॥ अथ प्रकृतिगानम् (ग्रामेगेयगानम्) ॥

संस्करणम्: 1.0 , निर्मितम्: 17-10-2026 23:59:15

१. आग्नेयं पर्व — प्रकृतिगानम् (गायत्रम्)

॥ गायत्रम् ॥ (ऋ-१, सा-२)

गायत्रम्।   परमेष्ठी प्रजापतिः, गायत्री, सविता ॥
ओ꣡ऽ३म् । त꣡त्सवितुर्वरे꣯णियोम् । भार्गो꣯दे꣯वस्य धी꣯माहीऽ२ । धियो꣡꣯यो꣯न: प्रचो꣢ऽ१२१२ ।
हि꣡म् (स्थि) आऽ२ । दा꣡यो । आ꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
दीर्घाः ६ । पर्वाणि ६ । मात्राः २॥ का ॥ १ ॥

गायत्रम् (Version 2)।   परमेष्ठी प्रजापतिः, गायत्री, सविता ॥
ओ꣡ऽ३म् । त꣡त्सवितुर्व꣯रेणियोम् । भा꣡र्गो꣯दे꣯वस्यधी꣯माहीऽ२ । धियो꣡꣯यो꣯नः प्रचो꣢ऽ१२१२ । हु꣡म् (स्थि)
आऽ२ । दा꣡यो । आ꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
दीर्घाः ६ । पर्वाणि ६ । मात्राः ३॥ ख्रि ॥ १ ॥
इति प्रकृतिसप्तगानान्तर्भूतं गायत्राख्यं प्रथमं गानं सम्पूर्णम् ॥

१. आग्नेयं पर्व — प्रथमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ अथ प्रथम खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-१९)

१-१ पर्कः।   गोतमो, गायत्री अग्निः ॥
ओ꣤ग्नाइ ॥ आ꣢꣯या꣯हीऽ३वो꣡इतोयाऽ२इ । तो꣡याऽ२इ । गृ꣡णा꣯नो꣢꣯ह । व्यदा꣡तोयाऽ२इ । तो꣡याऽ२इ ॥
ना꣡इहो꣢꣯ता꣡साऽ२३ ॥ त्सा꣡ऽ२᳐इबा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ही꣣ऽ२३४षी꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ९)(१)॥ झो ॥ १ ॥

१-२ बर्हिष्यम्।   कश्यपो, गायत्री अग्निः ॥
अ꣤ग्न꣥आ꣤꣯ या꣥꣯हिवी꣤ ॥ त꣡याइ । गृणा꣯नो꣯हव्यदा꣯ताऽ२३या꣢इ । नि꣡हो꣯ता꣯सत्सि꣢ब꣡र्हाऽ२३इषी꣢ ॥
ब꣡र्हाऽ२᳐इषा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ब꣢र्हीऽ᳐३षी꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ ६। मा॰ ६)(२)॥ तू ॥ २ ॥

१-३ पर्कः।   गोतमो, गायत्री अग्निः ॥
अ꣤ग्न꣥आ꣤꣯ या꣥꣯हि । वा꣤ऽ५इतया꣤इ ॥ गृ꣡णा꣯नो꣯हव्यदा꣢ऽ१ता꣢ऽ३ये꣢ ॥ निहो᳐ता꣣ऽ२३४सा꣥ ॥
त्सा꣡ऽ२३इबा꣢ऽ३ । हा꣡ऽ२३४इषो꣥ऽ६हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ६)(३)॥ तू ॥ ३ ॥
२-१ सौपर्णं, सुपर्णोः वैश्वमनसम्।   विश्वमना, गायत्री, अग्निः ॥
त्व꣤म꣥ग्ने꣯यज्ञा꣤꣯ ना꣥꣯म् । त्व꣤म꣥ग्ना꣤इ ॥ य꣢ज्ञा꣡꣯ ना꣯ꣳहो꣯ता꣯ । विश्वे꣯षा꣯ꣳहाऽ२३इता꣢: ॥ दे꣯वै꣡꣯भाऽ२३इर्मा꣢ ।
नु꣣षे꣯ज꣢ना꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १२। प॰ ९। मा॰ ६)(४)॥ झू ॥ ४ ॥
३-१ बृहद्भारद्वाजम् (बृहदाग्नेयं, बृहद्वा सौरम्)।   भरद्वाजो गायत्री, अग्निः ॥
अ꣥ग्निन्दू꣯ताम् ॥ वृ꣢णी꣡꣯महाइ । हो꣯ता꣯रांऽ२३वी꣢ । श्ववे꣡꣯दसाम् ॥ अस्ययाऽ२३ज्ञा꣢ । आ꣡ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣢ ॥
स्या꣡सुक्र꣢तुम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ५)(५)॥ कु ॥ ५ ॥
४-१ (श्रौतर्षाणि त्रीणि) श्रौतर्षम्।   त्रयाणां श्रुतर्षिः गायत्री, अग्निः ॥
अ꣥ग्निर्वृत्रा ॥ णा꣡ऽ२᳐इजा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । घा꣣ऽ२३४ना꣥त् । द्र꣢विणस्यु꣡र्विप꣢न्य꣡या꣰꣯ऽ२ ।
ओ꣡इसमिद्धाऽ२३श्शू꣢ ॥ क्रा꣡या꣯हु꣢तः । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ६)(६)॥ धू ॥ ६ ॥

४-२
अ꣣ग्नि꣢रौ꣣꣯हो꣤वाहा꣥इ । वृत्रा꣤णी꣥ ॥ जा꣡ङ्घा꣢ऽ३ना꣢त् । औ꣡हो꣢ऽ३वा꣢ऽ३ । द्र꣡विणा꣣ऽ२३४स्यूः꣥ ।
ओ꣡इवोइप꣪न्ययाऽ२ ॥ स꣡माये꣢ऽ३᳐ । धा꣡ऽ२᳐श्शू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । क्र꣢या꣡꣯हुता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ७)(७)॥ धे ॥ ७ ॥

४-३
ओ꣤ग्ह्नी꣥: ॥ वृ꣢त्रा꣡꣯णिजङ्घनात् । औ꣣꣯हौ꣢हो꣣ऽ२३४वा꣥ । द्र꣢विणस्यु꣡र्विप꣢न्य꣡या । औ꣣꣯हौ꣢हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
स꣡मिद्ध꣢श्शुक्र꣡या । औ꣣꣯हौ꣢हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ हो꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ३)(८)॥ दि ॥ ८ ॥
५-१ औशनम्।   उशना विराड्गायत्री, अग्निः ॥
प्रे꣤꣯ष्ठं ꣥वा꣤: ॥ अ꣡ताऽ२३इथी꣢म् । स्तौ꣡षे꣯मि꣢त्रम् । इव꣡प्राऽ२३या꣢म् ॥ अ꣡ग्नाइरा꣢ऽ३था꣢ऽ३म् ॥
ना꣡वाऽ२३हा꣢ऽ३४३इ ॥ दा꣡ऽ२३४यो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ९)(९)॥ छो ॥ ९ ॥

५-२ शैरीषम्।   शिरीषो उशना, गायत्री, अग्निः ॥
प्रे꣤꣯ष्ठं ꣥वः । ओ꣤हाइ ॥ अ꣡ताऽ२३इथी꣢म् । स्तुषाइमित्राऽ᳐३म् । इ꣡वाऽ२᳐प्रा꣣ऽ२३४या꣥म् ॥ औ꣢꣯होऽ१इ ।
अग्ने꣢꣯रा꣡थाऽ२३म् ॥ ना꣡ऽ२३वे꣤ऽ३ । दा꣢ऽ३४५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ १०)(१०)॥ ढौ ॥ १० ॥

५-३ औशनम्।   उशना विराड्गायत्री, अग्निः ॥
प्र꣥꣯ष्ठंवो꣯हा उ ॥ अ꣡तिथाइम् । स्तुषे꣯मित्रमिवप्राऽ२३या꣢म् ॥ अ꣡ग्नाये꣢ऽ३ ।
रा꣡ऽ२᳐था꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ न꣢वे꣡꣯दिया꣣ऽ२᳐३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ६)(११)॥ कू ॥ ११ ॥
६-१ सांवर्गम्।   (संवर्गः) साकमश्वः गायत्री, अग्निः ॥
त्व꣥न्नो꣯या ॥ ग्ने꣢꣯म꣡हो꣢꣯भिः । पा꣡꣯होइवी꣢ऽ३श्वा꣢ । स्या꣡꣯अरा꣯तेः꣢꣯ ॥ उ꣡ताद्वा꣢ऽ१इषाऽ२: ॥ म꣡र्त्य꣢स्य ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ७)(१२)॥ झे ॥ १२ ॥

६-२ वार्त्रघ्नम्।   साकमश्वः गायत्री, अग्निः ॥
त्वां ꣤꣯त्वन्नो꣥꣯अग्ने꣯म꣤ । हो꣥ऽ६भा꣥इः ॥ पा꣢꣯हि꣡विश्वाऔ꣢ऽ३हो꣢ । स्या꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । आ꣡रातेः꣢ ।
उ꣡ताद्वा꣢ऽ१इषाऽ२: । म꣡र्ताऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ९)(१३)॥ गो ॥ १३ ॥
७-१ शौनःशेपम्।   वत्सः गायत्री, अग्निः ॥
ए꣥꣯ह्यू꣯षू꣢ऽ३ब्र꣤वा꣯णा꣥ऽ६इता꣥इ ॥ अ꣡ग्नइत्थे꣯तरा꣯गाऽ२इरा꣡: ॥ ए꣢꣯भाऽ२इर्व꣡र्द्धा ॥ स꣡याऽ२३हा꣢ऽ᳐३४३इ ॥
दू꣡ऽ२३४भो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ५। मा॰ ८)(१४)॥ ङै ॥ १४ ॥

७-२ शौनःशेपम्।   शौनः शेपः, गायत्री, अग्निः ॥
ए꣥꣯ह्यू꣯षुब्रवौ꣯हो꣤णाइता꣥इ ॥ अ꣡ग्नइत्थे꣯तरा꣢ऽ१गी꣢ऽ३रा꣥: ॥ एभि᳐र्वा꣣ऽ२३४र्द्धा꣥ ॥ स꣡याऽ२३हा꣢ऽ᳐३४३इ ॥
दू꣡ऽ२३४भो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ५। मा॰ ६)(१५)॥ नू ॥ १५ ॥
८-१ वात्से द्वे।   वत्सो गायत्री, अग्निः ॥
आ꣥꣯ते꣯वत्साः ॥ म꣡नो꣯य꣢मत् । प꣡रमा꣢꣯त् । चित्स꣡धाऽ२३स्था꣢त् ॥ अ꣡ग्नाइ त्वा꣢ऽ᳐३ङ्का꣢ऽ᳐३ ॥ म꣤योवा꣥ ।
गा꣤ऽ५इरोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ७)(१६)॥ थे ॥ १६ ॥

८-२ काण्वम्।   कण्वः गायत्री, अग्निः ॥
आ꣤꣯ ते꣥꣯वत्सो꣤꣯मनो꣥꣯यमत् । ऐ꣤याहा꣥इ ॥ प꣢रमा꣡꣯च्चित्सधस्था꣯दै꣯याऽ२३हो꣡इया ॥
अग्ने꣯त्वां ꣯का꣯मयऐ꣯याऽ२३हो꣡इया ॥ गि꣢रा꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १२। प॰ ८। मा॰ ६)(१७)॥ जू ॥ १७ ॥
९-१ अग्नेरार्षेयम्।   गायत्री, अग्निः ॥
त्वा꣥꣯मग्ने꣯पू꣯ष्काऽ६रा꣥꣯दधी ॥ आ꣡थ꣢र्वा꣯ । ना꣡इः । अ꣪माऽ२᳐न्था꣣ऽ२३४ता꣥ ॥ मू꣣ऽ२३४र्ध्नो꣥ । वा꣣ऽ२३४इश्वा꣥ ।
स्य꣤वोवा꣥ । घा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ४)(१८)॥ बी ॥ १८ ॥
१०-१ वाध्र्यश्वम्।   (वध्र्यश्वोऽनूपो वा) गायत्री, अग्निः ॥
अ꣤ग्ने꣥꣯वि꣤व꣥स्वदा꣤꣯भ꣥रो꣤ । वाहा꣥इ ॥ अ꣢स्मभ्यमू꣯तऽ३या꣡इमहे꣢꣯ । ओ꣡ । वा꣢ऽ३᳐हा꣢इ । ओ꣡ । वा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ॥
दा꣡इवो꣢ऽ१हियाऽ२ । ओ꣡ । वा꣢ऽ३हा꣢इ । ओ꣡ । वा꣢ऽ३᳐हा꣢ऽ३᳐इ ॥
सा꣡ऽ२᳐इना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । दृ꣢षेऽ१ ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ९)(१९)॥ घो ॥ १९ ॥
॥ एकोनविंशतिः । प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥

॥ अथ द्वितीयः खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-१५)

११-१ सांवर्गम्।   सांवर्गः। अग्निर्गायत्र्यग्निः ॥
न꣤म꣥स्तौ꣯ । हो꣤ग्ना꣥इ ॥ ओ꣡जसा꣢ऽ३इ । गृ꣡णाऽ२᳐न्ता꣣ऽ२३४इदे꣥ । वा꣡कृ꣪ष्टयाऽ२: ॥ अ꣡माये꣢ऽ३ः ॥
आ꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ त्र꣢मर्द᳐या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ६)(१)॥ डू ॥ २० ॥
१२-१ वैश्वमनसम्।   विश्वमनाः गायत्र्यग्निः ॥
दू꣥꣯ता꣤ऽ३म्वो꣢ऽ३वि꣤श्ववे꣥꣯दसाम् ॥ ह꣢व्यवा꣡꣯हाम् । अ꣪माऽ२᳐र्त्ता꣣ऽ२३४या꣥म् ॥ या꣡जिष्ठ꣢म् । ऋ꣡ ।
जसे꣢ऽ३᳐हा꣢इ ॥ गिरा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ६)(२)॥ णू ॥ २१ ॥
१३-१ श्नाभम्।   श्नाभो गायत्र्यग्निः (इन्द्रः) ॥
उ꣥पत्वा꣯जा ॥ म꣡यो꣰꣯ऽ२गि꣡ । र꣢ओ꣡इय꣪यूऽ२: । दा꣡इदिश꣢ती꣯र्हविष्कृ꣡ । त꣢ओ꣡इय꣪यूऽ२: ॥ वा꣯यो꣡꣯राऽ२३नी꣢ ॥
क꣣या꣢ऽ᳐३स्था꣤ऽ५इराऽ६५६न् ॥ अ꣡श्वा꣢ऽ३᳐गा꣡꣯वाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ १०)(३)॥ गौ ॥ २२ ॥

१३-२ श्नौष्टीयम् (श्नौष्टम्) श्नुष्टो गायत्र्यग्निः।
उ꣥पत्वा꣯जा꣯माऽ६यो꣥꣯गिराः ॥ दा꣡इदिश꣢ । ता꣡इः । ह꣪वीऽ२᳐ष्का꣣ऽ२३४र्त्ता꣥: ॥ वा꣯यो꣯रना꣯हा꣯इका꣤या꣥ ॥
स्था꣡इरा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ ई꣤डा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ७)(४)॥ डे ॥ २३ ॥
१४-१ वैश्वामित्रम्।   विश्वामित्रो गायत्र्यग्निः ॥
उ꣢पा꣡त्वाऽ२३ग्ने꣤꣯दिवे꣥꣯दिवाइ ॥ दो꣡षाऽ२वा꣡स्ताऽ२: । धिया꣡꣯वयम् ॥ नामोऽ२भा꣡राऽ२ ॥
त꣢ए꣡꣯माऽ२३सा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ५)(५)॥ थु ॥ २४ ॥
१५-१ जराबोधीये द्वे।   द्वयोरग्निर्गायत्री रुद्रः ॥
जा꣤रा꣥ । बो꣡धाऽ२बो꣡धाऽ२ । त꣡द्विविड्ढाइ ॥ वि꣢शे꣯वा꣡इशेऽ२ ॥ य꣡ज्ञाऽ२३ । या꣯या꣢ऽ᳐३४ औ꣥꣯हो꣯वा ॥
स्तो꣡꣯मꣳरु꣢द्रा꣡꣯यदृ꣢शी꣯का꣡म् ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ ४)(६)॥ छी ॥ २५ ॥

१५-२
ज꣥रा꣯बो꣯धो꣤वा꣥ ॥ ता꣡द्विवि꣢ड्ढा꣡इ । वि꣢शा꣡इवाऽ२᳐३इशे꣢ । यज्ञिया꣡꣯या । स्तो꣯माꣳरु꣪द्राऽ२३᳚या꣤ ।
दृ꣥ । शी꣣꣯को꣢ऽ३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ४)(७)॥ बी ॥ २६ ॥
१६-१ मारुतम्।   मरुतो गायत्र्यग्निः ॥
प्र꣢ति꣡त्याऽ२३ञ्चा꣤꣯रुम꣥ध्वराम् ॥ गो꣢꣯पी꣯था꣡꣯ । या । प्राहू꣢या꣣ऽ२३४सा꣥इ ॥ म꣢रु꣡द्भि꣢: । आ꣡ । ग्नाआ꣢꣯गहा꣡ ।
औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ५)(८)॥ मु ॥ २७ ॥
१७-१ (भार्गवे द्वे।   ) वारवन्तीयम्। द्वयोः भृगुः शुनःशेपो वा, गायत्र्यग्निः ॥
आ꣡श्वा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । ना꣡त्वा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ वा꣤꣯र꣥वन्तंवन्द꣤ध्या । आ꣡ग्ना꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥
न꣤मो꣥꣯भिस्सम्रा꣤꣯ज꣥न्ता꣤म् ॥ आ꣡ध्वरा꣢꣯णा꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ ३)(९)॥ छि ॥ २८ ॥

१७-२
अ꣤श्व꣥न्न꣤त्वा꣥꣯ वा꣤꣯र꣥वन्ता꣤म् ॥ व꣢न्द꣡ध्या꣯अग्निन्नमो꣯भाइः । स꣢म्म्रा꣡꣯ज꣢ । तमा꣡ध्वरा꣢ऽ३४ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥
इ꣡हा꣣ऽ२३४हा꣥इ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३१२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ णा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ७)(१०)॥ भे ॥ २९ ॥

१७-३
अ꣥श्वन्नत्वा꣯औ꣯हो꣤हा꣥इ ॥ वा꣢रा᳐वा꣣ऽ२३४न्ता꣥म् । व꣢न्दा꣡ध्याऽ२३४हा꣥इ । अ꣡ग्नाइन्नमा꣢ऽ३४ ।
औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । इ꣡हा꣣ऽ२३४हा꣥इ । उ꣢हु᳐वा꣣ऽ२३४भी꣦: ॥ स꣢म्म्रा꣡꣯ज꣢ । ता꣡म꣪ध्वरा꣢ऽ३४ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥
इ꣡हा꣣ऽ२३४हा꣥इ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३᳐१२३४ । णाम् । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १६। मा॰ १०)(११)॥ तौ ॥ ३० ॥
१८-१ सामुद्रे द्वे।   समुद्रस्य वासो वा। और्वः द्वयोरग्निः गायत्र्यग्निः ॥
औ꣥꣯र्वभृगुव꣤त् । ओहाइ ॥ शू꣣ऽ२३४ची꣥म् । आ꣡प्नवा꣢꣯न । वदाऽ२हु꣡वाऽ२इ । हु꣡व꣢ओ꣡इ ॥
अग्नाऽ२इꣳस꣡मूऽ२ ॥ स꣡मु꣢ओ꣡ । द्र꣢वा꣡ससा꣢ऽ३१उवाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ९)(१२)॥ झो ॥ ३१ ॥

१८-२ (वैधारया ऋषिर्वा)।
औ꣥꣯र्वभृगुव꣤च्छुचि꣥म् । ए꣤ऽ५ । शु꣤चीम् ॥ आ꣡प्नवा꣢꣯न । वदा꣡ऽ२३हुवा꣢इ । हुवा꣡ऽ२३इ । हु꣢व꣣ए꣢ ॥
अ꣡ग्नाइꣳसा꣢ऽ३मू꣢ ॥ समू꣡ऽ२३ । स꣢मु꣣ए꣢ऽ३ । द्रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣢साऽ३मे꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ ८)(१३)॥ थै ॥ ३२ ॥
१९-१ असंगम्।   (आसंगः) अत्रिर्गायत्र्यग्निः ॥
अ꣥ग्नि꣤मि꣥न्धा꣯नो꣤꣯मन꣥सौ꣯ । हौ꣤꣯होवाहा꣥इ ॥ धि꣣य꣤ꣳस꣥चे꣯तमौ꣯ । हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हो꣡ऽ२३४र्तियाः ॥
अ꣡ग्नाये꣢ऽ३᳐म् । आ꣡ऽ२᳐इंधा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वि꣢व꣡स्वभी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ६)(१४)॥ डू ॥ ३३ ॥
२०-१ निधनकामम्।   प्रजापतिर्गायत्र्यग्निः ॥
आ꣤꣯दित्प्रत्नाऽ५स्यरे꣯त꣤साः ॥ ज्यो꣡꣯ति:पश्यन्तिवा꣯साऽ२रा꣡म् ॥ प꣢रो꣡꣯याऽ२दि꣡ध्यताइ ॥ दि꣢वि꣡ ।
होइ । होइ । औ꣢꣯ हो꣡꣯ औ꣢꣯हो꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡हाउ ॥ वा ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ६)(१५)॥ डे ॥ ३४ ॥
॥ पञ्चदशः ॥ द्वितीतः खण्डः ॥ २ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने प्रथमस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥

१. आग्नेयं पर्व — प्रथमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ तृतीय खण्डः ॥ (ऋ-१४, सा-२१)

२१-१ सैन्धुक्षितानि त्रीणि।   त्रयाणां सिन्धुक्षिद्गायत्र्यग्निः॥ स्वारं सैन्धुक्षितम् ॥
अ꣥ग्निंवो꣯वृधा꣤न्ता꣥म् ॥ आ꣡ध्वरा꣢꣯णा꣯म् । पुरू꣡तामौ꣢꣯ । हो꣯वाऽ३᳐हा꣢इ ॥ आ꣡च्छाऽ२ना꣡प्त्रेऽ२३ ॥
स꣢हो꣡ऽ२३४वा꣥ । स्वा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ४)(१)॥ फी ॥ ३५ ॥

२१-२
अ꣥ग्निंवाऽ६ए꣥ ॥ वृ꣢ध꣡न्ताम् । अध्वरा꣯णा꣯म्पुरू꣯तममच्छाऽ२होऽ१इ ॥ नाऽ२३प्त्रे꣢ ।
सहा꣡स्वाऽ२३४५ताऽ६५६इ ॥ ई꣣ऽ२३४ती꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ ४)(२)॥ टी ॥ ३६ ॥

२१-३ ऐडं सैंधुक्षितम्।
अ꣥ग्निं ꣤व꣥: । ओ꣤हाइ ॥ वृ꣡धाऽ२३न्ता꣢म् । अ꣡ध्वरा꣯णा꣯म्पुरू꣢ऽ१ता꣢ऽ᳐३मा꣢म् ॥ अच्छा꣯नप्त्रो꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥
सा꣡हा꣢ऽ३हा꣢ । स्वता꣡ । औ꣢ऽ३᳐हो꣤वा꣥ ॥ हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ६)(३)॥ णू ॥ ३७ ॥
२२-१ हरसी द्वे।   द्वयोरग्निर्गायत्र्यग्निः ॥
आ꣡ग्ना꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ति꣢ग्मे꣯नऽ३᳐शो꣡ । चाइषा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ या꣡ꣳसा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ वा꣡इश्वान्निया ।
त्राइणा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ अ꣢ग्नि꣡र्नो꣰꣯ऽ२वꣳसते꣯र꣣यी꣢ऽ१म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ८)(४)॥ ठै ॥ ३८ ॥

२२-२
ओ꣤हा꣥ । ओ꣤ग्ह्नी꣥: ॥ ता꣣ऽ२३४इग्मे꣥ । ना꣢शो᳐चा꣣ऽ२३४इषा꣥ । य꣡ꣳसाऽ२᳐द्वा꣣ऽ२३४इश्वा꣥म् ।
नि꣢यत्रा꣣ऽ२३४इणा꣥म् ॥ अ꣢ग्नि꣡र्नो꣰꣯ऽ२᳐ । व꣡ꣳसाऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ रा꣣ऽ२३४यी꣥म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ९)(५)॥ ढो ॥ ३९ ॥

२२-३ इहवद्वामदेव्यम्।   वामदेवो गायत्र्यग्निः ॥
अ꣥ग्नि꣤स्ति꣥ग्मे꣤꣯न꣥शो꣯चि꣤षा꣥꣯ । इ꣤हा ॥ य꣡ꣳसद्विश्वन्यत्रिणाऽ२म् । इ꣡हा꣢ ॥ अग्नि꣡र्नो꣯वꣳसताऽ२इ ।
इ꣡हा꣢ऽ३ ॥ रा꣡ऽ२३४यो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ३)(६)॥ थि ॥ ४० ॥
२३-१ यामम्।   यमो, गायत्र्यग्निः ॥
अ꣡ग्नाइमृ꣪डाऽ२᳐ । म꣣हा꣢ꣳआ꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ अ꣡यआ꣯दाऽ२᳐इ । व꣣यु꣢ञ्जा꣣ऽ२३४ना꣥म् ॥ इ꣡ये꣯थबाऽ२३ ॥
हिरा꣢ऽ३सा꣤ऽ५दाऽ६५६म् ॥
(दी॰ २। प॰ ६। मा॰ ६)(७)॥ चू ॥ ४१ ॥

२३-२ उत्तरयामम्।   यमो गायत्र्यग्निः ॥
अ꣣ग्ने꣤꣯मृड꣣म꣤हा꣣꣯ऽꣳअ꣤सि꣥ । ओ꣣꣯हा꣢ऽ३ओ꣤हा꣥ ॥ अ꣣य꣤आ꣣꣯ दे꣤꣯वयु꣣ञ्ज꣤न꣥म् । ओ꣣꣯हा꣢ऽ३᳐ओ꣤हा꣥ ॥ इ꣢ये꣡꣯थाऽ२३ब꣢ ॥
हि꣣रा꣢ऽ३सा꣤ऽ५᳚दाऽ६᳚५६म् ॥
(दी॰ ७। प॰ ६। मा॰ ६)(८)॥ चू ॥ ४२ ॥
२४-१ राक्षोघ्नम्।   अग्निर्गायत्र्यग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯रा꣢ऽ३क्षा꣤꣯ णो꣥꣯ अ꣤ꣳहसा꣥: ॥ प्र꣡तिस्मदे꣯व꣢रि꣡षाऽ२३ता꣢: ॥ तपा꣡इष्ठाऽ२३इरा꣢ ॥
जरो꣡꣯दाऽ२३हा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ६। मा॰ ६)(९)॥ पू ॥ ४३ ॥
२५-१ राक्षोघ्नम्।   अग्निर्गायत्र्यग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯यू꣢ऽ३क्ष्वा꣤꣯हि꣥ये꣤꣯तवा꣥ ॥ अ꣡श्वा꣯सो꣯दे꣯व꣢सा꣡꣯धाऽ२३वा꣢: ॥ अरं ꣡वाऽ२३हा꣢ ॥ तिया꣡꣯शाऽ२३वा꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ६। मा॰ ३)(१०)॥ टि ॥ ४४ ॥
२६-१ वैश्वमनसम्।   विश्वमना, गायत्र्यग्निः ॥
नि꣥त्वा꣯ । हो꣢ऽ३इ । न꣤ । क्षिया꣥ ॥ वा꣡इश्प꣢ता꣡इ । द्यु꣢म꣡न्त꣢म् । धा꣡इ । माहे꣢वा꣣ऽ२३४या꣥म् ॥
सुवो꣤हाइ ॥ रा꣢꣯म꣡ग्ना꣢꣯ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । हो꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ९)(११)॥ टो ॥ ४५ ॥
२७-१ अग्नेः आर्षेयम्।   अग्निर्गायत्र्यग्निः ॥
अ꣥ग्निर्मू꣯र्धा꣯दीऽ६वᳲ꣥ककूत् ॥ पा꣡तीऽ२:पा꣡र्थीऽ२ । विया꣡꣯अयाम् ॥ आपाऽ२ꣳरा꣡इताऽ२ ॥
सिजि꣡न्वाऽ२३ता꣢ऽ᳐३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ६)(१२)॥ टू ॥ ४६ ॥
२८-१ सोमसाम।   सोमो, गायत्र्यग्निः ॥
इ꣥ममू꣯षू ॥ त्व꣢मा꣡स्माऽ२३४का꣥म् । सा꣡नीऽ२ꣳहो꣡इ । गायाऽ२हो꣡ । त्र꣢न्न꣡व्याऽ२३ꣳसा꣢म् ॥
आ꣡ग्नेऽ२हो꣡इ । दाइवाऽ२हो꣡ ॥ षु꣢प्रा꣡वोऽ२३चा꣢ऽ᳐३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ १०। मा॰ ७)(१३)॥ ङे ॥ ४७ ॥
२९-१ गौपवनम्।   गोपवनो, गायत्र्यग्निः ॥
तं ꣥त्वा꣯गो꣯पा ॥ वा꣡नोऽ२᳐गा꣣ऽ२३४इरा꣥ । ज꣢ना꣡इष्ठ꣢दा꣡ । ग्न꣪याऽ२᳐ङ्गा꣣ऽ२३४इरा꣥: ॥
स꣢पौवा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । कौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ श्रु꣤धीऽ५हवाम् ॥ हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ८)(१४)॥ झै ॥ ४८ ॥
३०-१ सौर्यम्।   सूर्यवर्च्चावा, वसुरोचिर्वा, गायत्र्यग्निः ॥
प꣤र्यौ꣥꣯ । हो꣤इवाजा꣥ ॥ प꣢ता꣡इ:का꣢ऽ१वीऽ२: । आ꣡ग्निर्ह꣢व्या꣯ । ना꣡य꣪क्रमीऽ२त् ॥ द꣡धाऽ२३त् ॥
रा꣡ऽ२᳐त्ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ नि꣢दा꣯शु꣡षे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ६)(१५)॥ बू ॥ ४९ ॥
३१-१ सौर्यम्।   सूर्यो, गायत्री, सूर्यः ॥
उ꣤दु꣥त्य꣤म् । ओहाइ ॥ जा꣡ । त꣪वेऽ२᳐दा꣣ऽ२३४सा꣥म् । दे꣢꣯वं ꣡वहा । तीके꣢ता꣣ऽ२३४वा꣥: ॥ दा꣡ऽ२३४र्शे꣯हा꣥इ ॥
वा꣡इश्वा꣢꣯यसू꣡꣯ । र्याम् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ ८)(१६)॥ थै ॥ ५० ॥
३२-१ कावम्।   कविर्वसुरोचिर्गायत्र्यग्निः ॥
क꣥विमग्नीम् ॥ उ꣢पा꣡ऽ२३ । स्तू꣡ऽ२᳐हा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣢त्य꣡ध꣢र्मा꣯णमध्वरे꣡꣯ ॥ दे꣢꣯वाम् ॥
अमी꣯वचा꣡꣯ताऽ२३ना꣢ऽ᳐३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ५)(१७)॥ जु ॥ ५१ ॥
३३-१ काशीतम्।   कापीतं वा सुमन्दं वा। पारावतो (पारावतिर्वा) गायत्र्यग्निः ॥
श꣥न्नो꣯दे꣯वीः ॥ अ꣢भि꣡ष्टाऽ२३या꣢ऽ३४इ ॥ श꣥न्नो꣯भवा ॥ तु꣢पी꣡꣯ताऽ२३या꣢ऽ᳐३४इ ॥ शं ꣥यो꣯रभी ॥
स्र꣢व꣡ । तूऽ२᳐ । ना꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ३)(१८)॥ ञ्चि ॥ ५२ ॥

३३-२ काशीतोत्तरम्।   पारावतो गायत्र्यग्निः ॥
हु꣣वा꣢ऽ᳐३हो꣡ऽ२३४इ । शन्नो꣯दे꣥꣯वीः꣯ । अ꣤भिष्ट꣥याइ ॥ हु꣣वा꣢ऽ३हो꣡ऽ२३४इ । शन्नो꣯भ꣥व । तु꣤पी꣯त꣥याइ ॥
हु꣣वा꣢ऽ३᳐हो꣡ऽ२३४इ । शंयो꣯र꣥भि । स्र꣤वन्तु꣥नाः ॥ हु꣣वा꣢ऽ३हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ८)(१९)॥ ठ्व े ॥ ५३ ॥
३४-१ मनाज्ये द्वे।   द्वयोर्गोतमो (गोराङ्गिरसो वा) गायत्र्यग्निः ॥
क꣡स्यानू꣢ऽ१नाऽ२᳐म् । प꣣री꣢णा꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ धि꣡यो꣯जिन्वाऽ२᳐ । सि꣣स꣢त्पा꣣ऽ२३४ता꣥इ ।
गो꣡षा꣢꣯ता꣯या꣡ऽ२३ ॥ स्या꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣢प्᳐ । गी꣣ऽ२३४रा꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ५)(२०)॥ बु ॥ ५४ ॥

३४-२ गौराङ्गिरसस्य साम।   गौतमस्य मनाज्यं वा मनाज्योत्तरं वा ॥
ओ꣢꣯हो꣯इहुऽ३᳐वा꣡ऽ२३इ । हु꣢व꣣ए꣢ । कस्यनू꣯नांऽ३᳐पा꣤ऽ३री꣢꣯ण꣣सि꣥ ॥ ओ꣢꣯हो꣯इहुऽ३᳐वा꣡ऽ२३इ । हु꣢व꣣ए꣢ ।
धियो꣯जिन्वाऽ३᳐सी꣤ऽ३स꣢त्प꣣ता꣥इ ॥ ओ꣢꣯हो꣯इहुऽ३᳐वा꣡ऽ२३इ । हु꣢व꣣ए꣢ । गो꣯षा꣯ता꣯य ॥
स्य꣣ता꣢ऽ३इगा꣤ऽ५᳚इराऽ६५६ः ॥
(दी॰ १२। प॰ १०। मा॰ १३)(२१)॥ ञि ॥ ५५ ॥
॥ एकविंशतिः । तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥

॥ अथ तुरीय खण्डः ॥ (ऋ-७, सा-१५)

३५-१ उपहवौ द्वौ।   द्वयोर्भरद्वाजो बृहत्यग्निः ॥
य꣥ज्ञा꣯यज्ञा ॥ वो꣢꣯अग्नयाऽ३᳐इ । गि꣡राऽ२᳐गि꣣रा꣢ऽ३᳐४ । हा꣣꣯हो꣢ऽ३᳐इ । चा꣡द꣢क्षा꣣ऽ२३४सा꣥इ ।
प्र꣡प्रा꣰꣯ऽ२वय꣡ममृतंजा꣢꣯ । ता꣡वे꣢ऽ१दासाऽ२म् ॥ प्रिय꣡म्मित्राम् । न꣢श꣡ꣳसिषाम् ॥ ए꣣꣯हिया꣢ ।
औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ८)(२२)॥ ठै ॥ ५६ ॥

३५-२
य꣤ज्ञा꣣꣯य꣤ज्ञा꣥꣯ । हो꣢इ । वोऽ३᳐ग्न꣢य꣣ए꣢ऽ३४ । हि꣥या ॥ गि꣣रा꣯गि꣢रा꣡ । चाऽ२᳐द꣣क्ष꣢सा꣡इ । प्र꣢प्रा꣣꣯व꣢या꣡म् ।
अ꣢मृ꣡तंजा꣢ऽ३᳐ । त꣡वेऽ२᳐दा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ प्रि꣢य꣡म्मित्राम् । न꣢श꣡ꣳसिषाम् ॥ ए꣣꣯हिया꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ८)(२३)॥ घै ॥ ५७ ॥

३५-३ श्नौष्टीगवम्।   श्नुष्टीगुर्बृहत्यग्निः ॥
या꣡ज्ञा꣯याज्ञाऽ२ । वो꣡अग्नायाऽ२इ ॥ गा꣡इरा꣯गाइराऽ२ । चा꣡द꣪क्षासाऽ२इ । प्र꣡प्रावायाऽ२म् ।
अमृ꣡तंजा꣢ऽ३᳐ । त꣡वेऽ२᳐दा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ प्रा꣡यम्माइत्राऽ२म् ॥ ना꣡श꣪ꣳसाऽ२३इषा꣢ऽ᳐३४३म् ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ११। मा॰ १२)(२४)॥ चा ॥ ५८ ॥

३५-४ यज्ञायज्ञीयम्।   (भरद्वाजः) अग्निर्वैश्वानरो बृहत्यग्निः ॥
य꣤ज्ञा꣣ऽ५य । ज्ञा꣤ऽ३वो꣢ऽ३᳐ग्ना꣤या꣥इ ॥ गा꣡इरा꣯गिरा । चा꣢ऽ३᳐दा꣡क्षा꣢ऽ३᳐सा꣢इ । प्र꣡प्रा꣰꣯ऽ२᳐वय꣡ममृतम् ।
जा꣯ताऽ२३वा꣢ । हि꣡म्माइ ॥ दा꣢ऽ३सा꣢म् ॥ प्रा꣡यम्मित्रन्नशाऽ᳐२ꣳसि꣣षा꣢उ ॥ वाऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ७)(२५)॥ णे ॥ ५९ ॥
३६-१ कार्त्तयशम्।   कृतयशाः बृहत्यग्निः ॥
पा꣥꣯हिनो꣢ऽ᳐३अ꣤ग्न꣥ए꣤꣯कया꣥ ॥ पा꣡हियु꣢त । द्विता꣡या꣢ऽ१याऽ२ । पा꣡हिगी꣢꣯र्भिस्तिसृभिः ।
ऊ꣯र्जा꣡म्पा꣢ऽ१ताऽ२इ ॥ पा꣡हिच꣢तौ꣭ऽ३ । हो꣢ऽ᳐३वा꣢ ॥ सृभि꣡र्वाऽ२३सा꣢ऽ३४३उ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ६)(२६)॥ नू ॥ ६० ॥

३६-२ नार्मेधम्।   नृमेधा (भरद्वाजः) बृहत्यग्निः ॥
पा꣥꣯हिनो꣯अग्नए꣯कयाऽ६ए꣥ ॥ पा꣢꣯ । हो꣡इ । उ꣢ । ता꣡ । द्वि꣢ता꣡या꣢ऽ३᳐या꣢ । पा꣡꣯होऽ२᳐इगा꣣ऽ२३४इर्भी꣥: ।
ता꣡इसृभि꣢: ॥ ऊ꣯र्जा꣡म्पाता꣢ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ । पा꣡ऽ२३४हिहा꣥इ ॥ च꣢ता꣡सृभा꣢ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ ॥
वा꣡ऽ२३४साउ । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १७। मा॰ १२)(२७)॥ खा ॥ ६१ ॥

३६-३ कार्त्तवेशम्।   कृतवेशो (भरद्वाजः) बृहत्यग्निः ॥
पा꣤꣯हि꣣नो꣤꣯अ꣥ग्नए꣯ । क꣣या꣢ऽ३ । पा꣡ऽ२३४ । हियु꣥तद्विती꣯ । या꣤या꣥ ॥ पा꣤꣯हि꣣गी꣤꣯र्भि꣣स्ति꣤सृ꣣भि꣤रू꣥꣯र्जा꣯म् ।
पा꣢ऽ३ता꣢इ ॥ पा꣡꣯होइचा꣢ऽ᳐३ता꣢ऽ३᳐४ । हा꣥꣯ओ꣤वा꣥ ॥ सृ꣡भि꣢र्वसो꣯ ॥ उ꣡पा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ ११। मा॰ ६)(२८)॥ कू ॥ ६२ ॥
३७-१ पृश्नि।   भरद्वाजो बृहत्यग्निः ॥
बृ꣢हा꣡द्भीऽ२३र꣤ग्ने꣯अर्चिभिर्हा꣥उ ॥ शु꣢क्रा꣡इणदे꣢꣯वशो꣯चि꣡षा꣢꣯ । भ꣡राद्वा꣢ऽ१जेऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ।
स꣡मिधा꣢꣯नः । या꣡वि꣪ष्ठियाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ॥ रे꣯वा꣡त्पा꣢ऽ१वाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ॥ का꣡दी꣯दि꣢हि ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ८)(२९)॥ जै ॥ ६३ ॥

३७-२ पृश्नि।   भरद्वाजो बृहत्यग्निः ॥
बृ꣥हद्भिरग्ने꣯अर्चिभीऽ६रे꣥ ॥ शु꣢क्रा꣡इणदे꣢꣯वशो꣯चि꣡षा꣢꣯ । भ꣡राद्वा꣢ऽ१जेऽ२३ । ओ꣭ऽ३वा꣢ । स꣡मिधा꣢꣯नः ।
या꣡वि꣪ष्ठियाऽ२३ । ओ꣭ऽ३वा꣢ ॥ रे꣯वा꣡त्पा꣢ऽ१वाऽ२३ । ओ꣭ऽ३वा꣢ ॥ का꣡दी꣯दि꣢हि । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ४)(३०)॥ जी ॥ ६४ ॥
३८-१ उरोराङ्गिरसस्य साम।   उरुर्बृहत्यग्निः ॥
त्वे꣡꣯आऽ२३ग्ने꣤꣯स्वा꣯हुतहा꣥उ ॥ प्रि꣢या꣡꣯सस्स꣢न्तुसू꣯र꣡य꣢: । य꣡न्तारो꣢ऽ१याऽ२३४इ । मघ꣣वा꣤꣯ नो꣥꣯ज꣤ना꣥꣯ ।
ना꣢ऽ३᳐म् ॥ ऊ꣡र्व꣪न्दयाऽ२३हा꣢ ॥ तगो꣡꣯ ना꣰꣯ऽ२म् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ ७)(३१)॥ मे ॥ ६५ ॥
३९-१ पौरुमद्गे द्वे।   द्वयोः गोतमो बृहत्यग्निः॥ (द्वे) ॥
अ꣤ग्ने꣥꣯ज꣤रि꣥तर्विश्प꣤ति꣥: । औ꣯हो꣤वा । एहि꣥या꣯ । हाउ ॥ त꣢पा꣯नो꣡꣯ दे꣰꣯ऽ२वरक्ष꣡स꣢: । अ꣡प्रोषा꣢ऽ१इवाऽ२न् ।
गा꣡र्हपता꣢ऽ३इ । मा꣡हा꣢ऽꣳआ꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ दि꣡वाः । पायौ꣢वाओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ।
दु꣤रोऽ५णयूः । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ १२)(३२)॥ घा ॥ ६६ ॥

३९-२
अ꣣ग्ने꣤꣯ज꣣रि꣤त꣥र्वि । श्प꣣ती꣢ऽ३ः । ता꣡ऽ२३४ । पा꣯नो꣯दे꣥꣯वर । क्ष꣤सा꣥: ॥ ता꣡पा꣯नो꣯दे꣯वरक्षसो । अप्रोषी꣢ऽ३᳐वा꣢न् ।
गृ꣡ह꣢पता꣡इ । माहा꣢ऽꣳआ꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ ओ꣣ऽ४हा꣥ । ह꣣हा꣢इ᳐ । दि꣣वस्पा꣢꣯यू꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ ओ꣣ऽ४हा꣥ ।
ह꣣हा꣢इ᳐ । दु꣣रो꣯ण꣢यू꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ ओ꣣ऽ४हा꣥ । ह꣣हा꣢ऽ३᳐४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १९। मा॰ ११)(३३)॥ ध ॥ ६७ ॥
४०-१ माण्डवे द्वे।   जमदग्निः द्वयोर्मण्डुर्बृहत्यग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯विवा꣯हाउ ॥ स्वा꣢ऽ३दू꣡षा꣢ऽ३सा꣢: । चा꣡इत्रा꣢ऽ३᳐ꣳहा꣢इ । रा꣡धो꣢ऽ३हा꣢ऽ३᳐इ । अ꣡माऽ२᳐र्ता꣣ऽ२३४या꣥ ।
आ꣡दा꣢ऽ१शुषेऽ२ । जा꣡तवे꣢꣯दः । वहा꣡तू꣢ऽ१वाऽ२म् ॥ अद्या꣡꣯होइ । दाऽ२३इवा꣢ꣳ ॥ उषः꣡ ।
बूऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ हु꣢वे꣯व꣡सू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ११)(३४)॥ ज ॥ ६८ ॥

४०-२ विदावसुनिधनम्।   माण्डवम् ॥
अ꣥ग्ने꣯विवस्वदुषा꣤सा꣥: ॥ चि꣢त्र꣡ꣳरा꣯धो꣢꣯अ꣡मा꣰꣯ऽ२र्तिय । आ꣡दा꣢ऽ१शुषेऽ२ । जा꣡तवे꣢꣯दः । वहा꣡तू꣢ऽ१वाऽ२म् ॥
अद्या꣡꣯दाऽ२३इवा꣢ꣳ ॥ उषः꣡ । बूऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वि꣢दा꣯व꣡सू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ७)(३५)॥ धे ॥ ६९ ॥
४१-१ गाथम्।   भरद्वाजो बृहत्यग्निः ॥
त्व꣡न्नाऽ२३श्चि꣤त्रऊ꣥꣯त्या ॥ व꣢सो꣡राधा꣢ । सिचो꣡दा꣢ऽ१याऽ२३ । आ꣡स्या꣢रा꣣ऽ२३४या꣥: । त्व꣡मग्ने꣢꣯ ।
रथा꣡इरासा꣢ऽ३इ ॥ वी꣡दा꣢गा꣣ऽ२३४धा꣥म् । तु꣢चा꣡ऽ२३हा꣢इ ॥ तुना꣡ । औ꣢ऽ३᳐हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ २। प॰ १२। मा॰ ७)(३६)॥ छे ॥ ७० ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने प्रथमः प्रपाठकः ॥ १ ॥

१. आग्नेयं पर्व — द्वितीयप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ तुरीय खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-३, सा-७)

४२-१ उभयत स्तोभम् गौतमम्।   गोतमो बृहत्यग्निः ॥
हा꣥꣯उत्वमित्सप्रथा꣯असिहाउ ॥ आ꣡ग्ने꣯त्रा꣢꣯तः । ऋताᳲ꣡क꣪वाऽ२३४इः । हा꣣꣯हो꣢इ । त्वां ꣡꣯विप्रा꣢꣯सस्स꣡मिधा꣢꣯ ।
ना꣡दी꣯दिवा꣢ऽ३४ः । हा꣣꣯हो꣢इ ॥ आ꣡विवासा꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢ऽ३ ॥ ति꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ । धा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ११। प॰ ११। मा॰ १०)(१)॥ कौ ॥ ७१ ॥

४२-२ गौतमम्।   गोतमो बृहत्यग्निः ॥
त्वं ꣥त्वाऽ६मे꣥ ॥ इ꣢त्सप्रऽ३था꣡यासा꣢इ᳐ । आ꣣ऽ२३४सी꣥ । आ꣡ग्ने꣯त्रा꣢꣯तः । ऋताᳲ꣡क꣪वाऽ२᳐इः ।
का꣣ऽ२३४वी꣥: । त्वा꣡꣯म्विप्रा꣢꣯सस्स꣡मिधा꣢꣯ । ना꣡दी꣯दिवो꣢ । दा꣣ऽ२३४इवा꣥: ॥ आ꣡विवा꣢꣯सा꣡ऽ२३हा꣢ ॥
तिवे꣡꣯धाऽ२३सा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १३। मा॰ ९)(२)॥ डो ॥ ७२ ॥
४३-१ आयुस्साम।   अग्निर्बृहत्यग्निः ॥
आ꣣꣯ नो꣤꣯अ꣥ग्ने꣯वयो꣯वृ꣤ध꣥म् । ए꣢ऽ᳐३४ । र꣣या꣢ऽ३꣡४꣡५꣡इम् ॥ पा꣢꣯वऽ᳐३का꣡श꣪ꣳसाऽ२३या꣢म् ।
रा꣡꣯ स्वा꣢꣯चनउ꣡पमा꣢꣯ते꣯ । पू꣡रु꣪स्पृहाऽ२म् ॥ सु꣡नाइताइसू꣢ऽ३हा꣢इ ॥ य꣣शस्त꣢रा꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १। मा॰ १२)(३)॥ ता ॥ ७३ ॥
४४-१ हरसी द्वे।   द्वयोरग्निर्बृहत्यग्निः ॥
यो꣥꣯विश्वा꣢ऽ३दा꣤य꣥ते꣤꣯वसू꣥ ॥ हो꣡ताऽ२मा꣡न्द्रोऽ२ । ज꣡ना꣯ना꣯म् । माधोऽ२र्ना꣡पाऽ२ । त्रा꣡꣯प्रथमा꣯न्यस्मै꣯ ॥
प्रास्तोऽ२मा꣡याऽ२३ । तु꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ । ग्ना꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ २)(४)॥ जा ॥ ७४ ॥

४४-२
यो꣥꣯विश्वा꣯दयते꣯वसुहाउ ॥ हो꣡तामा꣡न्द्रोऽ२ । ज꣡ना꣯ना꣯म् । ओवा꣢ । ओ꣡वा꣢ । मा꣡धोऽ२र्ना꣡पाऽ२ ।
त्रा꣡꣯प्रथमा꣯न्यस्मै꣯ । ओवा꣢ । ओ꣡वा꣢ ॥ प्रा꣡स्तोऽ२मा꣡याऽ२३ । तु꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ । ग्ना꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ३)(५)॥ ठि ॥ ७५ ॥

४४-३ दैर्घश्रवसे द्वे।   द्वयोदीर्घश्रवा बृहत्यग्निः ॥
यो꣥꣯विश्वा꣯दयते꣯वस्वो꣯हा꣯ओ꣯हाऽ६ए꣥ ॥ हो꣡꣯ ता꣰꣯ऽ२मन्द्रो꣡꣯जना꣰꣯ऽ२ना꣯म् । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३᳐ए꣢ऽ३४ ॥
म꣣धो꣢ऽ३᳐४र्न꣣पा꣢ ॥ त्रा꣡प्रथ꣢ । मा꣯ना꣡यस्मा꣢इ । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३᳐ए꣢ऽ३४ ॥ प्र꣣स्तो꣢ऽ३४मा꣣꣯या꣢ऽ३ ॥
तु꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ । ग्ना꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १३। प॰ १२। मा॰ ७)(६)॥ ठे ॥ ७६ ॥

४४-४
यो꣥꣯विश्वा꣯दयते꣯वसूऽ६ए꣥ ॥ हो꣡꣯ता꣯मन्द्रो꣯जना꣯ना꣯म् ॥ माधो꣢ऽ१र्नापौ꣢ । वाऽ᳐३२ ॥ त्रा꣡꣯प्रथमा꣯न्यस्मै꣯ ।
प्रास्तो꣢ऽ१मायौ꣢ । वाऽ᳐३२ ॥ त्वग्न꣡ये꣢꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १२। प॰ ११। मा॰ ३)(७)॥ चि ॥ ७७ ॥
॥ द्वाविंश्तिः चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ दशति ॥

॥ अथ पञ्चम खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-१६)

४५-१ आग्नेये द्वे।   द्वयोरग्निर्बृहत्यग्निः ॥
ए꣥꣯ना꣯वो꣯अग्निन्ना꣤मसा꣥ ॥ ऊ꣡र्जो꣯न꣢पा꣯ । ता꣡मा꣢ऽ१हुवेऽ२ । प्रा꣡यञ्चे꣢꣯तिष्ठमरतिम् । सुवा꣡ध्वा꣢ऽ१राऽ२म् ॥
विश्वा꣡स्या꣢ऽ१दूऽ२ ॥ ता꣡ममृ꣢तम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ५)(८)॥ ङु ॥ ७८ ॥

४५-२
ए꣥꣯ना꣯वो꣯अग्निन्नमसा꣯हाउ ॥ ऊ꣡र्जो꣯न꣢पा꣯ । ता꣡मा꣢ऽ१हुवेऽ२३ । हा꣢उ । प्रा꣡यञ्चे꣢꣯तिष्ठमरतिम् ।
सुवा꣡ध्वा꣢ऽ१राऽ२३म् । हा꣢उ ॥ विश्वा꣡स्या꣢ऽ१दूऽ२३ । हा꣢उ ॥ ता꣡ममृ꣢तम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ९)(९)॥ जो ॥ ७९ ॥

४५-३ मनाज्ये द्वे।   द्वयोर्गोतमो बृहत्यग्निः ॥
ए꣥꣯ ना꣤꣯ वो꣥꣯अग्नि꣤मेऽ५न꣤म꣥सा꣤ ॥ ऊ꣢꣯ र्जो꣡꣯नपा꣢꣯तमा꣡꣯हु꣢वे꣯ । प्रा꣡ऽ२३या꣢म् । चा꣡इतिष्ठ꣢म् । आ꣡रति꣢म् ।
सुवा꣡ध्वा꣢ऽ१राऽ२म् ॥ विश्वा꣡स्या꣢ऽ१दूऽ२ ॥ ता꣡ममृ꣢तम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ८)(१०)॥ टै ॥ ८० ॥

४५-४
ए꣥꣯ ना꣤꣯ वो꣥꣯अग्नि꣤न्नम꣥सो꣯ । जो꣯नपो꣤वा꣥ ॥ ता꣡मा꣯हु꣢वे꣯ । प्रा꣡ऽ२३या꣢म् । चा꣡इतिष्ठ꣢म । रा꣡ऽ२३ती꣢म् ।
स्वध्वर꣡म् ॥ विश्वस्याऽ२३दू꣢ ॥ ता꣡ममृ꣢तम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ ७)(११)॥ छे ॥ ८१ ॥
४६-१ दैवराजम्।   देवराड् (गौतमः) बृहत्यग्निः ॥
शे꣤꣯षे꣯वनाऽ५इषुमा꣯तृ꣤षू ॥ सां ꣡त्वा꣢꣯म꣡र्ता꣢꣯सः । इ꣡न्धाऽ२३ता꣢इ । आ꣡तन्द्रो꣢꣯हव्यं ꣡वह꣢ । सा꣡इ ।
ह꣪वीऽ२᳐ष्का꣣ऽ२३४र्त्ता꣥: ॥ आ꣡दिद्दे꣢꣯वा꣡इ ॥ षु꣢रा꣡꣯जाऽ२३सा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ ८)(१२)॥ णै ॥ ८२ ॥
४७-१ गाथिनम्।   कौशिको गाथिर्बृहत्यग्निः ॥
अ꣥दर्शिगा꣯तुवित्तमाऽ६ए꣥ ॥ या꣡स्मिन्(स्थि)व्र꣢ता꣡꣯निया꣢꣯दधु꣡: । ऊपो꣯षुजा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ।
तमा꣡꣯रिय꣢स्यव꣡र्द्ध꣢नम् ॥ अ꣡ग्नाइन्नक्षा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३᳐हा꣢ ॥ तुनो꣯गि꣡र꣢: ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ८)(१३)॥ कै ॥ ८३ ॥
४८-१ बार्हदुक्थे द्वे।   द्वयोर्बृहदुक्थो बृहत्यग्निः ॥
अ꣥ग्निरुक्थाइ ॥ पु꣣रो꣢ऽ३हा꣤इता꣥: । ग्रा꣢꣯ वा꣡꣯ णो꣢꣯ब꣡ । हि꣣रा꣢ऽ३ध्वा꣤रा꣥इ ।
ऋ꣢चा꣡꣯या꣯मिमरुतो꣯ब्रह्माण꣪स्पाताऽ२इ ॥ दा꣡इवाऽ२आ꣡वाऽ२३ः ॥ व꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ । णा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ९)(१४)॥ गो ॥ ८४ ॥

४८-२
अ꣥ग्निरुक्था꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ ॥ पु꣣रौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हि꣤ताः । ग्रा꣢꣯ वा꣡꣯ णो꣢꣯ब꣡ । हि꣣रौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
ध्व꣤राइ । ऋ꣢चौ꣭ऽ३हो꣢ । या꣡꣯मिमरुतो꣯ब्रह्माण꣪स्पाताऽ२इ ॥ दा꣡इवाऽ२आ꣡वाऽ२३ः ॥ व꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
णा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ११)(१५)॥ च ॥ ८५ ॥
४९-१ पौरुमीढम्।   पुरुमीढो बृहत्यग्निः ॥
अ꣥ग्नि꣤मी꣥꣯ । डि꣣ष्वा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ आ꣡वसे꣢꣯ । गा꣡꣯ था꣢꣯भिश्शी꣯ । रशो꣡꣯चाऽ२३इषा꣢म् । अग्नि꣡ꣳरा꣯याइ ।
पुरुमाऽ२३इढा꣢ । श्रुत꣡न्नरो ॥ अग्निस्सूऽ२३दी꣢ । तया꣡इच्छाऽ२३४५र्दीऽ६५६ः ॥
द꣡क्षा꣢ऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ ७)(१६)॥ ते ॥ ८६ ॥
५०-१ कार्णश्रवसम् प्रास्कण्वं वा।   कर्णश्रवा बृहत्यग्निः ॥
श्रु꣣धी꣢ऽ३ । श्रू꣡ऽ२३४ । धिश्रुत्क꣥र्णव꣤ । ह्निभा꣥इः ॥ दे꣢꣯ वै꣡꣯रग्ने꣯स꣢या꣡꣯वाऽ२३भी꣢: ।
आ꣡꣯सी꣯दतुबर्हिषिमित्रो꣯अर्याऽ२३मा꣢ ॥ प्रा꣯त꣡र्याऽ२३वा꣢ऽ३ ॥ भा꣡ऽ२᳐इरा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ए꣢ऽ᳐३ । ध्व꣢र꣣आ꣢ ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ ७)(१७)॥ मे ॥ ८७ ॥
५१-१ दैवोदासम्।   दिवोदासो बृहत्यग्निः ॥
प्र꣥दै꣯वो꣯दा꣯सो꣤ग्ह्नी꣥: ॥ दे꣢꣯व꣡इन्द्रोन꣢म꣡ज्मना । अनुमाऽ२३ता꣢ । रं ꣡पृथिवींवि꣢वा꣡꣯वृताइ ॥ तस्थौ꣯नाऽ२३का꣢ ॥
स्या꣡शर्म꣢णि । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ४)(१८)॥ घी ॥ ८८ ॥
५२-१ सौक्रतवम्।   सुक्रतुर्बृहत्यग्निः ॥
अ꣥धज्मा꣯ओ꣤वा꣥ ॥ ध꣡वादा꣢ऽ१इवाऽ२: । बृहतो꣡꣯रो꣯चाना꣢ऽ१दाधीऽ२ । आ꣡ । यौ꣯ । हौ꣢꣯होऽ᳐३वा꣢ ।
वा꣡र्धस्व꣢तन्वा꣯ । गा꣡इरा꣢ऽ१ममाऽ२ । आ꣡जातासौ꣢꣯ । हौ꣯होऽ३वा꣢ऽ३४ ॥ हा꣥ । हा꣢उवाऽ३ ॥
क्र꣢तो꣯पृणा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ १३। मा॰ ५)(१९)॥ दु ॥ ८९ ॥
५३-१ काण्वे द्वे।   द्वयोः कण्वो बृहत्यग्निः ॥
का꣤꣯यमा꣯नोऽ५वना꣯तु꣤वाम् ॥ य꣢न्मा꣡꣯ तॄ꣢꣯रा꣡ । जाग꣢न्ना꣣ऽ२३४पा꣥: । न꣢तत्ते꣯अग्नेऽ३᳐ । प्र꣡मृषे꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ ।
नि꣡वाऽ२᳐र्ता꣣ऽ२३४ना꣥म् ॥ य꣢द्दू꣡꣯राऽ२३इसा꣢न् ॥ इ꣣हा꣯भु꣢वा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ८)(२०)॥ टै ॥ ९० ॥

५३-२
ए꣤काया꣥ ॥ मा꣡꣯नो । व꣣ना꣢तू꣣ऽ२३४वा꣥म् । ओ꣢इ᳐ । तू꣣ऽ२३४वा꣥म् । उ꣤हुवाहा꣥इ । औ꣭ऽ३᳐हो꣢ऽ३१इ ।
य꣢न्मा꣡꣯ तॄ꣢꣯रा꣡ । जाग꣢न्ना꣣ऽ२३४पा꣥: । आ꣣ऽ२३४पा꣥: । उ꣤हुवाहा꣥इ । औ꣭ऽ३᳐हो꣢ऽ३१इ ॥ न꣢त꣡त्त꣢आ꣡ ।
ग्ना꣢ऽ३इप्र꣡मृषा꣢ऽ३इ । नि꣡वाऽ२᳐र्ता꣣ऽ२३४ना꣥म् । ता꣣ऽ२३४ना꣥म् । उ꣤हुवाहा꣥इ । औ꣭ऽ३᳐हो꣢ऽ३१इ ॥
य꣢द्दू꣡꣯ रे꣢꣯सा꣡न् । इहा꣢भू꣣ऽ२३४वा꣥: । भू꣣ऽ२३४वा꣥: ॥ उ꣤हुवाहा꣥इ । औ꣭ऽ३᳐हो꣢ऽ३१२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ २५। मा॰ २१)(२१)॥ ञ्वा ॥ ९१ ॥
५४-१ मानवाद्ये द्वे।   द्वयोर्मनुर्बृहत्यग्निः ॥
नि꣥त्वा꣯मग्नाइ ॥ म꣢नुर्द्दा꣣ऽ२३४धा꣥इ । ज्यो꣡तिर्ज꣢ना꣯ । या꣡श꣪श्वाताऽ२इ । दी꣯ । दा꣡इ । थक꣢ ।
ण्वा꣡ऋ꣪तजा꣢ऽ३ । त꣡ऊऽ२᳐क्षा꣣ऽ२३४इता꣥: । य꣡न्न꣢मस्या꣡ऽ२३ ॥ ता꣡ऽ२᳐इकृ꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ष्टा꣣ऽ२३४या꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ११)(२२)॥ फ ॥ ९२ ॥

