॥ जैमिनीयसामवेद संहिता (कोडुन्तिरपुळ्ळि पाठः) ॥
संस्करणम्: 1.00 , निर्मितम्: 10-10-2026
आग्नॆयपाठः
प्रथम खण्डः (१९)
॥ गौतमस्यपर्क्कः ॥
ओतग्नातइश। आ याथाच्हि वाचाइश। ता या_टाइ.शता या_टिइश। गृ णाचानॊ_शह व्या_ दाचि। ता या_टाइ.शता या_टिइश। ना इ हॊ_किताच। सा_टत्सा.टइ बाखाऔ हॊ वाशि। हीखषिश ॥१॥
॥ कश्यपस्यबर्हिषीयं ॥
अ ग्न आ या हि वीतू। त या इ गृ णा नॊषूह व्य दा_ ताटीयातइश। नि हॊ ताचिस त्सी_किब, र्हा.टीइ षीता। ब, र्हा.टाइ षाखाऔ हॊ वाशि। ब.चर्ही षीटाख ॥२॥
॥ गौतमस्यचैवपर्क्कः ॥
अ ग्न आ या हि वा,तूइ त यातिइश। गृ णा नॊ ह व्य दा.पूय्तापयॆश। नि हॊ ताखिसाणत् । सा.टइ बा.तर्हापइ षॊप्लि। हा इशा ॥३॥
॥ सौपर्णञ्च ॥
त्व म ग्नॆ य ज्ञा नाषून्त्व म ग्नातिइश। य ज्ञा नां हॊ ता वि श्वॆ,षृषां हा.टाइ ताःता। दॆ_कवा इ भा,टिइ र्माता। नु षॆ.ताच्जकना औ.टाहॊखबाप्ल। हॊप्लइ ळाशा ॥४॥
॥ वैश्वमनसञ्चादित्यसामव ॥
अ ग्नि न्दूटितांत। वृ णी म हा इषूहॊ, ता रां_टिवीतश्व वॆ_चाद सांचा। अ स्य याटिज्ञा.तओ औ.काहॊतवात। स्या सू_चाक्र, तु मि ळा.टीभाखण। ओपइ ळाप्ला ॥५॥
॥ श्रौतर्षाणित्रीणि ॥
अ ग्नि र्वृ त्राती। णा.टइ जाखाऔ हॊ वाशि। घाखनाशत् । द्रचविशणकस्यु र्वी प_किन्य, या.टाओ इ, स मि द्धाटुश्शूत। क्रा या_चाहु, ता इ ळा.टीभाखण्। ओपइ ळाप्ला ॥६॥
अ ग्नीखारौ हॊ वाशिहा इ वृ त्रा णिशु। जं घाटाना.तदौ हॊटावातइश। द्र वि णापिस्यूःण। ओ इ वा इ,षीप न्या_ या.टिस मा इ द्धा.टीट्श्शूखऔ हॊ वाशि। क्र या_ हू.टिताःख ॥७॥
ओतग्नीःत। वृ त्रा णिकिजं घ ना_ दौ_कीहॊ औ हॊखिवाश। द्र विचाणकस्यु र्वि प_किन्य याचाऔ_कहॊ औ हॊखिवाश। स मि द्धा_चिश्शु क्र या_चिऔ_कहॊ औ हॊ.खिबाप्लहू तॊप्ला । हा इशा ॥८॥
॥ औशनञ्च ॥
प्रॆ ष्ठं वाःति। अ, ता.टाइ थींता। स्तॊ षॆ_चामि त्र, मि व प्राटुयांत। अ ग्ना_ इ राभीथा.तन्ना वा.टाहाखणइश। दापयांप्ला। हा इशा ॥९॥
॥ शैरीषॆच ॥
प्रॆ ष्ठं व यॊतीहातइश। अ, ता.टाइ थींता। स्तु षाताइ.शमि त्रा,तामि, वा.टाप्राखयंण। औथहॊचइश। अ ग्नॆ.थारा था.टान्नापवॆश। दाखयांश। हा इशा ॥१०॥
प्रॆ ष्ठं वॊतिहातबुश। आ ति था इंषुस्तु षॆ मि त्र, मि व प्राटूयांत। अ ग्ना इ रा.टीट्थाखऔ हॊ वाशि। न वॆ_ दी.टियांख ॥११॥
॥ इन्द्रस्यसंवर्गौवात्रघ्नॆद्वॆ ॥
