| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 274 |
कलि प्रागाथः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ कलिः प्रागाथः इन्द्रः बृहती ॥
योरा᳒जा॑चर्षा॑णीनां । या᳒तारा᳹थेभीरा᳒ध्री॑गुः । वि᳒श्वा॑सान्तारु᳒तापृ᳒तानानां । जे᳒ष्ठंयो᳹वृत्राहा᳒गृणे ॥ १ ॥
यो रा जा चाखीर्षा णा इ नाप्लीम् । या ता र थेकीच्भी राकाध्रायइ गूःटाध्रा इ गूःटि। वा इ श्वा साटीन्ता रू ताटिता रू ताटिपा र्ताकानाखनाणम् । ज्या इ ष्ठा योटीवा त्रा हाकिगाखर्णाणइश। त्र हा गृ णाप्लीइश। होप्लइ ळाशा ॥१॥
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| 274 |
कलि प्रागाथः |
इन्द्रः |
बृहती |
योरा᳒जा॑चर्षा॑णीनां । या᳒तारा᳹थेभीरा᳒ध्री॑गुः । वि᳒श्वा॑सान्तारु᳒तापृ᳒तानानां । जे᳒ष्ठंयो᳹वृत्राहा᳒गृणे ॥ १ ॥
यो रा जा च ऋतुषा णाखाइ नाशाम् । या ता र थेकीभी रा ध्राटिइ गूःता। वि श्वा सा न्त रु ताषूपृ त नाटिनातम् । ज्याटइ ष्ठाताय्यो वृकात्रा हा उ वाकी। ओपबा गा र्णोप्लि। हा इशा। ॥२॥
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| 275 |
पुरुहन्मा आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ पुरुहन्मा आंगिरसः इन्द्रः बृहती ॥
याता॑इन्द्राभाया॑महे । ता᳸तो॑नोआ᳒भा॑यंकृ॑धि । मा᳒घा॑वन्शग्धिता᳹वा॑तन्नाऊता᳒ये॑ । वि᳒द्वि᳒षोविमृधो॑जहि ॥ २ ॥
य त आ न्द्राखीभा या म हाप्लीइश। ता तो नोकिअ भा य ङ्काटिर्द्धीत। मा घ व न्श ग्धिषुत व तकिन्ना ऊ ताटियातइश। वि द्वा इ षोटीवीतमा र्धोकाज हि इ ळाटीभाखण्। ओपइ ळाशा ॥३॥
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| 276 |
भर्गः प्रागाथः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ भर्गः प्रागाथः इन्द्रः बृहती ॥
वास्तो॑ष्पतेध्रूवा᳒स्थूणां । अंसत्रं᳒सौ॑म्या᳒नाम् । द्रप्सः᳒पूरां᳒भेक्ताशश्वा॑तीनाम् । इ᳒न्द्रो᳒मू᳹नीनां॑सा᳒खा॑ ॥ ३ ॥
वा स्तो ष्प तातीइश। ध्रू वा स्थू णाटीउ वोखावाश। अं स त्रंकिच्सोकम्या नाटाम् । द्र प्सः पु रां भे क्ताषूश श्व ताटिइ ना माखिइ न्द्राःणा। मू नी नांकिआ उ वाटि। साखखाश ॥४॥ वा स्तो ष्प ते ध्रू वाफूस्थूतणांपस त्रं सोप्लिम्याङनाशम् । द्र प्सः पु रां भे क्ताषूश श्व ताटिइ नाताम् । आटइ न्द्राःता। मू नीटानाखणफप्ल्म् । साखखाश ॥५॥
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| 277 |
देवातिथिः काण्वः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ इरिम्बिठिः काण्वः इन्द्रः (वास्तोष्पति वा) बृहती ॥
ब᳒ण्माहं᳒आ॑सीसूर्या । बा᳒ळा॑दित्यामाहंआसि । माह᳒स्ते॑सातो᳹मा॑हीमा᳒पा॑निष्ठमा । मन्हा᳒दे॑वामाहं᳒आसि ॥ ४ ॥
ब ण्म हंखिअ सि सू र्याशी। बा ळा दि त्याकीच्मा हंकाआयसापईणमा ह स्तेणिसा तोफामा हिफामा पाप्लानीपष्टातमात। म न्हा दाटिइ वाता। माकहोपबाप्लआ सोप्ल। हा इशा ॥६॥
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| 278 |
जमदग्निर्भार्गवः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ जमदग्निभागर्वः इन्द्रः (सूर्यः) बृहती ॥
या᳸दि॑न्द्राप्रा᳒गपागूद॑त् । न्या॑ग्वाहूयासेनृभिः॑ । सीमा॑पूरूनृ᳒षू॑तोअस्या᳒ना᳸वे । आ᳒सी॑प्रशार्धातुर्वा᳒शे ॥ ५ ॥
य दि न्द्र प्रा ग पातूत् । ऊ दाकान्या ग्वा हू या सेकुनृ भाटाइःश। सि माटाच्पू रूचानृ षू तोथिअ स्या न वेटी। आ सीटाप्रा शाटाच्द्धाकतोपबाप्लर्वा शोप्ला। हा इशा ॥७॥ य दि न्द्र प्राषीग पा गु दातीगेत। ना य ग्वा हूकीच्याकसा इ नृ भिटीर्हा बु होखिहाणइश। सि माटाच्पूकरूचनृ षू तोथिअ स्या न वेटीर्हा बु होखिहाणइश। आ सा इ प्रा शाटुच्र्हा बु होखिहाणइश। द्धाटट्तूखऔ हो वाशि। र्वाखशेश ॥८॥