५४-२ मानवोत्तरम्।
हो꣤वाइ । नित्वा꣯म꣥ग्ने꣯म꣤नु꣥र्दधे꣯ । हो꣤वाइ ॥ ज्यो꣡꣯तिर्जना꣯यशश्वते꣯ । दाइदे꣢ऽ१थक꣢ । ण्वा꣡ऋ꣪तजा꣢ऽ३१ ।
त꣪ऊऽ२᳐क्षा꣣ऽ२३४इता꣥: ॥ य꣢न्ना꣡माऽ२३स्या꣢ऽ३ ॥ ता꣡ऽ२᳐इकृ꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ष्टा꣣ऽ२३४या꣥: ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ १०)(२३)॥ णौ ॥ ९३ ॥
॥ पञ्चमी दशतिः ॥ ५ ॥

॥ अथ षष्ठ खण्डः ॥ (ऋ-८, सा-१०)

५५-१ द्रविणम्।   अग्निर्बृहत्यग्निः ॥
दे꣥꣯वो꣤ऽ३वो꣢ऽ३द्र꣤विणो꣥꣯दाः ॥ पू꣢꣯ र्णां ꣡꣯विव꣢ष्ट्वा꣯सि꣡च꣢म् । ऊ꣡द्वा꣢ऽ१सिञ्चाऽ२ । ध्वमु꣡पवा꣢꣯पृणध्वम् ॥
आ꣡दि꣪द्वोदेऽ२ ॥ व꣡ओ꣯ह꣢ते꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ५)(२४)॥ ढु ॥ ९४ ॥
५६-१ बार्हस्पत्यम्।   बृहस्पतिर्बृहत्यग्निः॥ (ब्रह्मणस्पतिर्वा) ॥
प्रै꣥꣯तू꣢ऽ३ब्र꣤ह्म꣥ण꣤स्पती꣥: ॥ प्र꣢दा꣡इविये꣢ । तुसू꣡नृता꣢ऽ३ । अ꣡च्छाऽ२᳐वा꣣ऽ२३४इरा꣥म् । न꣡र्यम्प꣢ ।
ङ्किरा꣡धा꣢ऽ१साऽ२३म् ॥ दे꣡꣯वाऽ२᳐या꣣ऽ२३४ज्ञा꣥म् ॥ ना꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ तू꣣ऽ२३४ना꣥: ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ८)(२५)॥ घै ॥ ९५ ॥
५७-१ वीङ्कम्।   वसिष्ठो बृहत्यग्निः॥ (यूपो वा) ॥
ऊ꣢꣯र्ध्वऊ꣯षुणऽ३᳐ऊ꣡ताऽ२३४या꣥इ ॥ ति꣡ष्ठा꣯दे꣯वो꣯नसविता । ऊ꣯र्ध्वो꣯वाऽ२३जा꣢ । स्या꣡सनि꣢ता꣯ ।
या꣡दं ꣪जिभीऽ२: ॥ वा꣯घा꣡द्भीऽ२: ॥ वी꣡वीऽ२ ॥ ह्वया꣡꣯माऽ२३हा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ ७)(२६)॥ मे ॥ ९६ ॥
५८-१ विष्पर्धसस्साम।   विष्पर्धाबृहत्यग्निः ॥
प्र꣤यो꣯रा꣯याऽ५इनिनी꣯ष꣤ताइ ॥ म꣡र्तो꣯यस्तेव꣢सो꣡꣯दा꣯शत् । सवी꣯राऽ२३न्धा꣢ । ता꣡अग्न꣢उ । क्थशꣳसि꣡नम् ॥
त्मना꣯साऽ२३हा꣢ ॥ स्रपो꣡꣯षाऽ२३इणा꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ९)(२७)॥ धो ॥ ९७ ॥
५९-१ ऐतवाध्य्रम्।   ऐतवद्ध्रिर्बृहत्यग्निः ॥
प्र꣥वा꣤: ॥ य꣢ह्वं ꣡पुरूऽ२३णा꣢म् । विशां ꣡꣯दे꣯व꣢य꣡ताऽ२३इना꣢म् । अग्नि꣡ꣳसू꣯क्ते꣯भिर्वचो꣯भिर्वृ꣢णी꣡꣯माऽ२३हा꣢इ ।
या꣡ꣳसाऽ२मा꣡इदाऽ२न् ॥ य꣡इंध꣢ते꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ९)(२८)॥ झो ॥ ९८ ॥
६०-१ दोहः साम।   दोहो बृहत्यग्निः ॥
अ꣥यमग्निस्सुवी꣯र्यस्यहाउ ॥ आ꣡इशे꣢꣯हि꣡सौ꣯भग꣢स्य । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢इ । रा꣯य꣡ई꣯शे꣢꣯स्व꣡पत्य꣢ ।
स्या꣡गो꣢ऽ१माताऽ२३ः । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢इ ॥ ई꣯शे꣡꣯हाऽ२३इवॄ꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢ ॥ त्रा꣡हथा꣢꣯ना꣯म् ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १२। मा॰ ९)(२९)॥ फो ॥ ९९ ॥
६१-१ समन्तम्।   अग्निर्वसिष्ठो वा बृहत्यग्निः ॥
त्व꣤म꣥ग्ने꣯गृह꣤प꣥ता꣤इः ॥ त्व꣡ꣳहो꣯तानो꣢꣯अ꣡ध्वराइ । त्वंपोऽ२३ता꣢ । वा꣡इश्ववा꣢꣯ । रप्र꣡चाइता꣢꣯: ।
औ꣣꣯हो꣢ऽ३४वा꣣꣯हा꣢इ ॥ य꣡ । क्षाइयाऽ२३सी꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ॥ चवा꣡꣯राऽ२३या꣢ऽ३४३म् ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ १२)(३०)॥ ठा ॥ १०० ॥

६१-२ समन्ते द्वे।   द्वयोर्वरुणो बृहत्यग्निः ॥
त्व꣤म꣥ग्ने꣯गृ । हा꣤ऽ५पतीः꣤ ॥ त्व꣢ꣳहो꣣ऽ२३४ता꣥ । नो꣢अध्वा꣣ऽ२३४रा꣥इ । त्वा꣡ऽ२᳐म्पो꣣ऽ२३४ता꣥ ।
वि꣢श्वा᳐वा꣣ऽ२३४रा꣥ । प्र꣢चे꣯ताऽ३ः ॥ य꣡क्षाये꣢ऽ३ ॥ या꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ च꣢वा꣡꣯रिया꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ६)(३१)॥ मू ॥ १०१ ॥

६१-३ समन्तम्।
त्व꣥मा꣢ऽ३ग्ने꣤꣯गृ꣥हा꣤पती꣥: ॥ त्व꣡ꣳहो꣯ता꣢꣯नो꣯अ꣡ध्व꣢रे꣯ । त्वा꣡ऽ२३म्पो꣯ता꣢ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣯हो꣥꣯ ।
वा꣣꣯हा꣢इ । वा꣡इश्ववा꣢꣯ । रप्र꣡चाइता꣢꣯: । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣯हो꣥꣯ । वा꣣꣯हा꣢इ ॥ य꣡क्षाइयासा꣢ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ ।
औ꣯हो꣥꣯ । वा꣣꣯हा꣢इ ॥ चवा꣡꣯राऽ२३या꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २१। प॰ १८। मा॰ १४)(३२)॥ गी ॥ १०२ ॥
६२-१ वाम्रम्।   वाम्रो वैखानस आञ्जिग दानवो वा बृहत्यग्निः ॥
स꣥खा꣯यस्त्वा꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ ॥ व꣢वृ᳐ । मा꣣ऽ२३४हा꣥इ । दे꣢꣯वं ꣡मर्ता꣢ऽ३हा꣢ऽ३ । स꣡ऊऽ२᳐ताऽ२३४या꣥इ ।
अपा꣡꣯न्नपा꣢ऽ३ । त꣤ꣳसु꣥ । भ꣣र्गौ꣢ । बाऽ३हा꣢ऽ३ह । सू꣡द꣢ꣳसा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ सु꣢प्र꣡त्ऽ२३ती꣢म् ॥
अ꣢ने꣡꣯हाऽ२३सा꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ १०)(३३)॥ घौ ॥ १०३ ॥
॥ षष्ठी दशतिः ॥ ६ ॥

॥ अथ सप्तम खण्डः ॥ (ऋ-५, सा-७)

६३-१ त्रिष्टुप् श्यावाश्वम्।   श्यावाश्वस्त्रिष्टुबग्निः ॥
आ꣤꣯जु꣥हो꣯ता꣤ ॥ ह꣢वि꣡षा꣯मर्जयाऽ२ध्वा꣡उवाऽ२ । नि꣡हो꣯ता꣯रंगृहपतिन्दधाऽ२इध्वा꣡उवाऽ२३४ ॥
इ꣣डा꣢ऽ३४स्प꣣दा꣢इ ॥ न꣡मसा꣯रा꣯त꣢हा꣡व्याऽ२म् । सा꣡पर्य꣢ता꣡ । याजतं ꣢पा꣡ऽ२३ । स्ति꣤योवा꣥ ।
आ꣤ऽ५नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ६)(३४)॥ झू ॥ १०४ ॥
६४-१ ऋतुषामणी द्वे।   द्वयोर्ऋतुर्जगत्यग्निः ॥
ओ꣡इ । चित्रइच्छाइशो꣢ऽ१स्तरुणाऽ२३ । स्या꣤ऽ३व꣢क्ष꣣थः꣥ ॥ ओ꣡इ । नयो꣯मा꣯तारा꣢ऽ१वनुवाऽ२३इ ।
ती꣤ऽ३धा꣢꣯त꣣वे꣥꣯ ॥ ओ꣡इ । अनू꣯धा꣯याद꣪जी꣯जनाऽ२३त् । आ꣤ऽ३धा꣢꣯चि꣣दा꣥꣯ ॥ ओ꣡इ ।
ववक्षत्साद्यो꣢ऽ१महिदूऽ२३ । तिया꣢ऽ३ञ्चा꣤ऽ५राऽ६५६न् ॥ दू꣢꣯त्य꣡न्चरन्महे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ १०)(३५)॥ बौ ॥ १०५ ॥

६४-२
चि꣥त्राऽ६ए꣥ ॥ ए꣢ऽ३᳐१२३४ । शिशो꣥꣯स्त꣤रु꣥णस्यवक्ष꣤थः꣥ । क्ष꣤थः꣥ । हिहिहियाऽ६हा꣥उ । ए꣢ऽ३᳐१२३४ ॥
नयो꣯मा꣥꣯त꣤रा꣥꣯वन्वे꣤꣯ति꣥धा꣤꣯त꣥वे꣯ । त꣤वे꣥꣯ । हिहिहियाऽ६हा꣥उ ॥ ए꣢ऽ३᳐१२३४ । अनू꣥꣯ धा꣤꣯यदजी꣥꣯जनद꣤धा꣥꣯चिदा꣤꣯ ।
चिदा꣥꣯ । हिहिहियाऽ६हा꣥उ । ए꣢ऽ३᳐१२३४ ॥ ववक्ष꣥त्सद्यो꣤꣯महि꣥दू꣯ति꣤यं ꣥च꣤र꣥न् । च꣤र꣥न् । हिहिहियाऽ६हा꣥उ ।
वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ऋ꣢तू꣡न् ॥
(दी॰ १६। प॰ २०। मा॰ १०)(३६)॥ ङौ ॥ १०६ ॥
६५-१ यामं कौत्सं वा।   यमस्त्रिष्टुबग्निः (विश्वेदेवाः वा) ॥
ओ꣣ऽ४हा꣥ । ह꣣हा꣢इ । इदं ꣡तए । का꣢ऽ᳐३म्प꣡रः । ऊ꣢त꣣ए꣤का꣥म् ॥ तृ꣢ती꣡꣯ये꣯ना । ज्यो꣯तिषा꣢ऽ᳐३ ।
सं ꣢वि꣣श꣤स्वा꣥ ॥ सं ꣢वे꣡꣯शनाः । त꣢नु꣡वे꣯ । चा꣢ ᳐रु꣣रे꣤धी꣥ ॥ ओ꣣ऽ४हा꣥ । ह꣣हा꣢इ । प्रियो꣡꣯दे꣯वा । ना꣢ऽ३म्प꣡र ।
मा꣢ऽ३४३इ । जा꣢ऽ३᳐ना꣤ऽ५इत्राऽ६᳚५६इ ॥
(दी॰ ७। प॰ १७। मा॰ १०)(३७)॥ छौ ॥ १०७ ॥
६६-१ कौत्सम्।   कुत्सो जगत्यग्निः । यज्ञसारथिः अग्निः ॥
इ꣣म꣢ꣳस्तो꣣ऽ२३४मा꣥म् । अ꣢र्हा᳐ते꣣ऽ२३४जा꣥ । ता꣡वे꣢꣯द꣡से꣢ऽ३ । हो꣡इ ॥ र꣣था꣢मी꣣ऽ२३४वा꣥ । सं ꣢मा᳐हे꣣ऽ२३४मा꣥ ।
मा꣡नी꣢꣯ष꣡या꣢ऽ३ । हो꣡इ ॥ भ꣣द्रा꣢ही꣣ऽ२३४ना꣥: । प्र꣢मा᳐ती꣣ऽ२३४रा꣥ । स्या꣡स꣢ꣳस꣡दे꣢ऽ३ । हो꣡इ ॥
अ꣣ग्ना꣢इ᳐सा꣣ऽ२३४ख्या꣥इ । मा꣢रा᳐इषा꣣ऽ२३४मा꣥ । वा꣡यं ꣢त꣡वा꣢ऽ३ । हो꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १७। मा॰ ९)(३८)॥ छो ॥ १०८ ॥
६७-१ अग्निर्वैश्वानरस्य सामनी द्वे।   द्वयोरग्निर्वैश्वानरस्त्रिष्टुबग्निर्वैश्वानरः ॥
मू꣥꣯र्धो꣤होहा꣥इ ॥ नं ꣢दा꣣ऽ२३४इवा꣥: । अ꣡रताइम् । पृथी꣢ऽ३व्या꣢: । वै꣯श्वा꣡꣯नराम् । ऋ꣢त꣡आ꣯ । जा꣢ ᳐त꣣म꣤ग्नी꣥म् ॥
क꣢वि꣡ꣳसम्रा꣯जमतिथाइम् । ज꣪नाऽ२३ना꣢म् ॥ आ꣯स꣡न्न:पा । त्रा꣢ऽ३ञ्ज꣡न । या꣢ऽ३४३ ।
ता꣢ऽ३दा꣤ऽ५इ᳚वाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ १४)(३९)॥ गी ॥ १०९ ॥

६७-२
हो꣤꣯ वा꣥꣯इ । मू꣯र्धो꣤हा꣥इ ॥ नं ꣢दा꣡इ । वा꣢ऽ३अ꣡र । तिं ꣢पृ꣣थि꣤व्या꣥: । इ꣢हो꣯इयाऽ३ । ई꣭ऽ३या꣢ । वै꣯श्वा꣡꣯नराम् ।
ऋ꣢त꣡आ꣯ । जा꣢त꣣म꣤ग्नी꣥म् । इ꣢हो꣯इयाऽ३ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥ कवि꣡ꣳसम्रा । जा꣢ऽ३म꣡ति । थिं ꣢ज꣣ना꣤ना꣥म् ।
इ꣢हो꣯इयाऽ३ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥ आ꣯स꣡न्न:पा । त्रा꣢ऽ३ञ्ज꣡न । यं ꣢त꣣दे꣤वा꣥: । इ꣢हो꣯इयाऽ३ । ई꣡ऽ२᳐ ।
या꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १३। प॰ २५। मा॰ १४)(४०)॥ र्णी ॥ ११० ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने द्वितीयस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥ २ ॥

१. आग्नेयं पर्व — द्वितीयप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ सप्तम खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-५, सा-९)

६८-१ आश्वे द्वे।   द्वयोरश्वस्त्रिष्टुबग्निः ॥
वि꣤त्वत् । ओहाइ ॥ आ꣡꣯पो꣯नपर्वतस्य꣢पा꣡ऽ२३र्ष्ठा꣢त् । उक्थे꣡꣯भिरग्ने꣯जनयन्त꣢दा꣡ऽ२३इवा꣢: ॥
तं ꣡त्वा꣯गिरस्सुष्टुतयो꣯वा꣯ज꣢या꣡ऽ२३न्ती꣢ ॥ आ꣯जि꣡न्नगाइर्व꣪वाऽ२३हा꣢ऽ३᳐: । जा꣡ये꣢ऽ᳐३ ।
ग्यू꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢श्वा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ९)(१)॥ भो ॥ १११ ॥

६८-२
हा꣥ । य꣣या꣢इदि꣣वो꣤हा꣥इ । वि꣤त्व꣥त् । आ꣡꣯पो । न꣢प꣡र्व । त꣢स्य꣣पृ꣤ष्ठा꣥त् ॥ हा । य꣣या꣢इदि꣣वो꣤हा꣥इ ।
उ꣤क्था꣥इ । भि꣡रा । ग्ने꣢ऽ᳐३ज꣡न । यं ꣢त꣣दे꣤वा꣥: ॥ हा । य꣣या꣢इदि꣣वो꣤हा꣥इ । तं ꣤त्वा꣥ । गि꣡राः । सु꣢ष्टुत꣡यः ।
वा꣢ज꣣यं ꣤ती꣥ ॥ हा । य꣣या꣢इदि꣣वो꣤हा꣥इ । आ꣤जी꣥म् । न꣡गाइर्व꣪वाऽ२३हा꣢ऽ᳐३ः । जा꣡ये꣢ऽ᳐३ ।
ग्यू꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢श्वा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ३। प॰ २५। मा॰ १९)(३२)॥ णो ॥ ११२ ॥
६९-१ वामदेव्यम्।   रौद्रं वा। रुद्रस्त्रिष्टुबग्निः रुद्रः ॥
आ꣤꣯ वो꣥꣯रा꣯जा꣤ ॥ न꣣म꣢ध्व꣣ । र꣢स्य꣣रु꣤द्रा꣥म् । हो꣡ । ता꣢꣯ । रा꣡म् । स꣢ । त्ययजाऽ᳐३म् । रो꣢द꣣सी꣤यो꣥: ॥
अ꣢ग्निं ꣡पु । रा । त꣢नयि꣣ । त्नो꣢र꣣चि꣤त्ता꣥त् ॥ हि꣡रण्य꣢ । रू꣡ ॥ पा꣢ऽ३म꣡व । सा꣢ऽ᳐३४३इ ।
का꣢ऽ३᳐र्णू꣤ऽ५ध्वाऽ६५᳚६म् ॥
(दी॰ ४। प॰ १८। मा॰ ७)(३)॥ दे ॥ ११३ ॥
७०-१ वैश्वज्योतिषे द्वे।   द्वयोर्विश्वज्योतिस्त्रिष्टुबग्निः उषा वा ॥
इ꣣न्धा꣢ऽ३१२३४इ । हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ । रा꣤꣯ जा꣥꣯स꣤म꣥र्यो꣤꣯न । मोभी꣥रो꣤भी꣥: । ओ꣤भी꣥: ॥ य꣣स्या꣢ऽ३१२३४ ।
हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ । प्र꣤ती꣥꣯कमा꣤꣯हु꣥तंघृ । ता꣤इना꣥आ꣤इना꣥ । आ꣤इना꣥ ॥ न꣣रा꣢ऽ३१२३४ः । हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ ।
हव्ये꣤꣯भि꣥री꣯डते꣯स । बा꣤धा꣥बा꣤धा꣥: । बा꣤धा꣥: ॥ आ꣣꣯ग्ना꣢ऽ᳐३१२३४इ । हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ । अ꣢ग्रमुष꣡साऽ२३मशा꣢उ ।
वाऽ᳐३ ॥ चीऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २१। प॰ २०। मा॰ २४)(४)॥ ङी ॥ ११४ ॥

७०-२
हौ꣡होऽ२ । हौ꣡होऽ२ । हौ꣡꣯होइ । इ꣢न्धे꣯रा꣯जा꣯समर्यो꣯नऽ᳐३मो꣡भीऽ२: । ओ꣡भीऽ२: । ओ꣡भीऽ२: ॥
यस्यप्रती꣯कमा꣯हुतंघृऽ३ता꣡इनाऽ२ । आ꣡इनाऽ२ । आ꣡इनाऽ२ ॥ नरो꣯हव्ये꣯भिरी꣯डते꣯सऽ३बा꣡धाऽ२: ।
बा꣡धाऽ२: । बा꣡धाऽ२: ॥ हौ꣡होऽ२ । हौ꣡होऽ२ । हौ꣡꣯होइ । आ꣢꣯ग्निरग्रमुष꣡साऽ२३मशा꣢उ ।
वाऽ᳐३ ॥ चीऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १३। प॰ १८। मा॰ १२)(५)॥ डा ॥ ११५ ॥
७१-१ यामे द्वे।   द्वयोर्यमस्त्रिष्टुबग्निः ॥
प्र꣢के꣯तु꣡ना । बृ꣢हता꣡꣯या । ति꣢य꣡ग्नाइः । होइहोवा꣢ऽ᳐३हो꣡इ ॥ आ꣢꣯रो꣯द꣡साइ । वृ꣢षभो꣡꣯रो । र꣢वी꣡꣯ताइ ।
होइहोवा꣢ऽ᳐३हो꣡इ ॥ दि꣢वश्चि꣡दा । ता꣢꣯दु꣡पमाम् । उ꣢दा꣡꣯नाट् । होइहोवा꣢ऽ᳐३हो꣡इ ॥ अ꣢पा꣯मु꣡पा ।
स्थे꣢꣯म꣡हिषो । व꣢व꣡र्द्धा । होइहोवा꣢꣯हाऽ३१उ । वाऽ२३ ॥ दे꣢ऽ᳐३ । दि꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ११। प॰ १९। मा॰ १५)(६)॥ घु ॥ ११६ ॥

७१-२
हा꣥ । हा꣢औ꣯हो᳐इ । प्रा꣣ऽ२३४के꣥ । तु꣡ना । बृ꣢ह꣣ता꣢ऽ३᳐ । या꣢ति꣣य꣤ग्ह्नी꣥: ॥ हा । हा꣢औ꣯हो᳐इ ।
आ꣣ऽ२३४रो꣥ । द꣡साइ । वृ꣢ष꣣भो꣢ऽ३ । रो꣢र꣣वी꣤ती꣥ ॥ हा । हा꣢औ꣯हो᳐इ । दी꣣ऽ२३४वा꣥: । चि꣡दा ।
ता꣢ऽ३᳐दु꣡प । मा꣢मु꣣दा꣤न꣥ट् ॥ हा । हा꣢औ꣯हो᳐इ । आ꣣ऽ२३४पा꣥म् । उ꣡पा । स्थे꣢ऽ᳐३म꣡हि । षो꣢व꣣व꣤र्द्धा꣥ ।
हा । हा꣢औ꣯हो᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । दि꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ७। प॰ २९। मा॰ १६)(७)॥ झू ॥ ११७ ॥
७२-१ मराये द्वे।   द्वयोराशिमरायो विराडग्निः ॥
हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ । आ꣤ग्नी꣥म् । न꣢रा꣡: । न꣢रा꣡: । न꣢रा꣡: । दी꣢ऽ᳐३धि꣡ति । भि꣢र꣣र꣤ण्योः꣥꣯ ॥ हा꣯उहा꣯उहा꣯उ ।
हा꣤स्ता꣥ । च्यु꣢ता꣡म् । च्यु꣢ता꣡म् । च्यु꣢ता꣡म् । ज꣢न꣡य । त꣢प्र꣣श꣤स्त꣥म् ॥ हा꣯उहा꣯उहा꣯उ । दू꣤रा꣥इ ।
दृ꣢शा꣡म् । दृ꣢शा꣡म् । दृ꣢शा꣡म् । गृ꣢ह꣡प । ति꣢म꣣थ꣤व्यु꣥म् । हाउहाउहाउ । वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ २४। मा॰ २६)(८)॥ भ्रू ॥ ११८ ॥

७२-२
हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ । आ꣤ग्नी꣥म् । न꣢रा꣡: । दी꣢ऽ᳐३धि꣡ति । भि꣢र꣣र꣤ण्यो꣥꣯ । ण्यो꣯ । ण्योः꣯ ॥ हा꣯उहा꣯उहा꣯उ ।
हा꣤स्ता꣥ । च्यु꣢ता꣡म् । ज꣢न꣡य । त꣢प्र꣣श꣤स्त꣥म् । स्तम् । स्तम् ॥ हा꣯उहा꣯उहा꣯उ । दू꣤रा꣥इ । दृ꣢शा꣡म् ।
गृ꣢ह꣡प । ति꣢म꣣थ꣤व्यु꣥म् । व्युम् । व्युम् । हाउहाउहाउ । वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १२। प॰ २४। मा॰ १४)(९)॥ झ्री ॥ ११९ ॥
॥ षोडश सप्तमः।॥ सप्तमः खण्डः ॥ ७ ॥ दशतिः ॥

॥ अथ सप्तम खण्डः॥ (ऋ-८, सा-९)

७३-१ श्येनः प्रजापतिर्वादीर्घायुष्यं वा।   प्रजापतिस्त्रिष्टुबग्निः॥ उषा वा ॥
अ꣤बो꣥꣯धिया꣤ ॥ ग्ना꣡इस्स꣢मि꣡धा꣢꣯ज꣡ना꣰꣯ऽ२ना꣯म् । प्र꣡ताइधे꣢ऽ३नू꣢म् ॥ इवा꣯यती꣡꣯मुषा꣯स꣢म् । य꣡ह्वाई꣢ऽ३वा꣢ ।
प्र꣡वा꣰꣯ऽ२या꣡꣯मु꣢ज्जि꣡हा꣢꣯नाः꣯ ॥ प्र꣡भा꣯नाऽ२३वा꣢: ॥ सस्रते꣯ना꣡꣯क꣢म꣡च्छ꣢ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ १४। प॰ ११। मा॰ ९)(१०)॥ तो ॥ १२० ॥
७४-१ वासुक्ं शुक्रं वा।   वसुक्रस्त्रिष्टुबग्निः ॥
प्र꣤भू꣥꣯र्ज꣤य꣥न्ता꣤म् ॥ म꣣हा꣢ऽ३४३म्वि꣢पो꣣꣯ धा꣥꣯म् । मू꣢꣯ रै꣡꣯रमू꣯रंपुरान्द꣪र्माऽ२३णा꣢म् ॥ न꣣या꣢ऽ३४३न्त꣢गी꣣꣯र्भि꣥: ।
व꣣ना꣢ऽ३४३धि꣢य꣣न्धा꣥꣯: ॥ ह꣤रि꣥श्मश्रुन्न꣤वर्म꣥णाऽ६ । हा꣥उवा ॥ ध꣢नाऽ३र्ची꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ७)(११)॥ डे ॥ १२१ ॥
७५-१ पौषम्।   पूषा त्रिष्टुप्पूषा ॥
शु꣥क्र꣤न्ते꣥꣯अन्य꣤द्य꣥जत꣤म् । त꣥आऽ६न्या꣥त् ॥ वि꣡षुरू꣯पे꣯अहनी꣯द्यौः । इ꣪वाऽ२३सी꣢ ॥
वा꣡इश्वा꣯हिमा꣯या꣯अवसाइ । स्वधा꣢ऽ३वा꣢न् ॥ भद्रा꣡꣯ ते꣢꣯ । पू꣡ । षा꣢ऽ३नि꣡ह । रा꣢ति꣣र꣤स्तू꣥ । ति꣤राऽ५स्तुहाउ᳚वा ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ ११)(१२)॥ त ॥ १२२ ॥
७६-१ कौत्सम्।   कुत्सस्त्रिष्टुबग्निः ॥
इ꣥डा꣯मग्नाइ ॥ पु꣢रुदाऽ᳐३ । स꣢ꣳस꣣निं ꣤गोः꣥ । श꣤श्वत्तम꣣ꣳहव꣤मा꣥꣯ना꣯ । य꣣साऽ२३४धा꣥ ।
स्या꣡꣯न्नस्सू꣯नुस्तनयः । विजा꣢ऽ३वा꣢ऽ३ ॥ आ꣤ग्ने꣥सा꣤ता꣥इ ॥ सु꣣मा꣢ऽ३४३ । ती꣢ऽ᳐३ः । भू꣤꣯तुहा꣥उवा ॥
स्मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ७)(१३)॥ खै ॥ १२३ ॥
७७-१ काश्यपे द्वे।   द्वयोः कश्यपस्त्रिष्टुबग्निः ॥
प्र꣤हो꣯ता꣥꣯जा꣯ता꣤: ॥ म꣢हा꣡꣯न्नभो꣯विन्नृषद्माऽ२३सी꣯दा꣢त् । अपां ꣡꣯विवर्ताइ ॥ दधद्योऽ२३धा꣢ । याइ ।
सुते꣯वया꣡꣯ꣳसिय꣣न्ता꣢उ । वा ॥ वा꣡सू꣯नि꣢विध । ता꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ त꣢नूऽ३पा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ ११। मा॰ ७)(१४)॥ चे ॥ १२४ ॥

७७-२
प्र꣤हो꣯ता꣥꣯जा꣯तः꣤ । उ꣥हु꣤वाहा꣥इ ॥ मा꣡हाऽ२न्ना꣡भोऽ२ । वा꣡इन्नृषद्मा꣯सी꣯ददपांवि꣪वाऽ२३र्ता꣢इ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ।
इ꣡हा꣢ । दा꣡धाऽ२द्यो꣡धाऽ२ । या꣡इसुते꣯वया꣯ꣳसियन्ता꣯वसूऽ२३नी꣢ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡हा꣢ ॥
विधता꣡ये꣢ऽ३ । त꣡नूऽ२᳐पा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ह꣢वि꣡ष्मते꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ ८)(१५)॥ बै ॥ १२५ ॥
७८-१ घृताचेराङ्गिरसस्य साम।   घृताचिस्त्रिष्टुबग्निः, इन्द्रो वा ॥
प्र꣥सम्रा꣯जाम् ॥ अ꣢सुराऽ᳐३ । स्या꣢ ᳐प्र꣣श꣤स्ता꣥म् । पुं ꣢सᳲ꣡कृष्टाइ । ना꣢ऽ३म꣡नु । मा꣢दि꣣य꣤स्या꣥ ।
इ꣢न्द्रस्ये꣯वाऽ३४३प्र꣢तव꣣ । स꣢स्कृ꣣ता꣤नी꣥ ॥ व꣢न्द꣡द्वा꣯रा꣢꣯व꣡न्दमा꣢꣯ना꣯ ॥ वि꣡वाऽ२᳐ष्टू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
वी꣣ऽ२३४शा꣥: ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ५)(१६)॥ टु ॥ १२६ ॥
७९-१ प्रासाहम्।   भरद्वाजस्त्रिष्टुबग्निः ॥
अ꣥रण्योः ॥ नि꣢हितो꣯जाऽ३४३त꣢वे꣣꣯ दाः꣥꣯ । ग꣣र्भ꣤इवे꣣꣯त्सुभृ꣤तो꣥꣯ग । भि꣣णाऽ२३४इभी꣥: ॥
दि꣢वे꣡꣯दिवई꣯ड्यो꣯जागृ꣪वाऽ२३द्भी꣢: ॥ हा꣣ऽ२३४वी꣥ । ष्मा꣣ऽ२३४द्भी꣥: । मनुष्ये꣤꣯ऽ५भिरग्नि꣤: । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ११। मा॰ १०)(१७)॥ पौ ॥ १२७ ॥
८०-१ अग्नेर्वैश्वानरस्यात्रेर्वाराक्षोघ्नम्।   अग्निस्त्रिष्टुबग्निः ॥
अ꣣हा꣢ । वोऽ३हा꣢ । वोऽ३हा꣢ । सना꣡꣯दग्नाइ । मृ꣢ण꣡सि । या꣢तु꣣धा꣤ना꣥न् ॥ न꣢त्वा꣡꣯रक्षा । सी꣢ऽ᳐३पृ꣡त ।
ना꣢सु꣣जि꣤ग्यू꣥: ॥ अ꣢नु꣡दहा । स꣢ह꣡मू꣯ । रा꣢न्क꣣या꣤दा꣥: ॥ अ꣣हा꣢ । वोऽ३हा꣢ । वोऽ३हा꣢ । मा꣯ता꣡इहे꣢꣯त्या꣡: ।
मु꣢क्ष꣡त । दा꣢ऽ३४३इ । वी꣢ऽ३या꣤ऽ५᳚याऽ६५६ः ॥
(दी॰ ५। प॰ १९। मा॰ ८)(१८)॥ भै ॥ १२८ ॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥ ८ ॥ दशतिः ॥

॥ अथ अष्टम खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१३)

८१-१ पाथे द्वे।   द्वयोः पथोऽनुष्टुबग्निः ॥
आ꣡ग्ना꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ओ꣢꣯जिष्ठऽ३मा꣡ । भारा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । द्यु꣢म्न꣡मस्मभ्य꣢मध्रिगोऽ᳐३ । ओ꣡इ ।
प्राना꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ रा꣢꣯ ये꣡꣯पनी꣰꣯ऽ२यसेऽ᳐३ । ओ꣡इ । रात्सा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
वा꣡꣯ जा꣢꣯यप꣡न्था꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ७)(१९)॥ ङे ॥ १२९ ॥

८१-२
अ꣤ग्नेहा꣥उ ॥ ओ꣡꣯जि । ष्ठामा꣢ऽ१भारा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । द्यु꣢म्न꣡मस्म । भ्याम꣪ध्रीगा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ।
प्र꣡नो꣯रा꣯ये꣯ । पानी꣢ऽ१यासा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ रा꣡त्सीऽ२वा꣡जाऽ२ ॥ यपो꣡वा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ।
था꣤ऽ५मोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ३)(२०)॥ जि ॥ १३० ॥
८२-१ बृहदाग्नेयम्।   अग्निरनुष्टुबग्निः ॥
य꣣दि꣤वी꣯रो꣣꣯अनु꣤ष्या꣥꣯त् । ऐ꣢꣯याऽ३४३ई꣢ऽ३४या꣥ ॥ अ꣤ग्नि꣣मि꣤न्धी꣥꣯तमौ꣯ । हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हो꣡ऽ२३४र्तियाः ।
आ꣡जूऽ२ह्वा꣡द्धाऽ२३ । व्य꣡माऽ२᳐नू꣣ऽ२३४षा꣥क् ॥ श꣡र्मभ꣢ । क्षा꣡इ । तदा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ३इ ॥
वा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ व्या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ९)(२१)॥ खो ॥ १३१ ॥
८३-१ त्वेषस्ते यामम्।   यमोऽनुष्टुबग्निः ॥
त्वे꣢꣯षा꣡स्तेऽ२३धू꣤꣯मऋण्वतीर्हा꣥उ ॥ दि꣢विसंछुक्रऽ᳐३आ꣡ताता꣢ऽ३ः । सू꣤꣯रो꣯नहीहा꣥उ ॥ द्यु꣢ता꣡तूवा꣢ऽ३म् ।
कृ꣤पा꣯पवाहा꣥उ ॥ क꣢रो꣡꣯चाऽ२३सा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ९)(२२)॥ गो ॥ १३२ ॥
८४-१ बृहदाग्नेयम्।   अग्निरनुष्टुबग्निः ॥
त्व꣤ꣳहिक्षै꣯त꣥वद्य꣤श꣥: । ई꣤य꣥इ꣤याहा꣥इ ॥ अ꣡ग्नाइमि꣢ । त्रो꣡ । नाप꣢त्या꣣ऽ२३४सा꣥इ । आ꣡औ꣢ऽ३४हो꣥ ।
इ꣤याहा꣥इ । त्वं ꣡वि । चा । ष꣪णेऽ२᳐श्रा꣣ऽ२३४वा꣥: । आ꣡औ꣢ऽ३४हो꣥ । इ꣤याहा꣥इ ॥ वा꣡सा꣢ऽ᳐३उवा꣢ ।
पु । ष्टा꣡इम् । नापु꣢ष्या꣣ऽ२३४सी꣥ । आ꣡औ꣢ऽ३४हो꣥ । इ꣤याहा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ २०। मा॰ १५)(२३)॥ ङु ॥ १३३ ॥
८५-१ बृहतश्च कौमुदस्य साम।   कुमुद्बृहदनुष्टुबग्निः ॥
प्रा꣥꣯तरग्ना꣯इ:पूऽ६रु꣥प्रियाः ॥ वि꣢शा꣡स्त꣢वे꣯ । ता꣡ऽ२३ । अ꣢ति꣣था꣢इः । वा꣡इश्वेयास्मी꣢ऽ३न् ।
अ꣡माऽ२᳐र्त्ता꣣ऽ२३४या꣥इ ॥ ह꣡व्याऽ२३ꣳहो꣡इ । मर्त्ता꣢ऽ३हो꣡ ॥ स꣢इ꣡न्धाऽ२३ता꣢ऽ३४३इ ॥
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ११)(२४)॥ ट ॥ १३४ ॥
८६-१ यद्वाहिष्ठीये द्वे।   द्वयोरग्निरनुष्टुबग्निः ॥
य꣤द्वा꣯हि꣥ष्ठन्त꣤दा ॥ ग्न꣡याइ । बृहदर्चवि꣢भा꣡꣯वाऽ२३सा꣢उ । मा꣡हीऽ२षा꣡इवाऽ२ ।
त्व꣡द्रयिः ॥ त्वद्वाऽ२३जा꣢: ॥ उदी꣡꣯राऽ२३ता꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ७)(२५)॥ ढे ॥ १३५ ॥

८६-२ यद्वाहिष्ठीयोत्तरम्।
यद्वाहिष्ठीयोत्तरम् ॥ य꣤द्वा꣯हि꣥ष्ठंत꣤द꣥ग्न꣤ये꣥꣯ । यद्वा꣯हिष्ठो꣤वा꣥ ॥ त꣢द꣡ग्नयाइ । बृहदाऽ२३र्चा꣢ । विभा꣡꣯वसाउ ।
महिषाऽ२३इवा꣢ । त्व꣡द्रयिः ॥ त्वद्वाऽ२३जा꣢: ॥ उदी꣡꣯राऽ२३ता꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ७)(२६)॥ पे ॥ १३६ ॥
८७-१ विशोविशीयम् ऐडं वा।   अग्निरनुष्टुबग्निः ॥
वि꣥शो꣯विशो꣯हिं ꣯(स्थि)वोऽ६अ꣥तिथाइम् ॥ वा꣡꣯जयन्ताः । पू꣢ऽ३रू꣡प्री꣢ऽ३या꣢म् । अग्निं ꣡वो꣰꣯ऽ२ ।
दू꣡राऽ२३या꣢म् । हिं ꣡माइ । वा꣢ऽ३चा꣢ऽ३ः । स्तू꣡ऽ२३४षे꣯हा꣥इ ॥ ओ꣡ । हु꣣वा꣢इ । शू꣣ऽ२३४षा꣥ ॥
हिं ꣡मा । स्या꣢ऽ३मा꣢ऽ३ । न्मा꣡ऽ२३४भाइ । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १७। मा॰ १३)(२७)॥ छि ॥ १३७ ॥
८८-१ आत्रेये द्वे।   द्वयोरत्रिरनुष्टुबग्निः ॥
बृ꣥हद्वयाः ॥ हि꣢भा꣡꣯नाऽ२३वा꣢इ । आ꣡र्चा꣯दे꣢꣯ वा꣡꣯ । य꣢अ꣡ग्नाऽ२३या꣢इ । य꣡म्मित्रन्न । प्राश꣪स्तायाऽ२इ ॥
म꣡र्तासो꣢ऽ३दा꣢ऽ३ ॥ धि꣤रोवा꣥ । पू꣤ऽ५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ६)(२८)॥ धू ॥ १३८ ॥

८८-२
बृ꣥हद्वयो꣯हिभा꣯नाऽ६वा꣥इ ॥ आ꣡र्चा꣯दे꣢꣯वा꣯ । यअ꣡ग्नाऽ२३या꣢इ । य꣡म्मित्र꣢न्न । प्रा꣡श꣪स्तायाऽ२इ ॥
म꣡र्ता꣢꣯सो꣯द ॥ धा꣡इरे꣢ऽ१पूरा꣢ । औ꣣꣯हो꣯वा꣯हा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣢ऽ᳐३हा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ ९। मा॰ ७)(२९)॥ झे ॥ १३९ ॥
८९-१ श्रौतर्वणम्।   श्रुतर्वानुष्टुबग्निः॥ वृत्रहा वा ॥
अ꣥गन्मवॄ ॥ त्रा꣢ऽ३हा꣡न्ता꣢ऽ३मा꣢म् । ज्या꣡इष्ठ꣢म । ग्नि꣡माना꣢ऽ३वा꣢म् । य꣡स्माऽ२३हो꣡इ । श्रु꣢त꣡र्वन्ना꣯र्क्षाइ ॥
बृहाऽ२३द्धो꣡इ ॥ आनी꣯क꣢याऽ३१उवाये꣢ऽ३ ॥ ध्याऽ२३४ते꣥ ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ७)(३०)॥ झे ॥ १४० ॥
९०-१ इन्द्रस्य प्रियम्।   इन्द्रोऽनुष्टुबग्निः ॥
जा꣢꣯त:परे꣯णऽ३धा꣡ । इ꣣हा꣢ । मणा꣡ । इ꣣हा꣢ । यो꣣ऽ२३४नी꣥म् । यो꣡꣯निमिन्द्रश्च꣢गच्छथः ॥
यत्सवृद्भिस्सऽ३हा꣡ । इ꣣हा꣢ । भुवा꣡: । इ꣣हा꣢ । यो꣣ऽ२३४नी꣥म् । यो꣡꣯निमिन्द्रश्च꣢गच्छथः ॥
पिता꣯यत्कश्यऽ३पा꣡ । इ꣣हा꣢ । स्या꣯ग्ना꣡इ । इ꣣हा꣢ । यो꣣ऽ२३४नी꣥म् । यो꣡꣯निमिन्द्रश्च꣢गच्छथः ॥
श्रद्धा꣯मा꣯ता꣯मऽ३नू꣡: । इ꣣हा꣢ । कवा꣡इ । इ꣣हा꣢ । यो꣣ऽ२३४नी꣥म् ॥ यो꣡꣯निमिन्द्रश्च꣢गच्छथा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ११। प॰ २४। मा॰ १२)(३१)॥ घा ॥ १४१ ॥
॥ त्रयोदशः नवमः । नवमः खण्डः ॥ ९ ॥ दशतिः ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने द्वितीयः प्रपाठकः ॥

१. आग्नेयं पर्व — तृतीयप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ अथ दशम खण्डः ॥ (ऋ-६, सा-७)

९१-१ बार्हस्पत्यम्।   बृहस्पतिरनुष्टुबग्निः॥ विश्वेदेवाः वा ॥
सो꣤꣯ म꣥ꣳ रा꣤꣯ जा꣥꣯नंव꣤रु꣥णा꣤म् ॥ अ꣢ग्नि꣡मन्वा꣯रभा꣢꣯महेऽ᳐३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ । आ꣯दित्यं ꣡विष्णु꣢ꣳ सू꣡꣯र्य꣢म् ।
हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ ब्रह्मा꣡꣯णाऽ२३ञ्चा꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ बॄ꣡हा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥ पाऽ२३४ती꣥म् ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ७)(१)॥ ढे ॥ १४२ ॥
९२-१ आरूढवदाङ्गिरसं यामं वा।   आरूढविदाङ्गिरानुष्टुबग्निः ॥
आ꣡꣯रो꣭ऽ᳐३हा꣢न् । आ꣡꣯रो꣭ऽ᳐३हा꣢न् । आ꣡꣯रो꣭ऽ᳐३हा꣢न् । इतए꣯तउऽ᳐३दा꣡रू꣢ऽ१हाऽ२न् ॥
दिव:पृष्ठा꣯निऽ᳐३या꣡रू꣢ऽ१हाऽ२न् ॥ प्रभू꣯र्जयो꣯यऽ᳐३था꣡पा꣢ऽ१थाऽ२ ॥ उद्या꣯मङ्गिरऽ᳐३सो꣡या꣢ऽ१यूऽ२: ।
आ꣡꣯रो꣭ऽ᳐३हा꣢न् । आ꣡꣯रो꣭ऽ᳐३हा꣢न् । आ꣡ऽ२३ । रो꣡ऽ२᳐ । हा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा । ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १२। प॰ १४। मा॰ १०)(२)॥ झ्वौ ॥ १४३ ॥
९३-१ आसिते द्वे।   द्वयोरसितोऽनुष्टुबग्निः ॥
रा꣥꣯ ये꣤꣯अ꣥ग्ने꣯महा꣤इ ॥ त्वा꣡ । दा꣯ना꣯यसमिधी꣯माऽ२३ही꣢ । आ꣡इडीऽ२ष्वा꣡हीऽ२ । महे꣡꣯वृषन् ॥
द्यावाऽ२हो꣡त्राऽ२ ॥ यपो꣡वा꣢ऽ᳐३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । था꣤ऽ५इवोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ७)(३)॥ जे ॥ १४४ ॥

९३-२
रा꣢꣯या꣡याऽ२३ग्ने꣤꣯महे꣯त्वा꣯हा꣥उ ॥ दा꣡꣯ना꣯यसमिधी꣯माऽ२३हा꣢इ । आ꣡इडाइष्वा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ᳐३इ ।
मा꣡हे꣢वा꣣ऽ२३४र्षा꣥न् ॥ द्या꣡꣯वाहो꣢ऽ३त्रा꣢ऽ३ ॥ य꣢पो꣡ऽ२३४वा꣥ । था꣤ऽ५इवोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ ८)(४)॥ ठै ॥ १४५ ॥
९४-१ त्वार्ष्टीसाम।   त्वष्टानुष्टुबग्निः ॥
द꣤धन्वे꣯वाऽ५यदी꣯म꣤नू ॥ वो꣡꣯चद्ब्रह्मे꣯तिवे꣯रुतत् । पारि꣪विश्वाऽ२ । निका꣡꣯व्या ॥ नाइमिश्चक्रौ꣢वा᳐ ॥
ई꣣ऽ२३४वा꣥ । भु꣢वा꣡त् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ४)(४)॥ ङी ॥ १४६ ॥
९५-१ राक्षोघ्नम्।   अगस्त्योऽनुष्टुबग्निः॥ रक्षोहा वा ॥
प्र꣣त्य꣤ग्ने꣥꣯ । हो꣢इ᳐ । ह꣣र꣤सा꣯हरा꣥ऽ६ए꣥ ॥ शृ꣢णा꣡꣯हि꣢वा꣡ऽ२᳐इ । श्व꣣ता꣢ऽ३४५ः । पा꣣ऽ२३४री꣥ ॥
या꣢꣯तुधा꣡꣯नस्य꣢रक्ष꣡सो꣢꣯ऽ३᳐ ॥ बा꣡ऽ२३ला꣢म् ॥ नि꣡युञ्ज꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ री꣣ऽ२३४या꣥म् ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ६)(६)॥ ङू ॥ १४७ ॥
९६-१ मानवम्।   मनुरनुष्टुबग्निः, विश्वेदेवाः वा ॥
त्व꣤म꣥ग्ने꣯ । त्व꣤म꣥ग्ना꣤इ ॥ व꣢सूꣳ꣡꣯रिहा । रुद्रा꣯ꣳआऽ२३दी꣢ । तियाꣳ꣡꣯उता । यजा꣯सूऽ२३वा꣢ ।
ध्वर꣡ञ्जनम् ॥ मनुजाऽ२३ता꣢म् ॥ घृतप्रु꣡ष꣢म् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ७)(७)॥ फे ॥ १४८ ॥
॥ सप्त दशमः । दशमः खण्डः ॥ १० ॥ दशतिः ।

॥ अथ एकादशम खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-१८)

९७-१ (द्यौ तानि पञ्च) तौदे द्वे।   द्वयोः तोद उष्णिगग्निः ॥
पु꣥रू꣤ ॥ त्वा꣢꣯ दा꣡꣯शिवा꣯ꣳवो꣯चाये꣢ऽ३ । आ꣤री꣥रा꣤ग्ना꣥इ । ता꣢꣯व꣡स्विदा । तो꣢꣯द꣡स्ये꣯वशरणआऽ२३हो꣡इ ॥
महाऽ२३हो꣡ये꣢ऽ᳐३ ॥ स्यो꣢ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ४)(८)॥ घ्री ॥ १४९ ॥

९७-२
पु꣥रु꣤त्वा꣥꣯दा꣯शिवाꣳ꣤꣯ वो꣥꣯ । चे ॥ आ꣢री᳐रा꣣ऽ२३४ग्ना꣥इ । ता꣢वस्वा꣣ऽ२३४इदा꣥ ॥ तो꣤꣯द꣣स्ये꣤꣯व꣥शर ।
ण꣣योऽ२३४हा꣥इ ॥ मा꣭ऽ᳐३हा꣢ऽ᳐३ ॥ हिं ꣡माये꣢ऽ३ । स्यो꣢ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ४)(९)॥ र्टी ॥ १५० ॥

९७-३ दैर्घतमसानि त्रीणि।   त्रयाणां दीर्घतमा उष्णिगग्निः ॥
पु꣥रु꣤त्वा꣥꣯दा꣯शिवाꣳ꣤꣯ वो꣥꣯ । चे । चे ॥ अ꣢रा꣡इराऽ२३४ग्ना꣥इ । ता꣢वस्वा꣣ऽ२३४इदा꣥ ॥
तो꣢꣯दा꣡स्याऽ२३४इवा꣥ ॥ शा꣢रा᳐णा꣣ऽ२३४या꣥ । मा꣢ऽ३हा꣤ऽ५स्याऽ६५६ ॥ ए꣢ऽ᳐३१ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ४)(१०)॥ भी ॥ १५१ ॥

९७-४
पु꣥रुत्वा꣢ऽ३दा꣤꣯शि꣥वाꣳ꣤꣯वो꣯चे꣥ ॥ अ꣢रि꣡र । ग्नाइ । त꣪वाऽ२᳐स्वा꣣ऽ२३४इदा꣥ ॥ तो꣣ऽ२३४दा꣥ ।
स्या꣣ऽ२३४इवा꣥ ॥ शा꣢रा᳐णा꣣ऽ२३४या꣥ । मा꣢ऽ᳐३हा꣤ऽ५᳚स्याऽ६५६ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ३)(११)॥ डि ॥ १५२ ॥

९७-५
पु꣢रु꣡त्वाऽ२३दा꣤꣯शिवा꣯ꣳवो꣯चे꣯हा꣥उ ॥ हा꣢ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । अ꣢रि꣡रग्ने꣢꣯त꣡वस्वि꣢दा꣡꣯ ॥
हा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । तो꣢꣯द꣡स्ये꣢꣯वशरण꣡आ꣯ ॥ हा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
ए꣢ऽ᳐३ । म꣢ह꣡स्या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १२। प॰ १४। मा॰ २)(१२)॥ झा ॥ १५३ ॥
९८-१ प्रहितौ द्वौ।   द्वयोः श्यावाश्व उष्णिगग्निः ॥
प्र꣥हो꣯त्रे꣯पू ॥ र्वि꣢यं ꣡वचो । अग्नयाऽ२३इभा꣢ । रता꣡꣯बृहत् ॥ विपां ꣯ज्योऽ२३ती꣢ ॥ षिबा꣡ये꣢ऽ᳐३ ।
भ्रा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ न꣡वे꣰꣯ऽ२ध꣡से꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ३)(१३)॥ जि ॥ १५४ ॥

९८-२
प्र꣥हो꣯त्रा꣢ऽ३इपू꣤꣯र्वि꣥यं ꣤वचा꣥: ॥ अ꣢ग्न꣡ये꣰꣯ऽ२भ꣡रता꣢꣯ऽ३बॄ꣢ । हा꣡ऽ२३त् । वि꣢पां ꣣꣯ज्यो꣯ता꣢इ । षी꣣ऽ२३४बि꣥ ।
भ्र꣣ता꣢ऽ३इ ॥ ना꣡ऽ२३वे꣤ऽ३ ॥ धा꣢ऽ᳐३४५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ६)(१४)॥ गू ॥ १५५ ॥
९९-१ श्रुध्ये द्वे।   द्वयोः प्रजापतिरुष्णिगग्निः ॥
अ꣤ग्ने꣯वा꣯जाऽ५स्य । गो꣯मतो꣤वा ॥ ई꣢꣯ शा꣡꣯न꣢स्सा꣡ । ह꣢सो꣣꣯य꣢हो꣡ ॥ अ꣢स्मा꣡इदे꣢꣯हिजा꣡꣯तवे꣢꣯दो꣯म꣡ । हाऽ२३इ ।
श्रवा꣢उवा ॥ श्रू꣡꣯धियाऽ२ । ए꣡ऽ२३हिया꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ ११। मा॰ ४)(१५)॥ की ॥ १५६ ॥

९९-२
अ꣥ग्ने꣯वा꣯जस्यगो꣯हिं ꣯(स्थि)मतो꣤होहा꣥इ ॥ ई꣢꣯ शा꣡꣯न꣢स्सा꣡ । हासो꣢ ᳐या꣣ऽ२३४हो꣥ । आ꣡स्मे꣢ऽ१दाइही꣢ऽ३ ।
जा꣤꣯त꣥ । वे꣣꣯दा꣢ऽ३ः ॥ मा꣡ऽ२३ही꣤ऽ३ ॥ श्रा꣢ऽ३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ५)(१६)॥ डु ॥ १५७ ॥
१००-१ सदस्साम।   प्रजापतिरुष्णिगग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯यजिष्ठो꣯अध्वराऽ६ए꣥ ॥ दे꣢꣯वा꣯न्दे꣯वयऽ३ता꣡इया꣢ऽ१जाऽ२᳐ । हु꣣वा꣢ऽ३ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ हो꣡ता꣯मं ꣢द्रः ।
विरा꣡जा꣢ऽ१सीऽ२᳐ ॥ हु꣣वा꣢ऽ३ । हो꣭ऽ३वा꣢ । अति꣡स्राऽ२३इधा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ७)(१७)॥ के ॥ १५८ ॥

१००-२ हविर्धाने द्वे।   द्वयोः प्रजापतिरुष्णिगग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯ । इ꣢याऽ३४३ई꣢ऽ३४या꣥ ॥ य꣡जिष्ठो꣯अध्वराइ । दे꣯वा꣯न्दे꣯वयतेऽ२ । हौ꣡होऽ२ । या꣡जाऽ२ ।
हो꣡ताऽ२मा꣡न्द्रोऽ२ ॥ वि꣡राजा꣢ऽ३सी꣢ ॥ आ꣡ऽ२᳐ । ति꣣या꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्री꣣ऽ२३४धा꣥: ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ५)(१८)॥ चु ॥ १५९ ॥

१००-३
अ꣥ग्नई꣤या꣥ । ओ꣤वा꣥ ॥ य꣡जिष्ठो꣯अध्वराइ । दे꣯वा꣯न्दाऽ२३इवा꣢ । या꣡ते꣢ऽ१याजाऽ२ ॥ हो꣡ता꣢ऽ३उवा꣢ ॥
मन्द्रो꣯विऽ३रा꣡ऽ२३ । जा꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣡ति꣢स्रि꣡धा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ७)(१९)॥ घे ॥ १६० ॥
१०१-१ आतिथ्यम्।   त्वष्टोष्णिगग्नि;, अदितिर्वा ॥
ज꣥ज्ञा꣯नः सा ॥ प्त꣢मा꣯तृ꣡भाइः । मेधा꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४शा꣥ । स꣢तश्रा꣡याइ । अ꣪याऽ२᳐न्ध्रू꣣ऽ२३४वा꣥: ।
र꣡याऽ२३इणा꣢म् ॥ चि꣡काये꣢ऽ३ ॥ ता꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ७)(२०)॥ ध्वे ॥ १६१ ॥
१०२-१ आदित्यम्।   अदितिरुष्णिगग्निः अदितिर्वा ॥
उ꣥तस्या꣢ऽ३नो꣤꣯दि꣥वा꣤꣯मती꣥: ॥ आ꣡दिति꣢रू꣯ । तिया꣡गा꣢ऽ१माऽ२त् ॥ सा꣡꣯शंता꣢ऽ᳐३ता꣢ऽ᳐३ ॥ मा꣤ ।
य꣥: । क꣣रा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । अ꣤पाऽ५स्रिधाः । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ६)(२१)॥ नू ॥ १६२ ॥
१०३-१   धूपं । वार्कजम्म्भम् । वृकजम्म्भो उष्णिगग्निः ॥
ई꣢꣯डा꣡इश्वाऽ२३हि꣤प्रती꣥꣯वियाम् ॥ या꣡जस्व꣢जा꣡ । त꣢वे꣣꣯द꣢सा꣡ऽ२३म् ॥ च꣢रि꣣ष्णुधू꣢ ॥ मा꣣ऽ२३४म꣥ ।
गृ꣣भा꣢ऽ३इ । ता꣡ऽ२᳐शो꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ची꣣ऽ२३४षा꣥म् ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ६)(२२)॥ बू ॥ १६३ ॥
१०४-१ राक्षोघ्नम्।   अगस्त्य उष्णिगग्निः ॥
न꣥तो꣤वा ॥ स्या꣣ऽ२३४मा꣥ । य꣢या꣡꣯चाऽ२३ना꣢ । रिपु꣡री꣯शी꣯त꣢माऽ३१उवाऽ२३ । तीऽ२३४या꣥: ॥
यो꣡꣯अग्नये꣰꣯ऽ२ददा꣡꣯ । श᳚हव्य᳚दोऽ२३४वा꣥ ॥ ता꣣ऽ२३४ये꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ३)(२३)॥ गि ॥ १६४ ॥
१०५-१ सौमक्रतवम् बृहदाग्नेयं वा।   सोमक्रतुरुष्णिगग्निः ॥
अ꣣प꣤त्यं ꣣वृ꣤जि꣥नम् । रि꣣पू꣢म् । स्ते꣯ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥ अ꣢ग्नाइ । दुरा꣡꣯धाऽ२३या꣢ऽ३४म् ॥ द꣣वि꣤ष्ठ꣥मस्यसत् ।
प꣣ता꣢ऽ३इ ॥ का꣡ऽ२३र्धी꣤ऽ३ ॥ सू꣢ऽ३४५गोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ८)(२४)॥ झै ॥ १६५ ॥
१०६-१ राक्षोघ्नम्।   अगस्त्य उष्णिगग्निः ॥
हा꣥꣯उश्रुष्ट्यग्ने꣯नवस्यमे꣯हाउ ॥ स्तो꣢꣯मा꣡स्य꣢वा꣡इ । र꣢विष्प꣡ताये꣢ऽ३४ । ऐ꣥꣯ही꣯हा꣯उहो꣤वा꣥ । नि꣢मा꣯यि꣡नाः ।
त꣢प꣡सा꣢꣯रा꣡ऽ२३४ । ऐ꣥꣯ही꣯हा꣯उहो꣤वा꣥ ॥ क्षा꣡साऽ२३४ः । ऐ꣥꣯ही꣯हा꣯उहो꣤वा꣥ ॥ द꣢हएऽ३४ । हि꣥याऽ६हा꣥ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १५। प॰ १३। मा॰ १०)(२५)॥ बौ ॥ १६६ ॥
॥ अष्टादश एकादशः । एकादशः खण्डः ॥ ११ ॥ दशतिः ॥

॥ अथ द्वादश खण्डः ॥ (ऋ-८, सा-१४)

१०७-१ प्रमꣳहिष्ठीये द्वे।   द्वयोरिन्द्रः ककुबग्निः ॥
प्र꣥मꣳहा꣢ऽ३इष्ठा꣤꣯यगा꣥꣯यता ॥ ऋ꣢ता꣡श्नेऽ२ । बृ꣡हते꣯शूक्रा꣢ऽ३शो꣤ऽ३ । चाऽ२३४इषा꣥इ ॥ उ꣢पा꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ॥
स्तो꣡तासो꣢ऽ३आ꣤ऽ३ । ग्ना꣢ऽ३४५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ६)(२६)॥ ठू ॥ १६७ ॥

१०७-२
प्र꣤मꣳहि꣥ष्ठा꣯य । गा꣤ऽ५यता꣤ ॥ ऋ꣢ताऽ२१ । श्नेऽ२ । बृहा꣡ता꣢ऽ१इशूऽ२ । क्र । शो꣡꣯चाऽ२३इषा꣢इ ॥
उप । स्तु꣡तौऽ२ ॥ हु꣡वाइ । हो꣭ऽ३वा꣢ऽ३ । स꣢ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ ग्ना꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ १३। मा॰ ६)(२७)॥ जू ॥ १६८ ॥