त्व न्नॊ याति। ग्नॆचमा_ हॊथाभिः पा, हा इ वीटुश्वात। स्याचआ_ रा तॆ_थिच्रु ता_चाद्वा_यइ षाःटा। मा_कर्त्त्याथस्य इ ळा.टिभाखण्। ओपइ ळाशा ॥१२॥
त्वा न्द्व न्नॊषिअ ग्नॆ म हॊतीभातइःश। पा_कहि वि श्वा_ औटीहॊतस्या औटाहॊत। अ रा तॆ_किच्रु ता_चाद्वा_यइ षाःटा। म, र्त्तॊ.टाट्या.खऔ हॊ वाशि। स्याख ॥१३॥
॥ साकमश्वस्यशौनःशॆपॆःसामनी द्वॆ ॥
एफाह्यू षु ब्र वाखिणा इ ता इशी। अ ग्न इ त्थॆषीत रा_ गा.टिइ राःचा। ए भा.टाइ र्व्व द्धाचि। स, या.टाहाखण्इश। दॊपभॊप्ल। हा इशा ॥१४॥
ए ह्यू षुषिब्र व्वौ हॊ णातीइ ताताइश। अ ग्न इ त्थॆ त रा.यूगीपराःश। ए भि र्व्वाखिर्द्धाण। स, या.टाहाखण्इश। दॊपभॊप्ल। हा इशा ॥१५॥
॥ वत्सस्यकाण्वस्यसामनीद्वॆ ॥
आ तॆ व त्साःती। माचनॊ_शय म त्प रा_चीमा_थच्चि त्सा धाटिस्थातत् । अ ग्ना_ इ त्वांभीकात। म यॊ.पावाप्लगा इ रॊप्लि । हा इशा ॥१६॥
आ तॆ व त्सॊषीम नॊ य म द्ं या.तूहातइश। पा रा माषिच्चि त्स ध स्था, द्ं य्या.टूहॊ_कच्इ याशा। अ ग्नॆ त्वां काषीम, या अं य्या.टूच्हॊ_कचइ याशा। गि राकाइ ळा.टाभाखण्। ओपइ ळाशा ॥१७॥
॥ अग्नॆश्चवैश्वानरस्यार्षॆयं ॥
त्वा म ग्नॆ पु ष्का,तुरा द धीति। आचथ र्व्वा_चाना_ इ र मा.टीन्धाखताण। मूखर्द्ध्नॊप्लवाखइ श्वाणा। स्य वॊपावाप्लघा तॊप्ला । हा इशा ॥१८॥
॥ सुमित्रस्यचवार्द्धश्वॆस्साम ॥
अ ग्नॆ वि वषीस्व दा भ रॊ वातूहातइश। अ स्मचाभ्य मू.काच्त याचाइ म, हाटिओ वाटाहा.तओ, वाटाहातइश। दा_चइ वॊ_याहि, या_टाओ, वा _टाहा_तओ, वाटाहातइश। सा.टइ ना_खाऔ हॊ वाशि। दृ शॆताच् ॥१९॥
द्वितीय खण्डः (१५)
॥ अग्नॆश्चसंवर्गः ॥
न म स्तौ हॊतिग्नातइश। ओ जा सा.किइ गृ णा.टिन्ताखइ दॆणा। वा_चका_यष्टा याःटि। अ मा इ रा.टीट्माखऔ हॊ वाशि। त्र म र्द्द याखी ॥१॥
॥ वैश्वमनसञ्च ॥
दूणतां.फवॊखवि श्व वॆ द सांशु। हाथव्य वा,चहाटम मा.टुर्त्ताखयंण। या_चजि ष्ठ,चमृ ञ्ज सॆटुहातइश। गिचरा औ.टाहॊखबाप्ल। हॊप्लइ ळाशा ॥२॥
॥ श्नाभाश्नौष्टॆद्वॆ ॥
उ प त्वा जाःती। म, यॊ.टागि राःटा। ओ इ य यू_ र्द्दाषुई. दि श ती_ र्हा.तूवि ष्कृ ताःटि। ओकइ य यू_टिच्र्व्वा.कयॊ राटानीत। क या स्थाखिई रात्रान् । अ श्वा.थागाटवाःख ॥३॥
उ प त्वा जा मा.तुयॊ गि राःति। दा,चइशदि शा.काता, इ र्ह वी.टीष्काखर्त्ताःण। वा यॊ र ना.तीहा इ का याती। स्था इ रा.टिऔ हॊखावा, ई, ळाशि ॥४॥
॥ वैश्वामित्रञ्च ॥
