॥ पुरिषिञ्चाथर्वणम् ॥
चक्रंयदस्य प्सूषूआनिनिष क्तातुम् । ऊतोतद स्मैषुमध्वीच च्छाटीद्यातत् । पृथिव्या मषीतिषी तंकिया दूटाधाःत। पायो गोटिषूतआद धाटिओचषा धीथाषूइ ळाटिभाखण्। ओपइ ळाशा॥ ५५ ॥
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