१०७-३ गायत्रीसामासितम्।   असितः ककुबग्निः ॥
प्र꣣मꣳहि꣤ष्ठा꣥꣯यगा꣯ । इ꣢याऽ᳐३४३ई꣢ऽ३४या꣥ ॥ य꣡तऋता꣯श्ने꣯बृहते꣯शुक्र꣢शौऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाऽ२इ ।
चा꣡इषाऽ२इ ॥ उ꣡पा꣢ऽ३हो꣡इ । स्तुता꣢ऽ३हो꣡ ॥ सो꣢꣯अ꣡ग्नाऽ२३या꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ९)(२८)॥ को ॥ १६९ ॥

१०७-४ प्रमꣳहिष्ठीयम्।   इन्द्रः ककुबग्निः ॥
प्र꣤मꣳहि꣥ष्ठा꣯यगा꣯यत । प्रमꣳहिष्ठो꣤वा꣥ ॥ या꣡गा꣯य꣢त । ऋ꣡ताऽ२३श्ना꣢ऽ३४इ । बृहते꣣꣯शु꣤क्रशो꣥꣯ ।
चा꣢ऽ३इषा꣢इ ॥ उपौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢इ । स्तुतौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢ऽ३ ॥ स꣢ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । ग्ना꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ १०। मा॰ ६)(२९)॥ नू ॥ १७० ॥
१०८-१ वाजभृद्वाजाभृद्वाजाभर्मीयं वा।   भरद्वाजः ककुबग्निः ॥
प्रा꣡सो꣢ऽ३हा꣢इ । आ꣡ग्ने꣢ऽ३हा꣢इ ॥ तवाऽ३१उवाऽ२३ । तीऽ२३४भी꣥: ।
सु꣢वी꣡꣯रा꣯भि꣢स्तरतिवा꣡꣯जक꣢र्मभिः ॥ या꣡स्या꣢ऽ३हा꣢इ । त्वा꣡ꣳसाऽ२३ ॥ ख्य꣤मोवा꣥ । वा꣤ऽ५इथोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ८)(३०)॥ ढै ॥ १७१ ॥
१०९-१ सौभराणि त्रीणि।   त्रयाणां सुभरिः ककुबग्निः ॥
तं ꣥गू꣤ऽ३र्धा꣢ऽ३या꣤सुव꣥र्णरो꣤वा꣥ ॥ दे꣢꣯ वा꣡꣯सो꣯दे꣯वमराऽ२ता꣡इन्द꣪धाऽ२३ । हो꣡ । न्वा꣣ऽ२३४इरा꣥इ ॥
दे꣢꣯वत्रा꣡꣯ह । व्यमू꣭ऽ३हा꣢ऽ३ ॥ हा꣡ऽ२᳐इषा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ५)(३१)॥ र्डु ॥ १७२ ॥

१०९-२
तं ꣥गू꣯र्धया꣯सुवर्णा꣤रा꣥म् ॥ दे꣢꣯ वा꣡꣯ सो꣢꣯दा꣡इ । व꣢म꣣र꣢ता꣡ऽ२३इम् । द꣢ध꣣न्विरा꣢उ । वाऽ३ । देऽ२३४वा꣥ ॥
त्रा꣢꣯हा꣡ऽ२३ ॥ व्य꣤मोवा꣥ । हा꣤ऽ५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ७)(३२)॥ घे ॥ १७३ ॥

१०९-३
तं ꣥गू꣯र्धया꣯स्वौ꣯हो꣤र्णारा꣥म् ॥ दे꣡꣯वाऽ२᳐सो꣣ऽ२३४दे꣥ । व꣡मरताऽ२इम् । दा꣣ऽ२३४धा꣥ । न्वा꣣ऽ२३४इरा꣥इ ।
हा꣢हो꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ दे꣡꣯वाऽ२त्रा꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ व्य꣣मू꣢ऽ३हा꣤ऽ५इ ॥ षा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ०९। मा॰ ७)(३३)॥ भे ॥ १७४ ॥
११०-१ पक्थस्य सौभरस्य सामनी द्वे।   द्वयोः पक्थः ककुबग्निः ॥
मा꣤ । नाः ॥ हृ꣢णी꣯ऽ३था꣡अ꣪तिथी꣢ऽ᳐३म् । वा꣡सू꣢रा꣣ऽ२३४ग्ह्नी꣥: ॥ पु꣢रौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢इ । प्रशौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢ऽ३ ॥
स्त꣢ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ८)(३४)॥ बै ॥ १७५ ॥

११०-२
मा꣤꣯नोहा꣥उ ॥ हा꣡ऽ२३४ । णी꣯था꣯अ꣣ति꣤थि꣥म् । वा꣢सूरा꣣ऽ२३४ग्ना꣥इः ॥ पु꣢रौ꣡꣯ह꣢हो꣡इ । प्र꣢शौ꣡꣯ह꣢हो꣡ ॥
स्ताऽ२३४ए꣯षाः । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ९)(३५)॥ ञो ॥ १७६ ॥
१११-१ दैवनीकं सफम्।   देवानीकः ककुबग्निः ॥
भ꣤द्रो꣣ऽ४न꣥: । हो꣢इ᳐ । अ꣣ग्नि꣤रा꣯हुता꣥ऽ६ए꣥ ॥ भ꣣द्रा꣯रा꣢꣯ता꣡इः । सु꣢भ꣡गभा꣢ऽ᳐३ । द्रो꣡ऽ२᳐ध्वा꣣ऽ᳐२३४रा꣥: ॥
भ꣢द्रा꣡꣯ऊऽ२३ता꣢ऽ३ ॥ प्रा꣡ऽ२३शा꣤ऽ३ । स्ता꣢ऽ३४५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ८)(३६)॥ धै ॥ १७७ ॥
११२-१ गौतमं साध्यं वा।   साधिः ककुबग्निः ॥
या꣣ऽ५जि । ष्ठंत्वा꣤ऽ३वा꣢ऽ᳐३वृ꣤महा꣥इ ॥ दे꣢꣯वं ꣡दे꣯वत्रा꣯हो꣯ताऽ२३रा꣢म् । आ꣡मर्ति꣢यम् ॥ आ꣡स्य꣪याज्ञाऽ२३ ।
स्या꣡ऽ२३सू꣤ऽ३ । क्रा꣢ऽ३४५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ४)(३७)॥ थी ॥ १७८ ॥
११३-१ संवर्गः।   जमदग्नयुष्णिगग्निः ॥
त꣤दग्ने꣯द्यूऽ५म्नम् । आ꣯भरो꣤वा ॥ य꣢त्सा꣡꣯साऽ२३हा꣢ । स꣡दाऽ२३ना꣢इ । कञ्चि-द꣡त्राऽ२३इणा꣢म् ॥
मा꣡न्युञ्जनस्यदूऽ२३हो꣡ ॥ ढाऽ२३४याम् । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ६)(३८)॥ नू ॥ १७९ ॥
११४-१ राक्षोघ्नम्।   अगस्त्योष्णिगग्निः ॥
य꣢द्वा꣡꣯ऊऽ२३वि꣤श्पति꣥श्शिताः ॥ सु꣡प्री꣯तो꣢꣯म꣡नुषो꣢꣯विशे꣡꣯ ॥ विश्वाइदाऽ२३ग्नीः꣢ ॥ प्र꣡ति꣢र꣡क्षा꣢꣯ । सि꣣से꣯ध꣢ता꣡ ।
औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ५)(३९)॥ जु ॥ १८० ॥
॥ चतुर्दशद्वादशः द्वादशः खण्डः ॥१२॥ दशतिः ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने तृतीयस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥
॥ इति प्रकृतिगाने आग्नेयं पर्वं समाप्तम् ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — तृतीयप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ प्रथम खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-२३)

११५-१ मार्गीयवम्।   मृगयुर्गायत्रीन्द्रः ॥
म् ॥ त꣥द्वौ꣯हो꣤वा꣥ ॥ गा꣡याऽ२᳐ । सु꣣ता꣢इ᳐सा꣣ऽ२३४चा꣥ । पु꣡रुहू꣢꣯ता꣯ । यसा꣡त्वा꣢ऽ१नाऽ२इ ॥ शं ꣡यत् ।
हा । औ꣢ऽ३हो꣢इ᳐ । गा꣣ऽ२३४वा꣥इ ॥ ना꣡ऽ२᳐शा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । कि꣡नेऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ६)(१)॥ फू ॥ १८१ ॥

११५-२ रौद्रे द्वे।   द्वयोरुद्रो गायत्रीन्द्रः ॥
त꣥द्वो꣯गा꣯या ॥ सु꣢ताइसचाऽ᳐३ । पू꣡रुऽ२३हू꣯ता꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢ऽ३ । या꣡स꣢त्वा꣣ऽ२३४ना꣥इ ॥ शं ꣢य꣡द्गाऽ२३वे꣢ ॥
नशौऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वोऽ२३४ । वा꣥ । का꣤ऽ५इनोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ४)(२)॥ ती ॥ १८२ ॥

११५-३
त꣥द्वो꣯गा꣯यसुते꣯सचाऽ६ए꣥ ॥ पु꣢रुहू꣯ता꣡꣯यसत्वने꣢꣯ । पु꣡रुहू꣢꣯ता꣯ । या꣡स꣪त्त्वाऽ२३ना꣢ऽ३४इ । शंय꣥त् ।
गौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ना꣡ऽ२३शा꣤ऽ३ ॥ का꣢ऽ᳐३४५इनोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ६)(३)॥ डू ॥ १८३ ॥

११५-४ ईनिधनं मार्गीयवम्।   मार्गीयवो (मृगयुः) गायत्रीन्द्रः ॥
त꣥द्वो꣯गा꣯यसुते꣯सचाऽ६ए꣥ ॥ पु꣢रुहू꣯ता꣡꣯यसत्वनाइ ॥ शंयद्गाऽ२३वे꣢ ॥ ऐऽ२होऽ१आऽ२३इही꣢ ।
नशा꣡ऽ२३ । का꣡ऽ२᳐इना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ ६)(४)॥ छ्ूू ॥ १८४ ॥
११६-१ आश्वम्।   अश्वो गायत्रीन्द्रः ॥
य꣤स्ते꣯नू꣯नाऽ५ꣳशतक्र꣤ताउ ॥ इ꣡न्द्रद्युम्नितमो꣯माऽ२दाः꣡ ॥ ते꣢꣯न꣡नू꣯नाऽ२३म्मा꣢ ॥ दा꣡इमा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥
देऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ ५। मा॰ ५)(५)॥ मु ॥ १८५ ॥
११७-१ ऐटते द्वे।   द्वयोरिटन्वान् गायत्रीन्द्रः ॥
गा꣤꣯व꣥: । ए꣤गावा꣥: ॥ उ꣢पव । दाऽ᳐३ । वा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । वा꣣ऽ२३४टे꣥ ॥ म꣢ही᳐या꣣ऽ२३४ज्ञा꣥ ॥
स्य꣣रा꣢ऽ३ । स्या꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । प्सू꣣ऽ२३४दा꣥ ॥ उ꣢भा᳐का꣣ऽ२३४र्णा꣥ ॥ हि꣣रा꣢ऽ३ ।
हा꣡ऽ२᳐इरा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ण्या꣣ऽ२३४या꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १४। मा॰ ६)(६)॥ झू ॥ १८६ ॥

११७-२
ओ꣢इ᳐गा꣣ऽ२३४वा꣥: ॥ उ꣢पवऽ३दा꣡ । वाटा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । म꣢ही꣡꣯यज्ञस्य꣢रप्सु꣡दा꣢ऽ३ ॥ ओ꣢ऊ꣣ऽ२३४भा꣥ ॥
का꣡र्णा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ हि꣢रण्य꣡याऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १। प॰ ७। मा॰ ५)(७)॥ खु ॥ १८७ ॥
११८-१ श्रौतकक्षे द्वे।   द्वयोः श्रुतकक्षो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣣रा꣢ऽ३४म् । अश्वा꣯य । गा꣥꣯याऽ६ता꣥ ॥ श्रू꣡तक꣢ । क्षा꣯रा꣡ङ्गावा꣢इ᳐ । आ꣣ऽ२३४रा꣥म् । हा꣢ऽ᳐३हा꣢इ ॥
इ꣡ । द्रास्याऽ२३धा꣢ ॥ हिं ꣡माये꣢ऽ३ । म्नो꣢ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४ती꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ ५)(८)॥ बु ॥ १८८ ॥

११८-२
अ꣤र꣥म꣤श्वा꣥꣯यगा꣯यता꣯ । रमश्वो꣤वा꣥ ॥ या꣡गा꣯य꣢त । श्रु꣡त꣢क । क्षा꣡ऽ२३ । हा꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ ।
आ꣡राऽ२᳐ङ्गा꣣ऽ२३४वा꣥इ ॥ आ꣡रमिन्द्रा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢ ॥ स्या꣡धा꣢꣯म्ना꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ ३)(९)॥ बि ॥ १८९ ॥
११९-१ तन्वस्य साम।   तन्वः पार्थोवा, गायत्रीन्द्रः ॥
त꣢मि꣡न्द्राऽ२३म्वा꣤꣯जया꣥꣯मसी ॥ मा꣡हे꣯वृ꣢त्रा꣯ । यहा꣡न्ता꣢ऽ१वेऽ२ ॥ सवा꣡र्षा꣢ऽ१वाऽ२३ ॥ ष꣢भो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
भू꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ १)(१०)॥ त ॥ १९० ॥

११९-२ दावसुनिधनम्।   दावसुर्गायत्रीन्द्रः ॥
त꣢मि꣡न्द्राऽ२३म्वा꣤꣯जया꣯मसिहा꣥उ ॥ मा꣡हे꣯वृ꣢त्रा꣯ । यहा꣡न्ता꣢ऽ१वेऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢इ ॥
सवा꣡र्षा꣢ऽ१वाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢ ॥ षभो꣡ऽ२३ । भू꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । दा꣢꣯व꣡सू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ३)(११)॥ ञि ॥ १९१ ॥

११९-३ निवेष्ट्वः।   वसिष्ठो गायत्रीन्द्रः ॥
त꣥मिन्द्रंवा꣯जया꣯मसीऽ६ए꣥ ॥ म꣢हाऽ३हा꣢इ । वृत्रा꣯ऽ३या꣡ह꣪न्तवेऽ२ । ओऽ२ । ईऽ२ई꣭ऽ३या꣢ ।
ओ꣡मोवा꣢ ॥ सहे꣯वा꣡र्षाऽ२ । ओऽ२ । ईऽ२ई꣭ऽ३या꣢ । ओ꣡मोवा꣢ ॥ वृष । भो꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
भू꣣ऽ२३४वा꣥त् ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ४)(१२)॥ घी ॥ १९२ ॥

११९-४ इडानाꣳसंक्षारः।   इडा गायत्रीन्द्रः ॥
औ꣢꣯हो꣯इहुवाऽ३हो꣡इ । त꣢मिन्द्रंवाऽ३जा꣤ऽ३या꣢꣯म꣣सि꣥ ॥ औ꣢꣯हो꣯इहुवाऽ३हो꣡इ ।
म꣢हे꣯वृत्राऽ३या꣤ऽ३ह꣢न्त꣣वे꣥꣯ ॥ औ꣢꣯हो꣯इहुवाऽ३हो꣡इ । स꣣वा꣢र्षा꣣ऽ२३४वॄ꣥ ॥ ष꣢भो꣡꣯भु꣢वत् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३ ।
ए꣤हीडा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ११। मा॰ ८)(१३)॥ पै ॥ १९३ ॥
१२०-१ शाय्यातानि त्रीणि।   त्रयाणां शर्य्यातिर्गायत्रीन्द्रः ॥
हा꣥꣯उत्वमिन्द्रा ॥ ब꣢ला꣡दधि꣢ । हाऽ३उहा꣢उ । स꣡हसो꣢꣯जा꣯ । ता꣡ओ꣢ऽ१जसा꣢ऽ३ः । हा꣢ऽ३उहा꣢उ ॥
त्वा꣡ꣳसन्वृषा꣢ऽ३न् । हा꣢ऽ३उहा꣢उ ॥ वृषा꣡ये꣢ऽ३त् । आ꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वृ꣢धेऽ१ ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ १२)(१४)॥ पा ॥ १९४ ॥

१२०-२
त्व꣥मिन्द्रबला꣯दधीऽ६ए꣥ ॥ स꣡हसो꣢꣯जा꣯ । ता꣡ओ꣢ऽ१जसः꣢ ᳐ । इ꣣या꣢ऽ३हो꣡इ । इ꣣या꣢यो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
त्वा꣡ꣳसन्वृष꣢न् । इ꣣या꣢ऽ३हो꣡इ । इ꣣या꣢यो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ वृ꣢षा꣡ये꣢ऽ३त् । आ꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
म꣢हेऽ१ ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ८)(१५)॥ पै ॥ १९५ ॥

१२०-३
त्व꣤मि꣥न्द्रब꣤ला꣥꣯द꣤धि꣥स꣤ह꣥सा꣤: ॥ जा꣡ताऽ२: । ओ꣡꣯जसाऽ२३४ः । इहो꣥꣯इहा꣤ ॥ त्वा꣡ꣳसन्वृषा꣢ऽ३४न् ।
इहो꣥꣯इहा꣤ ॥ वृ꣢षा꣡ये꣢ऽ३त् । आ꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ८)(१६)॥ घै ॥ १९६ ॥
१२१-१ इन्द्राण्याः साम।   इन्द्राणी गायत्रीन्द्रः ॥
य꣥ज्ञइन्द्रमवर्धाऽ६या꣥त् ॥ य꣢द्भू꣡꣯मिम् । व्या । व्य꣪वाऽ२᳐र्त्ता꣣ऽ२३४या꣥त् ॥ चा꣣ऽ२३४क्रा꣥ । णा꣣ऽ२३४ओ꣥ ।
पा꣡श꣢न्दिवि꣡ ॥ च꣢क्रा꣣꣯ण꣢ओ꣡ऽ२३ ॥ पा꣡ऽ२᳐शा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ दी꣣ऽ२३४वी꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ७)(१७)॥ ने ॥ १९७ ॥
१२२-१ गौषूक्तम्।   गौषूक्तिर्गायत्रीन्द्रः ॥
य꣤दि꣥न्द्रा꣯हं ꣤यथौ꣥꣯ । हौ꣤꣯होवाहा꣥इ । तुवा꣤म् ॥ ई꣢꣯ शी꣡꣯यवस्व꣢औऽ२ । हु꣡वाइ । हुवाये꣢ । का꣡ईऽ२त् ॥
स्तो꣯ता꣡꣯मे꣯गो꣯स꣢खौऽ२ । हु꣡वाइ । हुवाये꣢ ॥ सा꣡याऽ२३त् । हो꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
अ꣢ग्नि꣡रा꣯हु꣢ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ १३। मा॰ १०)(१८)॥ जौ ॥ १९८ ॥

१२२-२ आश्वसूक्तम्।   आश्वसूक्तिर्गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣢औ꣣꣯हो꣤वाहा꣥इ । यदिन्द्रा꣯हाम् ॥ य꣢था꣡ । त्वम् । ऐ꣢꣯ही꣯यै꣣꣯ही꣢ऽ१ । आइशी꣯य꣢वस्वआ꣡इकइत् ॥
ऐ꣢꣯ही꣯यै꣣꣯ही꣢ऽ१ ॥ आऽ२इ । स्तो꣡ताऽ२मा꣡इगोऽ२ ॥ सखा꣡ऽ२३ । सा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
शु꣢क्र꣡आ꣯हु꣢ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ १२। मा॰ १४)(१९)॥ छी ॥ १९९ ॥
१२३-१ गौरीवितम्।   गौरीवितिर्गायत्रीन्द्रः ॥
प꣤न्यं ꣥पन्यमि꣤त् । सो꣥꣯ताऽ६रा꣥: ॥ प꣡न्यंपन्यमित्सो꣢ऽ१ता꣢ऽ३रा꣥: । आ꣡ । धा꣢꣯वत꣣ । म꣢दि꣣या꣤या꣥ ॥
सो꣡मंवी꣢꣯ । रा꣡ऽ२३ ॥ यशू꣢ऽ३रा꣤ऽ५᳚याऽ६५६ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ३)(२०)॥ ढि ॥ २०० ॥
१२४-१ गाराणि त्रीणि।   त्रयाणां गरो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥दंवसाउ ॥ सु꣢त꣡माऽ२३न्धा꣢: । पि꣡बा꣰꣯ऽ२सुपू꣯ । णमु꣡दाऽ२३रा꣢ऽ३४म् ॥ अ꣣ना꣢ऽ३४भ꣣या꣢ऽ३इन् ।
र꣤रोवा꣥ ॥ मा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ६)(२१)॥ छू ॥ २०१ ॥

१२४-२
इ꣥दा꣤ऽ३म्व꣢सो꣣꣯सु꣤तम꣥न्धाः ॥ पि꣢बा꣡꣯सूऽ२३पू꣢ऽ३ । ण꣡मूऽ२᳐दा꣣ऽ२३४रा꣥म् ॥ आ꣡ऽ२३ना꣢ ॥ भाऽ२या꣡इन् ।
र꣪राऽ२३ । हा꣢उवाऽ३ ॥ मा꣡꣯ते꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ५)(२२)॥ डु ॥ २०२ ॥

१२४-३ गारम्।
इ꣥दंवसो꣯सुतमन्धाऽ६ए꣥ ॥ पि꣢बा꣯सुपू꣯ऽ३र्णा꣡मु꣪दरौ꣢꣯ । होऽ३वा꣢ । पि꣡बा꣯सुपू꣯र्णामु꣪दरौ꣢꣯ । होऽ३वा꣢ ॥
आ꣡नाभा꣢ऽ३यी꣢न् ॥ र꣡रिमा꣢꣯ता꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ ३)(२३)॥ णि ॥ २०३ ॥
॥ योविंशतिः प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥ दशतिः ॥ ३ ॥

॥ अथ द्वितीय खण्डः ॥ (ऋ-४, सा-८)

१२५-१ ऐडसौपर्णं शरुप्रवेतसं वा।   त्रयाणां सुपर्णोगायत्रीन्द्रः (सूर्यः) ॥
उ꣥द्घे꣯दभ्यो꣤वा꣥ ॥ श्रू꣡ता꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४घा꣥म् । वृ꣢षा꣡भ꣢न्ना꣡ । रि꣪याऽ२᳐पा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ आऽ२स्ता꣡ ।
राऽ२३मे꣢ ॥ षा꣡इसू꣢꣯रिया꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ४)(२४)॥ ञी ॥ २०४ ॥

१२५-२ स्वारसौपंर्णं शरुप्रवेतसं वा।
उ꣥द्घे꣯दभिश्रुता꣯माऽ६घा꣥म् ॥ वृ꣤षभ꣣न्न꣤र्या꣥꣯ । हि꣡म् । पा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ आ꣡स्ता꣢ऽ३उवा꣢ ॥ रा꣯मा꣡इ ।
षि꣢सू꣡ऽ२३४वा꣥ । रा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(२५)॥ ढू ॥ २०५ ॥

१२५-३ विलम्बसौपर्णं शरुप्रवेतसं वा।
उ꣤द्घे꣯द꣥भि꣤श्रु꣥ता꣤꣯म꣥घम् । ई꣤य꣥इ꣤याहा꣥इ ॥ वृ꣤षभ꣣न्न꣤र्या꣥꣯ । हा꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ । पा꣡ऽ२३४सा꣥म् ॥
आ꣡स्ता꣢ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥ रा꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ षि꣢सू꣯रिया꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ७)(२७)॥ गे ॥ २०६ ॥
१२६-१ शाकलम्।   शकलो गायत्री इन्द्रसूर्यौ ॥
य꣤दद्यकाऽ५च्चवृत्र꣤हान् ॥ उ꣢द꣡गा꣯अभि꣢सू꣡꣯राऽ२३या꣢ ॥ सा꣡र्वाऽ२म् ॥ ता꣡दिन्द्र꣢ता꣡ये꣢ऽ᳐३ । हि꣡म् ।
वा꣢ऽ᳐३४५शोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ६। मा॰ ५)(२७)॥ चु ॥ २०७ ॥
१२७-१ आभरद्वसवे द्वे।   द्वयोराभरद्वसुर्गायत्रीन्द्रः ॥
य꣤आहा꣥उ ॥ आ꣡नायाऽ२त् । आ꣡नायाऽ२३त् । पा꣡राऽ२᳐वा꣣ऽ२३४ता꣥: । सु꣡नी꣯तीतूऽ२ । सु꣡नी꣯तीतूऽ२३ ।
र्वा꣡शं ꣢या꣣ऽ२३४दू꣥म् । इ꣡न्द्रस्सानाऽ२: । इ꣡न्द्रस्सानाऽ२३ः ॥ यू꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
सा꣣ऽ२३४खा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ९)(२८)॥ तो ॥ २०८ ॥

१२७-२
य꣤आ꣯न꣥य꣤त् । प꣥रा꣯वाऽ६ता꣥: ॥ सु꣡नी꣯ती꣯तुर्वशां ꣢ऽ१या꣢ऽ३दू꣢म् ॥ इ꣡न्द्रस्सनो꣯युवा꣢ऽ१सा꣢ऽ३खा꣢ ।
इन्द्रो꣣ऽ२३४ग्ना꣥इ ॥ इ꣢न्द्रा꣡औ꣢ऽ३होऽ२३४ । ग्ना꣥इ ॥ आ꣡इन्द्रो꣢꣯अ । ग्ना꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥: ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ११)(२९)॥ ट ॥ २०९ ॥
१२८-१ तान्वे द्वे।   द्वयोस्तन्वो गायत्रीन्द्रः ॥
मा꣥꣯नइन्द्रा꣯भिया꣯दा꣤इशा꣥: ॥ सू꣡रो꣯अ꣢क्तु । षुवा꣡꣯याऽ२३मा꣢ऽ३४त् ॥ तु꣣वा꣢ऽ३४यु꣣जा꣢ ॥
वना꣡इमाऽ२३ता꣢ऽ३४३त् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ८)(३०)॥ फै ॥ २१० ॥

१२८-२
मा꣥꣯ना꣤ऽ३आ꣢ऽ३इन्द्रा꣤꣯भिया꣥꣯दिशाः ॥ सू꣢रो᳐आ꣣ऽ२३४क्तू꣥ । षू꣢आ᳐या꣣ऽ२३४मा꣥त् ॥ त्वा꣡꣯युजा꣯वनौ꣭ऽ३हो꣢ ॥
मतौऽ२ । हु꣡वाइ । औ꣭ऽ३होऽ२३४५वाऽ६५६ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । य꣡यूऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ८)(२३)॥ भै ॥ २११ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने तृतीयः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — चतुर्थप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ द्वितीय खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-६, सा-१४)

१२९-१ रोहितकूलीये द्वे।   द्वयोरिन्द्रो, विश्वामित्रो वा गायत्रीन्द्रः ॥
ए꣤꣯न्द्र꣥सा꣤ ॥ न꣢सि꣡ꣳरयिम् । सजित्वा꣯नꣳस꣢दा꣡꣯साऽ२३हा꣢म् ॥ वा꣡ऽ२३र्षी꣢ ॥ ष्ठा꣡मू꣯त꣢याऽ३१उवाये꣢ऽ३ ॥
भाऽ२३४रा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ३)(१)॥ ति ॥ २१२ ॥

१२९-२
ए꣤꣯न्द्र꣥सा꣯नसा꣤इम् ॥ र꣢याऽ२इम् । सजि꣡त्वा꣯नꣳस꣢दा꣡꣯साऽ२३हा꣢म् ॥ वा꣡र्षीऽ२ष्ठा꣡मूऽ२३ ॥
त꣢यो꣡ऽ२३४वा꣥ । भा꣤ऽ५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ६)(२)॥ तू ॥ २१३ ॥
१३०-१ इन्द्राण्याः सामनी द्वे।   द्वयोरिन्द्राणी गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣡न्द्राम् । इ꣪न्द्रंवायाऽ२म् ॥ म꣡हा । म꣪हा꣯धानाऽ२इ ॥ इ꣡न्द्राम् । इ꣪न्द्रमर्भाऽ२इ ॥ ह꣡वा ।
ह꣪वा꣯माहाऽ२इ ॥ यु꣡जाम् । यु꣪जंवृत्राऽ२इ ॥ षु꣡वा । षु꣪वश्रिणाऽ२३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ २। प॰ १४। मा॰ १०)(३)॥ झौ ॥ २१४ ॥

१३०-२
इ꣥न्द्रंवयाम् ॥ म꣡हा । म꣪हा꣯धानाऽ२३इ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡ह꣢ । इहि꣡वाला꣢ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
इन्द्रमर्भाइ ॥ ह꣡वा । ह꣪वा꣯माहाऽ२३इ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡ह꣢ । इहि꣡वाला꣢ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
युजंवृत्राइ ॥ षु꣡वा । षु꣪वश्रिणाऽ२३म् । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡ह꣢ । इहि꣡वाला꣢ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ २। प॰ २२। मा॰ ९)(४)॥ छो ॥ २१५ ॥
१३१-१ सहस्रबाहवीयम्।   इन्द्रो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥पिबत्का꣯द्रूऽ६व꣥स्सुताम् ॥ इ꣡न्द्राहोऽ२इ । स꣡हाहोऽ२ । स्रा꣡बा꣢ऽ१हुवेऽ२ ॥ तत्रा꣡꣯दाऽ२३दी꣢ ॥
ष्टपौऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाऽ२इ । ई꣭ऽ३या꣢ । सिया꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १३। मा॰ ५)(५)॥ जु ॥ २१६ ॥
१३२-१ धृषतो मारुतस्य साम।   मारुतो गायत्रीन्द्रः ॥
व꣢य꣡माऽ२३४इन्द्रा꣥ ॥ त्वा꣡ऽ२३ । या꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । अ꣢भि꣡प्रनो꣰꣯ऽ२नुमो꣯वृषन् ॥
विद्धा᳐इतु꣣वा꣢ऽ३ ॥ स्या꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣣ऽ२३४सो꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ५)(६)॥ खु ॥ २१७ ॥

१३२-२ अदारसृत् (द्वे)।   भरद्वाजो गायत्रीन्द्रः ॥
हा꣥꣯उवयमिन्द्रा ॥ त्वाऽ२या꣡वाऽ२: । अ꣡भिप्रनो꣯नुमोऽ२वा꣡र्षाऽ२न् ॥ विद्धाऽ२इतू꣡वाऽ२ ॥
स्यनो꣡ऽ२३ । वा꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢स्म꣡भ्यं ꣢गा꣯तुवि꣡त्त꣢मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ६)(७)॥ फू ॥ २१८ ॥

१३२-३ धृषतो मारुतस्य साम।   धृषन्मरुत् गायत्रीन्द्रः ॥
व꣥यमिन्द्रा ॥ त्वा꣡या꣢ऽ᳐३वा꣢: । अ꣡भिप्रनो꣯नुमो꣢ऽ१वा꣢ऽ᳐३र्षा꣢न् ॥ विद्धी᳐तू꣣ऽ२३४वा꣥ । ओ꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥
स्य꣤नोवा꣥ । वा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ७। मा॰ ४)(८)॥ खी ॥ २१९ ॥

१३२-४ अदारसृती द्वे।   द्वयोर्भरद्वाजो गायत्रीन्द्रः ॥
व꣥या꣯मौ꣤꣯हो꣥ । इ꣤न्द्रा꣥ ॥ त्वा꣡या꣢ऽ᳐३वा꣢: । अ꣡भिप्रनो꣯नुमो꣢ऽ१वा꣢ऽ᳐३र्षा꣢न् ॥ विद्धी꣯त्वो꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥
स्या꣡नो꣢ऽ᳐३हा꣢इ । वसा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ५)(९)॥ नु ॥ २२० ॥

१३२-५
व꣣या꣢मौ꣣꣯हो꣤वाहा꣥इ । इ꣤न्द्रा꣥ । त्वा꣢औ꣣꣯हो꣤वाहा꣥इ । या꣤वा꣥: ॥ आ꣡ऽ२३भी꣢ । प्रा꣡ऽ२३नो꣢ ।
ओ꣡इनुमो꣯वाऽ२३र्षा꣢न् ॥ वा꣡ऽ२३इद्धी꣢ । तू꣡ऽ२३वा꣢ऽ३ ॥ स्या꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣣ऽ२३४सो꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ८)(१०)॥ पै ॥ २२१ ॥
१३३-१ ऐध्मवाहानि-हाराणि वा त्रीणि।   त्रयाणामिध्मवाहो गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣥꣯घा꣯ये꣯अग्निमिन्धा꣤ता꣥इ ॥ स्तृ꣢ण꣡न्तिबर्हिरा꣯नुषक् ॥ ये꣢꣯ षा꣡꣯मिन्द्रो꣯युवा꣯इहा ॥ ऊवाइ । ऊवोऽ२३४ ।
वा꣥ । सा꣤ऽ५खोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ ६)(११)॥ ठू ॥ २२२ ॥

१३३-२ इहवदैध्मवाहम्।
आ꣥꣯घा꣯यइ꣤हा ॥ ग्नि꣢मा꣡इ । धाता꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ई꣣ऽ२३४हा꣥ । स्तृ꣢णन्तिबर्हिऽ३रा꣡ । नूषा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ ये꣢꣯षा꣡म् । आइन्द्रा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ई꣣ऽ२३४हा꣥ । यु꣡वा । यु꣪वाऽ२᳐सा꣣ऽ२३४५खाऽ६५६ ॥
ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ १३। मा॰ ७)(१२)॥ डे ॥ २२३ ॥

१३३-३
औ꣥꣯हो꣯आ꣯घा꣯याऽ६ए꣥ ॥ ग्नि꣢मा꣡इन्धाता꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । स्तृ꣢णन्तिबर्हिऽ३रा꣡नूषा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥
ये꣢꣯षा꣡माइन्द्रा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ यु꣣वा꣢ऽ३ । सा꣡ऽ२३४खा । उ꣥हुवाऽ६हा꣥उ ॥ वा ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ५)(१३)॥ टु ॥ २२४ ॥
१३४-१ पैड्वस्य पैल्वस्य वा साम।   पैल्वो गायत्रीन्द्रः ॥
भि꣥ । ध्यो꣤हाइ ॥ वा꣡इश्वाअपा । द्वाइषा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ पा꣡रा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ बा꣡꣯धो꣯जहाइ ।
मार्द्धा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ व꣡सु꣢स्पा꣯र्ह꣡न्तदा꣯भ꣢रा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ८)(१४)॥ दै ॥ २२५ ॥
॥ द्वाविंशतिर्द्वितीयः, द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥ दशतिः ॥ २ ॥

॥ अथ तृतीय खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-२०)

१३५-१ ऐषम्।   इषो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣢हे꣡꣯वाऽ२३शृ꣤ण्वए꣥꣯षाम् ॥ क꣡शा꣯हस्ते꣯षुया꣢ऽ१द्वा꣢ऽ᳐३दा꣢न् । निया꣯मञ्चीऽ३त्रा꣤ऽ३मृ꣢ञ्ज꣣ता꣥इ ॥ नि꣢या꣡꣯मं ꣢चा꣡इ ।
त्र꣪माऽ२᳐र्ञ्जा꣣ऽ२३४ता꣥इ ॥ ए꣣꣯हिया꣢ऽ३४ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ ए꣢꣯हियौ꣡꣯होइ । ए꣢꣯हियौ꣡꣯होऽ२३इ । एऽ२३४ही꣥ ॥
(दी॰ १३। प॰ १०। मा॰ ८)(१५)॥ णै ॥ २२६ ॥
१३६-१ पौषम्।   पूषा गायत्रीन्द्रः॥ मरुतः ॥
इ꣤म꣣उ꣤त्वा꣯वि꣣च꣤क्ष꣥ते꣯ । ए꣢ऽ᳐३ । स꣤खाया꣥: ॥ इ꣡न्द्रसो꣯माऽ२३इना꣢: । हो꣡इहोवा꣢ ॥ पुष्टा꣡꣯वाऽ२३न्ता꣢: ।
हो꣡इहोवा꣢ऽ᳐३ ॥ य꣢थो꣡ऽ२३४वा꣥ । पा꣤ऽ५शोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ८)(१६)॥ घै ॥ २२७ ॥
१३७-१ मरुतां संवेशीयम्, सिन्धुषामवा।   मरुतो गायत्रीन्द्रः ॥
स꣡मस्यामाऽ२ । न्या꣯वे꣡꣯विशाः ॥ विश्वा꣯नामाऽ२ । ता꣯कृ꣡ष्टयाः ॥ समुद्रायेऽ२ ॥
वसिं ꣡धाऽ२३वा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ४)(१७)॥ दी ॥ २२८ ॥
१३८-१ हाविष्मते द्वे।   द्वयोर्हविष्मान् गायत्रीन्द्रः (विश्वेदेवा वा) ॥
दे꣥꣯वा꣯ । ना꣯म् । इ꣣दा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ओ꣡वा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । मा꣣ऽ२३४हा꣥त् । त꣢दा꣡꣯वृणाइ ।
माहा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । वा꣣ऽ२३४या꣥म् ॥ वृ꣢ष्णा꣡꣯मस्मा ॥ भ्यामा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ता꣣ऽ२३४ये꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ८)(१८)॥ पै ॥ २२९ ॥

१३८-२ हाविष्मतम्।
हा꣥꣯उदे꣯वा꣯ना꣯मिदवो꣯महद्धाउ ॥ त꣢दा꣡꣯वृणा꣢ऽ३इ । मा꣡हे꣢वा꣣ऽ२३४या꣥म् । ऐऽ२होऽ१आऽ२३इही꣢ ॥
वृ꣡ष्णामा꣢ऽ३स्मा꣢ ॥ भ्यमू꣡ऽ२३ । ता꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ह꣢वि꣡ष्मते꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ७)(१९)॥ डे ॥ २३० ॥

१३८-३ हाविष्कृते द्वे।   द्वयोर्हविष्कृद्गायत्रीन्द्रः (विश्वेदेवा वा) ॥
दे꣥꣯वा꣯ना꣯मिदवो꣯हा꣯उमा꣤हा꣥त् ॥ त꣢दा꣡꣯वृणाइ । महाइवाऽ२३या꣢म् ॥ वृ꣡ष्णाऽ२ꣳहोऽ१इ । आऽ२३स्मा꣢ ॥
भ्यमू꣡ऽ२३ । ता꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ह꣢विष्कृ꣡ते꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ७)(२०)॥ डे ॥ २३१ ॥

१३८-४
दे꣥꣯वा꣯ना꣯मिदवो꣯मा꣤हा꣥त् ॥ ता꣡दा꣯वृ꣢णी꣯ । महा꣡इवाऽ२३या꣢म् ॥ वृ꣡ष्णा꣯माऽ२३स्मा꣢ऽ३ ॥ भ्य꣢मू꣡ऽ२३४वा꣥ ।
ता꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ६। मा॰ ४)(२१)॥ ची ॥ २३२ ॥
१३९-१ काक्षीवतम्।   कक्षीवान् गायत्रीन्द्रः ब्रह्मणस्पतिर्वा ॥
सो꣥꣯मा꣢ऽ३नाꣳ꣤꣯स्वरणा꣥म् ॥ कृ꣢णू꣡हि꣢ब्र꣡ । ह्म꣢णस्प꣡ताये꣢ऽ३ । ओ꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ ॥ क꣡क्षाइवाऽ२३न्ता꣢म् ॥
यऔ꣣꣯हो꣢इ᳐ । औ꣣꣯हो꣡ऽ२३४वा꣥ । शा꣤ऽ५इजोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ८)(२२)॥ भै ॥ २३३ ॥
१४०-१ औषसम्।   उषो गायत्रीन्द्रः ॥
बो꣥꣯धन्मनाः ॥ इ꣡दाऽ२स्तू꣡नाऽ२: । वृत्र꣡हा꣢꣯भू꣡ । रि꣪याऽ२᳐सू꣣ऽ२३४ती꣥: ॥ शृ꣣णा꣢ऽ३४औहो꣥ ॥
तु꣣शक्र꣢आ꣡ । शि । षाम् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ११। मा॰ ७)(२३)॥ चे ॥ २३४ ॥
१४१-१ दक्षणिधनमौक्षम्।   भरद्वाजो गायत्रीन्द्रः सविता वा ॥
अ꣥द्य꣤नो꣥꣯दे꣯वसवितः । औ꣤꣯ हो꣥꣯वा꣤ ॥ इ꣢ह꣡श्रुधाइ । प्रजा꣯वाऽ२३त्सा꣢ । वी꣯स्सौ꣡꣯भगाम् ॥
परा꣯दूऽ२३ष्वा꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢ ॥ प्निय꣡ꣳसूऽ२३४५वाऽ६५६ ॥ द꣡क्षा꣢ऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ३)(२४)॥ ढि ॥ २३५ ॥

१४१-२ मौक्षम्।   भरद्वाजो गायत्रीन्द्रः सविता वा ॥
अ꣣द्या꣢ऽ३४ । नो꣯दे꣯व꣥सा꣯ । वि꣤ता꣥: ॥ प्र꣢जा꣯व꣡त्सा । वी꣢꣯ स्सौ꣡꣯भगाम् ॥ पारा꣢ऽ३दू꣤ष्वा꣥ ॥ प्नि꣢यꣳसु꣡वोवा꣢ऽ३ ।
ओ꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢स्म꣡भ्यं ꣢गा꣯तुवि꣡त्त꣢मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ ३)(२५)॥ ति ॥ २३६ ॥
१४२-१ भारद्वाजानि आर्षभाणी त्रीणि।   त्रयाणां भरद्वाजो गायत्रीन्द्रः ॥
कू꣡ऽ२३४वस्यवाऽ५र्षभो꣯यु꣤वा ॥ तु꣢विग्री꣡वोऽ२ । अना꣡꣯नताः ॥ ब्रह्मा꣯काऽ२३स्ता꣢म् ॥
ऐऽ२होऽ१आऽ२३इही꣢ । सप꣡र्याऽ२३ता꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ६)(२६)॥ डू ॥ २३७ ॥

१४२-२
कु꣤वा꣥कु꣤वा꣥ ॥ स्य꣢वृषऽ३भो꣡यु꣪वा꣭ऽ३ । ओ꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ । तुविग्री꣯वो꣯अऽ३ना꣡न꣪ता꣭ऽ३ः । ओ꣢ऽ३४ ।
हा꣣꣯हो꣢इ ॥ ब्र꣡ह्माऽ᳐२३ ॥ का꣡ऽ२᳐स्ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣢पर्यती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ५)(२७)॥ ङु ॥ २३८ ॥

१४२-३
ऐ꣥꣯ही꣯यै꣯ही꣯ । क्वस्यवृषभो꣯यु꣤वा ॥ ऐ꣥꣯ही꣯यै꣯ही꣯ । तुविग्री꣯वो꣯अना꣯न꣤ताः ॥ ऐ꣥꣯ही꣯यै꣯ही꣯ । ब्रह्मा꣯कस्तꣳसपर्य꣤ती ॥
ऐ꣥꣯ही꣯यै꣯ही꣯ । आ꣡ऽ२᳐इ ॥ हि꣣या꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ आ꣣ऽ२३४इही꣥ ॥
(दी॰ २३। प॰ १०। मा॰ ५)(२८)॥ णु ॥ २३९ ॥
१४३-१ शाक्त्यसामनी द्वे।   द्वयोः शाक्त्यो गायत्रीन्द्रः ॥
उ꣡पह्व꣢रा꣡इ । गिराऽ२इणा꣡म् ॥ संगामे꣢꣯चा꣡ । नदाऽ२इना꣡म् ॥ धियावि꣢प्रो꣡ । अजाय꣢ता꣡ ॥
अयाम् । अ꣢याऽ३१उ । वाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १। प॰ १०। मा॰ ७)(२९)॥ ङ्यो ॥ २४० ॥

१४३-२
इ꣣दा꣢मी꣣ऽ२३४दा꣥म् । इ꣢दा꣡मि꣢द꣣क꣢ ᳐म् । इ꣣दा꣢मी꣣ऽ२३४दा꣥म् । उ꣢पह्वरे꣯गिऽ३रा꣡इणा꣢म् ॥
इ꣣दा꣢मी꣣ऽ२३४दा꣥म् । इ꣢दा꣡मि꣢द꣣क꣢म् । इ꣣दा꣢मी꣣ऽ२३४दा꣥म् । सं ꣢गमे꣯चनऽ३दा꣡इना꣢म् ॥
इ꣣दा꣢मी꣣ऽ२३४दा꣥म् । इ꣢दा꣡मि꣢द꣣क꣢म् । इ꣣दा꣢मी꣣ऽ२३४दा꣥म् । धि꣢या꣯विप्रो꣯अऽ३जा꣡याता꣢ ॥
इ꣣दा꣢मी꣣ऽ२३४दा꣥म् । इ꣢दा꣡मि꣢द꣣क꣢म् । इ꣣दा꣢ऽ३मा꣤ऽ५इदाऽ६५६म् ॥ गो꣡꣯ष्प꣢दे꣡꣯पृट् ॥
(दी॰ ६। प॰ १६। मा॰ १९)(३०)॥ को ॥ २४१ ॥
१४४-१ वार्षन्धरे द्वे।   द्वयोर्वृषन्धरो गायत्रीन्द्रः ॥
प्र꣥सम्रा꣯जाम् ॥ चा꣡र्षाऽ२णा꣡इनाऽ२म् । आ꣡इन्द्राऽ२ꣳस्तो꣡ताऽ२३ । न꣡व्याऽ२᳐ङ्गा꣣ऽ२३४इर्भी꣥: ॥
ना꣡राऽ२न्ना꣡र्षाऽ२३ ॥ ह꣤म्मोवा꣥ । हा꣤ऽ५इष्ठोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ७। मा॰ ८)(३१)॥ स्वै ॥ २४२ ॥

१४४-२
प्र꣤स꣥म्रा꣯जो꣤हाइ ॥ चा꣡र्षाणी꣢ऽ३ना꣢म् । आ꣡इन्द्राꣳस्तो꣢ऽ३ता꣢ऽ३ । न꣡व्याऽ२᳐ङ्गा꣣ऽ२३४इर्भी꣥: ॥
नार꣣मो꣢इ᳐ । नृ꣣ । षा꣥꣯ह꣣मो꣢ऽ३इ ॥ म꣥ꣳहाऽ५इष्ठाम् । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ १०)(३२)॥ ञौ ॥ २४३ ॥

१४४-३ कुत्सस्य प्रस्तोकौ द्वौ।   द्वयोः कुत्सो गायत्रीन्द्रः ॥
प्र꣣सं ꣤म्रा꣣꣯ज꣤ञ्च꣥ । ष꣣णा꣢ऽ᳐३२३४इना꣥म् ॥ इ꣢न्द्रा꣡ꣳस्तो꣢ऽ३ता꣢ऽ३ । न꣡व्याऽ२᳐ङ्गा꣣ऽ२३४इर्भी꣥: ॥
न꣤र꣥न्नृषा꣤꣯हं ꣥मा꣤ऽ५ꣳहि । आऽ६हा꣥उवा ॥ ष्ठा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ६)(३३)॥ छू ॥ २४४ ॥

१४४-४
प्र꣤सं ꣥म्रा꣤꣯ज꣥ञ्चर्षणी꣯ना꣤꣯मिन्द्र꣥ꣳस्तो꣯ता꣯न꣤ । व्य꣥ङ्गाऽ६इर्भी꣥: ॥ इ꣡न्द्रꣳस्तो꣯ता꣯नव्यङ्गाऽ२३इर्भी꣢ऽ३४ः ॥
नरं ꣥नृषा꣤꣯ह꣥म् । मा꣤ऽ५ꣳहिष्ठा꣤म् ॥ स꣢हमै꣯है꣯ऽ३हो꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ म꣢ꣳहिऽ३ष्ठा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ १२। प॰ ८। मा॰ ८)(३४)॥ जै ॥ २४५ ॥
॥ विंशतिस्तृतीयः तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ दशतिः ॥ ३ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने चतुर्थस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — चतुर्थप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ तुरीय खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-१५)

१४५-१ औपगवे द्वे।   द्वयोरुपगुर्गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥पा꣯दुशी ॥ प्रि꣢य꣡न्धसाः । सुदक्षाऽ२३स्या꣢ । प्रहो꣯षि꣡णः ॥ इन्दो꣯राऽ२३इन्द्रा꣥: ॥ यवा꣡꣯शाऽ२३इरा꣥: ।
ऐ꣯ । हि꣡याऽ२᳐इ । हि꣣या꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । उ꣡पा꣢ऽ३१२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ८)(१)॥ चै ॥ २४६ ॥

१४५-२ औपगवोत्तरं सौश्रवसम् वा।
अ꣥पा꣯दू꣢ऽ३शि꣤प्रिय꣥न्धसाः ॥ सु꣢द꣡क्षस्यप्रहो꣯षिणाः । इ꣢न्दौऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाऽ२३इ । आ꣢ऽ᳐३४इन्द्रो꣥ ॥
यवा꣯शा꣤इरा꣥: ॥ ऐ꣢꣯ । हाऽ२ए꣡ऽ२३ । हिया꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । उ꣡पा꣢ऽ३१२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ८)(२)॥ खै ॥ २४७ ॥
१४६-१ त्वार्ष्टीसाम।   त्वष्टा गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥मा꣯उत्वा ॥ पु꣡रूऽ२वा꣡साऽ२उ । अ꣡भिप्रनो꣯नवूऽ२र्गा꣡इराऽ२᳐: ॥ औ꣣꣯हो꣢ऽ१इ । गा꣢꣯वो꣯वा꣡त्साऽ२३म् ॥
ना꣡ऽ२३धे꣤ऽ३ । ना꣢ऽ३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ७)(३)॥ फे ॥ २४८ ॥
१४७-१ त्वष्टुरातिथ्ये द्वे।   त्वष्टा गायत्रीन्द्रः (त्वष्टृचन्द्रमसौ वा) ॥
आ꣤त्रा꣥ ॥ हा꣢꣯ गो꣡꣯रमन्वताउवाऽ२३ । हो꣡वाऽ२३हो꣡इ ॥ ना꣯मत्वष्टुरपी꣯चियाउवाऽ२३ ।
हो꣡वाऽ२३हो꣡इ ॥ इ꣢त्था꣡꣯चन्द्रमसो꣯गृहाउवाऽ२३ । हो꣡वाऽ२३हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ६)(४)॥ द्वू ॥ २४९ ॥

१४७-२
हा꣤वात्रा꣥ ॥ हा꣢꣯ गो꣡꣯रमन्वताउवाऽ२३ । हो꣡इयाऽ२३ । हाऽ२ऊ꣡वाइ ॥
ना꣯मत्वष्टुरपी꣯चियामियाउवाऽ२३हो꣡वाऽ२३हाऽ२ई꣡या ॥ इ꣢त्था꣡꣯चन्द्रमसो꣯गृहाउवाऽ२३ ।
हो꣡इयाऽ२३ । हाऽ२ऊ꣡वाऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ १०)(५)॥ ण्वौ ॥ २५० ॥
१४८-१ पौषे द्वे।   द्वयोः पूषा गायत्रीन्द्रः, पूषणौ ॥
य꣥दिन्द्रो꣯या ॥ ना꣡याऽ२३त् । ओ꣡मो꣢ऽ३म् । ओ꣤वा꣥ । रि꣡तो꣯मही꣯रापाऽ२३ः । ओ꣡मो꣢ऽ३म् ।
ओ꣤वा꣥ ॥ वृ꣡षावृ꣪षाऽ२᳐ ॥ त꣣मा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ त꣡त्र꣢पू꣯षा꣡꣯भु꣢वत्स꣡चा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ५)(६)॥ ञु ॥ २५१ ॥

१४८-२
य꣥दिन्द्रो꣯अनयद्रिताऽ६ए꣥ ॥ म꣡ही꣯रापाऽ२: । म꣡ही꣯रापाऽ२३ः ॥ वा꣡र्ष꣢न्ता꣣ऽ२३४मा꣥: ॥ त꣡त्रापूषा꣢ऽ३ ।
पू꣡ऽ२᳐षा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भु꣢वत्स꣡चा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ६)(७)॥ फू ॥ २५२ ॥
१४९-१ श्यावाश्वे द्वे।   द्वयोः श्यावाश्वो विराड्गायत्रीन्द्रः (मरुतो वा) ॥
गौ꣥꣯र्धयाऽ६ए꣥ ॥ ति꣢मरुताऽ३म् । श्र꣡वास्यु꣪र्मा꣭ऽ३ । ता꣢मघो꣣ऽ२३४ना꣥म् ॥ यु꣡क्ताव꣪ह्नाइः ॥ र꣣था꣢ऽ३ ।
ना꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ६)(८)॥ ड्वू ॥ २५३ ॥

१४९-२
गौ꣥꣯र्धयतिमरुताऽ६मे꣥ ॥ श्र꣢वस्यु꣡र्मा꣰꣯ऽ२ता꣡꣯मघो꣯ना꣰꣯ऽ२म् । उहु꣡वाऽ२३हा꣢इ ॥ युक्ता꣡꣯वाऽ२३ह्नी꣢: ॥
उहु꣡वाऽ२३हा꣢इ᳐ । र꣣था꣢꣯ना꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ६)(९)॥ झू ॥ २५४ ॥
१५०-१ सुतंरयिष्ठीये द्वे।   द्वयोः प्रजापतिर्निचृत् गायत्रीन्द्रः ॥
उ꣢प꣡नोऽ२३ह꣤रिभि꣥स्सुतो꣤वा꣥ ॥ या꣢꣯हि꣡मदा꣢ऽ३ना꣯म्प꣢ । ता꣡ऽ२३इ ॥ उ꣢प꣣नो꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥
रा꣣ऽ२३४इभी꣥: । सु꣢ता꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ६)(१०)॥ ञू ॥ २५५ ॥

१५०-२
उ꣥पनो꣯हा꣯हो꣤हा꣥ । रा꣤इभी꣥: ॥ सू꣡ऽ२३ता꣢म् । या꣡हिम꣢दा꣯ । नां ꣡꣯पाऽ२३ता꣢इ ॥ उ꣣पा꣢ ᳐नो꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
रा꣡ऽ२᳐इभा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सु꣢त꣡ꣳरयि꣢ष्ठा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ७)(११)॥ गे ॥ २५६ ॥
१५१-१ इष्टाहोत्रीयं अप्सरसं वा अपांनिधिर्वा।   इष्टाहोत्रा अप्सरसो वा गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥ष्टा꣯हो꣤त्रा꣥: ॥ आ꣡सृ꣢क्षा꣣ऽ२३४ता꣥ । इ꣢न्द्रं ꣡वृधा । तो꣪ऽ२᳐ध्वा꣣ऽ२३४रा꣥इ ॥ आ꣡च्छा꣢ऽ३᳐वो꣤भॄ꣥ ॥
थ꣣मो꣢ऽ३जा꣤ऽ५साऽ६५६ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । उ꣢दधि꣡र्निधी꣢ऽ१ः ॥
(दी॰ १। प॰ ८। मा॰ ३)(१२)॥ गि ॥ २५७ ॥
१५२-१ प्रजापतेर्निधनकामं सिन्धुषाम वा।   प्रजापतिर्गायत्रीन्द्रः, सूर्योवा ॥
अ꣤हमिद्धाऽ५इपितु:प꣤राइ ॥ मे꣢꣯ धा꣡꣯मृतस्यजग्रहा । अ꣢ह꣡ꣳसू꣯र्याः ॥ इ꣪वाऽ२३४ । हा꣣꣯हो꣢इ ॥
ज꣡नि । होइ । होइ । औ꣢꣯ हो꣡꣯ औ꣢꣯हो꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡हाउ ॥ वा ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ८)(१३)॥ ञै ॥ २५८ ॥
१५३-१ रेवत्यः वाजदावर्योवा।   वाजदावर्योप्रजापति: गायत्रीन्द्रः ॥
रे꣥꣯वती꣯र्नाः ॥ स꣡धाऽ२᳐मा꣣ऽ२३४दा꣥इ । इ꣡न्द्राऽ२᳐इसा꣣ऽ२३४न्तू꣥ । तु꣢वि꣡वाऽ२जाः꣡ ॥ क्षूऽ२३मा꣢ ॥
तोऽ२या꣡ । भि꣢र्मो꣡ऽ२३४वा꣥ । दा꣤ऽ५इमोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ६)(१४)॥ जू ॥ २५९ ॥
१५४-१ सौमापौषं गोअश्वीयं वा।   सोमपूषणावृषी गायत्रीन्द्रः ॥
सो꣥꣯म:पू꣯षा ॥ च꣢चा꣡इततुः꣢ । अ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । वा꣡इश्वा꣯साꣳ꣢꣯सुक्षिती꣯ । ना꣡म् । अ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
दा꣡इव꣪त्राराऽ२३ ॥ थियो꣢ऽ३र्हा꣤ऽ५इताऽ६५६ ॥ गा꣡꣯ वो꣰꣯ऽ२अ꣡श्वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ८)(१५)॥ झै ॥ २६० ॥
॥ पञ्चदश चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ दशतिः ॥ ४ ॥

॥ अथ पञ्चम खण्डः ॥ (ऋ-६, सा-२१)

१५५-१ वैतहव्यानि त्रीणि, अश्यर्देड वैतहव्यम्।   त्रयाणां वीतहव्योऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
पा꣤꣯न्त꣥मा꣤꣯ वो꣥꣯अ꣤न्ध꣥सा꣤: ॥ इ꣢न्द्रा꣡माभि꣢ । प्रगा꣡याता꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢इ । विश्वा꣡साह꣢म् । शता꣡क्रातू꣢ऽ३म् ।
हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ मꣳहा꣡इष्ठञ्चा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢ ॥ षणा꣡ऽ२᳐इ । ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ९)(१६)॥ प्लो ॥ २६१ ॥

१५५-२ इहवद्वामदेव्यम्।
पा꣤꣯न्त꣥मा꣤꣯ वो꣥꣯अ꣤न्ध꣥सः । इ꣤हा ॥ इ꣢न्द्रम꣡भाइ । प्र꣢गा꣯य꣡ताऽ२ । इ꣡हा꣢ । वि꣡श्वा꣯सा꣯हꣳशताऽ२क्रतू꣡म् ।
इहा꣢ ॥ मꣳहाऽ२इष्ठञ्चा꣡ । इहा꣢ । षणाऽ२इना꣡म् ॥ इहा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ७)(१७)॥ के ॥ २६२ ॥

१५५-३ ओकोनिधनं वैतहव्यम्।
पा꣣ऽ५न्तम् । आ꣤ऽ३वो꣢ऽ३अ꣤न्धसा꣥: ॥ आ꣡इन्द्रामभाइ । प्र꣪गाऽ२᳐या꣣ऽ२३४ता꣥ ।
वि꣡श्वाऽ२᳐सा꣣ऽ२३४हा꣥म् ॥ शा꣢ऽ३ता꣡क्रा꣢ऽ३तू꣢म् ॥ म꣡ꣳहि꣢ष्ठञ्च꣡र्ष꣢ । णा꣡ये꣢ऽ३ । ना꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ओ꣢ऽ३काऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ९)(१८)॥ ञो ॥ २६३ ॥
१५६-१ शाक्त्यानि षट्, शाक्त्ये सामनी द्वे।   षण्णां शाक्त्यो गायत्रीन्द्रः ॥
प्र꣡वइन्द्राऽ२᳐ । य꣣मा꣢ ᳐दा꣣ऽ२३४ना꣥म् ॥ प्र꣢वाऽ२इ꣡न्द्रा । औ꣢ऽ३हो꣢ । या꣣ऽ२३४मा꣥ । दा꣢ऽ३ना꣢म् ॥
हराऽ२अ꣡श्वा । औ꣢ऽ३हो꣢ । या꣣ऽ२३४गा꣥ ॥ या꣢ऽ३ता꣢ ॥ सखाऽ२या꣡स्सो । औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३ ।
मा꣡पोऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५श्नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ १४। मा॰ ६)(१९)॥ लू ॥ २६४ ॥

१५६-२
प्र꣡वाऽ२इ꣡न्द्रा । औ꣢ऽ३हो꣢ । या꣣ऽ२३४मा꣥ । दा꣢ऽ३ना꣢म् ॥ ह꣡राऽ२अ꣡श्वा । औ꣢ऽ३हो꣢ । या꣣ऽ२३४गा꣥ ।
या꣢ऽ३ता꣢ ॥ स꣡खाऽ२या꣡स्सो । औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३ ॥ मा꣡पोऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५श्नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ १२। मा॰ ४)(२०)॥ यी ॥ २६५ ॥

१५६-३ गौरीविते द्वे।
प्र꣢वई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ । इ꣡न्द्रो꣯ई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ । या꣣ऽ२३४मा꣥ । दा꣢ऽ३ना꣢म् ॥ हरई꣭ऽ३या꣢ ।
ई꣭ऽ३या꣢ । आ꣡श्वो꣯ई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ । या꣣ऽ२३४गा꣥ । या꣢ऽ३ता꣢ ॥ सखई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ ।
या꣡स्सो꣯ई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ऽ३ ॥ मा꣡पोऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५श्नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ १८। मा॰ ८)(२१)॥ डै ॥ २६६ ॥

१५६-४
प्र꣢वौ꣯हो꣡वाऽ२ । इ꣡न्द्रौ꣯होवा꣢ । या꣣ऽ२३४मा꣥ । दा꣢ऽ३ना꣢म् ॥ हरौ꣯हो꣡वाऽ२ । आ꣡श्वौ꣯होवा꣢ ।
या꣣ऽ२३४गा꣥ । या꣢ऽ३ता꣢ ॥ सखौ꣯हो꣡वाऽ२ । या꣡स्सौ꣯होवा꣢ऽ३ ॥ मा꣡पोऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५श्नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ २)(२२)॥ खा ॥ २६७ ॥