ऊ पा_पित्वा ग्नॆ दि वॆ दि वा इशू। दॊ षा.टावा स्ता.टार्द्धि या_चाव यंचा। ना मॊ.टाभा रा.टाच्न्ताचएकमा.टसाखण्इश। ओपइ ळाशा ॥५॥
॥ अग्नॆश्चजराबॊधीयॆ ॥
जा राता। बॊ धा.टाबॊ धा.टात द्वि_चावि ढ्ढाचाइश। वि शॆ_कावा इ शॆ_टिय ज्ञॊ.टाया याखाऔ हॊ वाशि। स्तॊ मं_कारू द्रा य दृ शी_कूकांच ॥६॥
ज रा बॊ धॊतीवात। ता_चद्वि वि ड्ढाचिइश। वि शा इ वा.टीइ शॆता। याथज्ञि,शया या स्तॊ_किच्मां_चरु.यद्रा.पयाफदृ । शी कॊखाइ ळाप्ला ॥७॥
॥ मारूतञ्च ॥
प्रा ति त्यापिञ्चा रू म ध्व रांशु। गॊ पी.थाधा या प्राचिहू,कयाखसाणइश। मा रु_चात्भी_करा ग्ना_ या.टिगचहा औ.टाहॊखबाप्ल। हॊ इप्लाळाश ॥८॥
॥ भार्गवॆच ॥
आ श्वा.टाऔ हॊखावाश। ना त्वा.टाऔ हॊखावाश। वा र व न्तंषीव न्द द्ध्यैति। आ ग्ना.टाऔ हॊखावाश। न मॊ भिषिस्स म्म्रा ज न्तांतु। आ द्ध्व रा.किणा मौपाहॊ_ बाप्ला। हॊप्लाइ ळाश ॥९॥
अ श्व न्न त्वाषीवा र व न्तांती। वकन्द द्ध्याषिअ ग्नि न्न मॊ भा_चुइःश। सं_कम्रा जं.थान्ता मा.चाद्ध्व राखाऔ हॊ वा इ हॊखुहाणइश। औकहॊ.टयाखऔ हॊ वाशि। णांख ॥१०॥
॥ अग्नॆश्चवारवन्तीयं ॥
अ श्व न्न त्वा बु हॊतूहातइश। वा रा_ वाखिन्तं.शवंकदा_ द्ध्यॊपहाणइश। अ ग्ना इ न्न मा.पुऔ हॊ वा इ हॊखुहाणइश। उ हु वाखिभीःण। सं_कम्रा जं.थाता म द्ध्वापीरा. औ हॊ वा इ हॊखुहाणइश। उ हु वापिणा, मॆ हि या_प्लीहाश। हॊ इप्लळाशा ॥११॥
॥ और्वस्यवैधारॆस्सामनीद्वॆ ॥
औ र्व्व भृ ग्व दॊचूहातइश। शॊखचिंश। आ प्ना वा.टिनाकव दा_टाहु, वा.टाइ हु व यॊ_चीइश। अ ग्ना.टाइं स मू.टिच्स मु ओचि। द्र वा_चासा.कसा_तबुश। वाख ॥१२॥
औ र्व्व भृ ग्वषुछु चि मॆतिशु चींता। आ प्न वा.किनाचव दा.टाहु वा.ताइ हु वाटिइ हु_ वाटिएत। अ ग्ना इं सा_टीमू_तस, मू.टासा मूटाएत। द्रा.ट्ट्वाखऔ हॊ वाशि। साचसा.टमॆख ॥१३॥
॥ अत्रॆश्चासंगं ॥
अ ग्नि मिषिन्धा नॊ, म न स्यौ हॊ, औ हॊ वातेहातइश। धि यं स चॆ त मौ_टूहॊटहा.तहॊ, वा.टार्त्ति याःता। अ ग्ना इ मा.टीट्इ न्धाखाऔ हॊ वाशि। वि वा_टिस्वा. भीःख ॥१४॥
॥ प्रजापतॆश्चनिधनकामं ॥
आ दि त्प्र श्त्ना.फीस्य रॆशात साःका। ज्यॊ तिः प श्यषीन्ति वा_ सा_टिरांच। प रॊ_ या.टिदि द्ध्य ताचिइश। दि वि हॊ इ हॊ_कूऔ. हॊ औ. हॊ वापाहा_प्लबुश। वाख ॥१५॥
तृतीय खण्डः (२१)
॥ सैन्धुक्षितानित्रीणि ॥
अ ग्निं वॊ वृ धातुन्तांत। आ द्ध्वा_चारा णां_थाच्पू रू_काता_यमौ.टहॊ वाटाहातइश। आ च्छा.टाना प्त्रॆटा। साकहॊ. बाप्लास्वा तॊ । हा इशा ॥१॥
