| Global # |
ऋषिः (Rishi) |
देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 353 |
तिरश्चीराङ्गिरसः शंयुर्बार्हस्पत्यो वा |
इन्द्रः |
अनुष्टुप् |
॥ तिरश्चोरांगिरसः शय्युबार्हस्पत्यो वा इन्द्रः अनुष्टुप् ॥
प्र᳸त्य॑स्मैपी᳒पी॑षते । वि᳒श्वा॑नीविदू᳒षे॑भरा । अ᳸रं॑गमा᳒याज᳒ग्मा॑ये । आ᳒पा॑श्चाद्दाघ्वाने᳒नाराः ॥ १ ॥
प्र त्य स्मै पी बातुहातबुश। ओ इ षातितातइशइ । वा इ श्वाकिनीचक्वा इ दू षेटीहातइ भातारातआ राटाच्ङ्ग माकाया जाटाहातग्मा याथाय पा श्चाटिट्द्दाखऔ हो वाशि। घ्व नेटान राःखा ॥१॥ प्र त्य स्मै पीतीपी ष तातिइश। वा इ श्वाकिच्नीकवा इ दू षेटिभा राटाआ राटाच्ङ्गाकमा य ज ग्मा याषूय प श्चा द्द घ्व नाटूहोचइश। ना रा औटिहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥२॥
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देवता (Devata) |
छन्दः (Chandas) |
| 353 |
तिरश्चीराङ्गिरसः शंयुर्बार्हस्पत्यो वा |
इन्द्रः |
अनुष्टुप् |
प्र᳸त्य॑स्मैपी᳒पी॑षते । वि᳒श्वा॑नीविदू᳒षे॑भरा । अ᳸रं॑गमा᳒याज᳒ग्मा॑ये । आ᳒पा॑श्चाद्दाघ्वाने᳒नाराः ॥ १ ॥
प्र त्य स्मै पी पीफुष ताताइ वापाइ श्वा नि वि दु षेप्लूभाङराश। अ र ङ्ग मा या जफूग्म योखाहा या पा श्चा द्दाःटु। घ्वाकनोपबाप्लना रोप्ला। हा इशा ॥३॥
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| 354 |
भरद्वाजो बार्हस्पत्यः |
इन्द्रः |
अनुष्टुप् |
॥ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः इन्द्रः अनुष्टुप् ॥
आ᳒नोवयोवयाश्शायं᳒ । माहा॑न्तंगंभारेष्ठाम् । माहा᳒न्तं॑पूर्वी॑नेष्टां᳒ । उग्रं᳒वाचोआ᳒पा॑वधीः ॥ २ ॥
आ नो व योषीव य श्शातियातम् । मा हा न्त ङ्ग ह्व राखूइ ष्ठाशाम् । मा हा न्तं पू र्वी नाखूइ ष्ठाणाम् । उ ग्रं वाटिचो अ पा वाखी। धीःत्र ॥४॥
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| 355 |
वामदेवो गौतमः, शाकपूतो वा |
इन्द्रः |
अनुष्टुप् |
॥ वामदेवो गौतमः, शाकपतूो वा इन्द्रः अनुष्टुप् ॥
आ᳒त्वाराथं॑याथोता᳒ये । सुम्नाया॑वर्क्तया॑मसि । तु᳒विकूर्मि॑मृतीषाहं । इ᳒न्द्रं॑शवीष्ठासा᳒त्पा॑तिम् ॥ ३ ॥
आ त्वा र थंषीय थौ होतिवात। ता याकाइ सूखाम्नाण। या व र्क्त या म सीषूतु वि कूटुर्मीटच्माखर्क्तीण। ष हांकामा इ न्द्रंकिशाखवीण। ष्ठा सा त्पाटितींखण्। ओपइ ळाशा ॥५॥ आ त्वा र थं य थोफूता याखाआ त्वा र थाशीम् । या थो ता याटीऔ होखावाश। ईखहाश। सु म्ना याचिवाकर्क्ता या म सी यौकुच्होययौटहोखवाश। ईखहाश। तु वि कु र्मीचीमृकता इ ष ह मौकुच्होययौटहोखवाश। ईखहाश। इ न्द्रं श वीचीष्ठा सा त्प ति मौकुच्होययौटहोखवाश। ईखहाश ॥६॥