१५६-५ शाक्त्यं साम।
प्र꣢वो꣯दऽ३दा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡न्द्रो꣯ददा । औ꣢ऽ३हो꣢ । या꣣ऽ२३४मा꣥ । दा꣢ऽ३ना꣢म् ॥ हरिदऽ३दा꣡ ।
औ꣢ऽ३हो꣢ । आ꣡श्वो꣯ददा । औ꣢ऽ३हो꣢ । या꣣ऽ२३४गा꣥ । या꣢ऽ३ता꣢ ॥ सखिदऽ३दा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣢ ।
या꣡स्सो꣯ददा । औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३ ॥ मा꣡पोऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५श्नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १८। मा॰ २)(२३)॥ दा ॥ २६८ ॥

१५६-६ गौरीवितम्।
प्र꣤व꣥: । प्रवा꣤: ॥ इ꣢न्द्रा꣯ये꣯न्द्रा꣯ । य꣡मादा꣢ऽ१नाऽ२म् । हराइहर्यश्वा꣯ । य꣡गाया꣢ऽ१ताऽ२ ॥
स꣡खा꣯याऽ२३स्सो꣢ऽ३ ॥ मा꣡पोऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५श्नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ५)(२४)॥ भु ॥ २६९ ॥
१५७-१ काण्वे द्वे।   द्वयोः कण्वो गायत्रीन्द्रः ॥
व꣥यंवा꣤या꣥म् ॥ ऊ꣣ऽ२३४त्वा꣥ । ता꣢दी᳐दा꣣ऽ२३४र्था꣥: । इ꣣न्द्र꣤त्वा꣥꣯य꣤न्त꣥: । स꣣खाऽ२३४या꣥: ॥
क꣣ण्वा꣢ऽ३१२३४ः ॥ उक्थे꣯भि꣥र्जरन्ते꣯ । ए꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ६)(२५)॥ नू ॥ १७० ॥

१५७-२ काण्वम्।
व꣥यमू꣢ऽ३त्वा꣤꣯तदिदर्था꣥: ॥ ऐ꣡꣯हिहाऽ२इ । वय꣡मुत्वा꣯तदिदर्था꣯इन्द्रत्वा꣯-यन्तस्स꣢खा꣡ऽ२३या꣢: ॥
का꣣ऽ२३४ण्वा꣥: ॥ ऊ꣡ । क्थाइ । भि꣢र्जो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ र꣢न्ताऽ३याऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ६)(२६)॥ बू ॥ २७१ ॥
१५८-१ गौरीविते द्वे।   द्वयोर्गौरीवितो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣤न्द्रा꣥꣯यम꣤द्व꣥ना꣤इ ॥ सु꣢ता꣡म् । इन्द्रा꣯यमद्वने꣯सु꣢ता꣡म् । प꣢रा꣡इष्टोऽ२३भा꣢ । तुनो꣡꣯गिरो ॥ अर्कमाऽ२३र्चा꣢ ॥
तुका꣡꣯राऽ२३वा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ६)(२७)॥ भू ॥ २७२ ॥

१५८-२
इ꣥न्द्रा꣯यमद्वने꣯हाउ ॥ ओ꣡इसू꣢ऽ३ता꣢म् । प꣡रिष्टो꣢꣯ । भा꣡ । तु꣪नोऽ२३हा꣢इ । गा꣡इराऽ२: । प꣡रिष्टो꣯भा ।
तु꣪नोऽ२३हा꣢इ ॥ गा꣡इराऽ२: ॥ अ꣡र्काऽ२३म् ॥ आ꣡ऽ२᳐र्चा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ ।
तु꣢काऽ३र꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ १२)(२८)॥ गा ॥ २७३ ॥

१५८-३ श्रौतकक्षम्।   श्रुतकक्षो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣤न्द्रा꣥꣯यम꣤द्व꣥ने꣯सुत꣤म् । इ꣥न्द्रा꣯यमो꣤वा꣥ ॥ द्वा꣢ऽ३ना꣡इसू꣢ऽ३ता꣢म् । प꣡रिष्टो꣢꣯ । भा꣡ऽ२३ । हा꣢ऽ३हा꣢ऽ३ ।
तू꣡नोऽ२᳐गा꣣ऽ२३४इरा꣥: ॥ आ꣡र्कमर्चा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢ ॥ तुका꣡꣯राऽ२३वा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ७)(२९)॥ फे ॥ २७४ ॥
१५९-१ सौमित्रे द्वे।   द्वयोः सुमित्रो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥यंतआ ॥ द्र꣢सो꣡꣯मो । होवा꣢ऽ३हो꣡इ । नि꣢पू꣡꣯तो꣯आ꣢ऽ३ । धी꣡ब꣢र्हा꣣ऽ२३४इषी꣥ ॥ आ꣡इही꣢꣯मस्या꣡ऽ२३ ॥
द्रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ पी꣣ऽ२३४बा꣥ ।
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ६)(३०)॥ गू ॥ २७५ ॥

१५९-२
अ꣥यंतइन्द्रसोऽ४मा꣥: ॥ नि꣡पू꣯तो꣯अधिबाऽ२र्हा꣡इषीऽ२ । ऐ꣯होऽ२इमा꣡स्या ॥ द्र꣢वा꣯पा꣡इबाऽ२ ।
आ꣡इही꣯मस्याद्र꣢वाऽ३१उवाऽ२३ ॥ पीऽ२३४बा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ६। मा॰ ८)(३१)॥ पै ॥ २७६ ॥

१५९-३ इहवद्दैवोदासम्।   दिवोदासो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣤यं ꣣त꣤इन्द्रसो꣣ऽ४म꣥: । ना꣡ऽ२३४इ । पू꣯तो꣥꣯अ꣤धि꣥बर्हि꣤षी꣥ ॥ नि꣡पू꣯तो꣯अधि꣢ब꣡र्हाऽ२३इषी꣢ ॥
ऐ꣯हो꣡इमाऽ२३स्या꣢ ॥ द्रवा꣡꣯पाऽ२३४५इबाऽ६५६ ॥ ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ८)(३२)॥ खै ॥ २७७ ॥
१६०-१ शाक्वरवर्णम्।   शाक्वरवर्णोगायत्रीन्द्रः, प्रजापतिर्वा ॥
सू꣤रू꣥ ॥ प꣢कृ꣡त्नुमू꣯त꣢या꣡इ । सु꣢दु꣡घा꣢꣯म् । इ꣡वगोऽ२ । दु꣡ह꣢याऽ३१उवाऽ२३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥ जु꣢हू꣡꣯माऽ२३सी꣢ ॥
द्य꣡विद्यवि꣢याऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ ᳐३२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ४)(३३)॥ ढ्री ॥ २७८ ॥

१६०-२ रैवतम्।   रेवतो गायत्रीन्द्रः (रैणवम् । रेणुर्गायत्री प्रजापतिर्वा) ॥
सु꣥रू꣯हा꣯हाउ ॥ प꣢कृ꣡त्नुमूऽ२ता꣡याऽ२इ । सुदु꣡घा꣢꣯म् । इ꣡वगोऽ२ । दु꣡हे꣢꣯ । ऐ꣯ही꣯यै꣣꣯ही꣢ऽ१ ॥ जु꣢हौऽ२ ।
हौऽ२ । हु꣡वाऽ२इ । मा꣡सीऽ२ ॥ द्य꣡विद्यवि ॥ ऐ꣢꣯ही꣯यै꣣꣯ही꣢ऽ१ ॥
(दी॰ १०। प॰ १२। मा॰ ४)(३४)॥ फी ॥ २७९ ॥

१६०-३ ऐणवे वैणवे वा औदले द्वे, वींकम्।   वींको गायत्रीन्द्रः । प्रजापतिर्वा ॥
सु꣢रू꣯पकृत्नूऽ३मू꣡ताऽ२३४या꣥इ ॥ ओ꣡इसुरू꣯पकृत्नूमू꣢ऽ१तायाऽ२इ ।
ओ꣡इसुदुघा꣯मिवागो꣢ऽ१दुहाऽ२इ । जु꣡हू꣯मसाऽ२इ । द्य꣣वि꣢द्या꣣ऽ२३४वी꣥ । ऐ꣤ही꣥ ॥ जू꣡हूऽ२मा꣡सीऽ२ ॥
द्यवि꣡द्या । वीवीऽ२३ । आ꣤औ꣥꣯होइ । आ꣤औ꣥꣯होऽ६वा꣥ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । द्य꣢विऽ३ई꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ १०)(३५)॥ गौ ॥ २८० ॥

१६०-४ औदलम्।   उदलो गायत्रीन्द्रः (प्रजापतिर्वा) ॥
सु꣤रू꣥꣯पकॄ꣤ ॥ त्नू꣡मूऽ२तया꣡इ । सु꣢दु꣡घा꣯मी꣢ऽ३ । वा꣡गो꣢दू꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ सु꣤दु꣥घा꣯मा꣤ ॥ वा꣡गोऽ२दुहा꣡इ ॥
जु꣢हू꣡꣯माऽ२३सी꣢ऽ३ । द्या꣡ऽ२३वी꣤ऽ३ । द्या꣢ऽ३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ४)(३६)॥ धी ॥ २८१ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने चतुर्थः प्रपाठकः ॥ ४ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — पञ्चमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ अथ प्रथमो खण्डः ॥ (ऋ-४, सा-९)

१६१-१ आर्षभानि सैन्धुक्षितानि वा वाध्र्यश्वानि वा त्रीणि।   त्रयाणामृषभो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥भि꣤त्वा꣥꣯वृषभा꣯सुता꣤इ ॥ सू꣡तꣳसृ꣢जा꣯ । मिपा꣡इता꣢ऽ१याऽ२इ ॥ तृम्पा꣡वा꣢ऽ१याऽ२꣮ ॥
श्नुहाऽ३१उवाये꣢ऽ३ ॥ माऽ२३४दा꣥म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ ५)(१)॥ टु ॥ २८२ ॥

१६१-२
अ꣥भित्वा꣯वृषभा꣯सुते꣯अभ्या꣯हाउ ॥ त्वा꣢꣯वृऽ३षा꣡भा꣢ऽ१सूताऽ२इ । सू꣡तꣳसृ꣢जा꣯ ।
मिपा꣡इता꣢ऽ१याऽ२᳐इ ॥ तृ꣣म्पा꣢ऽ३हो꣡इ । वि꣣या꣢ऽ३हो꣡ ॥ श्नु꣢ही꣡꣯माऽ२३दा꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ८)(२)॥ झै ॥ २८३ ॥

१६१-३
अ꣥भि꣤त्वा꣥꣯वृषभा꣯सुते꣤꣯ । सु꣥तꣳसृजो꣤वा꣥ ॥ मि꣢पी꣯ता꣡याऽ२इ । सुत꣡ꣳसृजा꣢꣯मि । पी꣡꣯ताऽ२३या꣢इ ॥
त्रा꣡ऽ२३म्पा꣢ऽ३ ॥ वा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ श्नु꣢ही꣯म꣡दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ४)(३)॥ दी ॥ २८४ ॥
१६२-१ कौत्से पाञ्चवाजे वा।   दाशवाजे वा द्वे, ऐडं कौत्सम् । द्वयोः कुत्सो गायत्रीन्द्रः ॥
या꣣ही꣢न्द्रा꣡ऽ२३ । च꣤म꣥से꣤꣯षुवा꣯ईया꣥ ॥ सो꣡꣯मश्च꣢मू꣡꣯षुते꣢꣯सुतः꣡ । सोमश्च꣢मू꣯ । षुता꣡इसूऽ२३ता꣢: ॥ पा꣡इबे꣢ऽ३द्धा꣢इ ।
आ꣡स्या꣢ऽ३हा꣢इ ॥ त्वमी꣡꣯शाऽ२३इषा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ १०)(४)॥ ञौ ॥ २८५ ॥

१६२-२ स्वार कौत्सम्।
य꣥इन्द्रचा꣯माऽ६से꣥꣯षुवा ॥ सो꣡꣯मश्चमू꣯षुता꣢ऽ१इसू꣢ऽ३ता꣢: । सो꣯मश्चमूऽ३ । षू꣢ऽ३ता꣡इसू꣢ऽ३ता꣢: ॥
आ꣡ऽ२꣮इ । पिबे꣯दस्यो꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ त्व꣣मा꣢ऽ३इशा꣤ऽ५᳚इषाऽ६५६इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ १०)(५)॥ खौ ॥ २८६ ॥
१६३-१ सौमेधानि, पूर्वतिथानि वा पौर्वातिथानि वा त्रीणि।   त्रयाणां सुमेधा गायत्रीन्द्रः ॥
यो꣤꣯ गे꣥꣯यो꣯गे꣯तव꣤स्त꣥रा꣤म् ॥ वा꣡꣯जे꣯वा꣢꣯जे꣯हवा꣯महे꣯ ॥ सखा꣡꣯याऽ२३ई꣢ऽ३ ॥
द्र꣢मू꣡ऽ२३४वा꣥ । ता꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ११। प॰ ५। मा॰ ३)(६)॥ ङि ॥ २८७ ॥

१६३-२
यो꣥꣯गे꣯यो꣯गे꣯तवस्ताऽ६रा꣥म् ॥ वा꣡꣯ जे꣰꣯ऽ२वा꣡꣯ जे꣰꣯ऽ२ह꣡वा꣰꣯ऽ२महेऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ सा꣡खाऽ२या꣡ईऽ२३ ।
हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ । द्रमू꣡ऽ२३ । ता꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ३२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ११। प॰ ८। मा॰ ५)(७)॥ ग्लु ॥ २८८ ॥

१६३-३ सौमेधम्।
यो꣥꣯गे꣯यो꣯गे꣯तवा꣯हा꣯उस्ता꣤रा꣥म् ॥ वा꣡जे꣯वा꣢꣯जे꣯ । हवाऽ२मा꣡हाइ । हूवाइ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ ।
सा꣡खा꣢꣯यइ꣡ । द्रमूऽ२ता꣡याइ । हूवाइ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ ॥ स꣣खा꣯य꣢आ꣡ ॥ हूवाऽ२इ ।
औ꣭ऽ३होऽ२३४५वाऽ६५६ ॥ द्र꣢मूऽ३त꣡येऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ ९)(८)॥ गो ॥ २८९ ॥
१६४-१ दैवातिथं मैधातिथं वा।   देवतिथिर्गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣣꣯तू꣢ऽ३४ । ए꣯ता꣯नि । षी꣥꣯दाऽ६ता꣥ ॥ इ꣢न्द्रम꣡भाइ । प्र꣢गा꣯य꣡ता । साखा꣢꣯यस्तो꣡꣯म । वा । औ꣢ऽ३हो꣢ ।
व꣡वाऽ२᳐हा꣣ऽ२३४सा꣥: ॥ ह꣢या꣡इ । साखा꣢꣯यस्तो꣡꣯म । वा । औ꣢ऽ३हो꣢ ॥ हि꣡म्माऽ२३ ।
हा꣢ऽ३४५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ १५। मा॰ ४)(९)॥ नी ॥ २९० ॥
॥ त्रिंशत् पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥ दशतिः ॥ ५ ॥

॥ अथ षष्ठ खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-२२)

१६५-१ आङ्गिरसं माधुछन्दसम् वा।   मधुछन्दा वर्धमाना गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥दाऽ६मे꣥ ॥ हि꣢यऽ३नू꣡ओ꣢ऽ१जासाऽ२ । सू꣡त꣢ꣳरा꣡धा꣢ । ना꣡म्पा꣢ऽ१ताऽ२इ ।
पि꣡बा꣯तुवस्यागि꣪र्वाणाऽ२३४ः ॥ पि꣣बा꣢ऽ३४तु꣣वा꣢ऽ३ ॥ स्या꣡ऽ२᳐गा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣣ऽ२३४णा꣥: ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ५)(१०)॥ डु ॥ २९१ ॥

१६५-२ गायत्री (आङ्गिरसं) क्रौञ्चम् वा।   क्रौञ्चो वर्धमाना गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥दꣳहियाऽ४औहो꣥ ॥ नू꣭ऽ३ओ꣢जा꣣ऽ२३४सा꣥ । सू꣡त꣢ꣳरा꣡धा꣢ । ना꣭ऽ᳐३२म् । पा꣣ऽ२३४ता꣥इ ॥
पि꣡बा꣯तुवस्याऽ२३ । ग꣤ । वाहा꣥इ ॥ वा꣡ऽ२३४णाः । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १२। मा॰ ७)(११)॥ छे ॥ २९२ ॥

१६५-३ आङ्गिरसं घृतश्चुन्निधनं प्राजापत्यं माधुश्चन्दसं वा।   प्रजापतिवर्धमाना गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥दꣳह्यनूऽ६ओ꣥꣯जसा ॥ सु꣢त꣡ꣳराधा꣢ । ना꣡म्पातौ꣢꣯ । हो꣯वाऽ३हा꣢इ । पिबा꣡तुव꣢ । स्यगा꣡इर्वाणौ꣢꣯ ।
हो꣯वाऽ३हा꣢इ ॥ पिबा꣡तुवौ꣢꣯ । हो꣯वाऽ३हा꣢ ॥ स्यगा꣡ये꣢ऽ३ः । वा꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
घृ꣢तश्चु꣡ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ ७)(१२)॥ थे ॥ २९३ ॥
१६६-१ वाम्राणि प्रैयमेधानि वा त्रीणि।   त्रयाणां वाम्रो गायत्रीन्द्रः ॥
म꣤हाꣳइ꣥न्द्राः ॥ पु꣢रश्च꣡नो । मा꣢ऽ१हीऽ२त्वा꣡माऽ२ । स्तुव । श्रि꣡णाइ ॥ द्यौऽ२र्ना꣡प्राऽ२ ॥
थिना꣡꣯शाऽ२३वा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ ९। मा॰ ५)(१३)॥ घु ॥ २९४ ॥

१६६-२
म꣥हा꣯हा꣯ꣳइ꣤न्द्रा꣥: ॥ पू꣢ऽ३रा꣡श्चा꣢ऽ३नो꣢ । म꣡हाऽ२᳐इत्वा꣣ऽ२३४मा꣥ । स्तु꣢वौ꣭ऽ३हौ꣢ऽ३ । ह꣤वाऽ५श्रिणाइ ।
द्यौ꣡꣯र्नप्र । थि꣢ना꣡श꣪वाऽ२३ः ॥ द्यौ꣡ऽ२र्ना꣣ऽ२३४प्रा꣥ ॥ थि꣢नौ꣭ऽ३हौ꣢ऽ३ । ह꣤वोवा꣥ । शा꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ६)(१४)॥ टू ॥ २९५ ॥

१६६-३
म꣤हा꣯ꣳइन्द्राऽ५:पुरश्च꣤नाः ॥ मा꣣हि꣢त्वा꣭ऽ३२३२३मा꣢ ᳐ । स्तु꣣व꣢श्रा꣭ऽ३२३२३इणा꣢इ ॥
द्यौ꣯र्ना꣭ऽ३२३२३प्रा꣢ ॥ थि꣣ना꣯श꣢वा꣭ऽ३२३२३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ६)(१५)॥ ठू ॥ २९६ ॥
१६७-१ गौरीविते द्वे।   द्वयोर्गौरीवितिर्गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣥꣯तू꣯नआ ॥ द्र꣢क्षु꣡माऽ२३न्ता꣢म् । चा꣡इत्रंग्रा꣢꣯भा꣡ऽ२३ꣳहा꣢इ । सं ꣡गृऽ२भा꣡या । महा꣢꣯हस्तो꣣ऽ२३४हा꣥इ ।
द꣡क्षाऽ२इणा꣡इना । महाऽ२३ ॥ हा꣡ऽ२᳐स्ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ द꣡क्षि꣢णेऽ३ना꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ८)(१६)॥ घै ॥ २९७ ॥

१६७-२
आ꣥꣯तू꣯नइन्द्रक्षुमा꣤न्ता꣥म् । चि꣡त्राऽ꣢ꣳग्रा꣣ऽ२३४भा꣥म् । सं ꣢गृभा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ मा꣭ऽ३हा꣢ऽ३ ॥
हा꣡ऽ२᳐स्ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ द꣡क्षि꣢णे꣯ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ६। मा॰ ४)(१७)॥ पी ॥ २९८ ॥

१६७-३ आपालवैणवे, वैणवे वा आपाले वा आकूपारे पारववे वा द्वे।   द्वयोराकूपारो गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣤꣯तू꣯न꣥इ꣤ । द्र꣥क्षुमाऽ६न्ता꣥म् ॥ चि꣢त्रं ꣡ग्रा꣯भꣳसंगृभाऽ२या꣡ । चि꣢त्रं ꣡ग्रा꣯भꣳसम् । गॄ । औ꣢ऽ३हो꣢इ᳐ ।
भा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ ऐ꣢꣯हो꣡इ । महा꣯हस्ती꣯दक्षाऽ२३हो꣡इ ॥ औ꣢꣯हो꣡ । वा꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । णा꣤ऽ५इनोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ ८)(१८)॥ थै ॥ २९९ ॥

१६७-४
आ꣥꣯तू꣯नइन्द्रक्षुमाऽ६न्ता꣥म् ॥ चि꣢त्रं ꣡ग्रा꣯भꣳसंगृभा꣯या । चि꣢त्रं ꣡ग्रा꣯भꣳसम् । गॄऽ२३ । ई꣢ऽ३४हा꣥ ।
भा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ ऐ꣢꣯हो꣡इ । महा꣯हस्ती꣯दक्षाऽ२३हो꣡इ । औ꣢꣯हो꣡ । वा꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । णा꣤ऽ५इनोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १०। प॰ ११। मा॰ ७)(१९)॥ पे ॥ ३०० ॥
१६८-१ धुरोस्सामनी द्वे।   द्वयोर्धुरो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣤भी꣥अ꣤भी꣥ ॥ प्र꣢गो꣯ऽ३पा꣡तिं ꣪गिराऽ२ । इ꣡न्द्रमर्चयाथा꣢ऽ१विदाऽ२᳐इ ॥ सू꣣꣯नू꣢ऽ३ꣳहो꣡इ । सत्यो꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
स्या꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ प꣢तिऽ३मे꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ४)(२०)॥ थी ॥ ३०१ ॥

१६८-२
अ꣤भी꣥अ꣤भी꣥ ॥ प्र꣢गो꣡ । प꣢तिं ꣣गि꣢रा꣡ । इन्द्राम् । अ꣣र्चा꣢या꣣ऽ२३४था꣥ । हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म्ऽ३ ।
आ꣡ऽ२३४इविदाइ ॥ सू꣯नु꣣ꣳस꣤त्य꣣स्य꣤सा꣥ ॥ हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म्ऽ३ । ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥
पा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ११। मा॰ ९)(२१)॥ को ॥ ३०२ ॥

१६८-३ महागौरीवितं गौरीवितं वा।   शाक्त्यः गौरीवितिर्गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥भि । प्र꣣गो꣢ऽ३ । प꣤तिंगि꣥रा ॥ इ꣡न्द्रमर्चयथा꣯विदाऽ२३इ । सू꣡नुꣳसत्या꣢ऽ३१२३ ।
स्य꣤साऽ५त्पताइम् ॥ सू꣡नुꣳसत्या꣢ऽ३१२३ । स्य꣤सोवा꣥ । पा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ९। मा॰ ४)(२२)॥ घी ॥ ३०३ ॥
१६९-१ वाचस्सामनी द्वे।   द्वयोर्वाक् गायत्रीन्द्रः ॥
क꣥या꣯नश्ची ॥ त्र꣢आ꣡भू꣢ऽ३वा꣢त् । ऊ꣯ता꣡इस꣢ । दा꣡ । वार्द्ध꣢स्सा꣣ऽ२३४खा꣥ ॥ क꣡याशा꣢ऽ३ची꣢ऽ३ ॥
ष्ठा꣡ऽ२३या꣤ऽ३ । वा꣢ऽ३४५र्तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ४)(२३)॥ जी ॥ ३०४ ॥

१६९-२
हो꣥꣯वा꣯इ । हो꣯वा꣯इकया꣯नश्ची ॥ त्र꣢आ꣡भू꣢ऽ३वा꣢ऽ३४त् ॥ हो꣥꣯वा꣯इ । हो꣯वा꣯ऊ꣯ती꣯सदा ॥ वृ꣢धा꣡स्सा꣢ऽ३खा꣢ऽ३४ ।
हो꣥꣯वा꣯इ । हो꣯वा꣯इकया꣯शचाइ ॥ ष्ठ꣢या꣡꣯ । वाऽ२᳐र्ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १९। प॰ ११। मा॰ १०)(२४)॥ त्वौ ॥ ३०५ ॥

१६९-३ महावामदेव्यम् वामदेव्यम् वा।   वामदेवो गायत्रीन्द्रः ॥
का꣣ऽ५या꣯ । नश्चा꣤ऽ३इत्रा꣢ऽ३आ꣤꣯भुवा꣥त् ॥ ऊ꣡ । ती꣯स꣢दा꣡꣯वृध꣢स्स꣡ । खा । औ꣢ऽ३हो꣯हा꣢इ ।
क꣡याऽ२३शचा꣢इ᳐ ॥ ष्ठ꣣यौ꣯हो꣢ऽ३ । हि꣡म्माऽ२ । वा꣡ऽ२꣮र्तोऽ३५᳚हा꣢इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ६)(२५)॥ ङू ॥ ३०६ ॥
१७०-१ इन्द्रस्य सत्रासाहीये, अजितस्य आजिती वा द्वे।   द्वयोरिन्द्रो गायत्रीन्द्रः ॥
त्य꣥मुवाः ॥ स꣢त्रा꣯सा꣡हाऽ२म् । वि꣡श्वा꣯सुगी꣯र्षूआ꣢ऽ१याताऽ२म् । आ꣡꣯च्याऽ२३ ॥
वा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सि꣢यूऽ३त꣡येऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ५)(२६)॥ कु ॥ ३०७ ॥

१७०-२
त्या꣢ऽ३४म् । उव꣥स्सत्रा꣯सा꣤꣯ह꣥म् । ओऽ६वा꣥ ॥ वि꣡श्वा꣯सुगी꣯र्ष्वा꣯याऽ२ता꣡म् । आऽ२च्या꣡ । वाऽ२३या꣢ ॥
सि꣡यौ꣭ऽ३हो꣢꣯ । वा꣣꣯हा꣢ऽ३४३इ ॥ ता꣡ऽ२३४यो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ५)(२७)॥ झु ॥ ३०८ ॥
१७१-१ वामदेव्यम्।   वामदेवो गायत्रीन्द्रः (मेधाः) ॥
सा꣤दा꣥ ॥ स꣡स्पताइम꣪द्भूता꣢ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । प्रा꣡या꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
आ꣡इन्द्रा । स्याका꣢मा꣣ऽ२३४५याऽ६५६म् ॥ स꣢निं ꣡मे꣰꣯ऽ२धा꣡꣯मया꣢꣯सिषा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ५)(२८)॥ ठु ॥ ३०९ ॥
१७२-१ अश्विनोः साम।   अश्विनौ गायत्रीन्द्रः ॥
हा꣢इ । आप्सू᳐दा꣣ऽ२३४क्षा꣥: । (द्विः) । ये꣢꣯ते꣯पन्था꣯अऽ३धो꣡दि꣪वाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ हा꣢इ ।
आप्सू᳐दा꣣ऽ२३४क्षा꣥: । (द्विः) । ये꣢꣯भिर्व्यश्वऽ३मा꣡इर꣪याऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ हा꣢इ । उ꣣ता꣢ ᳐श्रो꣣ऽ२३४षा꣥ ॥
तु꣢नो꣡ऽ२३ । भू꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४ती꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ १२)(२९)॥ गा ॥ ३१० ॥
१७३-१ गौतमस्य भद्रम्।   गोतमो गायत्रीन्द्रः ॥
भ꣥द्रंभा꣤द्रा꣥म् ॥ न꣢आ꣡꣯भाऽ२३रा꣢ऽ३ ॥ आ꣤इषा꣥मू꣤र्जा꣥म् ॥ श꣢त꣡क्राऽ२३ता꣢ऽ३उ ॥ या꣤दि꣥न्द्रा꣤मॄ꣥ ॥
डा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सी꣣ऽ२३४ना꣥: ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ७)(३०)॥ ठे ॥ ३११ ॥
१७४-१ अश्विनोः साम, सोम साम वा।   अश्विनौ गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣣स्ति꣤सो꣣꣯ मो꣤꣯अय꣣ꣳसु꣤त꣣: । अ꣤ । स्त्येआस्ती꣥ ॥ सो꣣꣯ मो꣤꣯अय꣣ꣳसु꣤तᳲ꣣पिब꣤न्त्य꣥स्यम । रु꣣तोऽ२३४हा꣥इ ॥
उ꣤तस्वराऽ५जो꣤वा꣥ ॥ श्वा꣤ऽ५इनोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ७)(३१)॥ थे ॥ ३१२ ॥
॥ द्वाविंशतिः, षष्ठः खण्डः ॥ ६ ॥ दशतिः ॥ ८ ॥

॥ अथ सप्तम खण्डः ॥ (ऋ-४, सा-४)

१७५-१ त्वार्ष्टी साम।   त्वष्टा गायत्रीन्द्रः ॥
ई꣥꣯ङ्खयन्तीः ॥ अ꣢पाऽ२स्यू꣡वाऽ२: । आ꣡इन्द्रंजा꣢꣯तम् । ऊ꣡पा꣢ऽ१साताऽ२इ ॥ वन्वा꣡꣯नाऽ२३सा꣢: ॥
सुवी꣡रिया꣢ऽ३१उवाऽ२३ ॥ वृ꣢धेऽ१ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ७)(३२)॥ ठे ॥ ३१३ ॥
१७६-१ गोधा साम।   गोधा गायत्रीन्द्रो विश्वेदेवा वा ॥
न꣥किदे꣯वाः ॥ इ꣢ना꣡इ । इनीमासा꣢ऽ३इ । मा꣡सी꣭ऽ३या꣢ । न꣥किया꣯यो ॥ प꣢या꣡ । पयामासा꣢ऽ३इ ।
मा꣡सी꣭ऽ३या꣢ ॥ म꣥न्त्रश्रुत्याम् ॥ च꣢रा꣡ । चरामासा꣢ऽ३इ । मा꣡सी꣭ऽ३या꣢ ॥
(दी॰ २। प॰ १२। मा॰ ६)(३३)॥ छू ॥ ३१४ ॥
१७७-१ सवितुस्साम।   सविता गायत्री सविता ॥
दो꣤꣯ षो꣥꣯आ꣯गा꣤त् ॥ बृ꣢ह꣡द्गा꣯या । द्युमद्गाऽ२३मा꣢न् । आ꣡꣯थर्व꣣णा꣢ऽ३ ॥ स्तु꣢हि꣡ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३४इ ॥
दे꣣꣯वा꣢ऽ३म् । स꣤वोवा꣥ । ता꣤ऽ५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(३४)॥ घू ॥ ३१५ ॥
१७८-१ उषसस्साम।   उषा गायत्र्यश्विनौ॥ (सविता) ॥
ए꣥꣯षो꣯उषाः ॥ आ꣡पू꣯र्वि꣢या꣯ । व्यु꣡च्छ꣢ति । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ । प्रिया꣡꣯दाऽ२३इवा꣢ऽ३४ः ॥
स्तु꣣षा꣢ऽ३४इवा꣣꣯मा꣢ऽ३ ॥ श्वि꣢नो꣡ऽ२३४वा꣥ । बॄ꣤ऽ५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ७)(३५)॥ गे ॥ ३१६ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने पञ्चमस्यार्धः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — पञ्चमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ सप्तम खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-६, सा-८)

१७९-१ त्वष्टुरातिथ्ये द्वे।   द्वयोस्त्वष्टा गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣡न्द्रो꣯दधी꣯चो꣯अस्थभिरियाऽ२ई꣭ऽ३या꣢ ॥ वृत्रा꣡꣯ण्यप्रतिष्कुतइयाऽ२ई꣭ऽ३या꣢ ॥
जघा꣡꣯ननवती꣯र्नवइयाऽ२ ॥ ई꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ ५)(१)॥ ठ्वु ॥ ३१७ ॥

१७९-२
इ꣥न्द्रो꣯दधाइ ॥ चो꣢अस्था꣣ऽ२३४भी꣥: । वृ꣢त्रा꣡꣯णिया । प्रा꣢꣯ति꣡ष्कुताः । ज꣢घा꣡꣯नाऽ२३ना꣢ ᳐ ॥ व꣣ती꣯र्न꣢वा꣡ ।
औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ५)(२)॥ भु ॥ ३१८ ॥
१८०-१ पौषम्।   पूषा गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रे꣯हिमा꣯हाउ ॥ त्सी꣢ऽ३आ꣡न्धा꣢ऽ३सा꣢: । वा꣡इश्वे꣢꣯भिस्सो꣡ऽ२३हा꣢ऽ३ । मा꣡प꣢र्वा꣣ऽ२३४भी꣥: ।
म꣡हाऽ२३ꣳ ॥ आ꣡ऽ२᳐भा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ष्टि꣢रो꣡꣯जसा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ६)(३)॥ खू ॥ ३१९ ॥
१८१-१ इन्द्रस्य मायम्, माया वा।   इन्द्रो गायत्रीन्द्रो वृत्रहा वा ॥
आ꣣꣯ तू꣢꣯ औ꣣꣯ हो꣥꣯ ॥ (द्विः) । न꣢इ꣡न्द्र꣢वृ꣡त्राऽ२३४हा꣥न् । अ꣢स्मा꣡꣯क꣢म꣡र्ध꣢म् । आ꣡꣯गाऽ२३ही꣢ । गा꣡हीऽ२ ॥
मा꣡हाऽ२न्मा꣡हीऽ२३ ॥ भि꣢रू꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ ता꣤ऽ५इभोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ७)(४)॥ भे ॥ ३२० ॥
१८२-१ इन्द्रस्य संवर्तस्य सांवर्तेद्वे।   द्वयोरिन्द्रो गायत्रीन्द्रः ॥
हा꣥ । हा꣢उवाऽ३ । ओ꣡꣯जस्तदस्य꣢तित्विषे꣣ऽ२३४ । हा꣥ । हा꣢उवा । उभे꣡꣯यत्समवर्त꣢या꣣ऽ२३४त् ॥
हा꣥ । हा꣢उवाऽ३ । इ꣡न्द्रश्चर्मे꣰꣯ऽ२वरो꣡꣯दसी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ४)(५)॥ धी ॥ ३२१ ॥

१८२-२
ओ꣤꣯जस्तदाऽ५स्यतित्वि꣤षाइ ॥ उ꣢भे꣡꣯यत्समवर्तयादा꣢ऽ१इन्द्राऽ२३ः ॥ चा꣡ऽ२᳐र्मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ।
व꣢रो꣡꣯दसी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ४। मा॰ ४)(६)॥ भी ॥ ३२२ ॥
१८३-१ अंगिरसस्य शौनःशेपम्, च्यावनं वा।   शुनःशेपो गायत्रीन्द्रः॥ अ꣤या꣣ऽ५मु ॥
ता꣤ऽ३इसा꣢ऽ३मा꣤꣯तसा꣥इ ॥ का꣡पो꣯त꣢इ । वगा꣡र्भा꣢ऽ१धीऽ२म् ॥ वा꣡चाऽ२स्ता꣡च्चीऽ२३त् ॥ न꣢ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ।
हा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ७)(७)॥ छे ॥ ३२३ ॥
१८४-१ प्रतीचीनेडं काशीतम्।   काशीतो गायत्रीन्द्रो, वायुर्वा ॥
वा꣤꣯त꣥आ꣤꣯ वा꣥꣯तु । भा꣤ऽ५इषजा꣤म् ॥ शा꣡म्म्भुम꣢यः । भुनो꣡हृ꣪दाऽ२३४इ । हा꣣꣯हो꣢इ ॥ प्र꣡नआ꣯यूꣳषी꣢ऽ३ता꣢ ॥
रिषा꣡त् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । ई꣤डा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ८)(८)॥ भै ॥ ३२४ ॥
॥ द्वादशप्रथमः, सतमः खण्डः ॥ ७ ॥ दशतिः ॥ ९ ॥

॥ अथ अष्टम खण्डः ॥ (ऋ-९, सा-११)

१८५-१ सौमित्रम्।   सुमित्रो गायत्रीन्द्रो विश्वेदेवा वा ॥
य꣤ꣳरक्ष꣥न्तिप्र꣤चे꣥꣯तसा꣤꣯: ॥ व꣡रुणो꣯मित्रो꣯अर्याऽ२᳐३मा꣢ । न꣡ । काइस्साऽ२३दा꣢ ॥ हिं ꣡माये꣢ऽ३ ।
भ्या꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ जा꣣ऽ२३४ना꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ५)(९)॥ फु ॥ ३२५ ॥
१८६-१ श्यावाश्वे द्वे।   द्वयो श्यावाश्वो गायत्रीन्द्रः ॥
ग꣥व्यो꣤꣯षुणो꣥꣯य꣤था꣥꣯पुरा꣤ ॥ अ꣢श्वयो꣯त꣡रथा । याव꣢रिवस्या꣡ ॥ म꣢ । हो꣡꣯माऽ२३ । हो꣯ना꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ।
ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ १)(१०)॥ ठ्व ॥ ३२६ ॥

१८६-२
ग꣥व्यो꣯षुणो꣯यथा꣯पुराऽ६ए꣥ ॥ अ꣢श्वयोऽ१त । रथाऽ२ । या꣡ ॥ व꣢रि꣡वाऽ२स्या꣡ । म꣢हो꣡꣯ ।
महोऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ २)(११)॥ ग्रा ॥ ३२७ ॥
१८७-१ शैखण्डिनम्।   शिखण्डी गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥मा꣯स्तई ॥ द्र꣢पृ꣡श्नयो꣯घृतंदू꣭ऽ३हा꣢ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३इ । ता꣡आऽ२᳐शा꣣ऽ२३४इरा꣥म् ॥
ए꣣꣯ना꣢ऽ३४मृ꣣ता꣢ऽ३ ॥ स्य꣢पो꣡ऽ२३४वा꣥ । प्यू꣤ऽ५षोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(१२)॥ ढू ॥ ३२८ ॥
१८८-१ वैतहव्यम्।   वीतहव्यो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥या꣯धिया꣯चगव्याऽ६या꣥ ॥ पु꣡रुणा꣢ऽ३ । म꣢ ᳐न्पू꣣ऽ२३४रू꣥ । ष्टू꣡तौ꣢ । वाऽ३२ ॥ यत्सो꣯मे꣯ऽ३सो꣢꣯म꣣आ꣢ ॥
या꣡त्सो꣯मे꣰꣯ऽ२सो꣡꣯ । म꣢ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । भू꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ३)(१३)॥ ढि ॥ ३२९ ॥
१८९-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजो गायत्रीन्द्रः सरस्वती वा ॥
पा꣥꣯वका꣯नई꣤या꣥ ॥ स꣢रा꣡स्वा꣢ऽ१तीऽ२ । वा꣡जे꣯भि꣢र्वा꣯ । जिना꣡इवा꣢ऽ१तीऽ२ ॥ य꣡ज्ञाऽ२३म् ॥
वा꣡ऽ२᳐ष्टू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ धि꣢या꣡꣯वसू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ७। प॰ ०७। मा॰ ५)(१४)॥ छु ॥ ३३० ॥
१९०-१ आरुणस्य वैतहव्यस्य वा साम, सौभरं वा।   अरुणो वीतहव्यः गायत्रीन्द्रः ॥
क꣤इ꣥म꣤म् । उ꣥हु꣤वाहा꣥इ ॥ ना꣢꣯हुऽ३षा꣡इषू꣢ऽ१वाऽ२ । आ꣡इन्द्रꣳसो꣯म꣢ । स्यता꣡र्पा꣢ऽ१याऽ२त् ।
स꣡नो꣰꣯ऽ२व꣡सू꣢꣯ । निया꣡भा꣢ऽ१राऽ२त् ॥ स꣡नो꣰꣯ऽ२व꣡सू꣢꣯नि ॥ आ꣡ऽ२३ । भरा꣢उवा । आ꣡꣯गहि꣢ये꣡꣯हिताइमे꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ९)(१५)॥ टो ॥ ३३१ ॥
१९१-१ सौभरम्।   सुभरिर्गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣥꣯या꣯हिसू ॥ षु꣢मा꣡हा꣢ऽ१इतेऽ२ । षुमा꣡हा꣢ऽ१इतेऽ२ । आ꣡इंद्रसोम꣢म् । पिबा꣡इम꣢म् ।
पिबा꣡आ꣢ऽ१इमाऽ२᳐म् ॥ ए꣣꣯दंब꣢र्हा꣡इः ॥ स꣢दो꣡꣯माऽ२३मा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ १२)(१६)॥ ना ॥ ३३२ ॥
१९२-१ पाष्ठौहे द्वे।   पष्ठवाड्गायत्रीन्द्रः (मित्रावरुणोऽर्यमा) ॥
म꣣हा꣢इ᳐त्रा꣣ऽ२३४इणा꣥म् ॥ अ꣡वाऽ२र꣡स्तू । द्यु꣣क्षं ꣢मा꣣ऽ२३४इत्रा꣥ ॥ स्या꣡ऽ२र्य꣡म्णाः ॥
दु꣣रा꣢ ᳐धा꣣ऽ२३४र्षा꣥म् ॥ व꣢रौ꣡꣯होऽ२३४ । वा꣥ । णा꣤ऽ५स्योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ८। मा॰ ७)(१७)॥ गे ॥ ३३३ ॥

१९२-२
म꣥हित्री꣯णा꣯मवरस्तूऽ६ए꣥ ॥ द्यु꣢क्षं ꣡मित्रस्या꣯र्यम्णाः ॥ दु꣢रा꣡꣯धाऽ२३र्षा꣢म् ॥ वरौ꣡होऽ२ । हि꣡म्माऽ२ ।
ण । स्यो꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ हा꣢꣯ओ꣡वा꣢ । ओ꣡वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ५)(१८)॥ ञु ॥ ३३४ ॥
१९३-१ धुरासाकमश्वम्।   साकमश्वो गायत्रीन्द्रः ॥
त्वा꣡꣯वतो꣢ऽ३ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ ॥ पुरू꣯व꣢सोऽ३ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ । व꣢य꣡मिन्द्रा꣢ऽ३ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ ।
प्रणे꣯ता꣢ऽ३ः । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ ॥ स्मसिस्था꣢꣯ताऽ३ः । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ ॥ हरी꣯णा꣢ऽ३म् ।
हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ ९)(१९)॥ बो ॥ ३३५ ॥
॥ एकादशः द्वितीयः, अष्टमः खण्डः ॥ ८ ॥ दशतिः ॥ १० ॥

॥ अथ नवम खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-११)

१९४-१ यामम्।   यमो गायत्रीन्द्रः ॥
उ꣥त्वा꣯मन्दन्तुसो꣯हो꣤मा꣥: ॥ कृ꣢णौ꣡꣯हो । ष्व꣢रौ꣡꣯हो । धा꣢꣯अ꣡द्रिवाः ॥ अ । वब्राऽ२३ह्मा꣢ ॥ द्वि꣡षाऽ२: ।
हाऽ२इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१ये꣢ऽ३ । जा꣡ऽ२᳐हा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ए꣢ऽ᳐३ । य꣡यूऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ ७)(२०)॥ छे ॥ ३३६ ॥
१९५-१ आङ्गिरसां हरिश्रीनिधनम्।   अङ्गिरा गायत्रीन्द्रः ॥
गि꣤र्व꣥ण:पा꣯हि꣤न꣥स्सुत꣤म् । गिर्व꣥ण:पा꣤ ॥ हि꣡नस्सुताऽ२म् । म꣡धो꣯र्धा꣯रा꣯भि꣢रा꣡होऽ२ । ज्या꣡सेऽ२३ ।
हा꣢उवा ॥ इ꣡न्द्रात्वाऽ२३दा꣢ । तमा꣡ये꣢ऽ३त् । या꣡ऽ२᳐शा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ह꣢रिऽ३श्री꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ६)(२१)॥ ङू ॥ ३३७ ॥
१९६-१ वैरूपम्।   विरूपो गायत्रीन्द्रः ॥
सा꣤दा꣥ ॥ व꣢इन्द्राऽ३ः । च꣢र्कृ꣣षा꣤दा꣥ । उ꣢पो꣯नुसाऽ३ः । सा꣡पर्य꣢न् ॥ न꣣दे꣢꣯वा꣡ऽ२३ः ॥ वृता꣢ऽ३४३ः ।
शू꣢ऽ३४३ । रा꣢ऽ३आ꣤ऽ५᳚इन्द्राऽ६५६ः ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ९)(२२)॥ झो ॥ ३३८ ॥
१९७-१ आसितं सिन्धुषाम वा।   आसितो गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣥꣯त्वा꣯विशन्त्विन्दाऽ६वा꣥: ॥ स꣢मुद्र꣡मिव꣢सि꣡न्ध꣢वः । समुद्र꣡मि । व꣢सि꣡न्धाऽ२३वा꣢: ।
न꣡त्वा꣯मिन्द्रा꣯तिरि꣢च्यते꣯ ॥ नत्वा꣡꣯माऽ२३इन्द्रा꣢ ॥ तिरि꣡च्याऽ२३ता꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(२३)॥ घू ॥ ३३९ ॥
१९८-१ यमस्य इन्द्रस्य वा अर्कः (अर्कम्)।   यमो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रमि꣣द्गा꣢꣯थि꣣नो꣤꣯बृ꣥हात् ॥ इ꣢न्द्रा꣡म꣢र्का꣡इ । भि꣢रर्कि꣡णाः ॥ इन्द्रंवाणी꣢ऽ३ः । हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ अ꣤नूऽ५षता ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ६)(२४)॥ जू ॥ ३४० ॥
१९९-१ सौमित्रे द्वे।   द्वयोः सुमित्रो गायत्रीन्द्रः ऋभुर्वा ॥
इ꣤न्द्र꣥इषे꣤꣯द꣥दा꣯तुनः । ओ꣤हाइ ॥ ऋ꣢भु । क्ष꣡णाऽ२᳐म् । ऋ꣣भुꣳ꣢ ᳐रा꣣ऽ२३४यी꣥म् । वा꣢꣯जी꣯ददातु꣣वा꣢ऽ३ ।
वा꣢꣯ जी꣡꣯ददा । तु꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ । जा꣤ऽ५इनोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ७)(२५)॥ घे ॥ ३४१ ॥

१९९-२
इ꣥न्द्रइषे꣯ददा꣯तुनाऽ६ए꣥ ॥ ऋ꣢भुक्ष꣡णमृ꣢ । भूऽ२१२३म् । रयी꣢ऽ३४३म् ॥ वा꣡ऽ२३जी꣢ ॥ ददाऽ२ओ꣡ऽ२३ ।
तु꣤वोवा꣥ । जा꣤ऽ५इनोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ७)(२६)॥ जे ॥ ३४२ ॥
२००-१ इन्द्रस्याभयङ्करम्।   इन्द्रो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रो꣯अंगा ॥ म꣢ह꣡द्भाऽ२३या꣢म् । आ꣡भी꣯ष꣢द । पचु꣡च्याऽ२३वा꣢ऽ३४त् । स꣣हा꣢ऽ३४इस्थि꣣रा꣢ऽ३ः ।
वि꣤चोवा꣥ । षा꣤ऽ५णोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ६)(२७)॥ छू ॥ ३४३ ॥
२०१-१ त्वार्ष्टी साम।   त्वष्टा गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥मा꣯उत्वा ॥ सु꣢ताइसु꣡ताइ । नक्षन्ताऽ२३इगी꣢ऽ३४ः । वन꣥: । गा꣢ऽ३इरा꣥: ॥ गा꣡꣯वोवा꣢ऽ३त्सा꣢ऽ३म् ॥
न꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ । ना꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ १०)(२८)॥ जौ ॥ ३४४ ॥
२०२-१ पौषम्।   पूषा गायत्रीन्द्रः इन्द्रापूषणौ वा ॥
इ꣥न्द्रा꣯नुपू ॥ ष꣢णा꣡꣯वाऽ२३या꣢म् । सा꣡ख्या꣯य꣢ । सुव꣡स्ताऽ२३या꣢इ ॥ हू꣡वेऽ२मा꣡वाऽ२३ । ज꣢सो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥
ता꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ३)(२९)॥ ठि ॥ ३४५ ॥
२०३-१ इन्द्राण्याः साम।   इन्द्राणी गायत्रीन्द्रः ॥
न꣤ । क्ये꣤नाकी꣥ ॥ आ꣡इन्द्रत्वदुत्तराम् । न꣢ज्या꣡꣯ यो꣰꣯ऽ२ । अ꣡स्ताऽ२३इवॄ꣢ । हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म् ।
त्रा꣣ऽ२३४हा꣥न् ॥ न꣡क्ये꣢꣯ । वं ꣡याऽ२३था꣢ ॥ हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म्ऽ३४३ । तू꣢ऽ᳐३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ९)(३०)॥ टो ॥ ३४६ ॥
॥ एकादशस्तृतीयः, नवमः खण्डः ॥ ९ ॥ दशतिः ॥ १ ॥

॥ अथ दशम खण्डः ॥ (ऋ-५, सा-५)

२०४-१ श्यावाश्वं तारणं वा।   श्यावाश्वो गायत्रीन्द्रः ॥
त꣥रणिंवाः ॥ ज꣡नाऽ२३ना꣢म् । त्रदं ꣡वा꣯जा꣢ऽ३हा꣢ऽ३ । स्या꣡गो꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ स꣢मा꣡꣯नाऽ२३मू꣢ ॥
प्र꣤शाऽ५ꣳसिषाम् । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ५)(३१)॥ जु ॥ ३४७ ॥
२०५-१ वैरूपम्।   विरूपो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥सृग्रमा꣯इन्द्राऽ६ते꣥꣯गिराः ॥ प्रा꣡तीऽ२त्वा꣡मूऽ२त् । अहा꣯ । स꣡ता ॥ सा꣢ऽ१जोऽ२षा꣡वाऽ२ ॥
षभाऽ२म्प꣡ति꣢म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ।
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ५)(३२)॥ डु ॥ ३४८ ॥
२०६-१ सौमित्रम् कौत्सं वा।   सुमित्रो गायत्रीन्द्रः ॥
सु꣤नी꣯थो꣯घाऽ५समर्ति꣤याः ॥ य꣡म्मरुतो꣰꣯ऽ२य꣡मर्य꣢मा꣡꣯ । मि꣢त्रा꣡꣯स्पां ꣯त्य꣢द्रु꣡ह꣢: ॥ ऊ꣡ऽ । ऊऽऽ ।
वा꣢꣯हाऽ३१उवाऽ२ । अ꣡ति꣢द्वि꣡षा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ ४)(३३)॥ छी ॥ ३४९ ॥
२०७-१ तौभम्।   तुभो गायत्रीन्द्रः ॥
औ꣢꣯हो꣯वा꣯औ꣯हो꣣ऽ२३४वा꣥ । ओऽ६हा꣥ । य꣢द्वी꣯डा꣯वीऽ३न्द्रा꣤ऽ३य꣢त्स्थि꣣रा꣥इ ॥ औ꣢꣯हो꣯वा꣯औ꣯हो꣣ऽ२३४वा꣥ ।
ओऽ६हा꣥ । य꣢त्पर्शा꣯नेऽ३पा꣤ऽ३रा꣢꣯भृ꣣त꣥म् ॥ औ꣢꣯हो꣯वा꣯औ꣯हो꣣ऽ२३४वा꣥ । ओऽ६हा꣥ ।
व꣢सुस्पा꣯र्हाऽ३न्ता꣤ऽ३दा꣢꣯भ꣣र꣥ ॥ औ꣢꣯हो꣯वा꣯औ꣯हो꣣ऽ२३४वा꣥ । ओऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २२। प॰ १३। मा॰ ७)(३४)॥ जे ॥ ३५० ॥
२०८-१ श्रौतम्।   श्रुतो गायत्रीन्द्रः ॥
श्रु꣥ता꣤म् ॥ वो꣡꣯वृत्रहन्तमम् । प्रशर्द्धञ्चर्ष꣢णा꣡ऽ२३इना꣢म् ॥ आ꣯शा꣡इषाऽ२३इरा꣢ ॥ ध꣣से꣯म꣢हा꣡ ।
औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ७)(३५)॥ डे ॥ ३५१ ॥
॥ इति द्वितीयः प्रपाठकः ॥ २ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने पञ्चमः प्रपाठकः ॥ ५ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — षष्ठप्रपाठके प्रथमोऽद्धः

॥ दशम खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-५, सा-५)

२०९-१ आभीशवम्।   अभीशुर्गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥रन्तइन्द्रश्रवसे꣯ए । ए ॥ ग꣢मा꣡इमशू꣢꣯रत्वा꣡꣯वता꣢ऽ३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ अ꣡राꣳशा꣢ऽ१क्राऽ२३ ।
हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ परा꣡इमाऽ२३णा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ९)(१)॥ ढो ॥ ३५२ ॥
२१०-१ पौषम्।   पूषा गायत्रीन्द्रः ॥
धा꣥꣯ना꣯व꣣न्तं ꣢क꣣र꣤म्म्भि꣥णाम् ॥ अ꣡पू꣯पवन्तमू꣢ऽ१क्थी꣢ऽ३ना꣢म् ॥ इन्द्रा᳐प्रा꣣ऽ२३४ता꣥: । ओ꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥
जु꣤षोवा꣥ । स्वा꣤ऽ५नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ ५)(२)॥ टु ॥ ३५३ ॥
२११-१ इन्द्रस्य क्षुरपवि।   इन्द्रो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥पां ꣤꣯फे꣯ने꣥꣯नन꣤मु꣥चे꣤: ॥ शि꣡रइ꣢ । द्रो꣡त् । अ꣪वाऽ२᳐र्त्ता꣣ऽ२३४या꣥: ॥ वा꣡इश्वाऽ२३ः ॥
या꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ज꣢यस्पृ꣡धा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ८)(३)॥ फै ॥ ३५४ ॥
२१२-१ सौमित्रे द्वे।   सुमित्रो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣥मे꣯तआ ॥ द्र꣢सो꣡꣯माः । होवा꣢ऽ३हो꣡इ । सु꣢ता꣡꣯सो꣯ये꣢ऽ३ । चा꣡सो꣢तू꣣ऽ२३४वा꣥: ॥ ते꣣ऽ४षा꣥꣯म् ।
हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ मा꣡त्स्वप्र꣢भू꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ वा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ७)(४)॥ भे ॥ ३५५ ॥
२१३-१
तु꣤भ्यꣳहा꣥उ ॥ सु꣢ता꣡꣯सस्सो꣯मा꣯: । स्ती꣯र्णंबाऽ२३र्हीः꣢ । वि꣡भाऽ२होऽ१इ । वाऽ२३सा꣢उ ॥
स्तो꣡ता꣢ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥ भ्य꣡आऽ२᳐इ । द्र꣣मॄ꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ डा꣣ऽ२३४या꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ९)(५)॥ घो ॥ ३५६ ॥
॥ दश चतुर्थः, दशमः खण्डः ॥ १० ॥ दशतिः ॥ २ ॥

॥ अथ एकादश खण्डः ॥ (ऋ-९, सा-९)

२१४-१ कौत्से द्वे।   कुत्सो गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣥꣯वइन्द्राम् ॥ कृ꣢विं ꣡यथा । वा꣯जयाऽ२३न्ता꣢: । शता꣡क्रतुम् ॥ मꣳहिष्ठाऽ२३ꣳसी꣢ ।
चा꣡या꣭ऽ३उवा꣢ऽ३इ ॥ दूऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ७)(६)॥ छे ॥ ३५७ ॥
२१५-१
अ꣥तश्चिदिन्द्रनउपाऽ६ए꣥ ॥ आ꣡या꣯हि꣢श । तवा꣡꣯जाऽ२३या꣢ऽ३४ ॥ इ꣣षा꣢ऽ३४स꣣हा꣢ऽ३ ॥ स्र꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
जा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ६। मा॰ ३)(७)॥ चि ॥ ३५८ ॥
२१६-१ औषसम्।   उषा गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣥꣯बुन्दंवॄ ॥ त्र꣢हा꣡꣯द । दाइ । जात:पृच्छा꣢ऽ३त् । वि꣡माऽ२᳐ता꣣ऽ२३४रा꣥म् ॥ क꣢उ꣡ग्राऽ२३:के꣢ ॥
हा꣡शृण्वि꣢रे꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ५)(८)॥ णु ॥ ३५९ ॥
२१७-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजो गायत्रीन्द्रः ॥
बृ꣥बदुक्थꣳहाऽ६वा꣥꣯महाइ ॥ सा꣡र्प्राऽ२का꣡राऽ२ । स्नमू꣯ । त꣡याइ ॥ सा꣢ऽ१धाऽ२:का꣡र्ण्वाऽ२३ ।
त꣢मो꣡ऽ२३४वा꣥ । वा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ३)(९)॥ छि ॥ ३६० ॥
२१८-१ कौत्सम्।   कुत्सो गायत्रीन्द्रः ॥
ऋ꣥जुनी꣯ती꣤꣯ नो꣥꣯व꣤रु꣥णः । इ꣤हा ॥ मि꣢त्रो꣡꣯नयति꣢वि꣡द्वाऽ२३न्त्सा꣢: । इ꣡हा꣢ ॥ अर्यमा꣡꣯दाऽ२३इवा꣢इ ।
इ꣡हा꣢ ॥ स꣡जोषा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥ ई꣢ऽ३४हा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ५)(१०)॥ बु ॥ ३६२ ॥
२१९-१ औषसम्।   उषा गायत्रीन्द्रः अश्विनौ वा ॥
दू꣢꣯ रा꣡꣯दीऽ२३हे꣤꣯वय꣥त्सताः ॥ अ꣢रुण꣡प्सुर꣢शि꣡श्वाऽ२३इता꣢त् ॥ विभा꣡꣯नूंऽ२३वी꣢ ॥ श्वा꣡था꣯त꣢नत् ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ५)(११)॥ फु ॥ ३६२ ॥
२२०-१ मित्रावरुणयोः संयोजनम्।   मित्रावरुणौ गायत्रीन्द्रः मित्रावरुणौ ॥
आ꣣꣯ नो꣤꣯मि꣥त्रा꣯ । व꣢रुणाऽ३ । औ꣢꣯हो꣡वाऽ२३४ ॥ घृतै꣣꣯र्गव्यू꣤꣯ति꣥मु । क्ष꣢ताऽ३म् । औ꣢꣯हो꣡वाऽ२ ॥
मा꣡ध्वा꣢꣯र꣡जा꣰꣯ऽ२ꣳसिसूऽ३ । औ꣢꣯हो꣡वाऽ२ ॥ क्रतू꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १२। मा॰ २)(१२)॥ खा ॥ ३६३ ॥
२२१-१ ऋतुषाम।   ऋतवो गायत्रीन्द्रो मरुतो वा ॥
उ꣥दुत्ये꣯सू꣯नाऽ६वो꣥꣯गिराः ॥ का꣡ष्ठा꣢꣯य । ज्ञा꣡इ । षु꣪वाऽ२᳐त्ना꣣ऽ२३४ता꣥ ॥ वा꣢꣯ श्रा꣡꣯आऽ२३भी꣢ऽ३ ॥
ज्ञू꣡ऽ२३या꣤ऽ३ । ता꣢ऽ३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ४)(१४)॥ खी ॥ ३६४ ॥
२२२-१ विष्णोः साम।   विष्णुर्निचृत्गायत्री विष्णुः ॥
इ꣥दाऽ६मे꣥ ॥ वि꣡ष्णूऽ२᳐: । वि꣣च꣢क्रा꣣ऽ२३४मा꣥इ । त्रा꣡इधा꣯नि꣢ । दधा꣡इपा꣢ऽ१दाऽ२म् ॥ स꣡मूऽ२होऽ१ ।
ढाऽ२३मा꣢ऽ३ । स्या꣡ऽ२᳐पा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ३ । सु꣢लेऽ१ ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ५)(१४)॥ णु ॥ ३६५ ॥
॥ नव पञ्चमः, एकादशः खण्डः ॥ ११ ॥ दशतिः ॥ ३ ॥

॥ अथ द्वादश खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-११)