अ ग्निं वातीएत। वृ ध न्ता म द्ध्व रा णा म्पु रू त, म म च्छा_प्लिहॊ_यइ नाटाप्त्रॆत। स हापिस्वाशताचइश। ईप्लीतीशा ॥२॥
अ ग्निं वॊतीहातइश। वृ, धाटान्तांत। आ द्ध्व रा णां पु रू. ता मांप। अ च्छा न प्त्रॆपाच्हॊखाहाणइश। साशहॊकहापइश। स्व ताकऔ.टाहॊ_खबाप्ल। हॊप्लइ ळाश ॥३॥
॥ अग्नॆर्हरसीद्वॆ ॥
आ ग्ना.टाउ वॊखावाश। ति ग्मॆ.थाच्नाकशॊ_ चाटीइ षा. उ वॊखावाश। यां सा.टाउ वॊखावाश। वा इ श्वा न्या,टूत्रा इ णा. उ वॊखावाश। अ ग्नि_ र्टन्नॊ, वं स तॆ_कीर,चयींच ॥४॥
ओ हा यातीगीःख। ताशाइ ग्मॆ.खना शॊ_ चाणइ षा । यं सा.टाद्वाखइ श्वा.शानी या_ त्राखइ णंण। अ ग्निं_टर्न्नॊ,टवं सा.टाताखऔ हॊ वाशि। राखयींश ॥५॥
॥ इहवद्वामदॆव्यन्तृतीयं ॥
अ ग्नि स्ति ग्मॆषीन शॊ_ चि षाटिइ हातू। यं स द्वि श्व,षीन्य त्री णा.टिमि हाता। अ ग्नि_ र्न्नॊ,टिवं स ता.टूइ हाता। रापया इं_ हाशाइश ॥६॥
॥ यामॆद्वॆ ॥
अ ग्ना,टाइ मृ ळा.टुम हं_खिया सीण। आ य आ_ दा.टीइ व यू_खीञ्जा नंण। ई यॆ थाटीब र्हि राखिसा दांत्र ॥७॥
आणग्नॆ.फमृ ळा मा.फिहं या सि.फिओ हा.खाओखहाश। आणया.फआ दॆ वा.फियु न्ज ना.फिमॊखहा.शओखाहाश। इ या ई था.टीब र्हि राखासा दांत्र ॥८॥
॥ अग्नॆराक्षॊघ्नॆद्वॆ ॥
अ ग्नॆखीरा_ क्षाखीणॊ,शअं,प्लिहा,तसःत। प्रा ति स्म दॆ.कीवा री षाटिताःत। ता.टीपाटीइ ष्ठा.टीइ राता। ज रॊटिदा,टिहाखण्। ओपइ ळाप्ला ॥९॥
अ ग्नॆखीयूं_खीङ्क्ष्वाखीहि,शयॆ, ता, वाप्लि। अ श्वा सॊ_चीदॆ.चीवा सा_टिधाटिवाःत। आ रं_टिवा_टिहातन्ती,कआ शा.टावाःखण्। ओपइ ळाप्ला ॥१०॥
॥ वैश्वमनसञ्च ॥
निखित्वा_खिहॊखिइ न क्ष्याशि। वा,चइ स्पा ताचिइश। द्यू मं_कतं. धाचिइ मा_ हॆ.कवाखयंण। सु वॊताहातइश। रा म ग्ना.चिओ.पबाप्लहू तॊ । हा इशा ॥११॥
॥ अग्नॆश्चार्षॆयं ॥
अ ग्निं_तुमू र्द्धातुदी.तुवःतिक कूतित् । पा तीः.टापा र्त्थी.टाव्य अ यां.चि। आ पां.टारा इ तां.टिसीकजि न्वा.टाताखण्इश। ओपइ ळाप्ला ॥१२॥
॥ सॊमसामच ॥
इ म मूतीषूती। त्वा मा_ स्माटिकांत। सा निं.टाहॊ इ गा_टीया.टीहॊ_कतृथन्न_, व्यं,टासांता। आ ग्नॆ.टाहॊ इ दॆ_टीवा.टीहॊ.कथ्षु प्रा वॊ.टिचाःखण्। ओपइ ळाप्ला ॥१३॥
॥ गॊपवनञ्च ॥
त न्त्वातीगॊ पाती। वा नॊ.टागाखइ राःणा। ज नाचाइ ष्ठा,चाद ग्ना या.टूङ्गाखइ राःणा। स पौखुवा_शउ वॊखुवा.शकौखिवा_णउ वॊखिवाण। श्रु धीप्लीह वांप्ली। हॊपइ ळाशा ॥१४॥
