥ आ ग्नेफाहोफइ त माखिद्याश। अ श्वथान्न स्तो मा इः कृ तुकूच्न्नाकभा द्रांटा। हा र्द्दाथाओचइशस्पृ शाचामृ द्ध्याटाट्माखऔ हो वाशि। एतच्ताकओटहैःख ॥१९॥
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| 407 |
वसिष्ठो मैत्रावरुणिः |
मरुतः |
द्विपदा विराट् |
॥ वसिष्ठो मैत्रावरुणिः मरुतः द्विपदा विराट् ॥
अ᳒ग्नेता᳒मद्या᳒ । अश्वन्न᳒स्तोमैः॑ । क्रा᳒तून्ना᳒भद्रं᳒ । हृदिस्पृ᳒शं॑ । ऋद्ध्या᳹मा॑ताओ᳒हैः॑ ॥ ८ ॥
आकवि र्मापार्याःण। आ वा जंषिवा जि नो ग्मा न्देटु। वाचस्य स वी तु स्साटुवातइश। स्व र्गाटाअ र्वाखान्ताःत्र। जकय ताटाख् ॥२०॥
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| 408 |
वामदेवो गौतमः |
अग्निः |
पद पंक्तिः |
॥ वामदेवो गौतमः अग्निः पदपङ्क्तिः ॥
आवि᳸र्म॑र्याआवा॑जं॑वाजी᳒नो॑ग्मन् । देवा᳒स्या॑सावीतु᳒स्सा॑वे । स्वर्गा॑अ᳹र्वन्तोजा᳒यर्या॑ता ॥ ९ ॥
प व स्व सो मातु। द्यु म्नीणाफ्सू धाखाराःप्ल। मा ही नाटिमा नू पूटिर्वी योखाप्ल्इ ळाशा ॥२१॥