२२३-१ कौत्सम्।   कुत्सो गायत्रीन्द्रः ॥
अ꣥ती꣯हिमा ॥ न्यु꣢षाऽ२वा꣡इणाऽ२म् । सुषुवा꣡ꣳसाऽ२म् । हो꣡इ । ऊपै꣢ऽ१रायाऽ᳐२ ॥
अ꣣स्यरा꣢꣯ता꣡ऽ२३उ । सू꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । पी꣣ऽ२३४बा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(१५)॥ ढू ॥ ३६६ ॥
२२४-१ काश्यपम्, आप्सरसं वा।   कश्यपो गायत्रीन्द्रः ॥
क꣣दु꣤प्र꣣चे꣤꣯त꣥से꣯ । म꣣हा꣢ऽ३इ ॥ वा꣡ऽ२३४चो । दे꣥꣯वा꣯हाउ । व꣤चोदे꣥꣯वा । य꣢श꣡स्याऽ२३ता꣢ऽ३४इ ॥
त꣣दा꣢ऽ३४इद्धि꣣या꣢ऽ३ ॥ स्य꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ । धा꣤ऽ५नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ५)(१६)॥ भु ॥ ३६७ ॥
२२५-१ बार्हदुक्थे द्वे।   द्वयोर्बृहदुक्थो गायत्रीन्द्रः ॥
उ꣥क्थ꣤ञ्च꣥नो꣤हाइ ॥ श꣢स्य꣡मा꣯नम् । ना꣯गो꣯राऽ२३यीः꣢ । आ꣡꣯चिके꣯ता ॥ न꣢गा꣡꣯याऽ२३त्रा꣢म् ॥ गी꣯ ।
य꣡माऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ५)(१७)॥ ड्वु ॥ ३६८ ॥
२२६-१
इ꣥न्द्रउक्थाइ ॥ भि꣢र्मा꣡न्दाइष्ठो꣢ऽ३ । वा꣡जा꣢ ᳐ना꣣ऽ२३४ञ्चा꣥ । वा꣡꣯जप꣢तिः ॥ ह꣡राऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४न्त्सू꣥ ।
ता꣡꣯ ना꣰꣯ऽ२ꣳस꣡ । खा । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ६)(१८)॥ णू ॥ ३६९ ॥
२२७-१ कौत्सम्।   कुत्सो गायत्रीन्द्रः ॥
आ꣤꣯ या꣥꣯ही꣤ । उ꣡पन꣢स्सुत꣡म् । होवा꣢ऽ३हा꣢इ । वा꣡꣯ जे꣰꣯ऽ२भिर्मा꣡꣯हृणी꣢꣯यथाऽ३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ।
महाꣳ꣡꣯इव꣢यु꣡वाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ऽ᳐३इ । जा꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ७)(१९)॥ ध्ले ॥ ३७० ॥
२२८-१ कौत्से द्वे।   द्वयोः कुत्सो गायत्रीन्द्रः ॥
ओ꣡ऽ२होऽ१इ । कदा꣢꣯व꣣सो꣥꣯ । स्तो꣡त्रा꣢ऽ३म् । ह꣢र्य꣣ता꣤आ꣥ ॥ ओ꣡ऽ२होऽ१इ । अ꣣व꣢श्म꣣शा꣥꣯ ।
रु꣣धा꣢दू꣣ऽ२३४वा꣥: ॥ ओ꣡ऽ२होऽ१इ । दी꣣꣯ र्घ꣢ꣳसु꣣त꣥म् ॥ वा꣣꣯ता꣢ऽ३४३ । पी꣢ऽ३या꣤ऽ५याऽ६५६ ॥
ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ७)(२०)॥ फ्रे ॥ ३७१ ॥

२२८-२
क꣣दा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । व꣡सो । स्तोत्रा꣢ऽ३म् । ह꣢र्य꣣ता꣤आ꣥ । अ꣡वा꣢ऽ३४ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । श्म꣡शाऽ२ ।
रु꣣धा꣢ ᳐दू꣣ऽ२३४वा꣥: । दी꣣꣯र्घा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । सु꣡ताऽ२३म् । वा꣯ता꣢ऽ३४३ । पी꣢ऽ३या꣤ऽ५᳚याऽ६५६ ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ६)(२१)॥ ठू ॥ ३७२ ॥
२२९-१ और्ध्व(अर्ध) सद्मनम्।   ऊर्ध्वसद्मा गायत्रीन्द्रः ॥
ब्रा꣥꣯ह्मणा꣯दी ॥ द्र꣢रा꣯ध꣡साः । पि꣢बा꣯सो꣡माऽ२म् । ऋतू꣯ꣳर꣡नू ॥ त꣢वे꣯दा꣡ꣳसाऽ२३ ॥ ख्या꣡ऽ२३मा꣤ऽ३ ।
स्ता꣢ऽ३४५र्तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ३)(२२)॥ खि ॥ ३७३ ॥
२३०-१ और्ध्व(अर्ध) सद्मनम्।   ऊर्ध्वसद्मा गायत्रीन्द्रः ॥
व꣥यं ꣤घा꣥꣯ते꣯अ꣤पि꣥स्मसा꣤इ ॥ स्तो꣢꣯ ता꣡꣯रइन्द्रगिर्वणाः । ववाऽ२३हो꣡इ ॥ तूव꣪न्नोजीऽ२ । व꣡वाऽ२३हो꣡ ॥
न्व꣢सो꣡ऽ२३ । मा꣡ऽ२᳐पा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ए꣢ऽ᳐३ ॥ उ꣡पा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(२३)॥ घू ॥ ३७४ ॥
२३१-१ अभीपादस्य औदलस्य साम।   उदलो निचृत्गायत्रीन्द्रः ॥
ए꣥꣯न्द्रपृक्षुका꣯सुचीऽ६दे꣥ ॥ नृ꣢म्णाम् । तनू꣯षुऽ३धा꣡इहा꣢ऽ१इनाऽ२: ॥ सा꣡त्रा꣯जि꣢दु ॥
ग्रपौ꣡ऽ२३ꣳसिया꣢उ । वाऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ५)(२४)॥ थ्यु ॥ ३७५ ॥
२३२-१ आमहीयवं उक्थ्यामहीयवम् वा।   अमहीयुर्गायत्रीन्द्रः ॥
ए꣥꣯वा꣯हो꣢ऽ३अ꣤सिवी꣥꣯रयूः ॥ ए꣢꣯वा꣡शू꣢ऽ१राऽ२: । उ꣡ताऽ२३स्थिरा꣥: । आ꣡इवा꣢꣯ते꣯रा꣡ ॥ धियाऽ२३म्मना꣢उ ।
वाऽ३ । स्तो꣢꣯षेऽ᳐२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ ६)(२५)॥ छू ॥ ३७६ ॥

॥ अथ प्रथम खण्डः ॥ (ऋ-४, सा-१२)

२३३-१ भरद्वाजस्यार्कौद्वौ।   द्वयोर्भरद्वाजो बृहतीन्द्रः॥ ईशानेन्द्रौ वा ॥
अ꣥भित्वा꣯शू ॥ र꣢नो꣡नु꣪माऽ२: । ओ꣡इनू꣢ऽ३माः꣢ । आ꣡दुग्धा꣢꣯इ । वधा꣡इन꣪वाऽ२: । ओ꣡इना꣢ऽ३वा꣢: ।
आ꣡इशा꣯न꣢मस्यजगतः । सुवा꣡र्दृश꣢म् । आ꣡र्दृ꣢ऽ३षा꣢म् ॥ आ꣡इशा꣯न꣢मि ॥ द्रता꣡स्थुषः꣢ । आ꣡ऽ२३ ।
स्थू꣡ऽ२᳐ । षा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्थु꣢षस्स्थु꣡षा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ १६। मा॰ १५)(२६)॥ कु ॥ ३७७ ॥

२३३-२
अ꣥भित्वा꣢ऽ३शू꣤꣯र꣥नो꣤꣯नुमा꣥: ॥ आ꣡दुग्धा꣢꣯इव । धा꣡इनाऽ२३वा꣢: । आ꣡इशा꣯न꣢मस्या꣡जग । ताः ।
सु꣪वाऽ᳐२दृ꣣ऽ२३४शा꣥म् ॥ ई꣢꣯ शा꣡꣯नाऽ२३मी꣢ ॥ द्रा꣡तस्थु꣢षः । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ९)(२७)॥ को ॥ ३७८ ॥
२३४-१ इन्द्रस्य भारद्वाजे द्वे।   द्वयोर्भरद्वाजो बृहतीन्द्रः ॥
त्वा꣥꣯मिद्धी ॥ ह꣢वाऽ२म꣡हे꣢꣯ । आ꣡ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣯हा꣢उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ३᳐४पा꣥ ॥ सा꣢꣯तौ꣯वा꣯ज ।
स्याऽ३काऽ२र꣡द्वा꣢: । आ꣡ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣯हा꣢उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ३᳐४पा꣥ ॥ त्वां ꣡꣯वृत्राइषुइ꣢ । द्रसाऽ२त्प꣡ति꣢म् ।
आ꣡ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣯हा꣢उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ३᳐४पा꣥ ॥ न꣡रस्त्वां ꣯का꣯ष्ठा꣢꣯ । सुआऽ२र्व꣡त꣢: । आ꣡ ।
औ꣢ऽ३हो꣯वा꣯हा꣢उवाऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १७। प॰ २०। मा॰ १०)(२८)॥ ञ्लौ ॥ ३७९ ॥

२३४-२
त्वा꣤꣯मिद्धिहवा꣥꣯महे꣯ । सा꣯तौ꣯वा꣯जो꣤वा꣥ ॥ स्या꣡का꣢ऽ१रावाऽ२: । त्वां ꣡꣯वृत्राइषुइ꣢न्द्रसत् । पा꣡ति꣪न्नाराऽ२: ॥
त्वां ꣡꣯काऽ२३ष्ठा꣢ ॥ सुअ꣡र्वाऽ२३ता꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ८)(२९)॥ ढै ॥ ३८० ॥
२३५-१ सान्नते द्वे।   द्वयोः सन्नतिर्बृहतीन्द्रः ॥
अ꣥भिप्रवाः ॥ सु꣢रा꣡꣯धाऽ२३सा꣢म् । इ꣡न्द्रमर्चयाथा꣢ऽ१विदाऽ२३४इ । यो꣣꣯जा꣢ऽ३४रि꣣तॄ꣢ ।
भ्यो꣡꣯मघवा꣯पूरू꣢ऽ१वासूऽ२: ॥ स꣡हाऽ२३ ॥ स्रा꣡ऽ२᳐इणा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ व꣢शि꣡क्षती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ९)(३०)॥ गू ॥ ३८१ ॥

२३५-२
अ꣡भाइप्र꣪वाऽ᳐२ । सु꣣रा꣢धा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ इ꣡न्द्राम꣪र्चाऽ२३ । या꣡ऽ२᳐था꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । वी꣣ऽ२३४दे꣥ ।
यो꣡꣯जरि꣢तृ꣡भ्यो꣢꣯मघ꣡वा꣰꣯ऽ२पुरू꣯व꣡सु꣢: ॥ सहा ॥ स्रे꣯णे꣯वऽ३शा꣡ये꣢ऽ३ ।
क्षा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सु꣢भूऽ३त꣡येऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ ६)(३१)॥ मू ॥ ३८२ ॥

२३५-३ श्यैतम्।   प्रजापतिर्बृहतीन्द्रः ॥
अ꣤भि꣣प्रव꣤स्सु꣥रा꣯ । ध꣣सा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ आ꣡इन्द्रम꣢र्च । यथा꣡वि꣪दाऽ२३४इ ॥ ओ꣥ऽ६हा꣥ । यो꣡꣯जरि꣢तृ꣡भ्य꣥: ।
मा꣡घाऽ२३वा꣢ । पु꣡रूऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४सू꣥: ॥ स꣢ह꣡स्रे꣯णाइवा꣢ऽ३शा꣢ ॥ हि꣡म्माये꣢ऽ३ ।
क्षा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣣ऽ२३४सू꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ७)(३२)॥ जे ॥ ३८३ ॥
२३६-१ प्रजापतेर्नाविकम्।   प्रजापतिर्बृहतीन्द्रः ॥
तं ꣤व꣥: । ए꣤दास्मा꣥म् ॥ ऋ꣢ती꣯ष꣡ह꣢म् । हाऽ२इ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡हा꣢ । वा꣡सो꣯र्म꣢न्दा꣯न꣡मन्ध꣢साऽ३ः ।
हाऽ२इ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡हा꣢ । अभि꣡वत्सन्नस्वसरे꣢꣯षुधे꣯न꣡वा꣰꣯ऽ२ः । हाऽ२इ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ।
इ꣡हा꣢ ॥ इ꣡न्द्र꣢म् । हाऽ२इ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । इ꣡हा꣢ । गी꣣꣯र्भा꣢इ᳐: । ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣡꣯म᳐हे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ २१। मा॰ १७)(३३)॥ पे ॥ ३८४ ॥

२३६-२ अभीवर्तस्य इन्द्रस्य वा, अभीवर्तम्।   अभीवर्तोबृहतीन्द्रः ॥
तं ꣥वो꣤ऽ३दा꣢ऽ३स्मा꣤मृती꣥꣯षहो꣤वा꣥ ॥ वा꣡सो꣯र्म꣢न्दा꣯ । नमा꣡न्धा꣢ऽ१साऽ२: । आ꣡भिवत्सा꣢ऽ३१२३४म् ।
न꣣स्वस꣤रे꣥꣯ । षु꣢धा꣡इना꣢ऽ१वाऽ२: ॥ इन्द्रा꣡ꣳगा꣢ऽ१इर्भीऽ२᳐: ॥ न꣣वा꣢ऽ३ । मा꣡ऽ२३४५ ॥ हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ७)(३४)॥ ने ॥ ३८५ ॥

२३६-३ अभीवर्तस्य भागम्।   भगो बृहतीन्द्रः ॥
तं ꣣वो꣤꣯दस्म꣣मृ꣤ती꣥꣯ । ष꣣हा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ वा꣡सो꣯र्मन्दा꣯नमन्धासाऽ२: ।
आ꣡भिवत्सन्नस्वसरे꣯षूधे꣢ऽ१नावाऽ२: । ओ꣭ऽ३वा꣢ ॥ इन्द्रं ꣡गाऽ२३४इर्भी꣥: ॥
न꣢वा꣡꣯माऽ२३४५हाऽ६᳚५६इ ॥ भ꣢गाऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ६)(३५)॥ गू ॥ ३८६ ॥

२३६-४ अभीवर्तं आभीवर्तं वा।   इन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
त꣣म्वो꣤꣯दस्म꣣मृ꣤ती꣥꣯ । ष꣣हा꣢ऽ३म् । वा꣡ऽ२३४ । सो꣯र्म꣥न्दा꣯नम । धा꣤सा꣥: । अ꣢भिवत्सन्नस्वसरे꣯षुऽ३धा꣡इ ।
नाऽ२३वा꣢: ॥ इ꣡न्द्रंगी꣯र्भाइर्न्ना꣢ऽ३वा꣢ ॥ हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म्ऽ३ । हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म् ।
नवानवो꣣ऽ२३४वा꣥ । मा꣤ऽ५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ १०)(३६)॥ ग्वौ ॥ ३८७ ॥

२३६-५ नौधसम्।   नोधा बृहतीन्द्रः ॥
ता꣡ऽ२३४म् । वो꣯द꣥स्म꣤मृ꣥ती꣯ । षा꣤हा꣥म् ॥ व꣢सो꣡꣯र्मन्दा । ना꣢ऽ३मा꣡न्धा꣢ऽ३सा꣢: । आ꣡ऽ२३भी꣢ ।
वा꣡त्सन्न꣢ । स्व꣡स꣢ । रा꣡इ । षूधे꣢ना꣣ऽ२३४वा꣥: । आ꣡ऽ२३इन्द्रा꣢म् ॥ गा꣡इभिर्न꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥
मा꣣ऽ२३४हे꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ १३। मा॰ ८)(३७)॥ डै ॥ ३८८ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने षष्ठस्यार्धः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — षष्ठप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ प्रथम खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-६, सा-१९)

२३७-१ लौशे द्वे।   द्वयोर्लुशो बृहतीन्द्रः ॥
ता꣤रो꣥ ॥ भा꣡इर्वो꣯वि꣢दाऽ३१उवाऽ२३ । वाऽ२३४सू꣥म् । इ꣡न्द्रा꣰꣯ऽ२ꣳसबा꣡꣯ध꣢ऊ꣯त꣡ये꣰꣯ऽ२ । बृहा꣡त् ।
बृ꣢हाऽ३१उ । वाऽ२ । गा꣡꣯यन्त꣢स्सुत꣡सो꣢꣯मे꣯अध्वरे꣡꣯ ॥ हु꣢वे꣡꣯भाऽ२३रा꣢म् ॥ ना꣡का꣯रि꣢णम् ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ १०)(१)॥ गौ ॥ ३८९ ॥

२३७-२
ता꣤रो꣥ ॥ भा꣡इर्वो꣯वि꣢दाऽ३१उवाऽ२३ । वाऽ२३४सू꣥म् । इ꣡न्द्रा꣰꣯ऽ२ꣳसबा꣡꣯ध꣢ऊ꣯त꣡ये꣰꣯ऽ२ ।
बृहा꣡द्गा꣢ऽ१याऽ२ । ता꣡स्सुतसोऽ२ । मे꣯अ꣡ध्वराइ ॥ हु꣢वे꣡꣯भाऽ२३रा꣢म् ॥ ना꣡का꣯रि꣢णम् ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ९)(२)॥ ठो ॥ ३९० ॥

२३७-३ धानाके द्वे।   द्वयोर्धानाको बृहतीन्द्रः ॥
त꣥रो꣯भिर्वो꣯विदद्वा꣤सू꣥म् ॥ इ꣢न्द्राम् । इन्द्रꣳसबा꣯धऽ३ऊ꣡ता꣢ऽ१याऽ२इ ॥ बृहात् ।
बृहद्गा꣯यन्तस्सुतसो꣯मऽ३आ꣡ध्वा꣢ऽ१राऽ२इ ॥ हुवाइ । हुवे꣯भरन्नका꣯रिणम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ १०)(३)॥ ञौ ॥ ३९१ ॥

२३७-४ क्षुल्लककालेयम् वा।
त꣥रो꣯भिर्वो꣯विदाऽ४द्वासू꣥म् ॥ इ꣢न्द्रꣳसबाऽ३ । ध꣡ऊऽ२᳐ता꣣ऽ२३४या꣥इ । बृ꣢हा꣡त् । बृ꣢हाऽ३१उ ।
वाऽ२ । गा꣡꣯यन्त꣢स्सुत꣡सो꣢꣯मे꣯अध्वरे꣡꣯ ॥ हु꣢वे꣡꣯होइभाऽ२३रा꣢म् ॥ ना꣡का꣯रि꣢णम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ १०)(४)॥ ठौ ॥ ३९२ ॥

२३७-५ कालेयानि त्रीणि।   त्रयाणांकालेयो बृहतीन्द्रः ॥
त꣡रोऽ२३भिर्वो꣢ । वि꣤दाऽ५द्वसूम् ॥ इ꣢न्द्रꣳसबा꣯ऽ३धा꣡ऊ꣢ऽ१ताया꣭ऽ३इ । ओ꣢ऽ३४वा꣥ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
बृ꣢हद्गा꣯यन्तस्सुतसो꣯ऽ३मा꣡अ꣪ध्वारा꣭ऽ३इ । ओ꣢ऽ३४वा꣥ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ हु꣡वाइभराम् ॥
नाका꣢रा꣣ऽ२३४इणा꣥म् । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ओ꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १३। मा॰ १०)(५)॥ डौ ॥ ३९३ ॥

२३७-६
त꣡रो꣯भिर्वोऽ२ । वि꣣द꣢द्वा꣣ऽ२३४सू꣥म् ॥ इ꣢न्द्रꣳसबा꣯ऽ३धा꣡ऊ꣢ऽ१तायाऽ२इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ।
औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । बृहद्गा꣯यन्तस्सुतसो꣯ऽ३मा꣡अ꣪ध्वाराऽ२इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ॥
हु꣡वाइभा꣢ऽ१राऽ२म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ॥ ना꣡का꣯रि꣢णम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १५। मा॰ ९)(६)॥ मो ॥ ३९४ ॥

२३७-७
त꣥रो꣯भा꣢ऽ३इर्वो꣤꣯वि꣥द꣤द्वसू꣥म् ॥ इ꣢न्द्रा꣡ꣳस꣢बा꣡ । ध꣢ऊ꣣꣯त꣢या꣡ऽ२३इ । बृ꣢ह꣣द्गा꣯या꣢ऽ३ । ता꣡ऽ२३४ः ।
सुत꣣सो꣤꣯ मे꣥꣯अ । ध्वा꣢ऽ३रा꣢इ ॥ हु꣡वाइभ꣣रौ꣢ । वाऽ३४३ओ꣢ऽ३४वा꣥ ॥ न꣤काऽ५रिणाम् । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ११)(७)॥ ख ॥ ३९५ ॥
२३८-१ ऐषिरे द्वे।   द्वयोरिषिरो बृहतीन्द्रः ॥
त꣥रणिरीत् ॥ सि꣣षा꣢ऽ३सा꣤ती꣥ । वा꣢꣯जा꣡म्पु꣢रा꣡म् । धि꣢या꣯यु꣡जा । आवा꣢ऽ३आ꣤इन्द्रा꣥म् ॥ पु꣢रू꣡हू꣢꣯त꣡म् ।
न꣢मे꣯गा꣡इरा ॥ नाइमी꣢ऽ३न्ता꣤ष्टे꣥ ॥ वा꣢꣯सु꣡द्रुवाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ९)(८)॥ भो ॥ ३९६ ॥

२३८-२
त꣤राहा꣥उ ॥ णि꣢रित्सिऽ३षा꣡सति꣢ । हयाइ । हयाइ । वा꣡जंपु꣢रम् ॥ धिया꣡यूजौ꣢꣯ । हो꣯वाऽ३हा꣢इ ॥
आ꣡꣯वइन्द्रंपु꣢रुहू꣯तम् । नमा꣡इगाइरौ꣢꣯ । हो꣯वाऽ३हा꣢इ ॥ ने꣯मिन्तष्टे꣯वाऽ३सा꣡ ॥
औ꣢ऽ३हो꣯वा꣯हा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣢प् । द्रू꣣ऽ२३४वा꣥म् ॥
(दी॰ १२। प॰ १४। मा॰ १३)(९)॥ झि ॥ ३९७ ॥

२३८-३ गौश्रृंगे द्वे।   द्वयोर्गौश्रृंगो बृहतीन्द्रः ॥
त꣤र꣣णि꣤रि꣣त्सि꣤षा꣥꣯ । सा꣢ऽ३ती꣤ । वा꣯जं ꣥पु꣤रं ꣥ध्या꣯युजा꣤ ॥ वा꣡꣯जंपुरंध्या꣯युजा꣯ । वआ-ऽ२३इन्द्रा꣢ऽ३४म् ।
पुरुहू꣯त꣣न्न꣤मे꣥꣯ । गा꣢ऽ३इरा꣢ ॥ ने꣯मा꣡इन्ताऽ२३ष्टे꣢ ॥ वसुद्रु꣡व꣢म् ॥ इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ ७)(१०)॥ थे ॥ ३९८ ॥

२३८-४
त꣤र꣣णि꣤रि꣣त्सि꣤षा꣥꣯ । स꣣ती꣢ऽ३ । वा꣡ऽ२३४ । जंपुरं ꣥धिया꣯ । यु꣤जा꣥ ॥
वा꣡꣯जंपुरंध्या꣯युजा꣯वइन्द्रंपुरुहू꣯तन्नमाऽ२इगा꣡इराऽ२ । हाऽ२ऊ꣡ऊवाइ ॥
ने꣢꣯मि꣡न्तष्टे꣯वसोवा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ द्रू꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ८)(११)॥ ढै ॥ ३९९ ॥
२३९-१ पृष्ठम्।   पृष्ठो बृहतीन्द्रः ॥
पि꣥बा꣤ऽ३सु꣢त꣣स्य꣤रसि꣥नाः ॥ म꣡त्स्वा꣯नइन्द्रगो꣯मताऽ२३हो꣡इया ।
आ꣢꣯पि꣡र्नो꣯बो꣯धिसधमा꣯द्ये꣯वृधाऽ२३हो꣡इया ॥ अ꣢स्माꣳ꣡꣯आऽ२३वा꣢ ॥ तुता꣡इधाऽ२३या꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ ८)(१२)॥ ठै ॥ ४०० ॥

२३९-२ शौल्कम्।   शुल्को बृहतीन्द्रः॥ अभीवर्तौद्वौ। द्वयोर्जमदग्निः ॥
पि꣥बा꣯सुतस्यरसिनो꣯हाउ ॥ म꣡त्स्वा꣯नइन्द्र꣢गो꣡꣯माऽ२᳐त꣣: । हा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
आ꣢꣯पि꣡र्नो꣯बो꣯धिसधमा꣯दि꣢ये꣡꣯वाऽ२᳐र्द्धे꣣꣯ । हा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । अ꣢स्माꣳ꣡꣯अवन्तु꣢ते꣡꣯धाऽ२᳐य꣣: । हा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १२। प॰ ८। मा॰ ८)(१३)॥ श्रै ॥ ४०१ ॥

२३९-३ जमदग्नेरभीवर्तः।   जमदग्निर्बृहतीन्द्रः ॥
पि꣥बा꣯सुतस्यरसिनो꣯मत्स्वा꣯हाउ ॥ ना꣡ऽ२: । इ꣡न्द्राऽ२गो꣡꣯मताऽ२३ः । हा꣢उ । आ꣯पि꣡र्नो꣰꣯ऽ२बो꣯ ।
धिसा꣡ध꣪माऽ२ । दि꣡ये꣯वृधाऽ२३ । हा꣢उ ॥ अस्मा꣡ꣳअ꣪वाऽ२३ । हा꣢ ᳐ ॥ तु꣣ते꣢ऽ३हो꣡ऽ२᳐ ।
या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ धि꣢य᳐ऊ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ ८)(१४)॥ बै ॥ ४०२ ॥
२४०-१ कौल्मलबर्हिषे द्वे।   कुल्मलबहिर्बृहतीन्द्रः ॥
तु꣥वा꣤ऽ३ꣳहो꣢ऽ३ए꣤꣯हिचे꣥꣯रवाइ ॥ वि꣢दा꣡꣯भगंवसूऽ२त्ता꣡याऽ२३४इ । उ꣥द्वा꣯वृषस्वमघा꣤वा꣥न् ॥ ऐ꣢꣯हो꣡इ ।
गाऽ२वि꣡ष्टयाइ ॥ उदिन्द्रा꣯श्वमोवा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । ष्टा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ८)(१५)॥ खै ॥ ४०३ ॥

२४०-२
त्व꣥ꣳह्ये꣯हिचे꣯राऽ६वा꣥इ ॥ वि꣢दा꣡꣯भगंवसूत्ता꣢ऽ१याऽ२३४इ । उद्वा꣥꣯वृषस्व । मा꣤ऽ५घवा꣤न् ॥ आ꣡इहि꣢या꣡इ ।
ग꣢विष्टा꣡याऽ२इ ॥ उ꣡दिन्द्राऽ२अ꣡श्वमी । ओ꣢ऽ३१म् । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ष्टा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ९)(१६)॥ नो ॥ ४०४ ॥
२४१-१ वसिष्ठस्यजनित्रे द्वे।   द्वयोर्वसिष्ठो बृहतीन्द्रः (मरुतः) जनित्राद्यम् ॥
न꣥हिवा꣢ऽ३श्चा꣤र꣥मं ꣤चना꣥ ॥ हु꣢वे꣡होऽ२इ । व꣡सिष्ठ:पराइम꣪ꣳसाताऽ२इ । अस्मा꣡꣯कमद्यमरुताऽ२᳐: ।
सु꣣ता꣢इ᳐सा꣣ऽ२३४चा꣥ ॥ वा꣡इश्वे꣢ऽ३हो꣡इ । पिबा꣢ऽ३हो꣡ ॥ तु꣢का꣡ऽ२३ । मा꣡ऽ२᳐इना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ज꣢नि꣡त्राऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ १०)(१७)॥ णौ ॥ ४०५ ॥

२४१-२ जनित्रोत्तरम्।
न꣣हिव꣤श्च꣥रमम् । च꣣ना꣢ऽ३ । व꣤सिष्ठा꣥: ॥ हो꣡इ । होइ । पराइम꣪ꣳसाताऽ२३४इ । अस्मा꣣꣯क꣤मद्य꣣म꣤रुत꣥: ।
सु꣣ता꣢ऽ३इसा꣤चा꣥ ॥ वा꣡इश्वे꣯पि꣢बन्तुकौ꣭ऽ३ । हो꣢ऽ३१ये꣢ऽ३ ॥ मा꣡ऽ२᳐इना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ज꣢निऽ३त्रा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ १२)(१८)॥ था ॥ ४०६ ॥
२४२-१ मैधातिथं दैवातिथं वा।   मेधातिथिर्बृहतीन्द्रः ॥
मा꣥꣯चिदन्यदो꣤हा꣥इ ॥ वि꣣शा꣢ऽ३ꣳसा꣤ता꣥ । स꣡खा꣯याऽ२होऽ१इ । माऔ꣢ऽ३हो꣢ । रा꣡इषा꣢उवा ।
ण्या꣡ता꣢उवा । इ꣡न्द्रमित्स्तो꣯ता꣯वृषणाऔ꣢ऽ३हो꣢ । सा꣡चा꣢उवा । सू꣡ता꣢उवा । मु꣡हुरुक्थाऔ꣢ऽ३हो꣢ ।
चशा꣡ । औ꣢꣯हो꣡ । वा꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ११)(१९)॥ घा ॥ ४०७ ॥
॥ एकत्रिंशत्प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥ दशतिः ॥ ५ ॥

॥ अथ द्वितीय खण्डः ॥ (ऋ-६, सा-१६)

२४३-१ वैखानसम्।   वैखानसा बृहतीन्द्रः ॥
न꣥किष्टा꣢ऽ३ङ्क꣤र्म꣥णा꣤꣯नशा꣥त् ॥ य꣢श्चा꣡का꣢꣯रा꣡ । स꣢दा꣣꣯वृ꣢धा꣡ऽ२३म् । स꣢दा꣣꣯वृधा꣢म् । इन्द्रा꣡न्न꣢या꣡ । ज्ञै꣢꣯र्वि꣣श्व꣢गू꣡ ।
त꣪मा꣰꣯ऽ२र्भ्वसा꣡ऽ२३म् । त꣢मृ꣣भ्वसा꣢म् ॥ अधा꣡र्ष्ट꣢न्धा꣡ । ष्णु꣢मो꣣꣯ज꣢सा꣡ऽ२३ ॥ ष्णु꣢मो꣣꣯जसा꣢ऽ३४३ ॥
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १३। मा॰ ६)(२०)॥ डू ॥ ४०८ ॥

२४३-२ पौरुहन्मनं प्राकर्षं वा।   पुरुहन्मा बृहतीन्द्रः ॥
न꣣कि꣤ष्ट꣣ङ्कर्म꣤णा꣥꣯नशत् । हो꣢ऽ३४इ । य꣥श्चका꣢ऽ३रा꣤स꣥दा꣤꣯वृधा꣥म् ॥ आ꣡इन्द्राऽ२न्ना꣡याऽ२ ।
ज्ञै꣡꣯र्विश्वगू꣯र्तामृ꣪भ्वासाऽ२म् ॥ अ꣡धाऽ२होऽ१ । ष्टाऽ२३न्धॄ꣢ऽ३४ ॥ हा꣥꣯ओ꣤वा꣥ ॥ ष्णु꣢मो꣡꣯जसा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(२१)॥ घू ॥ ४०९ ॥
२४४-१ सात्यम्।   सत्यो बृहतीन्द्रः ॥
य꣥ऋता꣢ऽ३इची꣤द꣥भि꣤श्रिषा꣥: ॥ पू꣡राऽ२जा꣡त्रूऽ२ । भ्यआ꣯तृ꣡दा꣢ऽ३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ।
सा꣡न्धाऽ२ता꣡साऽ२म् । धा꣡इंम꣢घ꣡वा꣰꣯ऽ२पुरू꣯व꣡सु꣢: । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ ना꣡इष्काऽ२र्ता꣡वीऽ२ ॥
ह्रुतंपु꣡न꣢: । हो꣡ । वाऽ२᳐ । हा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ १४। मा॰ १२)(२२)॥ भ्वा ॥ ४१० ॥
२४५-१ भारद्वाजानि चत्वारि, भारद्वाजम्।   चतुर्णां भरद्वाजो बृहतीन्द्रः ॥
आ꣥꣯त्वा꣯सहा ॥ स्र꣢मा꣡शा꣢ऽ१ताऽ२म् । यू꣡क्ता꣯र꣢थे꣯हिरण्यये꣯ । ब्र꣡ह्मायू꣢ऽ१जाऽ२: । हा꣡रय꣢इ ।
द्रका꣡इशा꣢ऽ१इनाऽ२: ॥ व꣡हान्तू꣢ऽ१सोऽ२३ ॥ मा꣡ऽ२᳐पा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ता꣣ऽ२३४ये꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ७)(२३)॥ झे ॥ ४११ ॥

२४५-२ भारद्वाजं, कण्वबृहद्वा।   कण्वो बृहतीन्द्रः ॥
औ꣥꣯हो꣯आ꣯त्वा꣯सहाऽ६ए꣥ ॥ स्र꣢मा꣡शा꣢ऽ१ताऽ२३४म् । हा꣣꣯हो꣢इ । यू꣡क्ता꣯र꣢थे꣯हिरण्यये꣯ ।
ब्र꣡ह्मायू꣢ऽ१जाऽ२३४ः । हा꣣꣯हो꣢इ । हा꣡रय꣢इ । द्रका꣡इशा꣢ऽ१इनाऽ२३४ः । हा꣣꣯हो꣢इ ॥ व꣡हान्तू꣢ऽ१सोऽ२३४ ।
हा꣣꣯हो꣢ ॥ म꣣पी꣢ऽ३ । ता꣡ऽ२३४याइ । उ꣥हुवाऽ६हा꣥उ ॥ वा ॥
(दी॰ ११। प॰ १५। मा॰ १३)(२४)॥ ङि ॥ ४१२ ॥

२४५-३ भारद्वाजे द्वे।   द्वयोर्भारद्वाजो बृहतीन्द्रः ॥
आ꣤꣯ त्वा꣥꣯सह꣤स्र꣥मा꣤꣯श꣥त꣤मा ॥ यु꣢क्ता꣡꣯रथेहि꣢र꣡ण्यये । ब्र꣢ह्मयु꣡जो꣯हरयइन्द्र꣢के꣡होऽ२इ । शा꣡इनाऽ२३ः ।
हा꣢उवा ॥ व꣡हन्तुसोम꣢पौ꣣꣯हो꣢ऽ३ । हिं ꣡माऽ२᳐ ॥ त꣣या꣢ऽ३इ । ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ ऊ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ६)(२५)॥ र्ङू ॥ ४१३ ॥

२४५-४
आ꣣꣯ त्वा꣤꣯सह꣣स्र꣤मा꣥꣯ । श꣣ता꣢म् । आ꣣꣯ त्वा꣤꣯स꣥हा ॥ स्र꣢मा꣡शत꣢म् । आ꣡ऽ२꣮इहिया꣣ऽ२३४हा꣥इ ।
यू꣡क्ता꣯र꣢थे꣯हिरण्यये꣯ । ब्र꣡ह्मायू꣢ऽ१जाऽ२३ः । आ꣡ऽ२꣮इहिया꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ हा꣡रय꣢इ ।
द्रका꣡इशा꣢ऽ१इनाऽ२३ः । आ꣡ऽ२꣮इहिया꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ व꣡हान्तू꣢ऽ१सोऽ२३ ।
आ꣡ऽ२꣮इहिया꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ म꣢पी꣡꣯ताऽ२३या꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १६। मा॰ १७)(२६)॥ ते ॥ ४१४ ॥
२४६-१ अग्नेर्वाम्राणि त्रीणि।   त्रयाणां वम्रो बृहतीन्द्रः ॥
आ꣥꣯मन्द्रै꣯रा ॥ द्र꣢हरिभाइर्या꣯हिमयू꣯रऽ३रो꣡माभा꣢ऽ३इः । मा꣤त्वा꣥का꣤इची꣥त् । नि꣢ये᳐मू꣣ऽ२३४री꣥त् ।
न꣢पा꣯शि꣡नाः ॥ अ꣢तिधा꣡न्वेऽ२ ॥ वता꣡ꣳऽ२३ । आ꣡ऽ२᳐इहा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣣ऽ२३४या꣥: ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ १०)(२७)॥ झौ ॥ ४१५ ॥

२४६-२
आ꣤꣯म꣥न्द्रै꣤꣯रि꣥न्द्र । हा꣤ऽ५रिभा꣤इः ॥ या꣢꣯हि꣡मयूर꣢रो꣡꣯मभाइः । मा꣯त्वा꣯काऽ२३इची꣢त् । ना꣡इये꣯मु꣢रित् ।
नपा꣡꣯शाऽ२३इना꣢: । अता꣡इधाऽ२३न्वे꣢ । वता꣡ꣳऽ२३ । आ꣡ऽ२᳐इहा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ।
व꣢योऽ३भी꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ १४)(२८)॥ मी ॥ ४१६ ॥

२४६-३
आ꣤꣯म꣥न्द्रै꣤꣯रि꣥न्द्र । हा꣤ऽ५रिभी꣤: ॥ या꣢꣯हि꣡मयूर꣢रो꣡꣯मभाउ । वाऽ२ । मा꣡त्वाऽ२ ।
के꣡꣯चिन्निये꣯मुरिन्न꣢पा꣡꣯शिनाउ । वाऽ२ ॥ आ꣡तीऽ२ ॥ ध꣡न्वे꣯व꣢ताऽ३१उवाऽ२३ ॥ ईऽ२३४ही꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ ४)(२९)॥ णी ॥ ४१७ ॥
२४७-१ गुङ्गो सामः, गौङ्गवम् वा।   अग्निर्बृहतीन्द्रः ॥
त्व꣥मा꣢ऽ३ङ्गा꣤प्र꣥श꣤ꣳसिषा꣥: ॥ दा꣡इवाऽ२: । श꣡विष्ठ꣣मा꣢ऽ३ । ता꣤या꣥म् । न꣢त्व꣡दन्यो꣯मघवाऽ२३ना꣡ऽ२᳐ ॥
स्ति꣣मा꣢ऽ३र्डा꣤इता꣥ ॥ आ꣡इन्द्रब्र꣢ । वा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣢ ॥ मितो꣡ऽ२३४वा꣥ । वा꣤ऽ५चोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ११। मा॰ ७)(३०)॥ के ॥ ४१८ ॥
२४८-१ इन्द्रस्य यशश्चत्वारि सामानि।   इन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
त्व꣤मि꣥न्द्रा꣤ । य꣢शाः꣡꣯ । असाइ । ऋ꣢जी꣯षी꣡꣯शवस꣢: । प꣡ताइः । त्वं ꣢वृत्रा꣯णीऽ३ह꣢ꣳसि꣣या꣢ । प्र꣡ती꣯नाएऽ२ ।
क꣡इत्पूरूऽ२ । अ꣡नूऽ२होऽ१ । तश्च꣢ । षा꣡ऽ२᳐णा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । धा꣣ऽ२३४र्त्ती꣥: ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ )(३१)॥ छो ॥ ४१९ ॥

२४८-२ साध्रम्।   साध्ना बृहतीन्द्रः ॥
त्व꣥मा꣢ऽ३इन्द्रा꣤य꣥शा꣤꣯असा꣥इ ॥ ऋ꣢जा꣡इषी꣢꣯शा꣡ऽ२᳐ । व꣣सा꣢ऽ३४५ः । पा꣣ऽ२३४ती꣥: ।
त्वं ꣡वृत्रा꣯णिह꣢ꣳस्यप्रती꣡꣯न्ये꣯क꣢इ꣡त्पु꣢ । रू꣡ ॥ आना꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ता꣡श्चा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ष꣤णाऽ५इधृतीः ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ १२)(३२)॥ पा ॥ ४२० ॥

२४८-३ (समीचीनं) साध्रम् वा।   साध्रो बृहतीन्द्रः ॥
हा꣥꣯उत्वमिन्द्रा ॥ या꣢शा᳐आ꣣ऽ२३४सी꣥ऽ६ । हा꣥उ । ऋ꣢जा᳐इषी꣣ऽ२३४शा꣥ । वा꣢स᳐स्पा꣣ऽ२३४ती꣥ऽ६ः ।
हा꣥उ । त्वं ꣢वृ꣡त्रा । णी꣢꣯ ह꣡ꣳसिया । हा꣥उ । प्र꣢ती᳐ना꣣ऽ२३४ए꣥ । क꣢इ꣡त्पूऽ२३४रू꣥ऽ६ । हा꣥उ ॥
अ꣢नु꣡त्ताऽ२३४श्चा꣥ऽ६ । हा꣥उ ॥ षा꣡ऽ२᳐णा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ धा꣣ऽ२३४र्त्ती꣥: ॥
(दी॰ ४। प॰ १६। मा॰ १३)(३३)॥ ति ॥ ४२१ ॥

२४८-४ (प्राचीनं) यशसी द्वे।   द्वयोरिन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
हा꣥꣯उत्वमिन्द्रा ॥ य꣢शा꣡꣯असि꣢ । हो꣡इ । होइ । होये꣢ऽ३४ । हा꣥उहाउहाउ । ऋ꣢जी꣯षी꣡꣯शवस꣢स्प꣡ति꣢: ।
हो꣡इ । होइ । होये꣢ऽ३४ । हा꣥उहाउहाउ ॥ त्वं ꣡वृत्रा꣯णिह꣢ꣳस्यप्रती꣡꣯न्ये꣯क꣢इ꣡त्पु꣢रू꣡ । होइ । होइ ।
होये꣢ऽ३४ । हा꣥उहाउहाउ ॥ अ꣡नुत्त꣢श्चर्षणी꣯धृ꣡ति꣢: । हो꣡इ । होइ । होये꣢ऽ३४ । हा꣥उहाउहाउवा ॥
सु꣡वर्महा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ २२। मा॰ २६)(३४)॥ ठू ॥ ४२२ ॥

२४८-५
हो꣥꣯त्वमिन्द्रा ॥ य꣢शा꣡꣯असि꣢ । हो꣡ये꣢ऽ३ । होऽ२३꣡४꣡५꣡ । ऋ꣢जी꣯षी꣡꣯शवस꣢स्प꣡ति꣢: । हो꣡ये꣢ऽ३ ।
होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ त्वं ꣡वृत्रा꣯णिह꣢ꣳस्यप्रती꣡꣯न्ये꣯क꣢इ꣡त्पु꣢रू꣡ । होये꣢ऽ३ । होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ अ꣡नुत्त꣢श्चर्षणी꣯धृ꣡ति꣢: ।
हो꣡ये꣢ऽ३ । होऽ२३४वा꣥ऽ६ । हा꣥उवा ॥ सु꣡वर्मयाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ १५। मा॰ ६)(३५)॥ णू ॥ ४२३ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने षष्ठः प्रपाठकः ॥ ६ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — सप्तमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ द्वितीय खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-४, सा-९)

२४९-१ यौक्तस्रुचम्।   युक्तस्रुक् बृहतीन्द्रः ॥
इ꣤न्द्र꣥मि꣤द्दे꣥꣯व꣤ता ॥ त꣡याइ । इन्द्रंप्रयति꣢य꣡ध्वाऽ२३रा꣢इ । आ꣡इन्द्राऽ२म् ।
समी꣯के꣡꣯वनिनो꣯ह꣢वा꣡꣯माऽ२३हा꣢इ ॥ आ꣡इन्द्राऽ२म् ॥ धा꣡नस्य꣢सो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ ता꣣ऽ२३४ये꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ७)(१)॥ बे ॥ ४२४ ॥
२५०-१ आत्राणि त्रीणि, वासिष्ठानि वा।   त्रयाणां अत्रिर्बृहतीन्द्रः ॥
इ꣥मा꣤꣯उ꣥त्वा꣯पुरू꣯वसो꣯गि꣤र꣥: । ए꣤ऽ५ । गि꣤राः ॥ वा꣡र्द्ध꣢न्तु꣣या꣯म꣢मा꣡ऽ२३ । पा꣢꣯व꣣क꣢व꣣र्णा꣢: । शु꣡चयोवी꣢ऽ३पा꣢ ।
हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म् । चा꣣ऽ२३४इता꣥: ॥ अ꣢भि꣡स्तो꣯मै꣯र꣢नौऽ२ ॥ हु꣡वाइ । हो꣭ऽ३वा꣢ । षता꣡ ।
औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १५। मा॰ १०)(२)॥ णौ ॥ ४२५ ॥

२५०-२
इ꣥मा꣯उत्वा꣯पुरू꣯वसो꣯हाउ ॥ गि꣡रो꣯व꣢र्द्ध । तू꣡या꣢ऽ१ममाऽ२᳐ । इ꣣हा꣯हा꣢꣯हो꣡इ । इ꣢हो꣣ऽ२३४वा꣥ ।
पा꣢꣯वक꣡वर्णा꣢꣯श्शु꣡चर्य꣢: । इ꣣हा꣯हा꣢꣯हो꣡इ । इ꣢हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ वि꣢पश्चि꣡ । तो । अभिस्तो꣯मैः꣯ । इ꣣हा꣯हा꣢꣯हो꣡इ ।
इ꣢हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ अ꣢नू꣡ऽ२३ । षा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १७। प॰ १६। मा॰ ८)(३)॥ च्वै ॥ ४२६ ॥

२५०-३
इ꣤मा꣣꣯उ꣤त्वा꣥꣯पुरू꣯ । व꣣सा꣢ऽ३उ । गा꣡ऽ२३४इ । रो꣯व꣥र्द्धन्तुया꣤꣯: । ममा꣥ ॥ पा꣢꣯वक꣡वर्णा꣢꣯श्शु꣡चयो꣢꣯विपश्चि꣡ ।
ता । औ꣢ऽ३हो꣢ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ॥ अभि꣡स्तो꣯मै꣯र꣢नौऽ२ । हु꣡वाइ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ षता꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १६। मा॰ ७)(४)॥ पे ॥ ४२७ ॥
२५१-१ वासिष्ठानि त्रीणि, आत्राणि वा।   त्रयाणां वसिष्ठो बृहतीन्द्रः ॥
उ꣥दुत्ये꣯मा ॥ धू꣢꣯म꣡त्तमाऽ२३ः । गा꣢इ᳐रस्तो꣣ऽ२३४मा꣥ । सा꣢꣯ ई꣡꣯रताये꣢ऽ३ । सा꣢त्रा᳐जा꣣ऽ२३४इता꣥: ।
धा꣢ना᳐सा꣣ऽ२३४आ꣥ । क्षी꣢꣯ तो꣡꣯तयाऽ२३ः ॥ वा꣢जा᳐या꣣ऽ२३४न्ता꣥: ॥ र꣣था꣢ऽ३आ꣤ऽ५इवाऽ६᳚५६ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ १०)(५)॥ घौ ॥ ४२८ ॥

२५१-२
उ꣤दुत्ये꣯माऽ५धुमत्त꣤माः ॥ गि꣡रस्तो꣯मा꣯सआऽ२इरा꣡ताऽ२इ । सत्रा꣯जि꣡तो꣯धनाऽ२सा꣡꣯अ ॥
क्षि꣢तो꣯ता꣡याऽ२: ॥ वा꣡꣯जयन्तो꣯र꣢थाऽ३१उवाऽ२३ ॥ ईऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ ६। मा॰ ७)(६)॥ ते ॥ ४२९ ॥

२५१-३
ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । उ꣣दु꣤त्ये꣣꣯मधु꣤म꣥ । त꣣मोऽ२३४हा꣥इ ॥ गा꣡इराऽ२स्तो꣡माऽ२᳐ । स꣣आ꣢ऽ३४५इ ।
रा꣣ऽ२३४ते꣥ । स꣢त्रा꣯जि꣡तो꣰꣯ऽ२धनसा꣡꣯अक्षितो꣢꣯त᳐या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । वा꣤꣯जय꣣न्तो꣤꣯रर्था꣥꣯: ।
इ꣣वोऽ२३४हा꣥इ ॥ वा꣢꣯जय꣡न्तो꣢꣯र꣡था꣢꣯इ । वा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १५। मा॰ १०)(७)॥ ङौ ॥ ४३० ॥
२५२-१ गौतमस्य मनाज्ये, गोराङ्गिरसस्य सामनी वा द्वे।   द्वयोर्गोतमो बृहतीन्द्रः ॥
य꣢था꣡꣯गौऽ२३रो꣤꣯अपा꣥꣯कृताम् ॥ तृ꣡ष्यन्ने꣯तिय꣢वे꣡꣯राऽ२३इणा꣢म् । आ꣯पित्वे꣡꣯न:प्रपित्वे꣯तू꣯य꣢मा꣡꣯गाऽ२३ही꣢ ॥
क꣡ण्वेऽ२षुसू꣡ऽ२३ ॥ सा꣡ऽ२᳐चा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ पी꣣ऽ२३४बा꣥ ॥
(दी॰ १२। प॰ ६। मा॰ ५)(८)॥ चु ॥ ४३१ ॥

२५२-२
ओ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । या꣤था꣥ ॥ गौ꣢꣯रो꣯अऽ३पा꣡कृ꣪तम् । ओ꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ᳐ । तृष्यन्ने꣯तियऽ३वा꣡इरि꣪णम् ।
ओ꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ᳐ । आ꣣ऽ२३४पी꣥ । त्वे꣡꣯न:प्रपित्वे꣯तू꣯यामा꣢ऽ१गहि꣣ । ओ꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ᳐ ॥
क꣡ण्वेऽ२षुसू꣡ऽ२३ ॥ सा꣡ऽ२᳐चा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ पि꣢बऽ३ई꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ १५। मा॰ १०)(९)॥ ङौ ॥ ४३२ ॥
॥ पञ्चविंशः, द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥ दशतिः ॥ ६ ॥

॥ अथ तृतीय खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-२३)

२५३-१ इन्द्रस्य हारयणानि, हारायणानि वा त्रीणि।   त्रयाणामिन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
श꣥ग्ध्यू꣯षू ॥ श꣢चा꣡इपता꣢इ । ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥ । वि꣢श्वा꣯भिऽ३रू꣡तिभा꣢इः । भा꣣ऽ२३४गा꣥म् ॥
न꣢हित्वा꣯यशऽ३सा꣡म्वसू꣢ । वी꣣ऽ२३४दा꣥म् ॥ अ꣡नूऽ२३ । शू꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
च꣡रा꣰꣯ऽ२मसी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ७)(१०)॥ ङे ॥ ४३३ ॥

२५३-२
श꣤ग्ध्यू꣯श्वौ꣯होऽ५इशची꣯प꣤ताइ ॥ आ꣡इन्द्रविश्वा꣯भिरू꣯तिभिः । भगान्ना꣢ऽ३ही꣢ । त्वा꣡꣯यशसाम् ।
वसू꣢ऽ३हा꣢इ ॥ वा꣡इदाऽ२म् ॥ अ꣡नुशू꣯रचरोवा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । मा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ १०)(११)॥ जौ ॥ ४३४ ॥

२५३-३
श꣤ग्ध्यू꣣꣯षुश꣤ची꣥꣯ । प꣣ता꣢इ । श꣣ग्ध्यू꣤꣯षू꣥ ॥ श꣢चा꣡इपते꣢꣯ । आ꣡ऽ२꣮इहिमा꣣ऽ२३४हा꣥: ॥ आ꣡इन्द्रवि꣢श्वा꣯ ।
भिरू꣡तिभि꣢: । आ꣡ऽ२꣮इहिमा꣣ऽ२३४हा꣥: ॥ भा꣡गन्न꣢हित्वा꣯यशसम् । वसू꣡विद꣢म् ।
आ꣡ऽ२꣮इहिमा꣣ऽ२३४हा꣥: ॥ अ꣡नूशू꣢ऽ१राऽ२३ । आ꣡ऽ२꣮इहिमा꣣ऽ२३४हा꣥: ॥ च꣢रा꣡꣯माऽ२३सा꣢ऽ३४३इ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १६। मा॰ १६)(१२)॥ चू ॥ ४३५ ॥
२५४-१ वाम्राणि त्रीणि।   त्रयाणां वाम्रो बृहतीन्द्रः ॥
या꣣꣯हो꣢इ᳐ । ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥ ॥ भु꣢जऽ३आ꣡भा꣢ऽ१राऽ२: । सु꣡वाऽ२३हा꣢ । र्वा꣯ꣳअसुऽ३रा꣡इभा꣢ऽ१याऽ२: ।
स्तो꣡ता꣢ऽ३हा꣢ । र꣡मिन्मघवन्नस्याव꣪र्द्धायाऽ२ ॥ या꣡इचा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ त्वे꣯वृक्तब꣡र्हाऽ२३इषा꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ११)(१३)॥ ट ॥ ४३६ ॥

२५४-२
या꣥꣯इन्द्रभुजआ꣯भाऽ६रा꣥: ॥ सु꣢वर्वा꣯ꣳअ । सु꣡रेऽ२᳐भा꣣ऽ२३४या꣥: । हा । औ꣣꣯होऽ२३४हा꣥ ।
स्तो꣣꣯ता꣯र꣢मा꣡इत् । माघ꣢वन्ना꣡ । स्य꣪वाऽ२᳐र्द्धा꣣ऽ२३४या꣥ । हा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४हा꣥ ॥ ये꣢꣯च꣡त्वाऽ२३इवॄ꣢ऽ३ ।
हा꣢ । औ꣣꣯होऽ२३४हा꣥ ॥ क्त꣢ब꣡र्हाऽ२३इषा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १६। मा॰ ११)(१४)॥ त ॥ ४३७ ॥

२५४-३
या꣤꣯इ꣥न्द्रभु꣤ज꣥आ꣤꣯भ꣥रः । उहु꣤वाहा꣥इ ॥ सु꣡वर्वाꣳ꣢꣯अ꣡सुरे꣢꣯भ्यः । उहु꣡वाऽ२३हा꣢इ । स्तो꣯ता꣡꣯रमिन्मघ꣢वन्न ।
स्या꣡व꣪र्द्धायाऽ२ । उहु꣡वाऽ२३हा꣢इ ॥ ये꣯च꣡त्वाऽ२३इवॄ꣢ । उहु꣡वाऽ२३हा꣢ ॥ क्तब꣡र्हाऽ२३इषा꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ १२)(१५)॥ छा ॥ ४३८ ॥
२५५-१ वरुणसामानि त्रीणि।   त्रयाणां वरुणो बृहती विश्वेदेवाः ॥
प्र꣥मित्रा꣯यप्रा꣯हाउ ॥ आ꣡ऽ२र्य꣡म्णाइ । सचाऽ२हो꣡ । थि꣢यौऽ२ । हु꣡वाइ । आ꣢꣯ र्ता꣡꣯वसाउ । वराऽ२हो꣡ ।
थि꣢यौऽ२ । हु꣡वाइ । वरुणे꣯च्छा । दी꣢꣯यं ꣡वचाः ॥ स्तो꣯त्राऽ२ꣳहो꣡इ ॥ रा꣢꣯जौऽ२ । हु꣡वा ।
षू꣢꣯ गा꣡꣯यता꣢ऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ १६। मा॰ ८)(१६)॥ प्यै ॥ ४३९ ॥

२५५-२
प्र꣥मित्रा꣯यप्रौ꣯हो꣤वा꣥ ॥ आ꣡र्यम्णा꣢ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯हो꣭ऽ३वा꣢ । सा꣡चथ्य꣢म् । ऋता꣡वासा꣢ ।
औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯हो꣭ऽ३वा꣢ । वा꣡रू꣯थ्ये꣢꣯वरुणे꣯च्छ । दिया꣡म्वाचा꣢ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯हो꣭ऽ३वा꣢ ॥
स्तो꣡त्रꣳराजा꣢ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ षू꣯गा꣡याता꣢ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯हो꣭ऽ३वा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १६। प॰ २०। मा॰ ७)(१७)॥ ङे ॥ ४४० ॥

२५५-३
प्र꣥मित्रा꣯यप्रा꣯र्यम्णो꣤वा꣥ । ओ꣤वा꣥ ॥ सा꣡चथ्य꣢म् । ऋता꣡वा꣢ऽ१साऽ२उ । वा꣡ऽ२३रू꣢ । था꣡ऽ२३या꣢इ ।
व꣡रुणे꣢꣯च्छ꣡ । दायाऽ२३ꣳहा꣢इ । व꣡चो꣭ऽ३आ꣢ ॥ स्तो꣯त्र꣡ꣳरा꣯जसु꣢गा꣯यत । स्तो꣡ऽ२३त्रा꣢म् ॥ रा꣡जसु꣢गौ꣭ऽ३ ।
हो꣢ऽ३१२३४ । वा꣥ ॥ या꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १५। मा॰ ७)(१८)॥ ङे ॥ ४४१ ॥
२५६-१ प्रजापतेः वषट्कारणिधनम्।   प्रजापतिर्बृहतीन्द्रः ॥
अ꣤भि꣣त्वा꣤꣯पू꣯र्व꣣पी꣤꣯त꣥ये꣯ । अभित्वा꣢ऽ३पू꣤꣯र्व꣥पी꣤꣯तया꣥इ ॥ इ꣢न्द्रस्तो꣯मे꣯भिऽ३रा꣡य꣪वाऽ२: ।
भिरा꣡या꣢ऽ१वाऽ२३ः । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ ॥ समी꣯ची꣯ना꣯सऋभवस्सऽ३मा꣡स्व꣪राऽ२न् ।
समा꣡स्वा꣢ऽ१राऽ२३न् । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ ॥ रुद्रा꣯गृणन्तऽ३पू꣡र्वि꣪याऽ२म् । तपू꣡र्वा꣢ऽ१याऽ२३म् ।
ओ꣡꣯म् । ओऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ १५। मा॰ ९)(१९)॥ ञ्वो ॥ ४४२ ॥
२५७-१ धृषतो मारुतस्य साम, मारुतम् वा।   मारुतो बृहतीन्द्रः ॥
प्र꣤व꣥इ꣤न्द्रा꣥꣯यबृहते꣤꣯ । प्र꣥वा꣤: ॥ इ꣢न्द्रा꣯यऽ३बॄ꣡हा꣢ऽ१तेऽ२३ । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ ।
मरुतो꣯ब्रह्मऽ३आ꣡र्चा꣢ऽ१ताऽ२३ । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ । वृत्र꣡ꣳहाना꣢ । तिवृ । त्रा꣡हाऽ२३ । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ ।
शता꣡क्रतुः꣢ ॥ वा꣣ऽ२३४श्रे꣥ ॥ ण꣣शा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢ । त꣤पाऽ५र्वणा । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १७। मा॰ ५)(२०)॥ छु ॥ ४४३ ॥
२५८-१ संश्रवसः, विश्रवसः, सत्यश्रवसः, श्रवसो वा, सँशानानि चत्वारि सामानि।   चतुर्णामिन्द्रो बृहती मरुतः ॥
सा꣡न्त्वा꣯हि꣢न्व । तिधा꣡इताइभी꣢ऽ३ः ॥ ता꣡ऽ२᳐इ ॥ भा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣡ꣳश्र꣢वसेऽ३ ॥ (दा । १) ॥
सा꣡न्त्वा꣯रि꣢ण । तिधा꣡इताइभी꣢ऽ३ः । ता꣡ऽ२᳐इ ॥ भा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा । वि꣡श्र꣢वसेऽ३ ॥ (दा । २) ॥
सा꣡न्त्वा꣯त꣢त । क्षुर्धा꣡इताइभी꣢ऽ३ः । ता꣡ऽ२᳐इ ॥ भा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣢त्य꣡श्र꣢वसेऽ३ ॥ (दा । ३) ॥
(दी॰ ९। प॰ १८। मा॰ १२)(२१)॥ दा ॥ ४४४ ॥

२५८-२ इन्द्रस्य वाय्यानां वा, संशानानि, वासिष्ठानि वाम्राणि वा त्रीणि।
सा꣡न्त्वा꣯शि꣢श । तिधा꣡इता꣢ऽ१इभीऽ२: ॥ ता꣡इभीऽ२: । बृहदिन्द्रा꣯यऽ३गा꣡या꣢ऽ१ताऽ२ । या꣡ताऽ२ ॥
मरुतो꣯वृत्रऽ३हा꣡न्ता꣢ऽ१माऽ२म् ॥ ता꣡माऽ२म् । ये꣯नज्यो꣯तिरजनयन्नृऽ३ता꣡वा꣢ऽ१र्द्धाऽ२: ।
वा꣡र्द्धाऽ२: ॥ दे꣯वंदे꣯वा꣯यऽ३जा꣡गृ꣢ऽ१वीऽ२ । गॄ꣡वीऽ२ । सा꣡न्त्वा꣯शि꣢श । तिधा꣡इताइभी꣢ऽ३ः ।
ता꣡ऽ२᳐इ । भा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ श्र꣡वसे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ १७। मा॰ १३)(२२)॥ खि ॥ ४४५ ॥
२५९-१ वाम्रे द्वे।   द्वयोर्वाम्रो बृहतीन्द्रः (सूर्यः) ॥
इ꣢न्द्रा꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ॥ क्रतुन्नऽ३आ꣡भा꣢ऽ१राऽ२ । पिता꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । पुत्रे꣯भिऽ३यो꣡या꣢ऽ१थाऽ२ ।
शिक्षा꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । णो꣯अस्मिन्पुरुहू꣯त꣡यामा꣢ऽ१नीऽ२ ॥ जी꣡꣯वाऽ२३ः ॥ ज्यो꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
अ꣢शी꣯मही꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ७)(२३)॥ झे ॥ ४४६ ॥

२५९-२ क्रतु वासिष्ठम्।
इ꣤न्द्रक्रतूऽ५न्नआ꣯भ꣤रा ॥ पि꣢ता꣡꣯पुत्रेभि꣢यो꣡꣯यथा । शिक्षा꣯णोऽ२३आ꣢ । स्मा꣡इन्पुरु꣢हू꣯ । त꣡यामा꣢ऽ१नीऽ२ ।
औऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाइ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ ॥ जी꣢꣯ वा꣡꣯ज्योऽ२३ती꣢: । अशी꣡꣯माऽ२३हा꣢ऽ३४३इ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १३। मा॰ ७)(२४)॥ डे ॥ ४४७ ॥