॥ सूर्यसामनीद्वॆ ॥
प रि यौषीहॊषीइ वातिजाति। पा ता_चाइःचाका_यावीःट। अ_ ग्नी,चार्ह व्य_थान्ना.टयःटिक्र मीटित् । द धाटिट्द्रा.टिट्त्नाशिऔ हॊ वाशि। नि दा.ताशू षॆटाख् ॥१५॥
उ दु त्य मॊतीहातइश। जा ता वॆ.किदाखसंण। दॆ_कवंकव ह न्ती कॆ.कुताखवाःण। दा र्शॆपाहाणइश। वा इ श्वाकिच्या.कसू र्या मौपिहॊ_प्लबाप्ला। हॊप्लइ ळाशा ॥१६॥
॥ कावञ्च ॥
क वि म ग्नींती। उ पाटिच्स्तु,खहाशऔ हॊ वाश। स त्य ध_कीर्म्मा णंचाअ_ द्ध्व,चारॆ । दॆ वा,तीम मी.तीवा चाणाता.पनां । ओप्लइ ळाशा ॥१७॥
॥ वसुरॊचिषस्सौर्यवर्चस्यसामनीद्वॆ ॥
श न्नॊ दॆतीवीः । आ भीटिष्टा.टियाखइ श न्नॊ भु वांशु। तू पीटिता.टियाखइ श य्यॊ र भीःशु। स्रा व न्तू.टिट्नाखऔ हॊ वाशि। ऊखपाश ॥१८॥
हु वा,ताहॊपइ श न्नॊ दॆ वीप्लुर भि ष्ट याङिइश। हु वा.ताहॊपइ श न्नॊ भु वाप्लुन्तू पी ता याङीइश। हु वा.ताहॊपइ श य्यॊ र भीप्लुस्र व न्तुङिनाःश। हु वा_ताहॊ.टयाखऔ हॊ वाशि। ऊखपाश ॥१९॥
॥ गौरांगिरसस्यसामनीद्वॆ ॥
क स्या नू_टीनां.टीप री_ णाखिसीण। धी यॊ जि न्वा.टीसी सा_खित्पा ताणइश। गॊ_चषा ता_चाया स्या.टाट्ताखऔ हॊ वाशि। उ ब्ग्गीखाराःश ॥२०॥
ओ_कहॊथावा_थाइ हु वाटिइ हु_चिवाचिएत। क स्य नूखीनां.खीपा री.चाणा सीफा। ओ_कहॊथावा_थाइ हु वा.टिइ हु_चिवाचिएत। धी यॊ जि न्वा.खीसी सा.चात्पा तींफाइ । ओ_कहॊथावा_थाइ हु_ वा.टिइ हु_चिवाचिएत। गॊ षा ता य स्य ताखूगाखूइश। राःत्र ॥२१॥
॥ संहिता सङ्ख्या ॥
॥ वर्णानुक्रमणिका ॥
- अग्नॆराक्षॊघ्नॆद्वॆ
- अग्नॆर्हरसीद्वॆ
- अग्नॆश्चजराबॊधीयॆ
- अग्नॆश्चवारवन्तीयं
- अग्नॆश्चवैश्वानरस्यार्षॆयं
- अग्नॆश्चसंवर्गः
- अग्नॆश्चार्षॆयं
- अत्रॆश्चासंगं
- इन्द्रस्यसंवर्गौवात्रघ्नॆद्वॆ
- इहवद्वामदॆव्यन्तृतीयं
- और्वस्यवैधारॆस्सामनीद्वॆ
- औशनञ्च
- कश्यपस्यबर्हिषीयं
- कावञ्च
- गॊपवनञ्च
- गौतमस्यचैवपर्क्कः
- गौतमस्यपर्क्कः
- गौरांगिरसस्यसामनीद्वॆ
- प्रजापतॆश्चनिधनकामं
- भार्गवॆच
- मारूतञ्च
- यामॆद्वॆ
- वत्सस्यकाण्वस्यसामनीद्वॆ
- वसुरॊचिषस्सौर्यवर्चस्यसामनीद्वॆ
- वैश्वमनसञ्च
- वैश्वमनसञ्च (2)
- वैश्वमनसञ्चादित्यसामव
- वैश्वामित्रञ्च
- शैरीषॆच
- श्नाभाश्नौष्टॆद्वॆ
- श्रौतर्षाणित्रीणि
- साकमश्वस्यशौनःशॆपॆःसामनी द्वॆ
- सुमित्रस्यचवार्द्धश्वॆस्साम
- सूर्यसामनीद्वॆ
- सैन्धुक्षितानित्रीणि
- सॊमसामच
- सौपर्णञ्च