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| 279 |
देवातिथिः काण्वः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ देवातिथिः काण्वः इन्द्रः बृहती ॥
क᳒स्तामि॑न्द्रत्वावसो । आ᳒मा᳒र्क्त्यो॑दधर्षते । श्र᳒द्धाही᳒तेमाघा᳒वन्पा᳹र्येदीवी । वाजी᳒वाजंसिषासति ॥ ६ ॥
क स्त मि न्द्राती। तु वाटावा साटाबुश। आ म र्क्त्योषीद ध र्ष ताचीइशश्र द्धाथाहा इ तेटि। मा घ वकिन्पा र्या इ दायीइ वीटा। वा जीटावा जांटासीकषा साटाट्ताखऔ हो वाशि। उ ऊखापाश ॥९॥ क स्त मि न्द्रा त्वाफुव साताबू आपाम र्क्त्यो द ध र्ष ता इशृ। श्र द्धाथाहा इ तेटि। मा घ वकिन्पा र्या इ दा इ वाटूउ वोखावाश। वा जीथावा जांटाच्सीकषा साटाट्ताखऔ हो वाशि। उ ऊखापाश ॥१०॥
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| 280 |
वसिष्ठो मैत्रावरुणिः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ वसिष्ठो मैत्रावरुणिः इन्द्रः बृहती ॥
अश्वीराथीसुरूपायुः᳒ । गोम᳒य्यादिन्द्राते᳒साखा । श्वात्राभा᳒जावा᳒या॑सासचाते᳒सादा॑ । चन्द्रै᳒र्यातीसाभा᳒ऊ᳒पा॑ ॥ ७ ॥
अ श्वी अ श्वीती। र थीकाच्सू रूकापाययूःट। गोकम य्य दिकिन्द्रा तेयासा खाटा। श्वा त्राटाभा जाटाव य साचिस चा ते साटिदात। च न्द्रा इ र्याभीतीत। सापभाशऊखपोप्ल। हा इशा ॥११॥ अ श्वी र थी सु रू पातूयूःत। गोकिम य्य दिकिन्द्रा ते स खाकीउ वाटाहा उ वाटिहोकवाथइ याचा। श्वा त्रा भा जाषीव य साकिस चा ते स दाकुउ वाटाहा उ वाटिहोकवाथइ याचा। च न्द्राचाइ र्यायातीत। सा भाकाऊ पा इ ळाटीभाखण्। ओपइ ळाप्ला ॥१२॥
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| 281 |
देवातिथिः काण्वः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ देवातिथिः काण्वः इन्द्रः बृहती ॥
य᳒द्यावा᳒इन्द्रतेशातं᳒ । शातं᳹भूमी॑रूतास्युः । न᳒त्वावज्ज्रिन्साहा᳒स्रंसू᳒र्याआनू॑ । ना᳒जाता᳹माष्टारोद॑सी ॥ ८ ॥
य द्या वापिइ न्द्र ते श ताशुम् । शा तं भू मीकीरू ता स्यूःटि। न त्वा व ज्रिषीन्सा ह स्रं सू र्याकुआ नूटा। ना जाटाता माटाच्ष्टाकरोपबाप्लदा सोप्ला। हा इशा ॥१३॥
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| 282 |
पुरुहन्मा आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ पुरुहन्मा आंगिरसः इन्द्रः बृहती ॥
इन्द्रा॑ग्नीआपा᳒दीय᳒म् । पूर्वागा᳸त्पद्वा᳒ती॑भ्यः । हित्वा᳹शि ᳹रो॑जिह्वा᳒या᳹रा॑रापच्चारात् । त्रिंशा᳒त्पादा᳒न्या॑क्रमीत् ॥ ९ ॥
इ न्द्रा ग्नीषीय पा दि यातीमेत। पू र्वा गाटित्प द्वा दाचिइ भायायाःट। हि त्वा शि रोटीजि ह्वा या रा रा पायूश्चा राटात् । त्रिंकश त्प दा न्या क्राटुट्माखऔ हो वाशि। उ ऊखापाश ॥१४॥
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| 283 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
इन्द्रः |
बृहती |
॥ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः इन्द्रः (इन्द्राग्नी) बृहती ॥
इ᳒न्द्राने᳹दी᳒याए᳒दिहि । मीता᳒मे᳒धाभीरू᳒ती᳒भीः॑ । आ᳒श॑न्तामाश᳒न्ता॑माभी᳒राभीष्टीभिः । आस्वा᳒पेस्वापि᳒भिः॑ ॥ १० ॥
इ न्द्र ने दीषय ए दि हातीइ मि त मे धातु। भि रू ति भि राषीश न्ताटामातश न्त मा भी राकुभि ष्टि भि रा स्वाटुपेत। स्वा औपाहोश। पि भि रोखिइ ळाशा ॥१५॥ । इ न्द्र ने दीषीय ए दि हातृइ मि त मे धाषीभि रू ति भातीइःश। आकश न्त म श न्त माटूभा इ रा भीयीष्टी भी रा स्वा पाचुइश। स्वापहाश। पि भि रोखिइ ळाप्ला ॥१६॥