२५९-३ वासिष्ठम्।   वसिष्ठो बृहतीन्द्रः (सूर्यः) ॥
इ꣣न्द्र꣤क्र꣣तु꣤न्न꣥आ꣯ । भ꣣रा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ पिता꣯पू꣢ऽ३त्रे꣤꣯भि꣥यो꣤꣯यथा꣥ । ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । पि꣤ता꣣꣯पु꣤त्रे꣣꣯भि꣤य꣥: ।
या꣡थाऽ२३४हा꣥इ । शा꣤इक्षा꣥णो꣤आ꣥ । स्मा꣣इन्पु꣤रु꣥हू꣯तया꣯ । मा꣡नोऽ२३४हा꣥इ ॥ जी꣤वा꣥ज्यो꣤ती꣥: ॥
अ꣢शो꣡ऽ२३४वा꣥ । मा꣤ऽ५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ १०)(२५)॥ ठौ ॥ ४४८ ॥
२६०-१ आञ्जिगस्य अञ्जिगस्य वा स्वपसः सामनी द्वे।   आञ्जिगस्यस्वपसिः बृहतीन्द्रः ॥
मा꣥꣯नइन्द्रा ॥ प꣡रावा꣢ऽ३र्णा꣢क् । भ꣡वा꣯नस्सधमा꣢ऽ१दी꣢ऽ३या꣢इ ॥ त्व꣡न्नऊ꣯ती꣯त्वमिन्नआपी꣢ऽ३या꣢म् ॥
मा꣡꣯नइन्द्रपरा꣯वृ꣢णाऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ८)(२६)॥ क्यै ॥ ४४९ ॥

२६०-२
मा꣣꣯न꣤इ꣥न्द्रप꣤रा꣥꣯ । वृ꣣णा꣢क् । मा꣣꣯न꣤इ꣥न्द्रा ॥ प꣢रा꣡꣯वाऽ२३र्णा꣢क् । भ꣡वा꣰꣯ऽ२नस्स । धमा꣡꣯दाऽ२३या꣢इ ।
त्व꣡न्नऊ꣯तीऽ२ । त्व꣡मिन्नऽ२आ꣡꣯पियाम् ॥ मा꣢꣯ना꣡आऽ२३इन्द्रा꣢ । परा꣡꣯वाऽ२३र्णा꣢ऽ३४३क् ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १२। मा॰ १२)(२७)॥ फा ॥ ४५० ॥
२६१-१ आष्कारणिधनं काण्वम्।   कण्वो बृहतीन्द्रः ॥
व꣥यंघा꣢ऽ३त्वा꣤꣯सुता꣥꣯व꣤न्ता꣥: ॥ आ꣡पो꣯न꣢वृ । क्तबा꣡ऽ२३र्हिषा꣢उ । वाऽ३२ । पवि꣡त्र꣢स्या꣡ । प्र꣢स्र꣣व꣢णा꣡इ ।
षु꣢वृ꣡त्राऽ२३४हा꣥न् ॥ पा꣡ऽ२३री꣢ ॥ स्तो꣡꣯ता꣯र꣢: । आ꣡꣯साऽ२३४५ताऽ६५६इ ॥ आ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ष् ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ७)(२८)॥ के ॥ ४५१ ॥

२६१-२ महावैष्टंभम्।   वैष्टंभो बृहतीन्द्रः ॥
औ꣤꣯ हो꣥꣯वा꣤ । व꣥यं ꣤घ꣥त्वा꣯सुता꣤꣯व꣥न्तः । औ꣤꣯ हो꣥꣯वा꣤ ॥ औ꣡꣯होइ । आ꣯पो꣯नवृक्तबर्हिषः । पवाइत्रा꣢ऽ३स्या꣢ ।
प्र꣡स्रवणे꣯षुवा꣢ऽ१र्त्रा꣢ऽ३हा꣢न् । औ꣯होऽ३इ । औ꣡꣯होइ ॥ परिस्तो꣯ता꣯रआ꣯सते꣯ । पराइस्तो꣢ऽ३ता꣢ ॥
र꣣आ꣯स꣢ता꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १७। प॰ १५। मा॰ ११)(२९)॥ ञ ॥ ४५२ ॥

२६१-३ अभिनिधनं काण्वम्।   कण्वो बृहतीन्द्रः ॥
औ꣥꣯हो꣤होहा꣥इ । आ꣤इही꣥ । वा꣤या꣥म् ॥ घा꣣ऽ२३४त्वा꣥ । सू꣢ता᳐वा꣣ऽ२३४न्ता꣥: । आ꣢पो᳐ना꣣ऽ२३४वॄ꣥ ।
क्ता꣢꣯ब꣡र्हिषाः । ऐ꣢꣯हो꣡इ । आ꣣ऽ२३४इही꣥ । पा꣢वित्रा꣣ऽ२३४स्या꣥ । प्रा꣢स्रा᳐वा꣣ऽ२३४णे꣥ । षू꣢꣯वृ꣡त्रहान् ।
ऐ꣢꣯हो꣡इ । आ꣣ऽ२३४इही꣥ ॥ पा꣢रिस्तो꣣ऽ२३४ता꣥ । र꣣आ꣢ऽ३सा꣤ऽ५ताऽ६५६इ । आ꣣ऽ२३४भी꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ १७। मा॰ १२)(३०)॥ फा ॥ ४५३ ॥

२६१-४ महावैष्टंभम्।   विष्टंभो बृहतीन्द्रः ॥
व꣥यं ꣤घ꣥त्वो꣤हाइ । सु꣥ता꣯वन्तो꣤वा꣥ ॥ आ꣡पो꣯न꣢वृ । क्तबा꣡र्हा꣢ऽ१इषाऽ२३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ।
पवि꣡त्रस्य꣢प्रस्र꣡वणे꣢꣯ । षुवा꣡र्त्रा꣢ऽ१हाऽ२३न् । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ प꣡राइस्तो꣢ऽ१ताऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ ।
रआ꣡ऽ२३ ॥ सा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । दी꣣ऽ२३४शा꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ १०)(३१)॥ बौ ॥ ४५४ ॥
२६२-१ श्नौष्टीगवम्।   श्नुष्टीगुर्बृहतीन्द्रः ॥
ओ꣥꣯हा꣯इ । य꣤दि꣥न्द्रना꣤꣯ । हु꣥षी꣯षूऽ६वा꣥ ॥ ओ꣡जोऽ२ना꣡र्म्णाऽ२म् । चकृष्टि꣡ । षूऽ । ऐऽ२हीऽ१आइहीऽ२ ।
हाऽ२ऊ꣡ऊवाइ । या꣢ऽ१द्वाऽ२पा꣡ञ्चाऽ२ । क्षिती꣯ना꣡म् । ऐऽ२हीऽ१आइहीऽ२ । हाऽ२ऊ꣡ऊवाइ ।
द्यु꣢म्न꣡मा꣯भ꣢ । रा꣡ । ऐऽ२हीऽ१आइहीऽ२ । हाऽ२ऊ꣡ऊवाइ ॥ सा꣢ऽ१त्राऽ२वा꣡इश्वाऽ२ । निपौꣳ꣡꣯सि ।
या । ऐऽ२हीऽ१आइहीऽ२ । हाऽ२ऊ꣡ऊवाऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ २३। मा॰ २४)(३२)॥ द्वी ॥ ४५५ ॥
॥ त्रयोविंशतिस्तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ दशतिः ॥ ७ ॥

॥ अथ तुरीय खण्डः ॥ (ऋ-१, सा-१)

२६३-१ इन्द्रस्य वृषकम्।   इन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
स꣥त्य꣤मि꣥त्था꣤꣯वृ । षाऽ५इदसा꣤इ ॥ वृ꣡षजू꣯तिर्नो꣯विताऽ२ । वृ꣡षा꣯ह्युग्राशृ꣪ण्विषाऽ२इ । परा꣯व꣡ताइ ।
वृषोऽ२३र्वा꣢ ॥ वता꣡इश्रूऽ२३ता꣢ऽ३४३ः ॥ ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ७)(३३)॥ भे ॥ ४५६ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने सप्तमस्यार्धः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — सप्तमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ तुरीय खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-९, सा-१६)

२६४-१ द्यौते द्वे।   द्वैगते वा द्वयोः। द्वयोः द्विगत् बृहतीन्द्रः ॥
य꣥च्छक्रा꣢ऽ३सी꣤प꣥रा꣤꣯वती꣥ ॥ या꣡दर्वा꣢꣯व । तिवा꣡र्त्रा꣢ऽ१हाऽ२᳐न् । अ꣣ता꣢ऽ३ः । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ।
त्त्वा꣡꣯गी꣯भिर्द्युगदिन्द्राके꣢ऽ१शिभीऽ२: ॥ सु꣡ताऽ२३ । वा꣡ऽ२᳐ꣳआ꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ३ ।
वि꣡वा꣰꣯ऽ२सती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ५)(१)॥ ञु ॥ ४५७ ॥

२६४-२
य꣤च्छ꣥क्रा꣤꣯सि꣥परा꣯व꣤ति꣥यदो꣤हाइ ॥ र्वा꣢꣯वऽ३ता꣡इवृ꣪त्राहाऽ२३४न् । अ꣣ता꣢ऽ३४स्त्वा꣣꣯गा꣢इ । भा꣡इर्द्युग꣢दि ।
द्रा꣡के꣢ऽ१शिभीऽ२: ॥ सु꣡ताऽ२३ ॥ वा꣡ऽ२᳐ꣳआ꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वि꣡वा꣰꣯ऽ२सती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ८)(२)॥ जै ॥ ४५८ ॥
२६५-१ कार्तयशं कार्तवेशं वा।   कृतयशा बृहतीन्द्रः ॥
अ꣥भि꣤वो꣥꣯वी꣯र꣤मन्ध꣥सा꣤: ॥ म꣢दे꣯षूऽ३गा꣡याऽ२ । गिरा꣡माहा꣢ऽ३ । वी꣡चे꣢ता꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ इ꣤न्द्र꣥न्ना꣯मा꣤ ॥
श्रू꣡त्यꣳशा꣢꣯का꣡ऽ२᳐इ । ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ व꣢चो꣯उ꣡पा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ५)(३)॥ डु ॥ ४५९ ॥
२६६-१ इन्द्रस्य शरणम्।   इन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
इ꣤न्द्रत्रिधाऽ५तुशर꣤णाम् ॥ त्रि꣢व꣡रू꣯थꣳसु꣢व꣡स्तयाइ । छदिर्याऽ२३च्छा꣢ । मा꣡घव꣢द्भ्यः ।
चा꣡म꣪ह्याऽ२३ञ्चा꣢ ॥ या꣯व꣡याऽ२३दी꣢ ॥ द्यू꣡मेऽ२भिया꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ४)(४)॥ ञी ॥ ४६० ॥
२६७-१ श्रायन्तीयम्।   श्रायन्तीयो बृहतीन्द्रः (र्प्रजापतिः) सूय्र्ः ॥
श्रा꣥꣯यन्तइवसूऽ४राया꣥म् ॥ वि꣡श्वाऽ२इदि꣡न्द्राऽ२ । स्य꣡भाऽ२क्षा꣡ता । वासू꣯नि꣢जा꣯तो꣡꣯जनिमा꣢꣯ ।
नियो꣡जा꣢ऽ१साऽ२ ॥ प्र꣡तिभा꣢꣯ग꣡न्नदी꣰꣯ऽ२धिमः । प्रा꣡ऽ२३ती꣢ ॥ भा꣡꣯गान्ना꣢ऽ३दा꣢ । हि꣡म् । धि꣣मा꣢ऽ३ः ।
ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ हे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ६)(५)॥ ठू ॥ ४६१ ॥
२६८-१ वाम्रम् आक्षीलं वा।   वाम्रो बृहतीन्द्रः ॥
न꣣सी꣤꣯म꣣दे꣤꣯व꣥आ꣯ । हा꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ । पा꣡ऽ२३४ । तत्पतोवा꣥ ॥ इ꣡षꣳहोऽ२इ । दी꣡꣯र्घाहोऽ२ ।
यो꣡म꣪र्तायाऽ२: । आ꣡इतग्वा꣢꣯चित् । यआ꣡इताशो꣢ ᳐ । यु꣣या꣢उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ । ज꣡ताऽ२इ ॥
आ꣡इन्द्रोऽ२हा꣡रीऽ२ ॥ युयो꣡ऽ२३ । जा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १६। मा॰ १२)(६)॥ च्ला ॥ ४६२ ॥
२६९-१ शाक्राणि वा, वैयश्वानि वा, आश्वानि वा शौल्कानि वा, सुम्नानि वा, द्युम्नानि वा, पृष्ठानि वा, यौक्ताश्वानि वा, सोम सामानि वा, वसिष्ठानि वा, इमानि त्रीणि।   त्रयाणां वसिष्ठो बृहतीन्द्रः ॥
आ꣤꣯न꣥: । ए꣤विश्वा꣥ ॥ सु꣢हा꣡व्याऽ२म् । आ꣡इन्द्रꣳस꣢म । त्सू꣡भू꣢ऽ१षाता꣢ ᳐ । ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ ।
ब्र꣡ह्मा꣢꣯णिस꣡वना꣢꣯ । नि꣣वृत्र꣢हा꣡न् ॥ प꣢र꣡माऽ२३ज्या꣢: ॥ आ꣡र्चा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ षमा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १५। मा॰ ८)(७)॥ णै ॥ ४६३ ॥

२६९-२
आ꣥꣯नो꣯विश्वा꣯सुहा꣯हा꣤व्या꣥म् ॥ इ꣡न्द्रꣳसमत्सुभू꣯षतो꣯ । पब्राऽ२३ह्मा꣢ । णिस꣡वना । नि꣢वृ꣡त्रहान् ॥
प꣢र꣡माऽ२३ज्या꣢: । आ꣡र्चा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ षमा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ५)(८)॥ कु ॥ ४६४ ॥

२६९-३
आ꣥꣯नो꣯विश्वा꣯सुहा꣤व्या꣥म् ॥ इ꣢न्द्राम् । समत्सुभू꣯षत । उपा꣡ब्रा꣢ऽ१ह्माऽ२ । णिसवना꣯निवृत्रहन् ॥
परा꣡मा꣢ऽ१ज्याऽ२: ॥ ऋची꣡꣯षाऽ२३मा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ५)(९)॥ घु ॥ ४६५ ॥
२७०-१ प्रजापतेर्निधनकामम्।   प्रजापतिर्बृहतीन्द्रः ॥
त꣤वे꣯दिन्द्राऽ५वमंव꣤सू ॥ त्वं ꣡पुष्य꣢सिमध्यम꣡म् । सात्रा꣢ ᳐वा꣣ऽ२३४इश्वा꣥ । स्या꣡प꣢रम꣡स्य꣢रा꣯जसि ॥
न꣡कि꣢ष्ट्वा꣣ऽ२३४गो꣥ । षू꣡वृ꣪ण्वाऽ२३ता꣢इ । हो꣡वा꣢ऽ३हो꣡इ । होऽ । वा꣢꣯हाऽ३१उवाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ५)(१०)॥ ढु ॥ ४६६ ॥
२७१-१ इन्द्रस्य प्रियाणि त्रीणि, वसिष्ठस्य वा।   त्रयाणां इन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
क्वे꣥꣯यथा ॥ कु꣢वे꣯द꣡साऽ२इ । औ꣡होऽ२ । औ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ । पु꣢रुत्रा꣡꣯चाइत् । हि꣢ते꣯म꣡नाऽ२: ।
औ꣡होऽ२ । औ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ । अ꣢लर्षि꣡यू । ध्मा꣢꣯ख꣡जकॄऽ२त् । औ꣡होऽ२ ।
औ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ । पु꣢रन्द꣡रा । प्र꣢गा꣯या꣡त्राऽ२: । औ꣡होऽ२ । औ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ ॥
अ꣣गा꣢ऽ३ । सा꣡ऽ२᳐इषू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सु꣢श꣡ꣳसाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ २३। मा॰ १३)(११)॥ जि ॥ ४६७ ॥

२७१-२
कु꣤वा꣥कु꣤वा꣥ ॥ या꣡था । कु꣢वे꣯द꣡साइ । ऊवाइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ । पु꣢रुत्रा꣡꣯चाइत् । हि꣢ते꣯म꣡नाः ।
ऊवाइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ । अ꣢लर्षि꣡यू । ध्मा꣢꣯ख꣡जकॄत् । ऊवाइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
पु꣢रन्द꣡रा । प्र꣢गा꣯या꣡त्राः । ऊवाइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ अ꣣गा꣢ऽ३ । सा꣡ऽ२᳐इषू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
सु꣢शाऽ३ꣳसा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ७। प॰ २०। मा॰ १३)(१२)॥ ञि ॥ ४६८ ॥

२७१-३
क्वे꣢꣯यथकूऽ३वा꣡इदाऽ२३४सी꣥ ॥ पु꣡रुत्रा꣢꣯चित् । हिता꣡इमाऽ२३ना꣢: । आ꣡लर्षि꣢ । युध्मा꣡खजकॄ꣢ऽ३त् ।
हा꣢उवा ॥ पुर꣡न्दाऽ२३रा꣢ । प्रगा꣯या꣡त्राऽ२: ॥ अगा꣡ऽ२३ । सा꣡ऽ२᳐इषू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ प्सू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ९)(१३)॥ पो ॥ ४६९ ॥
२७२-१ ऐन्द्राणि वासिष्ठानि वा, त्रीणि।   त्रयाणां वसिष्ठो बृहतीन्द्रः ॥
व꣥यमे꣯नाम् ॥ आ꣡ऽ२᳐इदा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ही꣣ऽ२३४या꣥: । अ꣡पी꣯पे꣢꣯मे꣯ह꣡वश्रिणम् ।
तास्माऽ२ऊ꣡वाऽ२ । द्य꣡सवनाइ । सूतं ꣪भाराऽ२ । आ꣯नू꣡꣯नाऽ२३म्म्भू꣢ । षा꣡तश्रु꣢ते꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ ८)(१४)॥ थै ॥ ४७० ॥

२७२-२
व꣥यमे꣯नाम् ॥ इ꣡दाऽ२हा꣡याः । अ꣢पौ꣡꣯होइ । पे꣢꣯ मौ꣡꣯होइ । इ꣣ । हा꣢꣯व꣡श्रिणाम् ॥ त꣢स्मा꣯उ꣡वा ।
द्या꣢꣯स꣡वनाइ । सू꣢꣯तं ꣡भरा ॥ आ꣢꣯ नौ꣡꣯हो । नं ꣢भौ꣡꣯हो ॥ षा꣢꣯त꣡श्रुता꣢ऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १२। प॰ १३। मा॰ ८)(१५)॥ ज्यै ॥ ४७१ ॥

२७२-३
व꣤य꣣मे꣤꣯न꣥मिदा꣯ । हि꣣या꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । इ꣤याहा꣥इ ॥ हु꣢वे꣡होऽ२इ । अ꣡पी꣯पे꣯मे꣯हाव꣪श्रिणाऽ२म् ।
त꣡स्मा꣯उवद्यसवनाइ । सूतं ꣪भाराऽ२ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥ आ꣯नू꣡꣯नाऽ२३४म्म्भू꣥ ॥ ष꣢ता꣡श्रूऽ२३४५ताऽ६५६इ ॥
श्र꣢वऽ३सा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ८)(१६)॥ टै ॥ ४७२ ॥
॥ सप्तदश चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ दशतिः ॥ ८ ॥

॥ अथ पञ्चम खण्डः ॥ (ऋ-१०, सा-१६)

२७३-१ पौरुहन्मनम्।   पुरुहन्मा विराट् बृहतीन्द्रः ॥
यो꣥꣯रा꣯जा꣢ऽ३च꣤र्ष꣥णा꣤इना꣥म् ॥ या꣡ता꣯र꣢थे꣯ । भिरा꣡ध्रा꣢ऽ१इगूऽ२: । ध्रा꣡इगूऽ२: । वा꣡इश्वासा꣢ऽ३म् ।
त꣡रुता꣢ऽ३ । त꣡रुता꣢ऽ३ । पा꣡र्ता꣢ ᳐ना꣣ऽ२३४ना꣥म् ॥ ज्या꣡इष्ठं ꣢यो꣯वा꣡ । त्राहा꣢ ᳐गा꣣ऽ२३४र्णा꣥इ ॥ त्र꣤हाऽ५गृणाइ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ १३)(१७)॥ बि ॥ ४७३ ॥

२७३-२ प्राकर्षम्।   प्रकरषा बृहतीन्द्रः ॥
यो꣣꣯रा꣯जा꣤꣯च꣥ । ष꣣णा꣢ऽ३२३४इना꣥म् ॥ या꣡꣯ता꣯रथे꣯भि꣢र꣡ध्राऽ२३इगूः꣢ । वि꣡श्वा꣯सा꣯न्तरुता꣯पृतनाऽ२३ना꣢म् ॥
ज्या꣡ऽ२३इष्ठा꣢म् ॥ यो꣡वृत्र꣢हो꣡वा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । गा꣤ऽ५र्णोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ ७। मा॰ ९)(१८)॥ थो ॥ ४७४ ॥
२७४-१ इन्द्रस्याभयङ्करम्।   इन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
य꣥तआ꣢ऽ३इन्द्रा꣤भ꣥या꣤꣯महा꣥इ ॥ त꣡तो꣯नो꣯अभ꣢य꣡ङ्काऽ२३र्धी꣢ । म꣡घवञ्छग्धितवतन्न꣢ऊ꣡꣯ताऽ२३या꣢इ ॥
विद्वा꣡इषोऽ२३वी꣢ ॥ मा꣡र्द्धो꣯ज꣢हि । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ८)(१९)॥ बै ॥ ४७५ ॥
२७५-१ कावषे द्वे।   द्वयोः कवषो बृहतीन्द्रो वास्तोष्पतिः ॥
वा꣥꣯स्तो꣯ष्पताइ ॥ ध्रु꣢वा꣡ । स्थूणा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । अ꣡ꣳसत्र꣢ꣳसो꣯म्या꣡꣯ ना꣰꣯ऽ२म् ।
द्रप्सᳲ꣡पुरां ꣯भे꣯त्ता꣯शश्वताऽ२३इना꣢म् ॥ आ꣣ऽ२३४इन्द्रा꣥: ॥ मु꣡नी꣰꣯ऽ२ । नाऽ३१उवाऽ२३ ॥
साऽ२३४खा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ८)(२०)॥ धै ॥ ४७६ ॥

२७५-२
वा꣣꣯ स्तो꣤꣯ष्प꣥ते꣯ध्रुवा꣯ । स्थू꣣꣯णा꣢ऽ३ । आ꣡ऽ२३४ । सत्र꣥ꣳसो꣯ । म्या꣤꣯ना꣥म् ॥
द्र꣢प्सᳲ꣡पुरां ꣯भे꣯त्ता꣯शश्वताऽ२३इना꣢ ᳐म् ॥ आ꣡ऽ२३इन्द्रा꣥: ॥ मु꣡नी꣰꣯ऽ२ । नो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ सा꣣ऽ२३४खा꣥ ॥
(दी॰ ११। प॰ १०। मा॰ ५)(२१)॥ ङु ॥ ४७७ ॥
२७६-१ सूर्यसाम।   सूर्योबृहती सूर्यः ॥
ब꣥ण्महा꣢ꣳऽ३अ꣤सिसू꣥꣯र्या ॥ बा꣡डा꣯दि꣢त्य । महा꣡ꣳआ꣢ऽ१साऽ२३४इ । मह꣣स्ते꣤꣯सतो꣣꣯म꣤हिमा꣣꣯प꣤नि꣥ ।
ष्टा꣢ऽ३मा꣢ ॥ मह्ना꣡꣯दाऽ२३इवा꣢ऽ३ ॥ म꣢हो꣡ऽ२᳐३४वा꣥ । आ꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ५)(२२)॥ गु ॥ ४७८ ॥
२७७-१ वैश्वदेवे आनूपे, वाध्र्यश्वे वा द्वे।   आनूपो बृहतीन्द्रः ॥
अ꣤श्वी꣥अ꣤श्वी꣥ ॥ र꣢थी꣯सुऽ३रू꣡पा꣢ऽ१ईऽ२त् । गो꣡मा꣯ꣳय꣢दि । द्रा꣡ते꣢ऽ१साखाऽ२ । श्वा꣡त्राऽ२भा꣡जाऽ२ ।
व꣡यसा꣯सच꣢ते꣡꣯साऽ२३दा꣢ ॥ च꣡न्द्राइर्या꣢ऽ३ती꣢ऽ३ ॥ सा꣡ऽ२३भा꣤ऽ३म् । ऊ꣢ऽ३४५पोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ६)(२३)॥ धू ॥ ४७९ ॥

२७७-२
अ꣥श्वी꣯रथी꣯सुरू꣯पाऽ६ई꣥त् ॥ गो꣡꣯ मा꣯ꣳयदिन्द्रते꣯सखाउवाऽ२३हो꣡वाऽ२३हाऽ२ई꣡या ।
श्वा꣢꣯ त्रा꣡꣯भा꣯जा꣯वयसा꣯सचते꣯सदाउवाऽ२३हो꣡वाऽ२३हाऽ२ई꣡या ॥ चन्द्राइर्या꣢ऽ१तीऽ२ ॥ सा꣡भा꣯मु꣢प ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १३। प॰ ८। मा॰ ८)(२४)॥ डै ॥ ४८० ॥
२७८-१ वैरूपम्।   विरूपो बृहतीन्द्रः (सूर्यः) ॥
य꣢द्या꣡꣯वाऽ२३इ꣤न्द्रते꣥꣯शताम् ॥ श꣢तं ꣡भू꣯मी꣯रुतस्यूऽ२: । न꣡त्वा꣯वश्रिन्त्सहस्रꣳसू꣯र्या꣯अनूऽ२ ॥
ना꣡जाऽ२ता꣡माऽ२३ ॥ ष्ट꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ । दा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ६। मा॰ ५)(२५)॥ चु ॥ ४८१ ॥
२७९-१ नैपातिथे द्वे।   द्वयोर्निपातिथिर्बृहतीन्द्रः ॥
य꣤दि꣥न्द्रप्रा꣤꣯गपाक् ॥ उ꣡दाक् । न्यग्वा꣯हू꣯य꣢से꣡꣯नृभाऽ२इः । सि꣡मा꣯पुरू꣯नृषू꣯तो꣯अ । सि꣢या꣡न꣪वाऽ२इ ॥
आ꣡सीऽ२प्रा꣡शाऽ२ ॥ धतो꣡वा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२᳐३४वा꣥ । र्वा꣤ऽ५शोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ८)(२६)॥ डै ॥ ४८२ ॥

२७९-२
य꣥दिन्द्रप्रा꣯गपा꣯गुदाऽ६गे꣥ ॥ ना꣡यग्वा꣢꣯हू꣯ । यसा꣡इनृभी꣢ऽ३ः । हा꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४हा꣥ ।
सि꣡मा꣰꣯ऽ२पुरू꣡꣯नृषू꣢꣯तो꣯अ꣡ । सि꣢या꣡न꣪वेऽ२३ । हा꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४हा꣥ ॥ अ꣡साइप्राशा꣢ऽ३ । हा꣢ ᳐ ।
औ꣣꣯होऽ२३४हा꣥ ॥ धा꣡ऽ२᳐तू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ र्वा꣣ऽ२३४शे꣥ ॥
(दी॰ १३। प॰ १४। मा॰ ५)(२७)॥ ढु ॥ ४८३ ॥
२८०-१ कौमुदस्य बृहतः सामनी द्वे।   द्वयोः( कुमुदो बृहत्) कौमुदस्य बृहत् बृहतीन्द्रः ॥
क꣥स्तमिन्द्रा ॥ त्वा꣡ऽ२वा꣡साऽ२उ । आ꣡꣯मर्त्यो꣯दधर्षताइ । श्र꣢द्धा꣯हा꣡इतेऽ२ । मा꣡घ꣢वन्पा꣡꣯ ।
रियाइदा꣢ऽ१इवीऽ२᳐ ॥ वा꣣꣯ जी꣢꣯वा꣡जाऽ२म् ॥ सिषा꣡ऽ२३ । सा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ ७)(२८)॥ ण्ले ॥ ४८४ ॥

२८०-२
क꣣स्तमि꣤न्द्र꣥त्वा꣯ । व꣣सा꣢ऽ३उ । आ꣡ऽ२३४ । मर्त्यो꣥꣯दध । ष꣤ता꣥इ ॥ श्र꣢द्धा꣯हा꣡इतेऽ२ । मा꣡घ꣢वन्पा꣡꣯ ।
रियाइ । दाइवा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥ वा꣣꣯ जी꣢꣯वा꣡जाऽ२म् ॥ सिषा꣡ऽ२३ ।
सा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ १४। मा॰ ८)(२९)॥ ढ्व ै ॥ ४८५ ॥
२८१-१ वाचस्साम।   वाक् बृहतीन्द् इन्द्राग्नी ॥
इ꣥न्द्रा꣯ग्नी꣯अपा꣯दियाऽ६मे꣥ ॥ पू꣡꣯र्वागाऽ२त् । प꣡द्वताइभा꣢ऽ१याऽ२: । हित्वा꣡꣯शिरो꣰꣯ऽ२जिह्व꣡या꣯रा꣯ ।
राप꣪च्चाराऽ२त् ॥ त्रिꣳश꣡त्पदा ॥ नि꣢या꣡ऽ२३ । क्रा꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ६)(३०)॥ ल्लू ॥ ४८६ ॥
२८२-१ वाम्रे दाशीले वा द्वे।   द्वयोर्वम्रो बृहतीन्द्रः ॥
इ꣤न्द्र꣥ने꣤꣯ दी꣥꣯यए꣤꣯दि꣥ । हा꣤इ । मि꣥त꣤मे꣥꣯ । धा ॥ भि꣢रू꣡꣯तिभिः ॥ आ꣯शन्ताऽ२३मा꣢ । श꣡न्तमा꣯भिर꣢भि꣡ष्टिभिः ।
आ꣯स्वाऽ२३पे꣢ ॥ स्वा꣡औ꣢ऽ३हो꣤ऽ३ । पि꣢भि᳐रो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ६)(३१)॥ टू ॥ ४८७ ॥

२८२-२
इ꣤न्द्र꣥ने꣤꣯ दी꣥꣯यए꣤꣯दि꣥ । हा꣤इ । मि꣥त꣤मे꣥꣯ । धा꣯ । भिरू꣯ति꣤भाइः ॥ आ꣢꣯श꣡न्तमशन्तमाऽ२भा꣡इः । आभि꣪ष्टिभिः ॥
आ꣯स्वाऽ२पा꣡इस्वाऽ२३ ॥ हा꣤ऽ३ । पि꣢भि᳐रो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ९)(३२)॥ टो ॥ ४८८ ॥
॥ षोडश पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥ दशतिः ॥ ९ ॥

॥ अथ षष्ठ खण्डः ॥ (ऋ-२, सा-४)

२८३-१ गौरीविते प्रहितौ द्वौ, वासुके वा।   द्वयोर्गौरीवितिर्बृहतीन्द्रः ॥
इ꣥तऊ꣯ती ॥ वो꣢ऽ३ओ꣡जा꣢ऽ३रा꣢म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । प्रहे꣯ता꣯रम꣡प्राही꣢ऽ३ता꣢म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ।
आ꣯शुञ्जे꣯ता꣯राऽ३ꣳहा꣡इता꣢ऽ३रा꣢म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ॥ रथा꣡इतममतू꣯र्ताऽ२३४ न्तू꣥ ॥ ग्रि꣣या꣢ऽ३ ।
वा꣡ऽ२᳐र्द्धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्तु꣢षेऽ१ ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ ८)(३३)॥ तै ॥ ४८९ ॥

२८३-२
इ꣥तऊ꣯ती꣯वो꣯अजाऽ६रा꣥म् ॥ प्र꣢हे꣯ता꣡꣯रमप्रहितमुहुवाऽ२३हो꣡इ ।
आ꣢꣯शु꣡ञ्जे꣯ता꣯रꣳहाइता꣯रमुहुवाऽ२३हो꣡ ॥ र꣢थी꣯ । त꣡माऽ२᳐म् । अ꣣तू꣢ ᳐र्ता꣣ऽ२३४न्तू꣥ ॥ ग्रि꣣या꣢ऽ३ ।
वा꣡ऽ२᳐र्द्धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्तौ꣢ऽ३षाऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ १२। प॰ ९। मा॰ ८)(३४)॥ झै ॥ ४९० ॥
२८४-१ आत्रे द्वे।   द्वयोरत्रिर्बृहतीन्द्रः ॥
मो꣥꣯षुत्वा꣯वा ॥ घा꣡ताऽ२३४५ः । चा꣣ऽ२३४ना꣥ । आ꣢꣯ रे꣡꣯अस्मन्निरी꣰꣯ऽ२रमन् । आ꣡रा꣢ऽ१त्ताद्वाऽ२ ।
सा꣡ध꣪मादाऽ२म् । ना꣡आ꣯ग꣢हि ॥ आ꣡इह꣪वासाऽ२न् ॥ ऊ꣡पश्रु꣢धि । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ८)(३५)॥ खै ॥ ४९१ ॥

२८४-२
मो꣥꣯षुत्वा꣯वा꣯घतश्चनाऽ६ए꣥ ॥ आ꣢꣯ रे꣡꣯अस्मन्निरी꣯रमाऽ२न् । हाऽ२ऊ꣡ऊवाऽ२इ । ऊ￿ ।
आ꣢꣯ रा꣡꣯त्ता꣯द्वा꣯सधमा꣯दाऽ२म् । हाऽ२ऊ꣡ऊवाऽ२इ । ऊ￿ऽ२꣮ । नआ᳐गा꣣ऽ२३४ही꣥ ॥ आ꣡इह ।
वासौ꣢वाओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ उ꣢प꣡श्रूऽ२३धा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ १५)(३६४)॥ गु ॥ ४९२ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने सप्तमः प्रपाठकः ॥ ७ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — अष्टमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ षष्ठ खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-८, सा-१३)

२८५-१ गौरीविते द्वे।   द्वयोर्गौरीवितिर्बृहतीन्द्रः ॥
सु꣥नो꣯तसो꣯मपा꣯श्नाऽ६ए꣥ ॥ सो꣡꣯ममिन्द्राऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ । यव꣡श्राऽ२३इणा꣢इ ।
प꣡चता꣢꣯पक्ता꣡इरवसे꣢꣯कृ । णू꣡ । ध्वा꣢ऽ१मीऽ२३द्धा꣢इ ॥ पृ । णा꣡न् । आइत्पॄ꣢ऽ३हा꣢ ॥
णता꣡इमाऽ२३या꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ १०)(१)॥ गौ ॥ ४९३ ॥

२८५-२
सु꣤नो꣣꣯त꣤सो꣥꣯मपा꣯ । आ꣣꣯श्ना꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । इ꣤याहा꣥इ ॥ सो꣡꣯ममिन्द्राऽ२ । हु꣡वेऽ२ । हु꣡वेऽ२हो꣡ ।
याव꣪श्रिणाऽ२इ । प꣡चता꣯पक्ताइरवसे꣢꣯कृ । णू꣡ । ध्वा꣢ऽ१मीऽ२३द्धा꣢इ ॥ पृ । णा꣡न् । आइत्पॄ꣢ऽ३हा꣢ ॥
णता꣡इमाऽ२३या꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १६। मा॰ १०)(२)॥ चौ ॥ ४९४ ॥
२८६-१ वामदेव्यम्।   वामदेवो बृहतीन्द्रः ॥
य꣣स्स꣤त्रा꣯हा꣣꣯विच꣤र्ष꣥णिः । इन्द्रन्ता꣢ऽ३ꣳहू꣤꣯म꣥हे꣤꣯वया꣥म् ॥ इ꣡न्द्रन्तꣳहू꣯म꣢हे꣡꣯वाऽ२३या꣢म् ।
स꣡हस्रमन्यो꣯तुविनृम्ण꣢स꣡त्पाऽ२३ता꣢इ ॥ भवा꣡꣯साऽ२३मा꣢ ॥ त्सू꣡नो꣯वृ꣢धे꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ५)(३)॥ भु ॥ ४९५ ॥
२८७-१ अश्विनोः साम।   अश्विनौ बृहतीन्द्रःअश्विनौ ॥
श꣤ची꣯भिर्नाऽ५श्शची꣯व꣤सू ॥ दि꣡वा꣯नक्तंदि꣢श꣡स्यताम् । मावाऽ२म् । रा꣯ति꣡रुपदसत्क꣢दा꣡꣯चना ॥
आस्माऽ२त् ॥ रा꣡ति:क꣢दो꣡ऽ२३४वा꣥ । चा꣤ऽ५नोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ४)(४)॥ फी ॥ ४९६ ॥
२८८-१ वसिष्ठस्य वासिष्ठस्य वा, पश्रस्य पाश्रस्य वा पश्राणि त्रीणि।   त्रयाणां वसिष्ठो बृहतीन्द्रो वरुणः ॥
य꣥दा꣯कदा ॥ चा꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ढू꣣ऽ२३४षे꣥ । स्तो꣢꣯ ता꣡꣯जरे꣢꣯तम꣡र्ति꣢याऽ३ः । आ꣡दिद्वन्दे꣢ ।
ता꣡व꣪रुणाऽ२३४म् । वि꣣पा꣢ऽ३४गि꣣रा꣢ ॥ धा꣡र्त्ता꣢꣯रां ꣡वीऽ२३ ॥ व्रा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ९। प॰ १०। मा॰ ५)(५)॥ नु ॥ ४९७ ॥

२८८-२
य꣥दा꣯कदा꣯चमा꣯हाउ ॥ ढू꣡षाऽ२इस्तो꣡ताऽ२ । जराइ । तमर्ति꣡यः । आ꣯दिद्वन्दा꣢ ᳐ ॥ औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ ।
हा꣢ऽ३इ । ता꣡वाऽ२᳐रू꣣ऽ२३४णा꣥म् । वि꣢पा꣯गि꣡रा ॥ धर्त्ता꣯रंव्या꣢ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢इ ॥
व्रा꣡ता꣯ना꣢꣯म् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १६। मा॰ ९)(६)॥ पो ॥ ४९८ ॥

२८८-३
य꣤दा꣣ऽ४क꣥ । दा꣣ऽ४च꣥मी꣯ । ढु꣣षा꣢ऽ३इ । स्तो꣤ता꣥ ॥ ज꣢राइ । तमा꣡र्त्ताया꣢ऽ३ः ।
आ꣡दाइद्वन्दा꣢ऽ३इ । ता꣡वाऽ२᳐रू꣣ऽ२३४णा꣥म् ॥ विपा꣯ । गि꣣रौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । धर्त्ता꣯ ।
रं ꣣व्यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ व्र꣤ताऽ५नाम् । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १५। मा॰ १०)(७)॥ णौ ॥ ४९९ ॥
२८९-१ सौभरे द्वे।   सौभरिर्बृहतीन्द्रः ॥
पा꣤꣯हि꣥गा꣯आ꣤ ॥ ध꣢सो꣡꣯माऽ२३दा꣢इ । आ꣡इन्द्रा꣯य꣢मे꣯ । धिया꣡꣯ताऽ२३इथा꣢इ । यः꣡स￿मिश्लो꣢꣯ह꣡रियो꣢꣯र्य꣡: ।
हाइर꣪ण्यायाऽ२: । आ꣡इन्द्रोवा꣢ऽ३श्री꣢ऽ३ ॥ हि꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ । ण्या꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ १०)(८)॥ ढौ ॥ ५०० ॥

२८९-२
पा꣥꣯ । ह्ये꣤पाही꣥ ॥ गा꣢꣯अन्धसो꣡꣯माऽ२३दा꣢इ । आ꣡इन्द्रा꣯य꣢मे꣯ । धिया꣡꣯ताऽ२३इथा꣢इ ॥
य꣡स्समिश्लो꣰꣯ऽ२ह꣡रियो꣯र्यः । हाइर꣪ण्यायाऽ२: ॥ आ꣡इन्द्रोवा꣢ऽ३श्री꣢ऽ३ ॥ हि꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
ण्या꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ १०)(९)॥ णौ ॥ ५०१ ॥
२९०-१ इन्द्रस्य वैयश्वम्।   व्यश्वो बृहतीन्द्रः ॥
उ꣥भयꣳश्रृणवच्चनाऽ६ए꣥ ॥ आ꣡इन्द्रो꣰꣯ऽ२अर्वा꣡꣯गिदंवचाऽ२३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ।
सत्रा꣡꣯चिया꣢꣯मघ꣡वा꣰꣯ऽ२न् । सो꣡ । मापा꣢ऽ३हा꣢इ᳐ । ता꣣ऽ२३४या꣥इ ॥ धि꣢या꣡꣯शविष्ठआऽ२३हो꣡इ ॥
ग꣢मा꣡त् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ११)(१०)॥ खा ॥ ५०२ ॥
२९१-१ इन्द्रस्य सहस्रायुतीये, प्रजापतेर्महोविशीये वा द्वे।   प्रजापतिर्बृहतीन्द्रः(इन्द्रो वा) ॥
म꣥हे꣯चनो꣤वा꣥ ॥ त्वा꣢अद्रा꣣ऽ२३४इवा꣥: । प꣢रा꣯शुल्का꣯ । यऽ३दा꣡यासा꣢ऽ३इ । न꣤स꣥ । ह꣣स्रा꣢ऽ३ ।
या꣡ना꣯यु꣢ता꣯ । यवा꣡श्राइवो꣢ऽ३ ॥ न꣤श꣥ । ता꣣꣯या꣢ऽ३ ॥ शा꣡ऽ२३ता꣤ऽ३ । मा꣢ऽ३४५घोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ६)(११)॥ खू ॥ ५०३ ॥

२९१-२
म꣥हे꣯चा꣢ऽ३न꣤त्वा꣥꣯अ꣤द्रिवा꣥: ॥ पा꣡रा꣯शु꣢ल्का꣯ । यदा꣡या꣢ऽ१साऽ२इ । न꣡सहस्राऽ२ ।
य꣡ना꣯युता꣯याव꣪श्रिवाऽ२: ॥ नशा꣡ताऽ२३या꣢ ॥ शता꣡ऽ२३ । मा꣡ऽ२᳐घा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ म꣢हो꣡꣯विशे꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ५)(१२)॥ धु ॥ ५०४ ॥
२९२-१ इन्द्राण्यास्साम।   इन्द्राणी बृहतीन्द्रः ॥
व꣤स्या꣥꣯ꣳइन्द्रा꣯सिमे꣯ । हा꣤उपितू꣥: ॥ उ꣣ता꣢ ᳐भ्रा꣣ऽ२३४तू꣥: । अ꣢भू꣡ञ्जातौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । मा꣢꣯ता꣡चामौ꣢ ।
वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । छ꣢दयथः । साऽ३मा꣡वासौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ व꣢सू꣡त्वानौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
य꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ । धा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १४। मा॰ १०)(१३)॥ धौ ॥ ५०५ ॥
॥ सप्तदश षष्ठः खण्डः ॥ ६ ॥ दशतिः ॥ १० ॥

॥ अथ सप्तम खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१०)

२९३-१ सौभरम्।   सुभरिर्बृहतीन्द्रः ॥
इ꣣मा꣢ऽ३४इ ॥ इमइ । द्रा꣥꣯यसुन्वाऽ६इरा꣥इ ॥ सो꣡꣯मा꣯सो꣯दध्या꣯शिराः ।
ताꣳ꣢꣯ आ꣡꣯मदा꣯यवश्रहस्तपी꣯तायाइ ॥ हराऽ२३हो꣡ । भ्यां ꣯याऽ२३हो꣡ ॥ हि꣢यो꣡ऽ२३ ।
का꣡ऽ२᳐आ꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १२। प॰ १०। मा॰ ९)(१४)॥ ञ्वो ॥ ५०६ ॥
२९४-१ गार्त्समदम्।   गृत्समदो बृहतीन्द्रः ॥
इ꣤मइन्द्राऽ५मदा꣯य꣤ताइ ॥ सो꣡꣯मा꣯श्चिकित्रउक्थिनाः । मा꣢ऽ१धोऽ२:पा꣡पाऽ२ ।
न꣡उपनो꣯गिराश्शा꣢ऽ१र्णूऽ२ ॥ रा꣯स्व꣡स्तोऽ२३त्रा꣢ ॥ यगि꣡र्वाऽ२३णा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ७)(१५)॥ बे ॥ ५०७ ॥
२९५-१ वाचस्साम।   वाग्बृहतीन्द्रः ॥
आ꣥꣯त्वद्या꣯साऽ६ब꣥र्दुघाम् ॥ हु꣢वा꣡इगा꣰꣯ऽ२यत्र꣡वे꣰꣯ऽ२पसम् । आ꣡इन्द्रान्धे꣢ऽ३नू꣢म् । सुदु꣡घा꣢꣯म् ।
आ꣡ । नि꣪याऽ२᳐मा꣣ऽ२३४इषा꣥म् ॥ उ꣢रु꣡धाऽ२३रा꣢म् ॥ अरं ꣡काऽ२३र्ता꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ११)(१६)॥ म ॥ ५०८ ॥
२९६-१ बार्हदुक्थम्।   बृहदुक्थो बृहतीन्द्रः ॥
न꣤त्वा꣥꣯बृह꣤ । तोऽ५द्रया꣤: ॥ व꣡रन्तइन्द्र꣢वी꣡꣯डाऽ२३वा꣢: । या꣡च्छि꣪क्षासीऽ२ । स्तू꣡व꣪ताइमाऽ२ ।
वते꣡꣯वसू ॥ नकिष्टाऽ२३दा꣢ ॥ मिना꣡꣯ताऽ२३इता꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ७)(१७)॥ ने ॥ ५०९ ॥
२९७-१ नैपातिथम्, वाशम् वा।   निपातिथिर्बृहतीन्द्रः ॥
क꣥ई꣯म्वे꣯दा ॥ सु꣢ता꣡इसा꣢ऽ१चाऽ२ । पि꣡बन्तङ्कद्वायो꣢ऽ१दाधाऽ२इ ।
अयं ꣡य:पुरो꣯विभिनत्ताओ꣢ऽ१जासाऽ२ ॥ मन्दा꣡꣯नाऽ२३श्शी꣢ऽ३ ॥ प्रा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
धा꣣ऽ२३४सा꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ६)(१८)॥ खू ॥ ५१० ॥
२९८-१ तौरश्रवसम्।   तुरश्रवा बृहतीन्द्रः ॥
य꣢दि꣡न्द्राऽ२३शा꣤꣯सो꣯अ꣥व्रताम् ॥ च्या꣢꣯वया꣯स । दाऽ३सा꣡स्पारौ꣢ । वाऽ३२ । अस्मा꣡कामौ꣢ ।
वाऽ३२ । शुं ꣡मघ꣢वन् । पुरू꣡स्पॄहौ꣢ । वाऽ३२ ॥ वसा꣡व्यायौ꣢ । वाऽ३२३ ॥ धि꣢बो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
हा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १३। मा॰ ४)(१९)॥ दी ॥ ५११ ॥
२९९-१ त्वाष्ट्र््यास्साम।   त्वार्ष्टी बृहतीन्द्रो, विश्वोदेवाः ॥
त्व꣣ष्टा꣢ऽ३४ । नो꣯दै꣯वि꣥यम् । व꣤चा꣥: ॥ प꣢र्ज꣡न्यो꣯ब्रह्म꣢ण꣡स्पाऽ२३ती꣢: । पुत्रै꣡꣯र्भ्रा꣯तृभिरदितिर्न्नु꣢पा꣡꣯तूऽ२३ना꣢: ॥
दुष्टा꣡राऽ२३न्त्रा꣢ ॥ मणं ꣡वाऽ२३चा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(२०)॥ घू ॥ ५१२ ॥
३००-१ अदितेः साम।   अदितिर्बृहतीन्द्रः ॥
क꣥दा꣯चना꣯स्ताऽ६री꣥꣯रसाइ ॥ ने꣢न्द्रा᳐सा꣣ऽ२३४श्चा꣥ । सा꣢इदा᳐शू꣣ऽ२३४षा꣥इ । उ꣣पो꣤꣯ पे꣣꣯न्नुम꣤घ꣥वन्म्भू꣣꣯य꣤इ꣥त् ।
हा꣡ऽ२᳐इनू꣣ऽ२३४ता꣥इ ॥ दा꣢न᳐न्दा꣣ऽ२३४इवा꣥ ॥ स्य꣢पो꣡ऽ२३४वा꣥ । च्या꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ९)(२१)॥ गो ॥ ५१३ ॥
३०१-१ आजीगर्तम्।   अजीगतिर्बृहतीन्द्रः ॥
आ꣡इहीऽ२ । आ꣡इहि꣢हा꣡इ । युं ꣢ह््वा꣯हिवाऽ३र्त्रा꣤ऽ३ह꣢ ᳐न्त꣣म꣥ ॥ हा꣡री꣯इ꣢न्द्र । परा꣡वा꣢ऽ१ताऽ२३४ः ।
अ꣣र्वा꣢ऽ३४ची꣣꣯ना꣢: । मा꣡घ꣢वन्त्सो꣡꣯ । मपाइता꣢ऽ१याऽ२३४इ ॥ उ꣣ग्रा꣢ऽ३४ऋ꣣ष्वा꣢ऽ३इ ॥ भि꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
गा꣤ऽ५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ११)(२२)॥ त ॥ ५१४ ॥
३०२-१ माधुच्छन्दसम्।   मधुच्छन्दा बृहतीन्द्रः ॥
त्वा꣣꣯मि꣤दा꣥꣯ । हो꣢इ᳐ । हि꣣यो꣤꣯नरा꣥ऽ६ए꣥ ॥ अ꣢पा꣡इप्य꣢न्वा꣡ । श्राइन्म्भू꣢ ᳐र्णा꣣ऽ२३४या꣥: । स꣡इन्द्र꣢स्तो꣡꣯मवा꣢꣯हसः ।
इहा꣡श्रूधा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४वा꣣꣯हा꣢इ ॥ उपा꣡स्वासा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४वा꣣꣯हा꣢ ॥ रमा꣡꣯गाऽ२३हा꣢ऽ३४३इ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ १०)(२३)॥ बौ ॥ ५१५ ॥
॥ दश सप्तमः खण्डः ॥ ७ ॥ दशतिः ॥ १ ॥

॥ अथ अष्टम खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-११)

३०३-१ उषसस्साम।   उषा बृहतीन्द्रः उषा ॥
प्र꣢ता꣡इ । इ꣣हा꣢ । आ꣡इ । इ꣣हा꣢ । उवद । शिऽ३आ꣡यती꣢ । आ꣡यती꣢ ॥ उच्छा꣡ । इ꣣हा꣢ । आ꣡ऽ ।
इ꣣हा꣢ । ती꣯दु । हिऽ३ता꣡दि꣪वाऽ२: । आ꣡दि꣪वाऽ२: ॥ अपो꣡ । इ꣣हा꣢ । ओ꣡ । इ꣣हा꣢ । मा꣡ही꣯वृ꣢णुते꣯च ।
क्षुषा꣡त꣪माऽ२: । आ꣡त꣪माऽ२: ॥ ज्यो꣯ता꣡इ । इ꣣हा꣢ । आ꣡इ । इ꣣हा꣢ । कृणो꣯ । तिऽ३सू꣡न꣪रीऽ२ ।
ओ꣡न꣪रीऽ२३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ३०। मा॰ १०)(२४)॥ मौ ॥ ५१६ ॥
३०४-१ अश्विनोः साम।   अश्विनौ बृहतीन्द्रः (अश्विनौ वा) ॥
इ꣢मा꣯उवां ꣯दिविष्ट᳐या꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही ॥ उ꣢स्रा꣯हवन्ते꣯अश्विना꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही ॥
अ꣢यंवा꣯मह्वे꣯वसे꣯शची꣯व᳐सू꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही ॥ वि꣢शंविशंहिगच्छथा꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १२। प॰ ६। मा॰ ७)(२५)॥ चे ॥ ५१७ ॥
३०५-१ अश्विनोः संयोजनम्।   अश्विनौ बृहतीन्द्रः (अश्विनौ वा) ॥
कु꣤ष्ठᳲ꣥ को꣤꣯ वा꣥꣯मश्विना꣯आ꣤ ॥ ता꣡पा꣯नो꣢꣯दे꣯ । वा꣡म꣪र्ताया꣢ऽ३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ऽ३४इ । घ्न꣣ता꣢ऽ३४वा꣣꣯मा꣢ऽ१ ।
श्नाया꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ऽ३४इ ॥ क्ष꣣पा꣢ऽ३४मा꣣꣯णा꣢: । आ꣡ꣳशूना꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ऽ३४इ ।
इ꣣त्था꣢ऽ३४मु꣣वा꣢ऽ३त् । उ꣡वाऽ२᳐न् । य꣣था꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ १४। मा॰ ९)(२६)॥ भ्वो ॥ ५१८ ॥
३०६-१ अश्विनोः साम।   अश्विनौ बृहतीन्द्रः (अश्विनौ वा) ॥
अ꣣या꣢ऽ३४म् । अयंवां ꣥꣯म꣤ । धु꣥मत्ताऽ६मा꣥: ॥ सु꣢त꣡स्सो꣯मो꣰꣯ऽ२दि꣡विष्टि꣢षु । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३४ ।
ओ꣣꣯हा꣢ । ता꣡मश्विना꣯पिबतंतिरो꣯अन्हि꣢यम् । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३४ । ओ꣣꣯हा꣢ ॥ ध꣡त्ताꣳरा꣢ऽ१त्नाऽ२ ।
ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३४ । ओ꣣꣯हा꣢ ॥ निदा꣡ऽ२३ । शू꣡ऽ२᳐षा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ १८। मा॰ ५)(२७)॥ ञ्वु ॥ ५१९ ॥
३०७-१ सोमसाम।   सोमो बृहतीन्द्रः (सोमो वा) ॥
आ꣥꣯त्वा꣯सो꣯मा ॥ स्य꣢ । ग꣡ल्दाऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । स꣡दा꣰꣯ऽ२या꣡꣯चन्न꣢हं ꣡जियाऽ२३ ।
भू꣡र्णा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । मृ꣢ग꣡न्नसवने꣢꣯षुचुक्रुधम् ॥ कई꣡꣯शाऽ२३ना꣢म् ॥ ना꣡या꣯चि꣢षत् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ११। मा॰ ७)(२८)॥ पे ॥ ५२० ॥
३०८-१ आजमायवम्।   अजमायुर्बृहतीन्द्रः ॥
अ꣤ध्वर्यो꣯द्राऽ५वया꣯तु꣤वाम् ॥ सो꣡꣯ममिन्द्राऽ२: । पिपा꣡सा꣢ऽ१तीऽ२ । उ꣡पो꣰꣯ऽ२नू꣯नं ꣡युयु꣢जे꣯वृ ।
षा꣡णा꣢ऽ१हारीऽ२ ॥ आ꣯चा꣡जाऽ२३गा꣢ ᳐ ॥ म꣣वृत्र꣢हा꣡ । औ꣢ऽ३᳐हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ३)(२९)॥ ञि ॥ ५२१ ॥
३०९-१ समुद्रप्रैयमेधम्।   प्रियमेधा बृहतीन्द्रः ॥
अ꣥भी꣯षतस्तदा꣯हाउ ॥ भ꣡रा । इन्द्रज्या꣯य:क꣢नी꣡꣯याऽ२३सा꣢: । पुरू꣯व꣡सुर्हिमघवन्ब꣢भू꣡꣯वाऽ२३इथा꣢ ॥
भ꣡राइभाऽ२३रे꣢ ॥ चह꣡ह्रय꣢: । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(३०)॥ घू ॥ ५२२ ॥
३१०-१ वैरूपे द्वे।   द्वयोरिन्द्रो बृहतीन्द्रः ॥
य꣢दि꣡न्द्राऽ२३या꣤꣯वत꣥स्तुवाम् ॥ ए꣢꣯ ता꣡꣯वदहमी꣯शी꣯या । स्तो꣯ता꣯राऽ२३मी꣢त् । दा꣡धिषे꣢꣯ ।
रदा꣡वा꣢ऽ१साऽ२उ ॥ नपा꣡꣯पाऽ२३४त्वा꣥ ॥ या꣡रौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ६)(३१)॥ ढू ॥ ५२३ ॥

३१०-२
य꣥दिन्द्र꣣या꣢꣯व꣣त꣤स्तु꣥वाम् ॥ आ꣡इता꣢ऽ३ । वा꣡दा꣢ऽ३हा꣤मी꣥ । शा꣡या꣢ऽ३ऽ२ । स्तो꣡ता꣢꣯रा꣡मीऽ२३त् ।
द꣤धिषे꣥꣯रदा । वा꣡सा꣢ऽ३ऽ२उ ॥ ना꣡पा꣢꣯पा꣡त्वाऽ२३ ॥ या꣡रौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५इशोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ७)(३२)॥ ने ॥ ५२४ ॥
३११-१ वैश्वदेवम्।   विश्वेदेवा बृहतीन्द्रः ॥
त्व꣤मि꣥न्द्रो꣤हाइ । प्र꣥तू꣯र्तिश्वो꣤वा꣥ ॥ आ꣡भिवि꣢श्वा꣯: । असा꣡इस्पा꣢ऽ१र्द्धाऽ२: । आ꣡शस्ति꣢हा꣯जनिता꣯वृ ॥
त्रा꣡तू꣢ऽ१रासाऽ२इ ॥ त्वा꣡न्तू꣢ऽ१र्याऽ२᳐ ॥ त꣣रुष्य꣢ता꣡ । औ꣢ऽ३᳐हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ६)(३३)॥ तू ॥ ५२५ ॥
३१२-१ पुरीषम्।   अथर्वाबृहतीन्द्रः ॥
प्र꣥यो꣯रिरिक्षओ꣯जसाऽ६ए꣥ ॥ दि꣢व꣡स्सदो꣰꣯ऽ२भ्यस्प꣡रि । नत्वावि꣪व्या । औ꣢꣯हो꣭ऽ३वा꣢ । चा꣡ ।
रजः । औ꣢꣯हो꣭ऽ३वा꣢इ । द्रपा꣡꣯र्थिवाम् ॥ अतिवाऽ२३इश्वा꣢म् ॥ वा꣡वक्षि꣢थ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ ८)(३४)॥ गै ॥ ५२६ ॥
॥ एकादश अष्टमः खण्डः ॥ ८ ॥ दशतिः ॥ २ ॥

॥ अथ नवम खण्डः॥ (ऋ-१, सा-२)

३१३-१ प्राकर्षम्।   प्रकर्षः त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
अ꣢सौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢इ᳐ । वी꣣ऽ२३४दे꣥ । वा꣡ङ्गो꣯ऋ । जी꣢ ᳐क꣣म꣤न्धा꣥: ॥ न्यौ꣢꣯हो꣯वाऽ३हा꣢ ᳐ । स्मी꣣ऽ२३४नी꣥ ।
द्रो꣡जनु । षे꣢ ᳐मु꣣वो꣤चा꣥ ॥ बो꣢꣯धौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢इ᳐ । मा꣣ऽ२३४सी꣥ । त्वा꣡हरि । अ꣢श्व꣣य꣤ज्ञैः꣥ ॥ बो꣢꣯धौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢इ᳐ ।
ना꣣ऽ२३४स्तो꣥ । म꣢म꣡न्ध । सो꣢ऽ३४३ । मा꣢ऽ३दा꣤ऽ५᳚इषूऽ६५६ ॥
(दी॰ ११। प॰ १७। मा॰ ७)(३५)॥ खे ॥ ५२७ ॥

३१३-२ निहवः निहवम् वा।   वसिष्ठस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
आ꣡इही꣢ऽ३ । आ꣡इही꣢ ᳐ । ए꣣꣯हिया꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢इ । असा꣯विदे꣯वङ्गो꣯ऋजी꣯कऽ३मा꣡न्धा꣢ऽ३ः ।
आ꣡न्धाः꣢ ᳐ । अ꣣न्धा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢इ ॥ न्यस्मिन्निन्द्रो꣯जनुषे꣯मुऽ३वो꣡चा꣢ऽ३ । वो꣡चा꣢ ᳐ । वो꣣꣯चा꣢ ᳐ ।
ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢इ ॥ बो꣯धा꣯मसित्वा꣯हर्यश्वऽ३या꣡ज्ञै꣢ऽ३ः । या꣡ज्ञैः꣢ ᳐ । य꣣ज्ञा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
हा꣢इ ॥ बो꣯धा꣯नस्तो꣯ममन्धसो꣯मऽ३दा꣡इषू꣢ऽ३ । आ꣡इषू꣢ ᳐ । ए꣣꣯षुवा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢इ ।
आ꣡इही꣢ऽ३ । आ꣡इही꣢ ᳐ । ए꣣꣯हिया꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १९। प॰ ३२। मा॰ १६)(३६)॥ थू ॥ ५२८ ॥
॥ इति तृतीयः प्रपाठकः ॥ ३ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गानेऽष्टमस्यार्धः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — अष्टमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ नवम खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-९, सा-१७)