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| 356 |
प्रियमेधः आङ्गिरसः |
इन्द्रः |
अनुष्टुप् |
॥ प्रियमेध आंगिरसः इन्द्रः अनुष्टुप् ॥
सा᳒पूर्व्यो᳒माहो᳒नां । वेनःक्रा᳒तूभिरानजे । यस्या᳒द्वारामा᳹नूः॑पीता᳒ । देवे᳒षूधी᳒याआनाजे ॥ ४ ॥
स पू र्व्यो म हो नातूमेत। वे नाः क्राचितूकभा इ रा ना जेटुहातहा औटाहोतवा आटाइ हीता। य स्याकाद्वा राथामा नूः पी ताटीहातहा औटाहोतवा आटाइ हीता। दा इ वा इ षूटुहातहा औटाहोतवा आटाइ हीता। धी याकाआ नाटाट्जाखऔ हो वाशि। म धूताश्च्यू ताःटाख् ॥७॥
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| 357 |
प्रगाथः काण्वः |
इन्द्रः |
अनुष्टुप् |
॥ प्रगाथः काण्वः इन्द्रः अनुष्टुप् ॥
या᳒दीवा᳹ह॑न्त्याशा᳒वाः । भ्राज॑मानाराथेष्वा᳒ । पीब॑न्तोमादीरम्माधू॑ । तत्रश्रा᳒वां॑सिकृण्वते ॥ ५ ॥
य दी व ह न्त्या शषूवो य द्ये या दीतु। ओ इ व ह न्ता यायूशा वाःटा। ओ इ भ्रा ज मा नाषूर था इ षूयेवाट। ओ इ पि ब न्तोषुम दी रा म्मायीधूट। ओ इ त त्र श्रा वांषूसि क्रा उ वाकीओपबाप्लण्वा तोप्ला। हा इशा ॥८॥
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| 358 |
श्यावाश्वः आत्रेयः |
मरुतः |
अनुष्टुप् |
॥ श्यावाश्व आत्रयेः मरुतः अनुष्टुप् ॥
त्या᳸मू॑वोअप्रा॑हणं । गृणीषे᳹शा ᳹वासस्पा᳒तिम् । इन्द्रं॑विश्वासाहन्नारं । शाची॑ष्ठंविश्वा॑वे॑दसम् ॥ ६ ॥
त्य मु वोषिअ प्रा हाखीणणम् । गृ णीकाषे श वाकिस स्पा ता इ मि न्द्राटूवाखइ श्वाणा। सा हंकाहो येपाना र मोतिइश। श चा इ ष्ठांपीवीण। श्वा वाटाहोखबाप्लदा सांप्ला। हा इशा ॥९॥
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| 359 |
शंयुर्बार्हस्पत्यः |
इन्द्रः |
अनुष्टुप् |
॥ शय्युबार्हस्पत्यः इन्द्रः अनुष्टुप् ॥
दधिक्रा᳒विण्णो॑अकार्षं । जिष्णोरश्वा॑स्यावाजीनाः॑ । सूराभी᳒नोमू᳒खा॑करात् । प्राणआयूंषितारिषात् ॥ ७ ॥
ओतहा इ द धि क्राषूवि ण्णो अ का र्षा मोतूहातइश। ओतहा इ जि ष्णोषीर श्व स्य वा जि नाटूओ हाचाइश। सु राकाभी नोकामु खा काटिरातत् । प्र णाटाच्होयआ यूंटाहोयषी ता राटिइ षाखाण्त् । ओपइ ळाशा ॥१०॥
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| 360 |
वामदेवो गौतमः |
दधिक्रा |
अनुष्टुप् |
॥ वामदेवो गौतमः दधिक्रा वा अनुष्टुप् ॥
पूरांभिन्दू᳒रियूवाः᳒कविः । आमी॑तौजाअजायत । इ᳒न्द्रो᳹विश्वास्याक᳒र्मा॑णः । धर्ता॑वज्रीपू॑रूष्ट्रतः ॥ ८ ॥
पू रांफाभि न्दु र्यु वाखीक विःशा। आ मी तौ जाकीआ जा याटितात। आ इ न्द्रो वि श्वाटुस्या ककार्माखणाःण। ध र्क्ता वा ज्रौकीवा उ वोखिवाश। पु रू ष्टुप्लिताःश। होप्लइ ळाशा ॥११॥