३१४-१ योनिनी द्वे।   द्वयोर्गृत्समदस्ः त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
यो꣤ह्नी꣥: ॥ त꣡आइ । द्रा꣢ऽ३स꣡द । ना꣢ ᳐अ꣣का꣤री꣥ ॥ ता꣤मा꣥ । नृ꣡भाइः । पुरुहू꣢ऽ३ । ता꣢ ᳐प्र꣣या꣤ही꣥ ॥
आ꣤सा꣥: । य꣡था । नो꣢ऽ३अ꣡वि । ता꣢ ᳐वृ꣣ध꣤श्ची꣥त् ॥ दा꣤दा꣥: । व꣡सू । नी꣢ऽ३म꣡म । दा꣢ऽ३४३ः ।
चा꣢ऽ३सो꣤ऽ५᳚माऽ६५६इः ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ १७। मा॰ १३)(१)॥ यि ॥ ५२९ ॥

३१४-२
यो꣡नि꣢ष्ट꣣आ꣢इ᳐ । द्र꣣स꣤दना꣥इ । हो꣤वा꣥ ॥ आ꣡का꣢ऽ३ । रा꣢इ᳐त꣣मा꣤꣯नृभी꣥: । हो꣤वा꣥ । पू꣡ । रु꣢हूऽ३ ।
ता꣢ ᳐प्र꣣या꣤꣯ही꣥ । हो꣤वा꣥ । आ꣡सो꣢꣯य꣣था꣢ ᳐ । नो꣣꣯अ꣤विता꣥ । हो꣤वा꣥ ॥ वा꣡र्द्धा꣢ऽ३ः । चा꣢इ᳐द्द꣣दो꣤꣯वसू꣥ । हो꣤वा꣥ ॥
ना꣡इम꣢म꣣दः꣢ ᳐ । च꣣सो꣤꣯मै꣥: । हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ २१। मा॰ १२)(१२)॥ का ॥ ५३० ॥
३१५-१ औरुक्षये द्वे।   द्वयोरुरुक्षयस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
अ꣤द꣥र्दरू꣤त् ॥ स꣢मसृजो꣯वि꣡खानि꣢ । त्वम꣡र्णाऽ२३४वा꣥न् । ब꣢द्बधा꣯ना꣯ꣳअ꣡राम्णा꣢: । महा꣡꣯न्ताऽ२३४मी꣥ ।
द्र꣢पर्वतंवि꣡याद्द्वा꣢: ॥ सृजा꣡द्धाऽ२३४रा꣥: ॥ अ꣡व꣢य꣡द्दा꣢꣯न । वा꣡ऽ२३न्हा꣢ऽ३४३न् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ८)(३)॥ पै ॥ ५३१ ॥

३१५-२
अ꣤द꣥र्दरु꣤त्स꣥म꣤सृ꣥जा꣤: ॥ वि꣡खा꣯नि । त्वमर्णवा꣯न्बद्बधा꣯ना꣯ꣳअ꣢रा꣡ऽ२३म्णा꣢: ।
महा꣡꣯न्तमिन्द्रपर्वतंवि꣢या꣡ऽ२३द्वा꣢: ॥ सृजा꣡द्धा꣢꣯राऽ२: ॥ अ꣡वा꣰꣯ऽ२य꣡द्दा꣢꣯न । वा꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡न् ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ७)(४)॥ भे ॥ ५३२ ॥
३१६-१ पार्थेद्वे।   द्वयोः (पृथी वैन्यः) पार्थस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
सू꣤ष्वा꣥णा꣤सा꣥: ॥ इ꣣न्द्र꣢स्तु꣣ । म꣢सि꣣त्वा꣥ । स꣤निष्य꣣न्त꣤श्चि꣥त्तुविनृ । म्ण꣣वाऽ२३४जा꣥म् । आ꣯नः ।
भ꣣रा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । सुवितं ꣤यस्य꣥को꣯ । ना꣤ ॥ ताना꣥त्मा꣤ना꣥ । स꣢हिया꣯ । माऽ३४३ ।
तू꣢ऽ३वो꣤ऽ५᳚ताऽ६५६ः ॥
(दी॰ ३। प॰ १३। मा॰ ५)(५)॥ डु ॥ ५३३ ॥

३१६-२
ओ꣢ऽ३हो꣢ऽ३हो꣢इ᳐ । सू꣣ऽ२३४ष्वा꣥ । णा꣡꣯साः । इ꣣न्द्र꣢स्तु꣣ । म꣢ ᳐सि꣣त्वा꣥ ॥ ओ꣢ऽ३हो꣢ऽ३हो꣢इ᳐ । सा꣣ऽ२३४नी꣥ ।
ष्य꣡न्ताः । ची꣢ऽ३त्तु꣡वि । नृ꣢ ᳐म्ण꣣वा꣤जा꣥म् ॥ ओ꣢ऽ३हो꣢ऽ३हो꣢इ᳐ । आ꣣ऽ२३४ना꣥: । भ꣡रा । सु꣢विताऽ३म् ।
य꣢ ᳐स्य꣣को꣤ना꣥ ॥ ओ꣢ऽ३हो꣢ऽ३हो꣢इ᳐ । ता꣣ऽ२३४ना꣥ । त्म꣡ना । स꣢हिया꣡꣯ । मा꣢ऽ३४३ । तू꣢ऽ३वो꣤ऽ५᳚ताऽ६५६ः ॥
(दी॰ २। प॰ २१। मा॰ १०)(६)॥ चौ ॥ ५३४ ॥
३१७-१ सौपर्णेद्वे।   द्वयोः सुपर्णस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
ज꣥गृह्मा꣯ते꣯दक्षिणमो꣯हा꣯ओ꣯हाऽ६ए꣥ ॥ इ꣡न्द्रहाऽ२३स्ता꣢म् । वसू꣯य꣡वो । वसुपा꣢ऽ३ । ता꣢इ᳐व꣣सू꣥ ।
ना꣢म् । ओऽ३ । हा꣢ । ओऽ३ । हा꣢ऽ३ए꣢ ॥ विद्मा꣡꣯हित्वा । गो꣯पती꣢ऽ३म् । शू꣢ ᳐र꣣गो꣥ । ना꣢म् ।
ओऽ३ । हा꣢ । ओऽ३ । हा꣢ऽ३ए꣢ ॥ अस्म꣡भ्यंचाइ । त्रा꣢ऽ३म्वृ꣡ष । ण꣢ ᳐ꣳर꣣यि꣥म् । दा꣢: । ओऽ३ ।
हा꣢ । ओऽ३ । हा꣢ऽ३ए꣢ ॥ र꣡याइन्दा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ । औ꣢꣯ हो꣡꣯ औ꣢꣯हो꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡हाउ ।
वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ ३१। मा॰ १७)(७)॥ क्रे ॥ ५३५ ॥

३१७-२
ज꣥गृह्मा꣤꣯ ते꣥꣯द꣤क्षि꣥णम् । औ꣯हौ꣤꣯होवाहा꣥इ ॥ इ꣢न्द्रा᳐हा꣣ऽ२३४स्ता꣥म् । व꣢सू꣯य꣡वो । वसुपा꣢ऽ३ । ता꣢इ᳐व꣣सू꣥ ।
नौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ । विद्मा꣡꣯हित्वा । गो꣯पती꣢ऽ३म् । शू꣢ ᳐र꣣गो꣥ । नौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
हा꣢ऽ३हा꣢इ । अस्म꣡भ्यंचाइ । त्रा꣢ऽ३म्वृ꣡ष । ण꣢ ᳐ꣳर꣣यि꣥म् । दौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢ऽ३४ ।
औ꣥꣯ हो꣯꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ २३। मा॰ १२)(८)॥ द्रा ॥ ५३६ ॥

३१७-३ वात्सप्राणि त्रीणि।   त्रयाणां वत्सप्रिस्त्रिष्टुबिन्द्रः। तृतीयं महावात्सप्रम् ॥
हो꣡ईऽ२ । हो꣡ईऽ२ । हो꣡ईऽ२ । जगृह्मा꣡꣯ ते꣢꣯द꣡क्षि꣢णम् । इन्द्रहा꣡स्ताऽ२म् । हा꣡स्ताऽ२म् । हा꣡स्ताऽ२म् ॥
वसू꣯य꣡वो꣰꣯ऽ२वसुप । ते꣯वसू꣡नाऽ२म् । सू꣡नाऽ२म् । सू꣡नाऽ२म् ॥ विद्मा꣡꣯हित्वा꣢꣯ गो꣡꣯पति꣢म् । शू꣯रगो꣡नाऽ२म् ।
गो꣡नाऽ२म् । गो꣡नाऽ२म् ॥ अस्म꣡भ्यं ꣢चित्रं ꣡वृष꣢ । णꣳरया꣡इन्दाऽ२: । आ꣡इन्दाऽ२: । आ꣡इन्दाऽ२: ।
हो꣡ईऽ२ । हो꣡ईऽ२ । हो꣡याऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ २४। मा॰ २३)(९)॥ घ्रि ॥ ५३७ ॥

३१७-४
आ꣤औ꣥꣯होइ । आ꣤औ꣥꣯होइ । आ꣤औ꣥꣯होऽ६वा꣥ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣡ऽ२३हो꣯वा꣢ ।
जगृह्मा꣡꣯ताइ । दक्षिणा꣢ऽ३म् । इ꣢ ᳐न्द्र꣣ह꣤स्त꣥म् । द्र꣤हस्त꣥म् । द्र꣤हस्ता꣥म् ॥ व꣢सू꣯य꣡वो । वसुपा꣢ऽ३ ।
ता꣢इ᳐व꣣सू꣤ना꣥म् । व꣤सूना꣥म् । व꣤सूना꣥म् ॥ वि꣢द्मा꣡꣯हित्वा । गो꣯पती꣢ऽ३म् । शू꣢ ᳐र꣣गो꣤ना꣥म् । र꣤गोना꣥म् ।
र꣤गोना꣥म् ॥ अ꣢स्म꣡भ्यंचाइ । त्रा꣢ऽ३म्वृ꣡ष । ण꣢ ᳐ꣳर꣣यि꣤न्दा꣥: । र꣤यिन्दा꣥: । र꣤यिन्दा꣥: ॥ आ꣤औ꣥꣯होइ ।
आ꣤औ꣥꣯होइ । आ꣤औ꣥꣯होऽ६वा꣥ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣡ऽ२३हो꣯वा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १४। प॰ ३४। मा॰ ३१)(१०)॥ ध्र ॥ ५३८ ॥

३१७-५ महावात्सप्रोत्तरम्।
हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ । ओ꣡ । होहोवा꣢ । (द्वे त्रिः) । जगृह्मा꣡꣯ताइ । दक्षिणा꣢ऽ३म् । इ꣢ ᳐न्द्र꣣ह꣤स्त꣥म् ।
द्र꣤हस्त꣥म् । द्र꣤हस्ता꣥म् ॥ व꣢सू꣯य꣡वो । वसुपा꣢ऽ३ । ता꣢इ᳐व꣣सू꣤ना꣥म् । व꣤सूना꣥म् । व꣤सूना꣥म् ॥
वि꣢द्मा꣡꣯हित्वा । गो꣯पती꣢ऽ३म् । शू꣢ ᳐र꣣गो꣤ना꣥म् । र꣤गोना꣥म् । र꣤गोना꣥म् ॥ अ꣢स्म꣡भ्यंचाइ । त्रा꣢ऽ३म्वृ꣡ष ।
ण꣢ ᳐ꣳर꣣यि꣤न्दा꣥: ॥ र꣤यिन्दा꣥: । र꣤यिन्दा꣥: ॥ हा꣥꣯उहा꣯उहा꣯उ । ओ꣡ । होहोवा꣢ । ओ꣡ । होहोवा꣢ । ओ꣡ ।
हो । होऽ᳐२ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १२। प॰ ३८। मा॰ २३)(११)॥ श्रि ॥ ५३९ ॥
३१८-१ गौरीवितम्।   गौरीवितिस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
इ꣢न्द्र᳐न्ना꣣ऽ२३४रो꣥ । ने꣢मा᳐धा꣣ऽ२३४इता꣥ । ह꣢व꣡न्ताऽ२३इ ॥ य꣢त्पा᳐रा꣣ऽ२३४या꣥: । यू꣢ना᳐जा꣣ऽ२३४ता꣥इ ।
धि꣢या꣡स्ताऽ२३ः ॥ शू꣢रो᳐ना꣣ऽ२३४र्षा꣥ । ता꣢श्रा᳐वा꣣ऽ२३४सा꣥: । च꣢का꣡माऽ२३इ ॥ आ꣢गो᳐मा꣣ऽ२३४ती꣥ ।
व्र꣢जा᳐इभा꣣ऽ२३४जा꣥ । त्व꣡न्ना꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ । ए꣢ऽ᳐३ । उ꣡पा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ १४। मा॰ ९)(१२)॥ लो ॥ ५४० ॥
३१९-१ वैदन्वतम्।   विदन्वाꣳस्त्रिष्टुबिन्द्रः (सूर्योवा) ॥
व꣥यो꣯हा꣯हाउ ॥ सू꣡पर्णा꣯उपसे꣯दुराइन्द्र꣢म् । प्रिय꣡मे꣯धा꣯ऋषयो꣯नाध꣪माऽ२३ना꣢: ।
अ꣡पध्वा꣯न्तमू꣯र्णुहिपू꣯र्धि꣢चा꣡ऽ२३क्षू꣢: ॥ मुमुग्धि꣡ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ ॥ आ꣡ऽ२१ । स्मा꣢ऽ३न्नि꣡ध ।
ये꣢ऽ३४३ । वा꣢ऽ३बा꣤ऽ५᳚द्धाऽ६५६न् ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ ९)(१३)॥ मो ॥ ५४१ ॥
३२०-१ यामम्।   यमस्त्रिष्टुबिन्द्रः) यमो वा) ॥
आ꣡ऽ२या꣡म् । अ꣣या꣢꣯य꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ । आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२ । ना꣡꣯के꣯सुपार्णमुपयात्प꣣त꣢न्ता꣡म् ।
प꣣त꣢न्त꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ । आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२ ॥ आ꣡ऽ२या꣡म् । अ꣣या꣢꣯य꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ ।
आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२ । हृ꣡दा꣯वे꣯नान्तो꣯अभ्यचाक्ष꣣त꣢त्वा꣡ । क्ष꣣त꣢त्वौ꣭ऽ३ । हो꣢ऽ३इ । आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२ ॥
आ꣡ऽ२या꣡म् । अ꣣या꣢꣯य꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ । आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२ । हि꣡रण्यपाक्षंवरुणास्य꣣दू꣢꣯ता꣡म् ।
स्य꣣दू꣢꣯त꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ । आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२ ॥ आ꣡ऽ२या꣡म् । अ꣣या꣢꣯य꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ ।
आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२ । य꣡मस्ययोनौ꣯शकुनांभु꣣र꣢ण्यू꣡म् । भु꣣र꣢ण्यु꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ । आ꣡ऽ२इ ।
ऊ꣡ऽ२ ॥ आ꣡ऽ२या꣡म् । अ꣣या꣢꣯य꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३इ । आ꣡ऽ२इ । ऊ꣡ऽ२꣮ । वा꣯हाऽ३१उवाऽ२३ ॥
ए꣢ऽ᳐३ । दि꣡वम् । (द्वे द्विः) । ए꣢ऽ᳐३ । दि꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ १४। प॰ ५२। मा॰ ३९)(१४)॥ थो ॥ ५४२ ॥
३२१-१ ऋतसामनी द्वे।   ऋतस्त्रिष्टुबिन्द्रः (बृहस्पतिर्वा) ॥
ब्र꣡ह्मा । ब्राऽ२३ह्मा꣢ । जज्ञा꣯नंप्रथमंपु꣡रास्ता꣢त् । वि꣡साइ । वाऽ२३इसी꣢ । मतस्सुरुचो꣯वे꣯न꣡आद्वा꣢: ॥
स꣡बू । साऽ२३बू꣢ । ध्निया꣯उपमा꣯अस्य꣡वाइष्ठाः꣢ ॥ स꣡ताः । साऽ२३ता꣢: । चयो꣯निमसतश्च꣡वाइवा꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ १४)(१५)॥ घी ॥ ५४३ ॥

३२१-२
हु꣡वे꣭ऽ३हा꣢ऽ३इ । हु꣡वे꣭ऽ३हा꣢ऽ३इ । हि꣡षा꣭ऽ३या꣢ । ब्र꣡ह्म꣢जज्ञा꣡ । ना꣢ऽ३म्प्र꣡थ । म꣢ ᳐म्पु꣣र꣤स्ता꣥त् ॥
वि꣢सी꣡꣯मताः । सु꣢रु꣡चः । वे꣢ ᳐न꣣आ꣤वा꣥: ॥ स꣢बु꣡ध्नियाः । उ꣢प꣡मा꣯: । अ꣢ ᳐स्य꣣वि꣤ष्ठा꣥: ॥ स꣢त꣡श्चयो ।
नी꣢ऽ३म꣡स । त꣢ ᳐श्च꣣वि꣤वा꣥: ॥ हु꣡वे꣭ऽ३हा꣢ऽ३इ । हु꣡वे꣭ऽ३हा꣢ऽ३इ । हि꣡ । षाऽ२᳐: । आ꣣ऽ२३४ ।
औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ऋ꣢त꣡ममृत꣢म् । ए꣢ऽ᳐३ । ऋ꣢त꣡ममृत꣢म् । एऽ᳐३ । ऋ꣢त꣡ममृता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ४। प॰ २७। मा॰ १७)(१६)॥ थे ॥ ५४४ ॥
३२२-१ वारवन्तीयम्।   इन्द्रस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
अ꣥पू꣯र्व्या꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ ॥ पु꣣रु꣢त꣣ । मा꣢ ᳐नि꣣य꣤स्मै꣥ । म꣢हे꣡꣯वी꣯रा । या꣢ऽ३त꣡व । सा꣢इ᳐तु꣣रा꣤या꣥ । वि꣢रप्शि ।
ना᳐इव꣣श्रि꣤णे꣥꣯ । शा꣢ऽ३४३न्त꣢मा꣣꣯नि꣥ ॥ । स्मा꣢ऽ३इस्थ꣡वि । रा꣢ ᳐य꣣त꣤क्षू꣥: ॥ स्थ꣣वि꣤रा꣥꣯यतक्षुः । स्थ꣢वि ।
राऽ३४३ । या꣢ऽ३ता꣤ऽ५᳚क्षूऽ६५६ः ॥ स्थ꣡विरा꣢꣯यतक्षू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १०। प॰ १७। मा॰ ९)(१७)॥ फो ॥ ५४५ ॥
॥ एकोनविंशतिः प्रथमः, नवमः खण्डः ॥ ९ ॥ दशतिः ॥ ३ ॥

॥ अथ दशम खण्डः॥ (ऋ-९, सा-१७)

३२३-१ क्षुरपविणी द्वे।   इन्द्रस्त्रिष्टुबिन्द्रः (इन्द्राबृहस्पती वा) ॥
अ꣢वद्रा꣣ऽ२३४प्सा꣥: । आ꣢ ᳐ꣳशूमा꣣ऽ२३४ती꣥म् । आ꣡ती꣢ऽ३ । ष्ठाऽ२३꣡४꣡५꣡त् ॥ ई꣢या᳐ना꣣ऽ२३४:कॄ꣥ ।
ष्णो꣢दा᳐शा꣣ऽ२३४भी꣥: । सा꣡हा꣢ऽ३ । स्राऽ२३꣡४꣡५꣡इः ॥ आ꣢व᳐त्ता꣣ऽ२३४मी꣥ ।
द्र꣢श्शा᳐ची꣣ऽ२३४या꣥ । धा꣡मा꣢ऽ३ । ताऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥ आ꣢प᳐स्नी꣣ऽ२३४ही꣥ । ति꣢न्नॄ᳐मा꣣ऽ२३४णा꣥: ।
अ꣡धाऽ२᳐द्रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢धऽ३द्रा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ २। प॰ १६। मा॰ १०)(१८)॥ चौ ॥ ५४६ ॥

३२३-२
अ꣥वद्रप्साऽ६ए꣥ ॥ आ꣡ꣳशु꣢म꣣ती꣯मति꣢ष्ठा꣡ऽ२३त् । ई꣣꣯या꣢ ᳐न꣣ᳲकृ꣤ष्णा꣥: । दा꣡श꣢भि꣣स्सह꣢स्रा꣡ऽ२३इः ॥
आ꣯व꣢ ᳐त्त꣣मि꣤न्द्रा꣥: । शा꣡चि꣢ ᳐या꣣꣯धम꣢न्ता꣡ऽ२३म् ॥ अपा꣢ ᳐स्नी꣣꣯हि꣤ती꣥म् । नृ꣡मणाऽ२३ः । अ꣤धाऽ५द्राः ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ११)(१९)॥ प ॥ ५४७ ॥

३२३-३ स्यैमरश्मे द्वे।   स्युमरश्मिस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
अ꣣व꣤द्रप्सो꣣꣯ अ꣤ꣳशु꣥म꣤ती꣥꣯म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३४इ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ आ꣡ती꣢ऽ३ष्ठा꣢त् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३४इ ।
औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । ई꣣꣯या꣢ ᳐न꣣ᳲकृ꣤ष्णा꣥: । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३४इ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । दा꣡श । भा꣢इ᳐स्स꣣ह꣤स्रै꣥: । औ꣭ऽ३
हो꣢ऽ३४इ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । आ꣣꣯व꣢त्त꣣मि꣤न्द्रा꣥: । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३४इ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । शा꣡चि । या꣢ ᳐ध꣣म꣤न्ता꣥म् ।
औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३४इ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ अ꣣पा꣢ ᳐स्नी꣣꣯हि꣤ती꣥म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३४इ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ।
नृ꣡माऽ२᳐णा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢धऽ३द्रा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ २१। प॰ २५। मा॰ १८)(२०)॥ ङै ॥ ५४८ ॥

३२३-४
अ꣣व꣤द्रप्सो꣣꣯ अ꣤ꣳशु꣥म꣤ती꣥꣯म् । ए꣢ऽ᳐३ । औ꣢ऽ३हो꣤ऽ५वा ॥ आ꣡ताऽ२३४५इष्ठाऽ६५६त् ।
ई꣢꣯या꣯नᳲ꣡कृ꣢ष्णो꣡꣯द꣢श꣡भि꣢स्सह꣡स्रैः꣢꣯ ॥ आ꣡꣯वत्तम् । आइ । द्रा꣢ऽ३श्श꣡चि । या꣢ ᳐ध꣣म꣤न्ता꣥म् ॥
अ꣤प꣥स्नी꣤꣯हि꣥तिन्नृम꣤णा꣥꣯: । ओ꣤वा꣥ । अ꣢धद्राऽ३आ꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ १०)(२१)॥ थौ ॥ ५४९ ॥
३२४-१ द्यौताने, धृषतो मारुतस्य सामनी वा द्वे।   द्युतानस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
हा꣢ऽ᳐३ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢इ । वृत्र꣡स्यत्वा । श्व꣢स꣡था꣯त् । ई꣢ ᳐ष꣣मा꣤णा꣥: ॥ वि꣢श्वे꣡꣯दे꣯वाः ।
अजहू꣢ऽ३ः । ये꣢ ᳐स꣣खा꣤या꣥: ॥ म꣢रु꣡द्भिराइ । द्रा꣢ऽ३स꣡खि । य꣢ ᳐न्ते꣣꣯अ꣤स्तू꣥ ॥ अ꣢थे꣡꣯मा꣯वाइ । श्वा꣢ऽ३:पृ꣡त ।
ना꣢ ᳐ज꣣या꣤सी꣥ । हा꣢ऽ᳐३ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ आ꣡औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ २२। मा॰ १०)(२२)॥ ठौ ॥ ५५० ॥

३२४-२
हो꣡ये꣢ऽ३ । ह꣢या꣡ये꣢ऽ३ । हया꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । हा꣢इ । वृत्र꣡स्यत्वा । श्व꣢स꣡था꣯त् । ई꣢ ᳐ष꣣
मा꣤णा꣥: ॥ वि꣢श्वे꣡꣯दे꣯वाः । अजहू꣢ऽ३ः । ये꣢ ᳐स꣣खा꣤या꣥: ॥ म꣢रु꣡द्भिराइ । द्रा꣢ऽ३स꣡खि । य꣢न्ते꣣꣯अ꣤स्तू꣥ ॥
अ꣢थे꣡꣯मा꣯वाइ । श्वा꣢ऽ३:पृ꣡त । ना꣢ ᳐ज꣣या꣤सी꣥ । हो꣡ये꣢ऽ३ । ह꣢या꣡ये꣢ऽ३ । ह꣣या꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ।
हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । आ꣡औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ २५। मा॰ ११)(२३)॥ म ॥ ५५१ ॥
३२५-१ सोमसामनी द्वे।   द्वयोः सोमस्त्रिष्टुबिन्द्रः (सूर्योवा) ॥
वी꣤धू꣥म् ॥ द꣡द्राद꣪द्रा । णा꣢ऽ३ꣳस꣡म । ना꣢इ᳐ब꣣हू꣤ना꣥म् ॥ यू꣤वा꣥ । न꣡ꣳसान꣪ꣳसा । ता꣢ऽ३म्प꣡लि ।
तो꣢ ᳐ज꣣गा꣤रा꣥ ॥ दे꣤वा꣥ । स्य꣡पास्य꣪पा । श्या꣢ऽ३का꣡꣯वि । यं ꣢ ᳐म꣣हि꣤त्वा꣥ ॥ आ꣤द्या꣥ । म꣡माम꣪मा । रा꣢ऽ३स꣡हि ।
या꣢ऽ३४३ः । सा꣢ऽ३मा꣤ऽ५᳚नाऽ६५६ ॥
(दी॰ १। प॰ १७। मा॰ ४)(२४)॥ खी ॥ ५५२ ॥

३२५-२
ह꣣ꣳऽ४ । आ꣣ऽ४५ । हꣳ । ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । वि꣢धु꣡न्दद्रा । णा꣢ऽ३ꣳस꣡म । ना꣢इ᳐ब꣣हू꣤ना꣥म् ॥
यु꣢वा꣡꣯नꣳसा । ता꣢ऽ३म्प꣡लि । तो꣢ ᳐ज꣣गा꣤रा꣥ ॥ दे꣢꣯व꣡स्यपा । श्या꣢ऽ३का꣡꣯वि । यं ꣢ ᳐म꣣हि꣤त्वा꣥ ॥ ह꣣ꣳऽ४ ।
आ꣣ऽ४५ । हꣳ । ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । अ꣢द्या꣡꣯ममा । रा꣢ऽ३स꣡हि । या꣢ऽ३४३ः । सा꣢ऽ३मा꣤ऽ५᳚नाऽ६५६ ॥
(दी॰ ४। प॰ २१। मा॰ ३)(२५)॥ ति ॥ ५५३ ॥
३२६-१ इन्द्रवश्रे द्वे।   इन्द्रस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
औ꣥꣯हो꣯इतुवा꣤म् ॥ ह꣢त्य꣡त्स꣢प्त꣡भ्यो꣢꣯ जा꣡꣯यमा꣢꣯ना꣣ऽ२३४ः ॥ औ꣥꣯हो꣯अशा꣤ । त्रु꣡भ्यो꣢꣯अभवश्श꣡त्रुरि꣢ ᳐न्द्रा꣣ऽ२३४ ॥
औ꣥꣯हो꣯इगू꣯ढे꣤ । द्या꣡꣯वा꣯पृ꣢थिवी꣡꣯अन्ववि꣢ ᳐न्दा꣣ऽ२३४ः ॥ औ꣥꣯हो꣯इविभू꣤ । म꣡द्भ्यो꣢꣯भु꣡वने꣢꣯भ्यो꣯र꣡ण᳚धा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १९। प॰ ८। मा॰ १०)(२६)॥ दौ ॥ ५५४ ॥

३२६-२
त्वो꣤हाइ । ह꣣त्यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । स꣢प्त꣡भ्यो꣢꣯ जा꣡꣯यमा꣢꣯ । नो꣡वा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ ॥ अ꣥शो꣤हाइ ।
त्रु꣣भ्यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । अ꣡भ꣢वश्श꣡त्रुरि꣢ । द्रो꣡वा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ ॥ गू꣥꣯ढो꣤हाइ । द्यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
पृ꣢थिवी꣡꣯अन्ववि꣢ । दो꣡वा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ ॥ वि꣥भो꣤हाइ । म꣣द्भ्यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । भु꣡वने꣢꣯ ।
भ्यो꣡वा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ । र꣤णाऽ५न्धाः । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ २३। मा॰ १९)(२७)॥ ग ॥ ५५५ ॥
३२७-१ ऋषिप्रमाणपदगणिते अर्द्धवेयः।   सूर्यवर्चसो भृष्टिमतः सामनी द्वे। भृष्टिमांत्रिष्टुबिन्द्रः ॥
मे꣤डी꣥म् ॥ न꣡त्वा꣯वश्रिणंभृष्टि꣢मा꣡ऽ२३न्ता꣢म् । पुरुधस्मा꣡꣯नंवृषभꣳस्थि꣢रा꣡ऽ२३प्स्नू꣢म् ।
करो꣡꣯ष्यर्यस्तरुषाइर्दु꣪वाऽ२३स्यू꣢: ॥ आ꣡इन्द्रद्यु꣢क्ष꣡म् ॥ वृत्राऽ२३ । हा꣡ऽ२᳐णा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
गृ꣢णीऽ३षे꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ८)(२८)॥ बै ॥ ५५६ ॥

३२७-२
मे꣤꣯डि꣥न्नत्वा꣤ ॥ वा꣢ऽ३४औहो꣥ । श्रा꣡इ । णं ꣢भा꣡र्ष्टाइमौ꣢ । वाऽ᳐३२३४ । ता꣥म् । पु꣣रा꣢ऽ३४औहो꣥ ।
ध꣢स्मा꣡꣯नंवृ । ष꣢भ꣡ꣳस्थाइरौ꣢ । वाऽ᳐३२३४ । प्स्नू꣥म् ॥ क꣣रा꣢ऽ३४औहो꣥ । षि꣢अ꣡र्यस्त । रुषाइर्दूवौ꣢ ।
वाऽ᳐३२३४ । स्यूः꣥ ॥ इ꣣न्द्रा꣢ऽ३४औहो꣥ ॥ द्यु꣢क्ष꣡म् । वृत्राऽ२३ । हा꣡ऽ२᳐णा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
गृ꣢णी꣯षे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ २१। मा॰ १४)(२९)॥ पी ॥ ५५७ ॥
३२८-१ अंकुशौ द्वौ (वसिष्ठौ)।   वसिष्ठस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
प्र꣥वा꣤: ॥ मा꣡हे꣯म꣢हे꣯वृधे꣯ । भ꣡राधू꣢ऽ३वा꣢म् । प्रचा꣡इत꣢सा꣡इ । प्रासू꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४ती꣥म् ॥ कृ꣡णुध्वम् ।
इहाऽ२᳐वा꣣ऽ२३४इशा꣥: ॥ पू꣡ऽ२३र्वी꣢: । प्र꣡चा । राऽ२३चा꣢ । षणा꣡इ । प्रा । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ ॥
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १५। मा॰ ११)(३०)॥ ण ॥ ५५८ ॥

३२८-२
ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । प्र꣢वो꣯महाइमा꣣ऽ२३४हे꣥ । वृ꣣धा꣢ऽ३४३इ । भ꣢ ᳐रा꣣ऽ२३४ध्वा꣥म् ॥ ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
प्र꣢चे꣯तसाइ᳐प्रा꣣ऽ२३४सू꣥ । म꣣ता꣢ऽ३४३इम् । कृ꣢णू꣣ऽ२३४ध्वा꣥म् ॥ ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
वि꣢श:पू꣯र्वाइ᳐ᳲप्रा꣣ऽ२३४चा꣥ । र꣣चा꣢ऽ३४३ । ष꣢ ᳐णा꣣ऽ२३४इप्रा꣥: ॥ ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । हा꣯उहौ꣯हो꣤वा꣥ऽ६ ।
हा꣥उवा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ १६। मा॰ १२)(३१)॥ प्रा ॥ ५५९ ॥
३२९-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
शु꣥न४ꣳहु꣥वे꣯ममघ꣤वा꣥꣯नमि꣤न्द्राम् ॥ अ꣢स्मि꣡न्म्भरे꣯नृतमँ वा꣯ज꣢सा꣡ऽ२३ता꣢उ ।
श्रृण्व꣡न्तमुग्रमू꣯तये꣯स꣢मा꣡ऽ२३त्सू꣢ ॥ घ्न꣡ । तंवाऽ२३र्त्रा꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ ॥
णिसंजि꣡त꣢म् । ध꣡नाऽ२३नी꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ५)(३२)॥ कु ॥ ५६० ॥
३३०-१ वैश्वदेवम्।   विश्वेदेवास्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
दि꣡वया꣢꣯ । ओ꣡वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । उदु꣡ब्रह्मा । णी꣢ऽ३ऐ꣡꣯र । त꣢श्र꣣व꣤स्या꣥ ॥ इ꣢न्द्र꣡ꣳसमा ।
र्ये꣢ऽ३म꣡ह । या꣢ ᳐व꣣सि꣤ष्ठा꣥ ॥ आ꣢꣯ यो꣡꣯विश्वा । नी꣢ऽ३श्र꣡व । सा꣢ ᳐त꣣ता꣤ना꣥ ॥ दि꣡वया꣢꣯ । ओ꣡वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ।
उप꣡श्रो꣯ता । म꣢ई꣡꣯व । तो꣢ऽ३४३ । वा꣢ऽ३चा꣤ऽ५᳚ꣳसाऽ६५६इ ॥
(दी॰ ७। प॰ १९। मा॰ ३)(३३)॥ झि ॥ ५६१ ॥
३३१-१ पुरीषम्।   अथर्वात्रिष्टुबिन्द्रः ॥
च꣥क्रं ꣤यद꣥स्या꣯प्सु꣤वा꣯निष꣥त्ता꣤म् ॥ उ꣢तो꣡꣯तदस्मै꣯मध्विच्च꣢च्छा꣡ऽ२३द्या꣢त् । पृथिव्या꣡꣯मतिशितंय꣢दू꣡ऽ२३धा꣢: ॥
प꣡यो꣯गोऽ२३षू꣢ । आ꣡दधा꣢꣯ ओ꣡꣯षधी꣢꣯षु । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ५)(३३)॥ ढु ॥ ५६२ ॥
॥ सप्तदशः द्वितीयः, दशमः खण्डः ॥ १० ॥ दशतिः ॥ ४ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गानेऽष्टमः प्रपाठकः ॥ ८ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — नवमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ अथ एकादश खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१३)

३३२-१ ताह््र्यसामनी द्वे।   ताह््र्यस्त्रिष्टुबिन्द्रः (ताह््र्योवा) ॥
त्य꣥मू꣯षू ॥ वा꣢꣯जि । नाऽ३꣡४꣡५꣡म् । दे꣢꣯वजू꣯ता꣣ऽ२३४म् । स꣥हो꣯वा꣣꣯नं ꣢ता꣡ । रु꣢ताऽ३ । र꣢ ᳐ꣳर꣣था꣤ना꣥म् ।
अ꣢रिष्टना꣣ऽ२३४इमी꣥म् ॥ पृ꣢तनाऽ३४३ज꣢मा꣣꣯शु꣥म् ॥ स्व꣢स्त꣡ । याइ ॥ ता꣯ह््र्य꣢ ᳐मि꣣हा꣢ऽ३४३ ।
हू꣢ऽ३वा꣤ऽ५᳚इमाऽ६५६ ॥
(दी॰ ८। प॰ १३। मा॰ ८)(१)॥ डै ॥ ५६३ ॥

३३२-२
ई꣢꣯यइयाऽ३हा꣢इ । त्य꣯मूषुवा꣯जिनाऽ३न्दे꣤ऽ३व꣢जू꣣꣯त꣥म् ॥ ई꣣ऽ४य꣥इ꣤या꣥꣯ । हा꣣ऽ२३४इ । स꣥हो꣯वा꣣꣯नं ꣢ता꣡ ।
रु꣢ताऽ३ । र꣢◌᳐ꣳर꣣था꣤ना꣥म् ॥ ई꣢꣯यइयाऽ३हा꣢इ । अरिष्टाऽ३ । ना꣡इ । मी꣢ऽ३म्पृ꣡त । ना꣢ ᳐ज꣣मा꣤शू꣥म् ॥
ई꣣ऽ४य꣥इ꣤या꣥꣯ । हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ । स्व꣢स्त꣡ । याइ । ता꣯ह््र्य꣢मि꣣हा꣢ऽ३४३ । हू꣢ऽ३वा꣤ऽ५᳚इमाऽ६५६ ॥
(दी॰ १०। प॰ १८। मा॰ १४)(२)॥ बी ॥ ५६४ ॥
३३३-१ इन्द्रस्य त्रातम्।   इन्द्रस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
त्रा꣢꣯ ता꣡꣯रमिन्द्रमविता । र꣪मीऽ२३न्द्रा꣢म् ॥ ह꣡वे꣯हवे꣯सुहवꣳशू । र꣪मीऽ२३न्द्रा꣢म् ॥ हुवा꣡इनुशक्रंपुरुहू ।
त꣪मीऽ२३न्द्रा꣢म् ॥ इद꣡ꣳह꣢ । वा꣡इः । म꣢घ꣡वा꣯ । वा꣢ऽ३४३इ । तू꣢ऽ३वा꣤ऽ५᳚इन्द्राऽ६५६ः ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ९)(३)॥ पो ॥ ५६५ ॥
३३४-१ वार्त्रातुरम्।   वृत्रतुरस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
य꣥जा꣯महो꣤वा꣥ ॥ आ꣡इन्द्रंव꣢श्र । द꣡क्षाऽ२३इणा꣢म् । ह꣡री꣯णा꣢꣯ꣳरथ्यं ꣡वि । व्रताऽ२३ना꣢म् ।
प्र꣡श्मश्रु꣢भिर्दो꣡꣯धु꣢वत् । ऊ꣡ । ध्वाधा꣢ ᳐भू꣣ऽ२३४वा꣥त् ॥ वि꣡साइ । ना । भि꣢र्भय꣡मानाऽ२३ः ॥
वा꣡ऽ२३इरा꣤ऽ३ । धा꣢ऽ३४५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १३। मा॰ १०)(४)॥ दौ ॥ ५६६ ॥
३३५-१ मारुतस्य धृषतः सामनी द्वे।   द्वयोः धृषत्स्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
स꣥त्रा꣯ । ह꣣णा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ दा꣡꣯धृ꣢षिन्तू꣡ । म्रमिन्द्रा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । म꣢हा꣡꣯मपा꣢꣯रं ꣡वृष꣢भ꣡ꣳसु꣢व꣡श्राऽ२३म् ॥
ह꣡न्ताऽ२᳐यो꣣ऽ२३४वॄ꣥ ॥ त्रा꣡ꣳसनि । तो꣢ऽ३४३ । ता꣢ऽ३वा꣤ऽ५जाऽ६५६म् ॥
दा꣡꣯ ता꣢꣯मघा꣡꣯निम꣢घ꣡वा꣰꣯ऽ२सुरा꣡꣯धा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ११। प॰ १०। मा॰ ५)(५)॥ ङु ॥ ५६७ ॥

३३५-२
स꣤त्रा꣯ह꣣ण꣤न्दा꣣꣯धृ꣤षि꣥म् । तू꣢ऽ३४३म्म्र꣢ ᳐मि꣣न्द्र꣥म् ॥ म꣢हा꣡꣯मपा꣢꣯रं ꣡वृष꣢भ꣡ꣳसु꣢व꣡श्राऽ२३म् ॥ ह꣢न्ता᳐यो꣣ऽ२३४वॄ꣥ ॥
त्रा꣡ꣳसनि । तो꣢ऽ३४३ । ता꣢ऽ३वा꣤ऽ५जाऽ६५६म् ॥ दा꣡꣯ ता꣢꣯मघा꣡꣯नि म꣢घ꣡वा꣰꣯ऽ२सुरा꣡꣯धा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ५)(६)॥ ढु ॥ ५६८ ॥
३३६-१ आत्रम्।   अत्रिस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
यो꣣꣯ नो꣤꣯वनुष्य꣣न्न꣤भि꣥दा꣯ । ति꣣मा꣢ऽ᳐३२३४र्ता꣥: ॥ उ꣡गणा꣯वा꣯मन्यमा꣯नस्तु꣢रो꣡ऽ२३वा꣢ ।
क्षिधी꣡꣯युधा꣯शवसा꣯वा꣯त꣢मा꣡ऽ२३इन्द्रा꣢ । अ꣡भाइष्या꣢ऽ३मा꣢ ॥ वृ꣡षामा꣢ऽ३णा꣢ऽ३ः ।
त्वो꣡ऽ२३ता꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ६)(७)॥ भू ॥ ५६९ ॥
३३७-१ गृत्समदस्य मदौ द्वौ गार्त्समदे वा द्वे।   द्वयोः गृत्समदस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
हा꣥꣯उयंवृत्रे꣯षू । क्षि꣢तयाऽ३ः । स्प꣢ ᳐र्ध꣣मा꣤ना꣥: । ध꣡मा꣯ना꣢ऽ३ः । ई꣡ऽ२३४यइया꣯ ॥ हा꣥꣯उयंयुक्ते꣯षू ।
तु꣢रयाऽ३ । तो꣢ ᳐ह꣣व꣤न्ता꣥इ । ह꣡वन्ता꣢ऽ३इ । ई꣡ऽ२३४यइया꣯ ॥ हा꣥꣯उयꣳशू꣯रसा । ता꣤ऽ३उय꣢म꣣ ।
पा꣢ ᳐मु꣣प꣤ज्मा꣥न् । उ꣡पज्मा꣢ऽ३न् । ई꣡ऽ२३४यइया꣯ ॥ हा꣥꣯उयंविप्रा꣯साः । वा꣤ऽ३ज꣢य꣣ । ता꣢इ᳐स꣣इ꣤न्द्रा꣥: ।
स꣡इन्द्रा꣢ऽ३ः । ई꣡ऽ२३४य । इ꣥याऽ६ । हा꣥उवा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १२। प॰ २३। मा॰ २२)(८)॥ श्रा ॥ ५७० ॥

३३७-२
यं ꣥यंया꣯ । हा꣯उयंवृत्रे꣯षू । क्षि꣢तयाऽ३ः । स्प꣢ ᳐र्ध꣣मा꣤ना꣥: । ध꣡मा꣯नाः꣢꣯ । यंयं ꣡य꣰ऽ२०या꣡꣱म् ॥ यं ꣥यंया꣯ ।
हा꣯उयंयुक्ते꣯षू । तु꣢रयाऽ३ । तो꣢ ᳐ह꣣व꣤न्ता꣥इ । ह꣡वन्ते꣢꣯ । यंयं ꣡य꣰ऽ२०या꣡꣱म् ॥ यं ꣥यंया꣯ । हा꣯उयꣳशू꣯रसा ।
ता꣤ऽ३उय꣢म꣣ । पा꣢ ᳐मु꣣प꣤ज्मा꣥न् । उ꣡पज्म꣢न् । यंयं ꣡य꣰ऽ२०या꣡꣱म् ॥ यं ꣥यंया꣯ । हा꣯उयंविप्रा꣯साः ।
वा꣤ऽ३ज꣢य꣣ । ता꣢इ᳐स꣣इ꣤न्द्रा꣥: । स꣡इन्द्र꣢: । यंयं ꣡य꣰ऽ२०या꣡꣱म् । यं ꣥यंयाऽ६ । हा꣥उवा । ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १५। प॰ २७। मा॰ १२)(९)॥ फ्रा ॥ ५७१ ॥
३३८-१ वैश्वामित्रम्।   विश्वामित्रस्त्रिष्टुबिन्द्रः (इन्द्रापर्वतौ वा) ॥
इ꣤न्द्राहा꣥उ । हा꣢꣯हो꣡इ । पर्वता꣯बृहता꣯रथाऽ२᳐इना꣣ऽ२उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥ वा꣤꣯मीर्हा꣥उ । हा꣢꣯हो꣡इ ।
इषआ꣯वहतꣳसुवाऽ२᳐इरा꣣ऽ२उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥ वी꣤꣯तꣳहा꣥उ । हा꣢꣯हो꣡इ ।
हव्या꣯न्यध्वरे꣯षुदाऽ२᳐इवा꣣ऽ२उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥ व꣤र्द्धाहा꣥उ । हा꣢꣯हो꣡ । था꣯ङ्गी꣯भिर्डया꣯
मदाऽ२᳐न्ता꣣ऽ२उवाऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १४। प॰ १६। मा॰ १५)(१०)॥ त्लु ॥ ५७२ ॥
३३९-१ सावित्राणि षट्सामानि (सवित्रम्)।   षण्णां सविता त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
हा꣢ऽ३ । हा꣢इ । इन्द्रा꣡꣯यगाइ । रा꣢ऽ३अ꣡नि । शी꣢ ᳐त꣣स꣤र्गा꣥: ॥ १ ॥ अ꣢साउ । असाउ । इन्द्रा꣡꣯यगाइ ।
रा꣢ऽ३अ꣡नि । शी꣢ ᳐त꣣स꣤र्गा꣥: ॥ २ ॥ कु꣢वा । कुवा । इन्द्रा꣡꣯यगाइ । रा꣢ऽ३अ꣡नि । शी꣢ ᳐त꣣स꣤र्गा꣥: ॥ ३ ॥
अ꣢याम् । अयाम् । अपᳲ꣡प्रै꣯रा । या꣢ऽ३त्स꣡ग । र꣢ ᳐स्य꣣बु꣤ध्ना꣥त् ॥ ४ ॥ अ꣡विदा꣢ऽ३त् । अ꣡विद꣢त् ।
यो꣯अ꣡क्षे꣯णाइ । वा꣢ऽ३च꣡क्रि । यौ꣢ ᳐श꣣ची꣤भी꣥: ॥ ५ ॥ इ꣢हा꣡ऽ२३ । ई꣢ऽ᳐३४हा꣥ । वि꣢ष्व꣡क्तस्ता । भा꣢ऽ३पृ꣡थि ।
वी꣢ऽ३४३म् । ऊ꣢ऽ३ता꣤ऽ५द्याऽ६५६म् ॥ ६ ॥
(एवं षट् सामानि)
(दी॰ ६। प॰ ३१। मा॰ २२)(११)॥ का ॥ ५७३ ॥
३४०-१ कुतीपाद वैरूपस्य साम।   विरूपस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
आ꣤꣯ त्वा꣥꣯स꣤खा꣥꣯यस्सख्या꣤꣯व꣥वृत्यू꣤: ॥ ति꣢रᳲ꣡पुरू꣯चिदर्णवां ꣯जगाऽ२म्यौ꣯ । हौ꣯होऽ३वा꣢ ॥
पितु꣡र्नपा꣯तमा꣯दधी꣯तवाऽ२इधौ꣯ । हौ꣯होऽ३वा꣢ ॥ अस्मि꣡न्क्षये꣯प्रतरां ꣯दी꣯दियाऽ२नौ꣯ । हौ꣯होऽ३वा꣢ ।
औ꣯होऽ२ । इ꣡हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १९। प॰ ९। मा॰ १२)(१२)॥ धा ॥ ५७४ ॥
३४१-१ आमहीयवम्।   अमहीयुस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
को꣥꣯अद्ययुङ्क े꣯धुरिगा꣯ऋतस्याऽ६ए꣥ ॥ शि꣡मी꣯वतो꣯भा꣯मिनो꣯दुर्हृ꣢णा꣡ऽ२३यू꣢न् ॥
आ꣯स꣡न्ने꣯षा꣯मप्सुवा꣯हो꣯म꣢यो꣡ऽ२३भू꣢न् । य꣡ए꣯षां ꣯भृत्या꣯मृणधत्सजाइवा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १५। प॰ ५। मा॰ ८)(१३)॥ म्यै ॥ ५७५ ॥
॥ त्रयोदश तृतीयः, एकादशः खण्डः ॥ ११ ॥ दशतिः ॥५ ॥

॥ अथ द्वादश खण्डः॥ (ऋ-४, सा-१८)

३४२-१ शैखण्डिने द्वे।   द्वयोः शिखण्ड्यनुष्टुबिन्द्रः ॥
गा꣣꣯या꣢ऽ३१ । ति꣣त्वा꣢ऽ३१२३४ । गा꣯य꣥ । त्रा꣢ऽ३इणा꣢ ᳐: ॥ अ꣣र्चा꣢ऽ३१ । ति꣣या꣢ऽ३१२३४ । कम꣥ ।
का꣢ऽ३इणा꣢: ॥ ब्र꣣ह्मा꣢ऽ३१ । ण꣣स्त्वा꣢ऽ३१२३४ । शत꣥ । क्रा꣢ऽ३ता꣢उ᳐ ॥ उ꣣द्वा꣢ऽ३१ । श꣣मा꣢ऽ३१२३इ ।
व꣤याऽ५इमिराइ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १७। मा॰ ९)(१४)॥ छो ॥ ५७६ ॥

३४२-२
गा꣥꣯यन्तित्वो꣤हा꣥इ ॥ गा꣣꣯या꣢ ᳐त्री꣣ऽ२३४णा꣥: । अ꣡र्चन्त्यर्कमा꣢ऽ१र्की꣢ऽ३णा꣢: । अर्चन्तियो꣣ऽ२३४हा꣥ ।
क꣣मा꣢ ᳐र्की꣣ऽ२३४णा꣥: ॥ ब्र꣢ह्मा꣡꣯णस्त्वा꣯शता꣢ऽ१क्रा꣢ऽ३तो꣢ । ब्रह्मा꣯णस्त्वो꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ श꣣ता꣢ ᳐क्रा꣣ऽ२३४ता꣥उ ।
उ꣡द्वꣳशमिवया꣢ऽ१इमी꣢ऽ३रे꣢ । उद्वꣳश᳐मो꣣ऽ२३४ हा꣥इ । व꣣या꣢ऽ३इमा꣤ऽ५᳚इराऽ६५६इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ११)(१५)॥ प ॥ ५७७ ॥

३४२-३ औद्धꣳशीयम्।   उद्वꣳशीयम्। विश्वेदेवानुष्टुबिन्द्रः ॥
गा꣤꣯य꣥न्तित्वा꣯गा꣯यत्रि꣤ण꣥आ꣤ ॥ अ꣡र्चन्त्यर्कमर्काऽ२३इणा꣢: । ब्रह्मा꣡꣯णस्त्वाऽ२होऽ१इ ।
शतक्राऽ२३ता꣢उ । उ꣡द्वꣳशमिवया꣢ऽ१इमी꣢ऽ३रे꣢ ॥ उद्व᳐ꣳशा꣣ऽ२३४मी꣥ ॥ वा꣡या꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ ।
उ꣢प् । मा꣡ऽ२꣮इरोऽ३५᳚हा꣢इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ १०)(१६)॥ धौ ॥ ५७८ ॥
३४३-१ शैखण्डिनानि त्रीणि।   त्रयाणां शिखण्ड्यनुष्टुबिन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रंविश्वाः ॥ आ꣡वीऽ२वृधा꣡न् । सामुद्र꣢व्या꣡ । चासं ꣢गिरा꣡: । राथी꣯त꣢माऽ३१उवाऽ२ । रथा꣡इनाऽ२म् ॥
वा꣯जा꣡꣯नाऽ२३ꣳसा꣢त् ॥ पा꣡तिंप꣢तिम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ९)(१७)॥ टो ॥ ५७९ ॥

३४३-२
ओ꣢इ꣣न्द्रं ꣤वि꣥श्वाः ॥ अ꣢वी꣯ । वृ꣡धान् । सा꣢ऽ१मूऽ२द्रा꣡व्याऽ२ । चसम् । गि꣡राः ॥ रा꣢ऽ१थीऽ२ता꣡माऽ२म् ।
रथी꣡꣯ । नाम् । वाजाऽ२ना꣡ꣳसाऽ२त् ॥ पतिं ꣡पाऽ२३ती꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १३। मा॰ १०)(१८)॥ जौ ॥ ५८० ॥

३४३-३
इ꣣न्द्रं ꣤वि꣣श्वा꣤꣯अ꣥वी꣯वृधन् । स꣢मू᳐द्रा꣣ऽ२३४व्या꣥ ॥ चा꣢ऽ३सां ꣡गी꣢ऽ३रा꣥: । रा꣡थी꣢꣯तमाऽ२म् । ऊऽ२ ।
हाऽ२इ । ऊऽ२ । रथा꣡इनाम् ॥ वाजा꣢꣯ ना꣯ꣳसाऽ२ । ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊऽ२ ॥
पतिं ꣡पाऽ२३ती꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १५। मा॰ १०)(१९)॥ मौ ॥ ५८१ ॥

३४३-४ आष्टादꣳर्ष्टे द्वे।   द्वयोरष्टादꣳर्ष्टोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
इ꣤न्द्रं ꣥वि꣤श्वा꣥꣯अवी꣯वृधन् । ऐ꣤याहा꣥इ ॥ स꣢मू꣡द्रा꣢ऽ१व्याऽ२ । चसां ꣡गा꣢ऽ१इराऽ२३ः । ऐ꣡꣯याऽ२३हा꣢इ ॥
रथा꣡इता꣢ऽ१माऽ२म् । रथा꣡इनाऽ२३म् । ऐ꣡꣯याऽ२३हा꣢इ ॥ वा꣯जा꣡ना꣢ऽ१ꣳसाऽ२त् ।
पता꣡इंपा꣢ऽ१तीऽ२३म् । ऐ꣡꣯याऽ२३हा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ १६)(२०)॥ गू ॥ ५८२ ॥

३४३-५
इ꣤न्द्रं ꣥वि꣤श्वा꣥꣯अवी꣯वृधन्नै꣤꣯ या꣥꣯ दौ꣤꣯ । हो꣥ऽ६वा꣥ ॥ स꣢मुद्र꣡व्यच꣢सम् । गा꣡इराऽ२३ः । ऐ꣡꣯याऽ२३त् ।
औ꣡ऽ२३हो꣯वा꣢ ॥ रथा꣡इतम२ꣳर । था꣡इनाऽ२३म् । ऐ꣡꣯याऽ२३त् । औ꣡ऽ२३हो꣯वा꣢ ॥
वा꣡꣯जा꣯ना꣢꣯ꣳस꣡त्पति꣢म् । पा꣡तीऽ२३म् । ऐ꣡꣯याऽ२३त् । औ꣡ऽ२३हो꣯वा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ १४। प॰ १६। मा॰ १३)(२१)॥ ति ॥ ५८३ ॥

३४३-६ महावैश्वामित्रे द्वे।   द्वयोः विश्वामित्रोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
ह꣢याइ । हयाऽ३ । ओ꣤हा꣥ओ꣤हा꣥ । (त्रीणि त्रिः) । इ꣢न्द्रंविश्वा᳐: । अ꣣वी꣢꣯वा꣡र्द्धाऽ२न् ॥ समुद्रव्या᳐ ।
च꣣सं ꣢गा꣡इराऽ२: ॥ रथी꣯तमम् । रथा꣡इनाऽ२म् ॥ वा꣯जा꣯ना꣯ꣳसात् । प꣣तिं ꣢पा꣡तीऽ२म् । हयाइ ।
हयाऽ३ । ओ꣤हा꣥ओ꣤हा꣥ ॥ (त्रीणि त्रिः) । हो꣣ऽ४इडा꣥ । हो꣣ऽ४इडा꣥ । हो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ३०। मा॰ २४)(२२)॥ मी ॥ ५८४ ॥

३४३-७
ह꣢या꣡ये꣢ऽ३ । ह꣢या꣡ये꣢ऽ३ । हयाऽ२३꣡४꣡५꣡ । ह꣣ꣳऽ२३ । आ꣡ऽ२३४इ । द्रंवि꣣श्वा꣤꣯अ꣥वी꣯ । वृ꣣धा꣢ऽ३न् ॥
सा꣡ऽ२३४ । मुद्र꣣व्य꣤च꣥सम् । गि꣣रा꣢ऽ३ः ॥ रा꣡ऽ२३४ । थी꣣꣯त꣤म꣥ꣳरथी꣯ । ना꣢ऽ३म् ॥ वा꣡ऽ२३४ ।
जा꣯ना꣯ꣳस꣣त्प꣤ति꣥म् । प꣣ता꣢ऽ३इम् । ह꣢या꣡ये꣢ऽ३ । ह꣢या꣡ये꣢ऽ३ । हयाऽ२३꣡४꣡५꣡ । ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
हो꣣ऽ४इडा꣥ । हो꣣ऽ४इडा꣥ । हो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ २४। मा॰ १२)(२३)॥ घा ॥ ५८५ ॥
३४४-१ वसिष्ठस्य प्रियाणि चत्वारि।   वसिष्ठोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
इ꣢म꣡माऽ२३४इन्द्रा꣥ ॥ सु꣢त꣡म् । पाऽ२᳐इबा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ज्ये꣡꣯ष्ठ꣢म꣡मा꣰꣯ऽ२र्तियंम꣡द꣢म् । शुक्रा ॥
स्यत्वा꣯भिऽ३या꣡ऽ२३ ॥ क्षा꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ धा꣡꣯ रा꣰꣯ऽ२ऋत꣡स्य꣢सा꣡꣯दने꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ ८। मा॰ ७)(२४)॥ बे ॥ ५८६ ॥

३४४-२ गौतमम्।   गोतमोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
इ꣥ममि꣣न्द्र꣢ ᳐सु꣣तं ꣤पि꣥बा ॥ ज्ये꣢꣯ष्ठा꣡म꣢मा꣡ । ति꣢यंम꣡दाऽ२᳐म् । शु꣣क्रा꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । स्य꣢त्वा꣯भ्य꣡क्ष꣢र᳐न् ॥
धा꣣꣯रा꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । ऋ꣣ता꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ स्य꣤साऽ५दनाइ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ ४)(२५)॥ गी ॥ ५८७ ॥

३४४-३ वसिष्ठस्य प्रिये द्वे।   द्वयोर्वसिष्ठोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
इ꣤ममिन्द्राऽ५सुतंपि꣤बा ॥ ज्ये꣢꣯ष्ठममाऽ३र्त्ता꣡य꣪म्मादाऽ२म् । औऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाइ ।
औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ । शु꣢क्रस्यत्वा꣯ऽ३भा꣡य꣪क्षाराऽ२न् । औऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाइ ।
औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ ॥ धा꣡रा꣢ऽ१ऋताऽ२ । औऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाइ ।
औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ । स्य꣢सा꣡꣯दाऽ२३ना꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १९। मा॰ ८)(२६)॥ ढै ॥ ५८८ ॥

३४४-४ वसिष्ठस्यप्रियम्।
इ꣢म꣡मीऽ२३ । द्र꣤सु꣥तं ꣤पि꣥ब । ज्ये꣤ष्ठा꣥म् ॥ अ꣢मऽ३र्त्ता꣡यं ꣪मादाऽ२म् । शुक्रा꣡स्यत्वा꣢ऽ३ ।
भि꣡याऽ२᳐क्षा꣣ऽ२३४रा꣥न् ॥ धा꣡रा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । आ꣡र्त्ता꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ स्य꣤साऽ५दनाइ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ ११। मा॰ ७)(२७)॥ हे ॥ ५८९ ॥
३४५-१ वींकानि चत्वारि, वीङ्क े द्वे।   द्वयोः गृत्समदोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
य꣤दि꣥न्द्रो꣤हाइ ॥ चि꣢त्रमइह꣡नाऽ२३ । आ꣡ऽ२३४ । स्तित्वा꣯दा꣥꣯ । हा꣢ऽ३इ । त꣢मद्रा꣡इवाऽ२३ः ॥
रा꣡ऽ२३४ । धस्त꣣न्नो꣤꣯वि꣥दा । हा꣢ऽ३ । वा꣡ । साउ ॥ उभया꣯हाऽ२३ ॥ स्तिया꣢उवाऽ३४३ ।
भा꣢ऽ३४५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १४। मा॰ ८)(२८)॥ धै ॥ ५९० ॥

३४५-२
य꣥दिन्द्रचित्रमौ꣯हो꣤वा꣥ ॥ हा꣣ऽ२३४ना꣥ । अ꣡स्तित्वा꣯दा꣯तमोवा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ ᳐ । द्रा꣣ऽ२३४इवा꣥: ॥
रा꣡꣯धस्तन्नो꣯विदोवा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ ᳐ । वा꣣ऽ२३४सा꣥उ ॥ उ꣡भया꣯हस्तियोवा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ऽ३४३ ।
भा꣢ऽ३४५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ४)(२९)॥ की ॥ ५९१ ॥

३४५-३ आकूपारं आकूपारमनादेशं वा।   अकूपारोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
य꣢दि꣡न्द्राऽ२३चि꣤त्र꣥ । म꣢इहा꣣ऽ२३४ना꣥ ॥ अ꣡स्ताऽ२इत्वा꣡꣯दा । त꣢मद्रा꣡इवो । रा꣢꣯धस्ता꣡न्नाऽ२: ।
विदद्व꣡साउ ॥ उ꣢भया꣡हाऽ२३ । स्ता꣡ऽ२३या꣤ऽ३ । भा꣢ऽ३४५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ६)(३०)॥ झू ॥ ५९२ ॥

३४५-४ वीङ्कम्।
य꣣दि꣤न्द्र꣥चित्रमइ । ह꣣ना꣢ऽ३ । आ꣤स्ती꣥ ॥ त्वा꣡꣯दा꣯तमद्रिवः ॥ रा꣯धस्ताऽ२३न्ना꣢: । वी꣡वीऽ२ ।
द꣡द्वसाउ ॥ उभयाऽ२३हा꣢ । स्ता꣡याऽ२३ । भा꣡ऽ२३रा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ )(३१)॥ ठु ॥ ५९३ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने नवमस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — नवमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ द्वादश खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-६, सा-१०)

३४६-१ तैरश्च्ये द्वे।   द्वयोः तिरश्च्यऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
श्रु꣥धी꣤ ॥ हा꣡वाऽ२ꣳहा꣡वाऽ२म् । तिरश्चि꣡याः । इ꣢न्द्र꣡याऽ२३स्त्वा꣢ । स꣡पौ꣭ऽ३हो꣢ । र्य꣡ती꣭ऽ३या꣢ ॥
सुवी꣡꣯र्यस्यगो꣯मताः ॥ रा꣢꣯या꣡स्पूऽ२३र्द्धी꣢ ॥ महा꣡ꣳऽ२३ । अ꣢सि꣣या꣢ऽ३४३ ॥ ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ४)(१)॥ ठी ॥ ५९४ ॥

३४६-२
श्रु꣥धी꣯हा꣢ऽ३व꣤न्ति꣥र꣤श्चिया꣥: ॥ इ꣢न्द्रा꣡य꣢स्त्वा꣡ । स꣢प꣣र्य꣢ता꣡ये꣢ऽ३४ । सुवी꣥꣯ । रि꣣या꣢ ᳐ । स्या꣣ऽ२३४गो꣥ ।
मा꣡ताऽ२: ॥ रा꣡यास्पूर्द्धी꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ म꣤हाꣳऽ५असी । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १२। मा॰ ५)(२)॥ छु ॥ ५९५ ॥
३४७-१ महावैश्वामित्रम्।   विश्वामित्रोऽनुष्टुबिन्द्रः सूर्योवा ॥
अ꣣सा꣤꣯विसो꣣꣯म꣤इ꣥न्द्रते꣯ । शा꣢विष्ठा꣣ऽ२३४धॄ꣥ ॥ ष्णो꣢ऽ३आ꣡गा꣢ऽ३ही꣢ । आ꣡त्वा꣢꣯पृणा꣡ऽ२३हा꣢ऽ३ ।
क्तु꣡ईऽ२᳐न्द्रा꣣ऽ२३४या꣥म् ॥ र꣡जाः । सूर्यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ न꣤राऽ५श्मिभीः ॥ हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ८)(३)॥ नै ॥ ५९६ ॥
३४८-१ काण्वे द्वे।   द्वयोः कण्वोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
ए꣥꣯न्द्रा꣢ऽ३या꣤꣯हि꣥ह꣤रिभा꣥इः ॥ उ꣢पाकण्वाऽ३ । स्या꣡सु꣢ष्टू꣣ऽ२३४ती꣥म् । दि꣢वो꣯अमूऽ३ ।
ष्या꣡शा꣢ ᳐सा꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ दा꣡इवंय꣢याऽ३१उवाऽ२३ ॥ दा꣡ऽ२३इवा꣤ऽ३ । वा꣢ऽ३४५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ९)(४)॥ डो ॥ ५९७ ॥

३४८-२
ए꣤꣯न्द्र꣥या꣯हि ह꣤रि꣥भिः । उहु꣤वाहा꣥इ ॥ उ꣡पकण्वस्य꣢सु꣡ष्टुति꣢म् । उहु꣡वाऽ२३हा꣢इ । दिवो꣡꣯अमू꣢ऽ३ ।
ष्या꣡शा꣢ ᳐सा꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ दा꣡इवंय꣣या꣢उ । वाऽ३ ॥ देऽ२३४वा꣥ । व꣤सोऽ५हा । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ९)(५)॥ ठो ॥ ५९८ ॥
३४९-१ वैश्वामित्रम्।   विश्वामित्रोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
आ꣥꣯त्वा꣯गा꣢ऽ३इरो꣤꣯र꣥थी꣤꣯रिवा꣥ ॥ अ꣢स्थुस्सुते꣯ऽ३षू꣡गि꣪र्वाणा꣭ऽ३ः । ओ꣢ऽ३४वा꣥ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
अ꣢भित्वा꣯सऽ३मा꣡नू꣢ऽ१षाता꣭ऽ३ ॥ ओ꣢ऽ३४वा꣥ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ गा꣡꣯वोवा꣢ऽ३त्सा꣢ऽ३म् ।
न꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ । ना꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ४)(६)॥ ञी ॥ ५९९ ॥
३५०-१ शुद्धाशुद्धीये द्वे (पदान्त निधनंशुद्धाशुद्धीयम्)।   द्वयोरिन्द्रोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
ए꣤꣯ तो꣥꣯न्वि꣤न्द्र꣥ꣳस्त꣤वा꣥꣯मा꣤ ॥ शु꣢द्ध꣡ꣳशुद्धे꣯न꣢सा꣡ऽ२३म्ना꣢ । शुद्धै꣡꣯रुक्थै꣯र्वा꣯वृ꣢ध्वा꣡ऽ२३ꣳसा꣢म् ॥
शुद्धै꣡꣯राऽ२३शी꣢ऽ३ ॥ र्वा꣡ऽ२᳐न् । म꣣मा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ तू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ ७। मा॰ ३)(७)॥ फि ॥ ६०० ॥

३५०-२ ऐडँशुद्धाशुद्धीयम्।
ए꣥꣯तो꣯न्विन्द्रꣳस्तवाऽ६मा꣥ ॥ शु꣢द्꣡ꣳशुद्धे꣢ । न । सा꣡म्नाऽ२ ॥ शु꣡द्धाइरू꣢ऽ३क्था꣢ऽ३इः ।
वा꣡꣯वाऽ२᳐र्ध्वा꣣ऽ२३४ꣳसा꣥म् ॥ शु꣢द्धै꣡꣯राऽ२३शी꣢ ॥ र्वा꣡न्मम꣢त्तु । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ५)(८)॥ तु ॥ ६०१ ॥
३५१-१ रयिष्ठे द्वे।   द्वयोः गोतमोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
यो꣥꣯रयिंवो꣯रया꣯हाउ ॥ ता꣣ऽ२३४मा꣥: । यो꣡꣯द्युम्नै꣯र्द्युम्नवत्त꣢मः । सो꣡꣯मस्सुतस्सआऽ२३हो꣡इ । द्र꣪ताऽ२इ ।
अ꣡स्तिस्वधा꣯पताऽ२३हो꣡ये꣢ऽ३ ॥ मदोऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ७)(९)॥ जे ॥ ६०२ ॥

३५१-२
यो꣣꣯र꣤यिं ꣣वो꣤꣯र꣥यि । त꣣मोऽ२३४हा꣥इ ॥ यो꣣꣯द्यु꣤म्नै꣣꣯र्द्यु꣤म्नव꣥ । त꣣मोऽ२३४हा꣥इ ॥ सो꣣꣯म꣤स्सुत꣣स्स꣤इ꣥ ।
द्र꣣तोऽ२३४हा꣥इ ॥ अ꣣स्ति꣤स्व꣥धा꣯पते꣯ । म꣣दोऽ२३४हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ५)(१०)॥ ञु ॥ ६०३ ॥
॥ अष्टाविंशति प्रथमः, द्वादशः खण्डः ॥ १२ ॥ दशतिः ॥ ६ ॥

॥ अथ प्रथम खण्डः॥ (ऋ-८, सा-११)

३५२-१ कौल्मबर्हिषे द्वे।   द्वयोः कुल्मबर्हिरनुष्टुबिन्द्रः ॥
प्र꣥त्यस्मै꣯पिपा꣯हाउ ॥ आ꣡इषा꣢ऽ३ता꣢इ । वा꣡इश्वा꣢꣯निवा꣡इ । दूषे꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ । भा꣢ऽ३रा꣢ । आ꣡रा꣰꣯ऽ२ङ्गमा꣡ ॥
याजा꣢ऽ३हा꣢ऽ३ । ग्मा꣢ऽ३या꣢इ ॥ अ꣡पाऽ२३ । श्चा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ घ्व꣡ने꣰꣯ऽ२नरा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ९)(११)॥ चो ॥ ६०४ ॥

३५२-२
प्र꣥त्यस्मै꣯पीऽ६पी꣥꣯षताइ ॥ वा꣡इश्वा꣢꣯निवा꣡इ । दूषे꣢꣯भा꣡राऽ२ । आ꣡रा꣰꣯ऽ२ङ्गमा꣡ । यजग्मा ॥ याइ ।
अपश्चा꣯दघ्वनाऽ२३हो꣡इ । न꣢रा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ६)(१२)॥ कू ॥ ६०५ ॥

३५२-३ नानदम्।   इन्द्रोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
प्र꣣त्य꣤स्मै꣥꣯पि꣤पी꣥꣯ । ष꣣ता꣢ऽ३इ । वा꣡ऽ२३४इ । श्वा꣯नि꣥विदुषे꣯ । भा꣤रा꣥ ॥ अ꣤रङ्गमा꣣꣯य꣤ज꣥ । ग्म꣣योऽ२३४हा꣥इ ॥
आ꣤प꣥श्चा꣤दा꣥ ॥ घ्व꣢नो꣡ऽ२३४वा꣥ । ना꣤ऽ५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ४)(१३)॥ मी ॥ ६०६ ॥
३५३-१ शाकपूतम्।   शाकपूतिरनुष्टुबिन्द्रः ॥
आ꣥꣯नो꣯वयो꣯वयश्शाऽ६या꣥म् ॥ म꣢हा꣯न्तङ्गह्वरा꣣ऽ२३४इष्ठा꣥म् । म꣢हा꣯न्तंपू꣯र्विना꣣ऽ२३४इष्ठा꣥म् ॥
उ꣢ग्रं ꣡वाऽ२३चा꣢ ᳐: ॥ अ꣣पा꣢ऽ३वा꣤ऽ५᳚धाऽ६५६इः ॥
(दी॰ ६। प॰ ५। मा॰ ८)(१४)॥ ङै ॥ ६०७ ॥
३५४-१ कौल्मलबर्हिषे द्वे।   द्वयोः कुल्मलबर्हिरनुष्टुबिन्द्रः ॥
आ꣥꣯त्वा꣯रथंयथौ꣯हो꣤वा꣥ ॥ ता꣡या꣢इ᳐सू꣣ऽ२३४म्ना꣥ । य꣡वर्त्तया꣯मसितुविकूर्मी꣢म् । आ꣣ऽ२३४र्ती꣥ ।
ष꣡ह꣢म् ॥ आ꣡इन्द्रा꣢ऽ३ꣳशा꣤वी꣥ ॥ ष्ठ꣢स꣡त्पाऽ२३ती꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ६)(१५)॥ थू ॥ ६०८ ॥

३५४-२
आ꣣꣯ त्वा꣤꣯र꣣थँ ꣤यथो꣥꣯ । त꣣या꣢इ᳐ । आ꣣꣯ त्वा꣤꣯र꣥थाम् ॥ य꣢थो꣡ताया꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । ई꣣ऽ२३४हा꣥ ।
सु꣢म्ना꣯यवर्त्तऽ३या꣡मसि꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ तु꣢विकू꣯र्मिमृऽ३ ता꣡इषह꣢ ᳐म् ।
औ꣣꣯हो꣢ऽ३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ इ꣢न्द्रꣳशविष्ठऽ३सा꣡त्पति꣢ ᳐म् । औ꣣꣯हो꣢ऽ३१इ ।
औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४५वाऽ६५६ ॥ ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ ११। प॰ १५। मा॰ ८)(१६)॥ कै ॥ ६०९ ॥
३५५-१ मधुश्चुन्निधनम्।   प्रजापतिरनुष्टुबिन्द्रः ॥
स꣥पू꣯र्व्यो꣯महो꣯नाऽ६मे꣥ ॥ वे꣢꣯न:क्रतूऽ३भा꣡इरा꣯नजे꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । आ꣡इहीऽ२ ।
यस्यद्वा꣯रा꣯ऽ३मा꣡नु:पिता꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । आ꣡इहीऽ२ ॥ दा꣡इवे꣯षुधा꣢ऽ३ ।
हा꣢ऽ३हा꣢इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । आ꣡इहीऽ२ ॥ यआ꣡ऽ२३ । ना꣡ऽ२᳐जा꣣ऽ२३४ औ꣥꣯हो꣯वा ॥
म꣢धुश्चु꣡ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १०। प॰ १६। मा॰ ९)(१७)॥ पो ॥ ६१० ॥
३५६-१ उषसस्साम।   उषानुष्टुबिन्द्रः ॥
य꣤दी꣥꣯व꣤ह꣥न्त्या꣯श꣤व꣥: । य꣤ । द्येयादी꣥ ॥ ओ꣡इवहन्ताआ꣢ऽ१शावाऽ२: ।
ओ꣡इभ्रा꣯जमा꣯ना꣯रथाइषू꣢ऽ१वाऽ२ । ओ꣡इपिबन्तो꣯मदिरांमा꣢ऽ१धूऽ२ ॥ ओ꣡इ ।
तत्रश्रवा꣯ꣳसिकोवा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ ण्वा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ १०)(१८)॥ झौ ॥ ६११ ॥
३५७-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
त्य꣣मु꣤वो꣥꣯अ । प्र꣣हा꣢ ᳐ । हा꣣ऽ२३४णा꣥म् ॥ गृ꣢णी꣯षे꣡꣯शवस꣢: । प꣡ताइम् । आइन्द्रा꣢ऽ३म्वा꣤इश्वा꣥ ।
स꣡हा꣢ऽ३ꣳहो꣡ये꣢ऽ३४ । ना꣥र꣣मो꣢ऽ३इ ॥ श꣢चि꣡ष्ठाऽ२३४म्वी꣥ ॥ श्व꣡वा꣢ऽ३हो꣡ऽ२३४ । वा꣥ ।
दा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ९)(१९)॥ ठो ॥ ६१२ ॥
३५८-१ (दधिक्रम्) दधिक्राव्णम्।   अग्निरनुष्टुबिनन्द्रः दधिक्रा वा ॥
ओ꣤हाइ । द꣥धिक्रा꣤꣯ व्णो꣥꣯अका꣯रिषम् । ओ꣤हाइ ॥ ओ꣡हाइ । जिष्णो꣯रश्वस्यवा꣯जिनाऽ२३हो꣡इ ।
सु꣢रभि꣡नो꣯मु꣢खा꣡꣯काऽ२३रा꣢त् ॥ प्र꣡नाऽ२३हो꣡इ । आ꣯यूऽ२३हो꣡ ॥ षि꣢ता꣡꣯राऽ२३ इषा꣢ऽ३४३त् ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ ११)(२०)॥ त ॥ ६१३ ॥
३५९-१ मारुतम्।   मरुतोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
पु꣥रां ꣯भि꣣न्दु꣢र्यु꣣वा꣤꣯क꣥वीः ॥ अ꣡मितौ꣯जा꣯अ꣢जा꣡꣯याऽ२३ता꣢ । आ꣡इन्द्रो꣯विश्वा꣢ऽ३ । स्या꣡क꣢र्मा꣣ऽ२३४णा꣥: ॥
ध꣡र्त्ता । वाश्रौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ पु꣤रूऽ५ष्टुताः । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ७)(२१)॥ घे ॥ ६१४ ॥
॥ एकादशः द्वितीयः, प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥ दशतिः ॥ ७ ॥

॥ अथ द्वितीय खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१३)

३६०-१ वामदेव्यम्।   वामदेवोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
प्र꣥प्रवस्त्रिष्टुभमिषमो꣯हा꣯ओ꣯हाऽ६ए꣥ ॥ व꣢न्द꣡द्वीरा꣢ । यआ꣡इन्द꣪वेऽ२ । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ए꣢ ।
धि꣡या꣯वो꣯मे꣯धसा꣢ऽ१ता꣢ऽ३या꣢इ । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ए꣢ ॥ पु꣡रांधी꣢ऽ३या꣢ऽ३ । वि꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
सा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ८)(२२)॥ कै ॥ ६१५ ॥
३६१-१ काश्यपम्।   कश्यपोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
क꣥श्यपस्यसुवर्विदाऽ६ए꣥ ॥ या꣡वा꣯हु꣢स्स । युजा꣡वा꣢ऽ१इतीऽ२३४ । य꣣यो꣤꣯र्वि꣣श्व꣤मपि꣥ । व्र꣣ता꣢ऽ३म् ॥
य꣡ज्ञान्धी꣢ऽ३रा꣥: ॥ निचा꣡ऽ२३ । आ꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ५)(२३)॥ ध्वु ॥ ६१६ ॥
३६२-१ प्रैयमेधम्।   प्रियमेधानुष्टुबिन्द्रः ॥
अ꣢र्चतप्रा꣯र्चता᳐ना꣣ऽ२३४रा꣥: ॥ प्रि꣢यमे꣯धाऽ३सो꣤ऽ३अ꣢र्च꣣त꣥ । अ꣢र्च꣡न्तुपूऽ२३त्रा꣤ऽ३का꣢꣯उ꣣त꣥ ॥
पु꣡रमिद्धाऽ२३ ॥ ष्णुवा꣢ऽ३र्चा꣤ऽ५᳚ताऽ६५६ ॥
(दी॰ ३। प॰ ५। मा॰ ३)(२४)॥ णि ॥ ६१७ ॥
३६३-१ बार्हदुक्थम्।   बृहदुक्थोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
उ꣥क्थमिन्द्रा ॥ य꣢श꣡ꣳसाऽ२३या꣢म् । वा꣡र्द्धनं ꣢पु । रुनि꣡श्शाऽ२३इधा꣢इ । श꣡क्रोया꣢ऽ३था꣢ऽ३ ।
सू꣡ते꣢ ᳐षू꣣ऽ२३४ना꣥: ॥ रा꣢꣯र꣡णाऽ२३त्सा꣢ ॥ खिया꣡इषूऽ२३चा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ १०। मा॰ ६)(२५)॥ ङू ॥ ६१८ ॥
३६४-१ अग्नेर्वैश्वानरस्य सामनी द्वे।   द्वयोरग्निरनुष्टुबग्निरिन्द्रो वैश्वानरो वा ॥
वि꣥श्वा꣯नरा ॥ स्य꣢वाऽ२स्पा꣡तीऽ२म् । आ꣡ना꣯न꣢त । स्यशा꣡वा꣢ऽ१साऽ२: । ए꣡वै꣯श्चा꣢꣯ । चर्ष꣡णाऽ२इना꣡म् ॥
ऊऽ२ती꣡ ॥ हु꣢वा꣡इर꣢ । था꣡ऽ२३४नो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ६)(२६)॥ धू ॥ ६१९ ॥

३६४-२
वि꣣श्वा꣢ऽ३४ । नरस्य꣥वौ꣯ । हो꣤स्पाती꣥म् ॥ अ꣢ना꣡꣯नता꣢ऽ३ । स्या꣡शा꣢ ᳐वा꣣ऽ२३४सा꣥: । ए꣡वै꣯श्चा꣢꣯ ।
चर्ष꣡णाऽ२३४इना꣥म् ॥ ऊ꣢꣯ ती꣡꣯हु꣢वा꣡इर꣢ ॥ था꣡ऽ२३४नो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(२७)॥ घू ॥ ६२० ॥
३६५-१ शाकपूते द्वे।   द्वयोः शाकपूतिरनुष्टुबिन्द्रः ॥
स꣢घा꣡꣯यस्ता꣢ऽ३इ । ए꣢ । दिवो꣡꣯नरा꣢ऽ३ः । ए꣢ । धिया꣡꣯मर्ता꣢ऽ३ । ए꣢ ॥ स्यश꣡मता꣢ऽ३ः । ए꣢ ॥
ऊ꣯ता꣡इसबृ꣢ऽ३ । ए꣢ । हतो꣡꣯दिवा꣢ऽ३ः । ए꣢ ॥ द्विषो꣡꣯अꣳहा꣢ऽ३ः । ए꣢ । ना꣡तर꣢ति । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १८। मा॰ ८)(२८)॥ गै ॥ ६२१ ॥

३६५-२
स꣥घा꣯यस्ताइ ॥ दि꣢वो꣯न꣡राः । धि꣢या꣯मा꣡र्ताऽ२ । स्यशम꣡ताः ॥ ऊ꣢꣯ती꣯सा꣡बृऽ२ । हतो꣯दि꣡वाः ॥
द्वि꣢षो꣯आ꣡ꣳहाऽ२: ॥ ना꣡तर꣢ति । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ७)(२९)॥ चे ॥ ६२२ ॥
३६६-१ वरुणान्याः साम।   वरुणान्यनुष्टुबिन्द्रः ॥
वि꣥भो꣯ष्टइन्द्ररा꣯धाऽ६सा꣥: ॥ वि꣢भ्वी꣡꣯ रा꣰꣯ऽ२ति꣡श्शत꣢क्रतो꣯ । शताऽ२क्रा꣡ताउ ॥ आथा꣯नो꣢꣯विश्वचर्षणे꣯ ।
श्वचाऽ२र्षा꣡णाइ ॥ द्यु꣢म्न꣡ꣳसुद꣢त्रमꣳहय᳐ । त्र꣣मा꣢ऽ३ꣳहा꣤ऽ५᳚याऽ६५६ ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ ४)(३०)॥ ठी ॥ ५२३ ॥
३६७-१ उषसम् औषसम् वा।   उषानुष्टुबिन्द्रः। उषा वा ब् ॥
व꣥यश्चा꣢ऽ३इत्ते꣤꣯पत꣥त्रिणाः ॥ द्वि꣢पा꣡꣯च्चतुष्पा꣯दर्जुनाये꣢ऽ३ । ऊ꣤ष꣥ᳲप्रा꣤रा꣥न् । ऋ꣢तू꣯ꣳर꣡नू ॥
दि꣢वो꣯आ꣡न्तेऽ२३ ॥ भा꣡ऽ२३या꣤ऽ३ः । पा꣢ऽ३४५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ६)(३१)॥ फू ॥ ६२४ ॥
३६८-१ देवानां रुचिः।   रोचनम् वा । रुचिरनुष्टुबिन्द्रः विश्वेदेवा वा ॥
अ꣥मी꣯ये꣯दे꣯वा꣯स्था꣤ना꣥ ॥ म꣡ध्यआ꣯रो꣯चने꣯दिवाः । क꣢द्वऋ꣡ताम् । क꣢दमा꣡र्ताऽ२म् ॥
का꣡꣯प्रत्ना꣯व꣢आ꣡꣯हूऽ२३ती꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ७। मा॰ ८)(३२)॥ फै ॥ ६२५ ॥
३६९-१ ऋक्साम्नोस्सामनी द्वे।   द्वयोः ऋगनुष्टुबिन्द्रः ॥
ऋ꣤च꣥ꣳ सा꣤꣯म꣥यजा꣤ ॥ म꣡हाइ । या꣯भ्यां ꣯कर्मा꣯णि꣢कृ꣡ण्वाऽ२३ता꣢इ । वि꣡ते꣯सदसि꣢रा꣡꣯जाऽ२३ता꣢: ॥
यज्ञं ꣡दाऽ२३इवे꣢ ॥ षू꣡वक्ष꣢तः ॥ इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(३३)॥ घू ॥ ६२६ ॥

३६९-२ साम्नः साम।   सामानुष्टुबिन्द्रः ॥
ऋ꣥चꣳसा꣢ऽ३मा꣤य꣥जा꣤꣯महा꣥इ ॥ या꣡भ्यां ꣯क꣢र्मा꣯ । णिका꣡र्ण्वा꣢ऽ१ताऽ२इ । ण्वा꣡ताऽ२इ । वा꣡इते꣯स꣢द ।
सिरा꣡जा꣢ऽ१ताऽ२: । जा꣡ताऽ२: ॥ य꣡ज्ञांदा꣢ऽ१इवेऽ२ ॥ षू꣡वक्ष꣢तः । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ ९)(३४)॥ थौ ॥ ६२७ ॥
॥ त्रयोदशतृतीयः, द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥ दशतिः ॥ ८ ॥

॥ अथ तृतीय खण्डः॥ (ऋ-१, सा-१)

३७०-१ त्रैशोकम्।   त्रिशोको जगतीन्द्रः ॥
वि꣥श्वो꣤हाइ ॥ पृ꣡तना꣢꣯अभिभू꣡꣯ । त꣢र꣣न्न꣢रा꣡: । स꣢जू꣡꣯स्तत꣢क्षुरा꣡इन्द्रञ्ज꣢जनू꣡: । च꣢रा꣯जा꣡सोऽ२३४हा꣥इ ।
क्र꣢त्वौ꣡꣯होइ । व꣢रौ꣡꣯होइ । स्थे꣯मन्याऽ२᳐मू꣣ऽ२३४री꣥म् ॥ उतो꣤हाइ ॥ उ꣢ग्र꣡मोऽ२३४जी꣥ ।
ष्ठं ꣢ता᳐रा꣣ऽ२३४सा꣥म् । हो꣢इ᳐ । त꣣रा꣢ऽ३४ । स्विनम् । ओ꣥ऽ६वा꣥ ॥ ओ꣢इ᳐दी꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १६। मा॰ १४)(३५)॥ ची ॥ ६२८ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने नवमः प्रपाठकः ॥ ९ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — दशमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ तृतीय खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-१०, सा-२३)

३७१-१ शैखण्डिने द्वे।   द्वयोः शिखण्डी जगतीन्द्रः ॥
श्र꣣त्ते꣢ऽ३हो꣡इ । द꣣धा꣢ऽ३हो꣡ऽ२३४ । मिप्र꣥थमा꣤꣯य꣥म । न्य꣤वा꣥इन्य꣤वा꣥इ ॥ अ꣣हा꣢ऽ३न्हो꣡इ ।
य꣣द्दा꣢ऽ३हो꣡ऽ२३४ । स्युन्नर्यं ꣥विवे꣤꣯: । अपा꣥अ꣤पा꣥: ॥ उ꣣भे꣢ऽ३हो꣡इ । य꣣त्त्वा꣢ऽ३हो꣡ऽ२३४ ।
रो꣯द꣥सी꣯धा꣤꣯व꣥ता꣯म् । अ꣤नू꣥अ꣤नू꣥ ॥ भ्य꣣सा꣢ऽ३द्धो꣡इ । ते꣣꣯शू꣢ऽ३हो꣡ऽ२३४ । ष्मा꣯त्पृ꣥थिवी꣤꣯चि꣥द ।
द्रि꣤वो꣥द्रि꣤वा꣥: । द्रि꣤व꣥आ꣤ । औ꣥꣯हो꣯वाऽ६ । हा꣥उवा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ २०। मा॰ १४)(१)॥ र्ङी ॥ ६२९ ॥

३७१-२
श्र꣣त्ता꣢ऽ३१इ । द꣣धा꣢ऽ३१२३४ । मिप्र꣥थमा꣤꣯य꣥म । न्य꣤वा꣥इन्य꣤वा꣥इ ॥ अ꣣हा꣢ऽ३१न् । य꣣द्दा꣢ऽ३१२३४ ।
स्युन्नर्यं ꣥विवे꣤꣯: । अपा꣥अ꣤पा꣥: ॥ उ꣣भा꣢ऽ३१इ । य꣣त्त्वा꣢ऽ३१२३४ । रो꣯द꣥सी꣯धा꣤꣯व꣥ता꣯म् । अ꣤नू꣥अ꣤नू꣥ ॥
भ्य꣣सा꣢ऽ३१त् । ते꣣꣯शू꣢ऽ३१२३४ । ष्मा꣯त्पृ꣥थिवी꣤꣯चि꣥द । द्रि꣤वो꣥द्रि꣤वा꣥: । द्रि꣤व꣥ए꣤ । हि꣥याऽ६हा꣥ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ २०। मा॰ १४)(२)॥ नी ॥ ६३० ॥

३७१-३ अत्रेर्विवर्तौद्वौ।   द्वयोरत्रिर्जगतीन्द्रः ॥
अ꣣योऽ२३४वा꣥ । अ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । श्रा꣤त्ता꣥इ । दा꣡ऽ२३४धा꣯ । मि꣥प्रथमा꣤꣯य꣥म । न्य꣤वा꣥इन्य꣤वा꣥इ ॥
अ꣣योऽ२३४वा꣥ । अ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । आ꣤हा꣥न् । या꣡ऽ२३४द्द । स्यु꣥न्न꣤र्यं ꣥विवे꣤꣯: । अपा꣥अ꣤पा꣥: ॥
अ꣣योऽ२३४वा꣥ । अ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । ऊ꣤भा꣥इ । या꣡ऽ२३४त्त्वा꣯ । रो꣯द꣥सी꣯धा꣤꣯व꣥ता꣯म् । अ꣤नू꣥अ꣤नू꣥ ॥
अ꣣योऽ२३४वा꣥ । अ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । भ्या꣤सा꣥त् । ता꣡ऽ२३४इशु । ष्मा꣥꣯त्पृथिवी꣤꣯चि꣥द । द्रि꣤वो꣥द्रि꣤वा꣥: ।
द्रि꣤व꣥आ꣤ । औ꣥꣯हो꣯वाऽ६ । हा꣥उवा ॥ द्रि꣢वऔ꣯ह꣢ꣳऽ१ ॥
(दी॰ १३। प॰ २८। मा॰ १६)(३)॥ डू ॥ ६३१ ॥

३७१-४
इ꣣योऽ२३४वा꣥ । इ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । श्रा꣤त्ता꣥इ । दा꣡ऽ२३४धा꣯ । मि꣥प्रथमा꣤꣯य꣥म । न्य꣤वा꣥इन्य꣤वा꣥इ ॥
इ꣣योऽ२३४वा꣥ । इ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । आ꣤हा꣥न् । या꣡ऽ२३४द्द । स्यु꣥न्न꣤र्यं ꣥विवे꣤꣯: । अपा꣥अ꣤पा꣥: ॥
इ꣣योऽ२३४वा꣥ । इ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । ऊ꣤भा꣥इ । या꣡ऽ२३४त्त्वा꣯ । रो꣯द꣥सी꣯धा꣤꣯व꣥ता꣯म् । अ꣤नू꣥अ꣤नू꣥ ॥
इ꣣योऽ२३४वा꣥ । इ꣣या꣢ ᳐यो꣣ऽ२३४वा꣥ । भ्या꣤सा꣥त् । ता꣡ऽ२३४इशु । ष्मा꣥꣯त्पृथिवी꣤꣯चि꣥द । द्रि꣤वो꣥द्रि꣤वा꣥: ।
द्रि꣤व꣥आ꣤ । औ꣥꣯हो꣯वाऽ६ । हा꣥उवा ॥ द्रि꣢वइहोऽ३ह꣢ꣳऽ१ ॥
(दी॰ १२। प॰ २८। मा॰ १६)(४)॥ जू ॥ ६३२ ॥

३७१-५ महासावेतसे द्वे।   द्वयोः सवेतसो जगतीन्द्रः ॥
आ꣡ऽ२३या꣢ऽ३म् । श्रा꣤त्ता꣥इ । दा꣡ऽ२३४धा꣯ । मि꣥प्रथमा꣤꣯य꣥म । न्य꣤वा꣥इन्य꣤वा꣥इ ॥ आ꣡ऽ२३या꣢ऽ३म् ।
आ꣤हा꣥न् । या꣡ऽ२३४द्द । स्यु꣥न्न꣤र्यं ꣥विवे꣤꣯: । अपा꣥अ꣤पा꣥: ॥ आ꣡ऽ२३या꣢ऽ३म् । ऊ꣤भा꣥इ । या꣡ऽ२३४त्त्वा꣯ ।
रो꣯द꣥सी꣯धा꣤꣯व꣥ता꣯म् । अ꣤नू꣥अ꣤नू꣥ ॥ आ꣡ऽ२३या꣢ऽ३म् । भ्या꣤सा꣥त् । ता꣡ऽ२३४इशु । ष्मा꣥꣯त्पृथिवी꣤꣯चि꣥द ।
द्रि꣤वो꣥द्रि꣤वा꣥: । द्रि꣤व꣥आ꣤ । औ꣥꣯हो꣯वाऽ६ । हा꣥उवा ॥ द्रि꣢वोऽ३द्रि꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ २४। मा॰ २०)(५)॥ झौ ॥ ६३३ ॥

३७१-६
अ꣢यंयाऽ३ः । श्रा꣤त्ता꣥इ । द꣡धा꣢ऽ३१२३४ । मिप्र꣥थमा꣤꣯य꣥म । न्य꣤वा꣥इन्य꣤वा꣥इ ॥ अ꣢यंयाऽ३ः ।
आ꣤हा꣥न् । य꣡द्दा꣢ऽ३१२३४ । स्युन्नर्यं ꣥विवे꣤꣯: । अपा꣥अ꣤पा꣥: । अ꣢यंयाऽ३ः । ऊ꣤भा꣥इ । य꣡त्त्वा꣢ऽ३१२३४ ।
रो꣯द꣥सी꣯धा꣤꣯व꣥ता꣯म् । अ꣤नू꣥अ꣤नू꣥ । अ꣢यंयाऽ३ः । भ्या꣤सा꣥त् । ता꣡इशू꣢ऽ३१२३४ । ष्मा꣯त्पृ꣥थिवी꣤꣯चि꣥द ।
द्रि꣤वो꣥द्रि꣤वा꣥: । द्रि꣤व꣥आ꣤ । औ꣥꣯हो꣯वाऽ६ । हा꣥उवा । द्रि꣢वाऽ३ई꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ २४। मा॰ २०)(६)॥ भौ ॥ ६३४ ॥

३७१-७ महाशैरीषे द्वे।   द्वयोः शिरीषो जगतीन्द्रः ॥
औ꣥꣯हो꣤होहा꣥इ । श्रा꣤त्ता꣥इ ॥ दा꣣ऽ२३४धा꣥ । मी꣢प्रा᳐था꣣ऽ२३४मा꣥ । य꣢म᳐न्या꣣ऽ२३४वे꣥ ।
य꣢म᳐न्या꣣ऽ२३४वा꣥इ ॥ अ꣣हा꣢ऽ३१२न्(स्थि)या꣣ऽ२३४द्दा꣥ । स्यु꣢न्ना᳐री꣣ऽ२३४या꣥म् । वि꣢वे᳐रा꣣ऽ२३४पो꣥ ।
वि꣢वे᳐रा꣣ऽ२३४पा꣥: ॥ उ꣣भा꣢ऽ३१२इया꣣ऽ२३४त्त्वा꣥ । रो꣢दा᳐सी꣣ऽ२३४धा꣥ । व꣢ता᳐मा꣣ऽ२३४नू꣥ ।
व꣢ता᳐मा꣣ऽ२३४नू꣥ ॥ भ्य꣣सा꣢ऽ३१२त्ता꣣ऽ२३४इशू꣥ । ष्मा꣢त्पॄ᳐थी꣣ऽ२३४वी꣥ । चि꣢द᳐द्रि꣣ऽ२३४व꣥: ।
चि꣢द᳐द्रा꣣ऽ२३४इवा꣥: । द्रि꣤व꣥आ꣤ । औ꣥꣯हो꣯वाऽ६ । हा꣥उवा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । द्रि꣢वइ꣡हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ २३। मा॰ १४)(७)॥ डी ॥ ६३५ ॥

३७१-८
श्र꣥त्ता꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ । द꣡धा꣢ऽ३१२३४ । मिप्र꣥थमा꣤꣯य꣥म । न्य꣤वा꣥इन्य꣤वा꣥इ ॥ अहा꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ ।
य꣡द्दा꣢ऽ३१२३४ । स्युन्नर्यं ꣥विवे꣤꣯: । अपा꣥अ꣤पा꣥: ॥ उभा꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ । य꣡त्त्वा꣢ऽ३१२३४ । रो꣯द꣥सी꣯धा꣤꣯व꣥ता꣯म् ।
अ꣤नू꣥अ꣤नू꣥ ॥ भ्यसा꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ । ता꣡इशू꣢ऽ३१२३४ । ष्मा꣯त्पृ꣥थिवी꣤꣯चि꣥द । द्रि꣤वो꣥द्रि꣤वा꣥: । द्रि꣤व꣥आ꣤ ।
औ꣥꣯हो꣯वाऽ६ । हा꣥उवा । द्रि꣢वएऽ३द्रि꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १८। प॰ २०। मा॰ २१)(८)॥ ण ॥ ६३६ ॥
३७२-१ इन्द्रस्य प्रियाणि त्रीणि।   त्रयाणां इन्द्रो जगतीन्द्रः ॥
स꣤माहा꣥उ ॥ आ꣡इतविश्वा꣯ओ꣯जसा꣢ऽ३ । प꣡तिमा꣢ऽ३इ । दि꣡वाऽ२३४ः । हा꣣꣯हो꣢इ ।
यआ꣡इका꣢ऽ१ईऽ२त् । भू꣡꣯रतिथि꣢: । ज꣡नाऽ२३ना꣢ऽ३४म् । हा꣣꣯हो꣢इ । सपू꣡र्वि꣪याऽ२: । नू꣡꣯तन꣢मा꣯ ।
जि꣡गाऽ२३इषा꣢ऽ३४न् । हा꣣꣯हो꣢इ ॥ तंवा꣡र्त्ता꣢ऽ१नीऽ२: । अ꣡नुवा꣢꣯वृते꣯ । आ꣡ये꣢ऽ३ । कया꣢उवाऽ३ ॥
वृ꣢धेऽ१ ॥
(दी॰ १०। प॰ १८। मा॰ १९)(९)॥ बो ॥ ६३७ ॥

३७२-२
स꣥मे꣤꣯त꣥वि꣤श्वा꣥꣯ ओ꣤꣯ज꣥सा꣯प꣤ति꣥म् । ए꣤पाती꣥म् ॥ दि꣡वया꣢꣯ । हौऽ२ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ ।
यआ꣡इका꣢ऽ१ईऽ२त् । भू꣡꣯रतिथि꣢: । ज꣡नाऽ२३ना꣢म् । हौऽ२ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ ।
सपू꣡र्वि꣪याऽ२: । नू꣡꣯तन꣢मा꣯ । जि꣡गाऽ२३इषा꣢न् । हौऽ२ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥
तंवा꣡र्त्ता꣢ऽ१नीऽ२: । अ꣡नुवा꣢꣯वृते꣯ । आ꣡ये꣢ऽ३ । कया꣢उवाऽ३ ॥ म꣢हेऽ१ ॥
(दी॰ १०। प॰ २३। मा॰ १४)(१०)॥ बी ॥ ६३८ ॥

३७२-३
स꣥मे꣤꣯त꣥वि꣤श्वा꣥꣯ ओ꣤꣯ज꣥सा꣯प꣤ति꣥म् । ए꣤पाती꣥म् ॥ दा꣡इवा꣢ऽ१याऽ२ । औऽ२ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ओ꣡मोवा꣢ ।
यआ꣡इका꣢ऽ१ईऽ२त् । भू꣡꣯रतिथि꣢: । ज꣡नाऽ२३ना꣢म् । औऽ२ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ओ꣡मोवा꣢ ।
सपू꣡र्वा꣢ऽ१याऽ२: । नू꣡꣯तन꣢मा꣯ । जि꣡गाऽ२३इषा꣢न् । औऽ२ । हौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ओ꣡मोवा꣢ ।
तंवा꣡र्त्ता꣢ऽ१नीऽ२: । अ꣡नुवा꣢꣯वृते꣯ । आ꣡ये꣢ऽ३ । कया꣢उवाऽ३ ॥ ध꣡र्मणे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ २३। मा॰ १५)(११)॥ दु ॥ ६३९ ॥
३७३-१ वैरूपाणि त्रीणि।   त्रयाणां इन्द्रो जगतीन्द्रः ॥
इ꣥मे꣯तआ ॥ द्र꣢ते꣡꣯वयंपुरूऽ२ष्टू꣡ताऽ२ । ये꣡꣯त्वा꣯रभ्यचरा꣯मसिप्रभूऽ२वा꣡साऽ२उ ।
नहि꣡त्वदन्यो꣯गिर्वणो꣯गिराऽ२स्सा꣡घाऽ२त् ॥ क्षो꣯णी꣡꣯रिवप्रतितद्धर्यनोऽ२वा꣡चाऽ२᳐: ।
व꣣चा꣢ ᳐ओ꣣ऽ । २३४वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ६)(१२)॥ ढू ॥ ६४० ॥

३७३-२
इ꣥मे꣯तआ ॥ द्र꣢ते꣡꣯वयंपुरु꣢ । ष्टु꣡ता । या꣢ऽ१इत्वाऽ२रा꣡भ्याऽ२ । चा꣡रा꣯म꣢सिप्रभू꣯ । व꣡साउ ।
ना꣢ऽ१हीऽ२त्वा꣡दाऽ२न् । यो꣡गिर्व꣢णो꣯गि꣡रः । सघात् ॥ क्षो꣢ऽ१णीऽ२रा꣡इवाऽ२ । प्र꣡ति꣢त꣡द्ध꣢ ।
र्यनो꣡꣯वाऽ२३चा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ९)(१३)॥ घो ॥ ६४१ ॥

३७३-३
इ꣢मे꣡꣯ताऽ२३इ꣤न्द्र꣥ते꣤꣯व꣥यं ꣤पु꣥रुष्टुतो꣤वा꣥ ॥ ये꣡꣯त्वा꣯राभ्याऽ२ । च꣡रा꣯मसीऽ२३प्रा꣤ऽ३भू꣢꣯व꣣सा꣥उ ।
न꣢हि꣡त्वादाऽ२न् । यो꣡꣯गिर्वणोऽ२३गी꣤ऽ३र꣢स्स꣣घ꣥त् । क्षो꣡꣯णी꣯रिवाऽ२ ॥ प्र꣡तितद्धाऽ२३ ।
र्य꣤नोऽ५वचाः । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १०। मा॰ ६)(१४)॥ नू ॥ ६४२ ॥
३७४-१ बार्हदुक्थम्।   बृहदुक्थो जगतीन्द्रः ॥
च꣥र्षणी꣯धृतꣳहाउ ॥ म꣢घ꣡वा꣯न꣢मु꣡क्थाऽ२३या꣢म् । इ꣡न्द्रंगिरो꣯बृहती꣯रभ्य꣢नू꣡꣯षाऽ२३ता꣢ । वा꣡वृ꣪धानाऽ२म् ।
पु꣡रु꣪हूताऽ२३म् । सु꣡वाऽ२᳐र्क्ता꣣ऽ२३४इभी꣥: ॥ अ꣡माऽ२र्तिया꣡म् । ज꣢र꣡माणाऽ२३म् ॥ दा꣡ऽ२३इवे꣤ऽ३ ।
दा꣢ऽ३४५इवोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ११)(१५)॥ म ॥ ६४३ ॥
३७५-१ त्रासदस्यवे द्वे।   द्वयोस्त्रसदस्युर्जगतीन्द्रः ॥
अ꣥च्छा꣯वइन्द्रंमतयस्सुवर्युवाऽ६ए꣥ ॥ स꣢ध्री꣡꣯ची꣯र्विश्वा꣯उशती꣯रनूऽ२षा꣡ताऽ२ ।
प꣡रिष्वजन्तजनयो꣯यथाऽ२पा꣡तीऽ२म् ॥ मर्य꣡न्नाऽ२३शू꣢ ॥ ध्यु꣡म्म꣢ । घ꣡वाऽ२᳐ । न꣣मू꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
त꣢याऽ३ई꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ६)(१६)॥ डू ॥ ६४४ ॥

३७५-२ अच्छत्रासदस्यवम्।
आ꣡ऽ२३४ । च्छा꣯व꣥इ꣤न्द्रं ꣥म । त꣤या꣥: । सू꣢꣯व꣡र्युवाऽ२३ः । सा꣡ऽ२३४ । ध्री꣯ची꣥꣯र्वि꣤श्वा꣥꣯उ । श꣤ती꣥: ।
आ꣢꣯ नू꣡꣯षताऽ२३ । पा꣡ऽ२३४ । रिष्व꣥जन्तज꣤ । नया꣥: । या꣢꣯ था꣡꣯पताऽ२३इम् । मा꣡ऽ२३४ ।
र्यन्नशु꣥न्ध्यु꣤म्म꣥ । घ꣤वा꣥ । ना꣢꣯ मू꣡꣯तया꣢ऽ३१उ । वाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ १७। मा॰ ९)(१७)॥ खो ॥ ६४५ ॥
३७६-१ जागतꣳसोमसाम।   सोमो जगतीन्द्रः ॥
अ꣥भित्या꣢ऽ३म्मे꣤꣯षं ꣥पु꣤रुहू꣥ ॥ त꣢मृग्मा꣡याऽ२म् । इन्द्रंगी꣯र्भाइः । मदता꣯वस्वाऽ३आ꣡र्ण꣪वम् ।
ओ꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ ॥ यस्यद्या꣯वो꣯नविचरन्तिऽ३मा꣡नु꣪षम् । ओ꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ ॥
भुजे꣯मꣳहिष्ठमभिविप्रमर्चत । दु꣡राऽ२᳐ । ति꣣ना꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ ९)(१८)॥ ञ्वो ॥ ६४६ ॥
३७७-१ सौभरम्।   सुभरिर्जगतीन्द्रः ॥
त्꣥ꣳसू꣢ऽ३मे꣤꣯षं ꣥म꣤हया꣥ ॥ सु꣢वर्वा꣡इदाऽ२म् । शतंयस्यसुभुवस्सा꣯कऽ३मा꣡इरा꣢ऽ१ताऽ२इ ।
अत्यन्नवा꣯जꣳहवनस्यऽ३दा꣡ꣳरा꣢ऽ१थाऽ२म् ॥ आ꣡इन्द्रं ꣢ववृ꣡त्या꣢꣯म꣡ ॥ वसाये꣢ऽ३ ।
सू꣡ऽ२᳐वॄ꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्ती꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ८)(१९)॥ गै ॥ ६४७ ॥
३७८-१ जागतं वरुणसामनी द्वे।   द्वयोर्वरुणो जगतीद्यावापृथिव्यौ ॥
घृ꣤त꣣व꣥ । ता꣤ऽ३इभु꣢व꣣ना꣤꣯ ना꣥꣯म् । अभिश्रिया ॥ उ꣢र्वी꣡꣯पृथ्वी꣯मधुदुघे꣯सुपे꣯शसाऽ२३हो꣡इ ।
द्या꣯वा꣯पृथिवी꣯वरुणा । स्या꣢꣯ध꣡र्मणाऽ२३ । हो꣡इ ॥ वि꣢ष्का꣡भाऽ२३इते꣢ ॥ आ꣡जरे꣢꣯ । भू꣡꣯रि । राये꣢ऽ३ ।
तसा꣢उवाऽ३ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । इ꣡न्दुस्स꣢मुद्र꣡मुर्वि꣢या꣡꣯विभा꣢꣯ती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १४। प॰ १४। मा॰ ६)(२०)॥ धू ॥ ६४८ ॥

३७८-२
घृ꣥त꣤व꣥ती꣯भु꣤व꣥ना꣯ना꣯म । भा꣤ऽ५इश्रिया꣤ ॥ उ꣢र्वी꣡꣯पृथ्वी꣯मधुदुघे꣯सुपे꣯शाऽ२सा꣡ । द्या꣯वा꣯पृथिवी꣯वरुणा ।
स्या꣢꣯ध꣡र्मणा ॥ वाइष्क꣢भिता꣡इ ॥ अ꣢ज꣡रे꣰꣯ऽ२भू꣡꣯रि । राये꣢ऽ३ । तसा꣢उवाऽ३ ॥
इ꣡न्दुस्स꣢मुद्र꣡मुर्वि꣢या꣡꣯विभा꣢꣯ती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १५। प॰ १०। मा॰ ४)(२१)॥ मी ॥ ६४९ ॥
३७९-१ श्येनम्।   इन्द्रो जगतीन्द्रः ॥
उ꣥भे꣤꣯यदि꣥न्द्ररो꣤꣯द꣥सा꣤इ ॥ आ꣡ऽ२३पा꣢ । प्रा꣡थउ꣢षाऽ३१उवाऽ२३ । इ꣢व꣣आ꣢ । महा꣡꣯न्तन्त्वा꣯माहाइना꣢म् ॥
सं ꣡म्रौ꣭ऽ३हो꣢ ॥ जं ꣡चर्ष꣢णाऽ३१उवाये꣢ऽ३ । ना꣢ऽ३मा꣢ । दे꣯वी꣡꣯जनित्रियाजी꣢ऽ१जानाऽ२त् ॥ भ꣡द्रौ꣭ऽ३हो꣢ ॥
जा꣡नित्रि꣢यजाऽ३१उवाऽ२३ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ज꣢नदाऽ३२ ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ ९)(२२)॥ गो ॥ ६५० ॥
३८०-१ वैरूपम्।   विरूपो जगतीन्द्रो मरुत्वान् ॥
प्र꣢मं᳐दा꣣ऽ२३४इने꣥ ॥ पि꣢तुमदाऽ३र्च्चा꣤ऽ३ता꣢꣯व꣣च꣥: । यᳲ꣡का꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ।
ष्ण꣡गर्भा꣢꣯निर꣡ह꣢न्नृजि꣡श्वना꣢ऽ३ । अ꣢वस्या꣣ऽ२३४वा꣥: । वृ꣡ष꣢णंवा꣡ । श्राद꣢क्षा꣣ऽ२३४इणा꣥म् ॥
मा꣡रौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ त्व꣤न्तꣳसख्या꣯यहुवाऽ५इमहाउ ॥ वा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ९)(२३)॥ णो ॥ ६५१ ॥
॥ चतुर्विंशति चतुर्थः, तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ दशतिः ॥ ९ ॥

॥ अथ तुरीय खण्डः॥ (ऋ-३, सा-११)

३८१-१ क्रोशम्।   इन्द्र उष्णिगिन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रा꣤ ॥ सु꣢ते꣡꣯षुसो꣯मे꣯ । षु꣢ । हो꣡ईऽ२ । हो￿ । वा꣢꣯हो꣡इ । क्रतुंपुनी꣯षउक्थियाम् । वि꣢दा꣡इवा꣢ऽ१र्द्धाऽ२३ ॥
स्या꣢ऽ३दा꣡क्षा꣢ऽ३स्या꣢ ॥ म꣡हाऽ२३ꣳहिषा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ७)(२४)॥ फे ॥ ६५२ ॥

३८१-२ अनुक्रोशम्।   इन्द्र उष्णिगिन्द्रः ॥
इ꣣न्द्रा꣢ऽ३हो꣡इ । ह꣣वे꣢ऽ३हो꣡इ ॥ सु꣢ते꣡꣯षुसो꣯मे꣯षुक्रतुंपुनी꣯षउक्थियाम् ॥ वि꣢दा꣡इवा꣢ऽ१र्द्धाऽ२ ॥
स्यदक्ष꣡स्या । मा꣢ऽ३हा꣤꣯ꣳहि꣥ ॥ षा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ६)(२५)॥ फू ॥ ६५३ ॥

३८१-३ कौत्सम् (क्रोशम्)।   कुत्स उष्णिगिन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रसुते꣯षुसो꣯मे꣤षू꣥ ॥ क्र꣡तूंऽ२पु꣡नाइ । ष꣢उक्थि꣡याम् । वि꣢दे꣯वा꣡र्द्धाऽ२ । स्यदक्ष꣡स्या ॥
म꣢हा꣯ꣳहा꣡इषाऽ२: । म꣡हाऽ२३ꣳहिषा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ७)(२६)॥ धे ॥ ६५४ ॥
३८२-१ दैवोदासे द्वे।   द्वयोः दिवोदास उष्णिगिन्द्रः ॥
हा꣥꣯उतमू꣯वभी ॥ प्र꣢गा꣯य꣡ता । हा꣥꣯उ । पु꣢रू᳐हू꣣ऽ२३४ता꣥म् । पु꣢रुष्टु꣡ताम् । हा꣥꣯उ ॥ इ꣢न्द्रङ्गा꣣ऽ२३४इर्भी꣥: ॥
त꣢वा꣡इषाऽ२३मा꣢ऽ३४ । हा꣥꣯उ । वि꣣वा꣢ऽ३सा꣤ऽ५ताऽ६५६ ॥ दी꣣ऽ२३४वी꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ९)(२७)॥ को ॥ ६५५ ॥

३८२-२
ता꣣ऽ४मू꣥꣯वभी । हो꣢इ᳐ । प्र꣣गा꣤꣯यता꣥ऽ६ए꣥ ॥ पु꣢रू꣡हू꣢ऽ३ता꣢म् । पुरू꣡ष्टू꣢ऽ३ता꣢ऽ३म् । पू꣡रूऽ२᳐ष्टू꣣ऽ२३४ता꣥म् ।
इ꣢न्द्रा꣡ङ्गी꣢ऽ३र्भा꣢इः । तवा꣡इषा꣢ऽ३मा꣢ । विवा꣡सा꣢ऽ३ता꣢ऽ३ । वि꣡वाऽ२᳐सा꣣ऽ२३४ता꣥ । आ꣡इन्द्रा꣢ऽ३४म् ।
गी꣣꣯र्भा꣢ऽ३इः । त꣡विषम् । आऽ ॥ वि꣪वाऽ२३हा꣢ऽ३ । सा꣡ता꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ऊ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ १७। मा॰ १४)(२८)॥ र्ठी ॥ ६५६ ॥

३८२-३ प्रहितोः संयोजने द्वे।   द्वयोः ओकोनिधनं प्रहितिरुष्णिगिन्द्रः ॥
त꣥मू꣤ऽ३अ꣢भि꣣प्र꣤गा꣯य꣥ता ॥ पु꣢रू꣡ । हू꣯तंपुरूऽ२ष्टू꣡ताऽ२म् । इन्द्रांऽ२गा꣡इर्भीऽ२: । तवि꣡षाऽ२३४मा꣥ ॥
वि꣢वा꣡ऽ२३ ॥ सा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ओ꣣ऽ२३४का꣥: ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(२९)॥ ढू ॥ ६५७ ॥

३८२-४
त꣥मू꣤ऽ३अ꣢भि꣣प्र꣤गा꣯य꣥ते꣯दाम् ॥ पु꣢रू꣡ । हू꣯तंपुरूऽ२ष्टू꣡ताऽ२म् । आ꣡इन्द्रङ्गी꣢꣯र्भिस्तविषमा꣯ ।
विवा꣡सा꣢ऽ१ताऽ२ । आ꣡इन्द्रङ्गा꣢ऽ३४५इ । भा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इः ॥ त꣢वा꣡इषाऽ२३मा꣢ऽ३ ॥
वा꣡ऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣢तए꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ १२)(३०)॥ ञा ॥ ६५८ ॥
३८३-१ हारिवर्णानि चत्वारि।   चतुर्णां हरिवर्णउष्णिगिन्द्रः ॥
तं ꣤तेऽ५मदम् । गृ꣤णीऽ५मसि ॥ वृ꣢षा꣡ । णंपृक्षुसा꣯साऽ२हा꣡इम् । उ꣢लो꣡꣯का । कृत्नुमद्राइ ॥
वो꣯हाऽ२३री꣢ऽ३ ॥ श्रा꣡ऽ२३या꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ६)(३१)॥ णू ॥ ६५९ ॥

३८३-२
ता꣣ऽ४न्ते꣥꣯ । हो꣢इ᳐ । म꣣दं ꣤गृणी꣯मसी꣥ऽ६ए꣥ ॥ वृ꣢षा꣡होऽ२ । णं ꣡पृक्षूसा꣢ऽ१साहीऽ२म् ।
उलो꣯ककृत्नु꣡मद्रिवोहा꣢ऽ१रीऽ२ ॥ श्रिया꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ५)(३२)॥ णु ॥ ६६० ॥

३८३-३
तं ꣥ते꣯मदंगृणी꣯मसीऽ६ए꣥ ॥ वृ꣢षा꣡औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३४ । णंपृ꣥क्षु꣤सा꣥꣯सही꣤म् । उ꣢ला꣡औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३४ ।
ककृ꣥त्नु꣤म꣥द्रिवा꣤: ॥ ह꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ श्रा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ६)(३३)॥ ठू ॥ ६६१ ॥

३८३-४
तं ꣤ते꣯मदांऽ५गृणी꣯म꣤साइ ॥ वा꣡र्षणं ꣢पृ । क्षुसा꣡सा꣢ऽ३ही꣢ऽ३म् । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ उ꣡लोका꣢ऽ३कृ꣢ऽ३ ।
हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ ॥ त्नुमा꣡ऽ२३ । द्रा꣡ऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ह꣢रिश्रि꣡याऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ६)(३४)॥ धू ॥ ६६२ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने दशमस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — दशमप्रपाठके द्वितीयोऽर्धः

॥ तुरीय खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-७, सा-१७)

३८४-१ त्रैतानि चत्वारि।   चतुर्णां त्रित उष्णिगिन्द्रः ॥
य꣥त्सो꣯ममिन्द्रविष्णा꣤वी꣥ ॥ य꣡द्वा꣯घत्रितआ꣯प्तियाइ । य꣢द्वा꣯मरुत्सुमऽ३न्दा꣡सोऽ२३४हा꣥इ ॥
सा꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । दु꣡भी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ५)(१)॥ कु ॥ ६६३ ॥

३८४-२
य꣤त्सो꣯ममाऽ५इन्द्रविष्ण꣤वाइ ॥ य꣢द्वा꣡꣯घात्रितआ꣯प्ताऽ२या꣡इ ॥ य꣢द्वा꣡꣯माऽ२रु꣡त्सुमा ॥ दासाये꣢ऽ३ ।
सा꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ दू꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ६)(२)॥ कू ॥ ६६४ ॥

३८४-३
हा꣥꣯ओ꣯हा꣯यत्सो꣯ममा ॥ द्रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ष्णा꣣ऽ२३४वी꣥ । य꣡द्वा꣰꣯ऽ२घत्रित꣡आ꣰꣯ऽ२प्तिये꣡꣯ ।
यद्वा꣯मरुत्सुमाऽ२३हो꣡ । द꣪साऽ२इ ॥ स꣡माऽ२३हो꣡ये꣢ऽ३ ॥ दु꣢भिरो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ५)(३)॥ भु ॥ ६६५ ॥

३८४-४
औ꣣꣯हो꣢ऽ३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । य꣢त्सो꣯ममीऽ३न्द्रा꣤ऽ३वि꣢ष्ण꣣वा꣥इ ॥ औ꣣꣯हो꣢ऽ३१इ ।
औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । य꣢द्वा꣯घत्रीऽ३ता꣤ऽ३आ꣢꣯प्ति꣣या꣥इ ॥ औ꣣꣯हो꣢ऽ३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ।
य꣢द्वा꣯मरूऽ३त्सू꣤ऽ३म꣢न्द꣣सा꣥इ ॥ औ꣣꣯हो꣢ऽ३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४५वाऽ६५६ ॥ स꣡मिन्दुभी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ९)(४)॥ ठो ॥ ६६६ ॥
३८५-१ सुराधसम्।   सुराधस उष्णिगिन्द्रः ॥
ए꣣꣯दु꣤मधोः꣥꣯ । म꣣दा꣢ऽ᳐३२इन्ता꣣ऽ२३४रा꣥म् ॥ सि꣢ञ्चा꣡꣯ध्वर्यो꣯अन्धसाऽ२᳐: । धा꣣ऽ२३४सा꣥: ॥
ए꣢꣯ वा꣡꣯हिवी꣯रस्तवताऽ२᳐इ । वा꣣ऽ२३४ता꣥इ ॥ स꣣दा꣢ऽ३वा꣤ऽ५᳚र्द्धाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ ९)(५)॥ छो ॥ ६६७ ॥

३८५-२ प्रराधसम्।   प्रराधस उष्णिगिन्द्रः ॥
ए꣤꣯दुमधौ꣯होऽ५र्मदिन्त꣤राम् ॥ सि꣢ञ्चा꣡होऽ२इ । अ꣡ध्वर्योअं ꣪धासाऽ२: ॥ आ꣡इवा꣢ऽ१हिवीऽ२ ॥
राऽ२स्त꣡वताइ । स꣢दा꣡꣯वृ । धा । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ७)(६)॥ णे ॥ ६६८ ॥
३८६-१ विकल्पमारुतम्।   मरुतः उष्णिगिन्द्रः ॥
ए꣣ऽ५न्दुमि । द्रा꣤ऽ३या꣢ऽ३सि꣤ञ्चता꣥ ॥ पि꣡बा꣰꣯ऽ२तिसो꣯म्यं ꣡मधु꣢ । प्ररा꣡꣯धाऽ२३ꣳसी꣢ ॥
चो꣡꣯दयताइमा꣢ऽ३ही꣢ ॥ त्वना꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ २)(७)॥ धा ॥ ६६९ ॥
३८७-१ वैश्वमनसम्।   विश्वमना उष्णिगिन्द्रः ॥
ए꣥꣯तो꣯न्विन्द्रꣳस्तवाऽ६मा꣥ ॥ सा꣡खा꣢꣯यस्स्तो꣡ऽ२᳐ । मि꣣या꣢ऽ३४५म् । न꣡रमा꣯कृ꣢ष्टी꣡꣯र्यो꣯विश्वा꣢꣯अ꣡भि꣢ ॥
आ꣡ ॥ स्तियाये꣢ ॥ का꣡ईऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ४)(८)॥ र्दी ॥ ६७० ॥
३८८-१ सौमित्राणि त्रीणि।   त्रयाणां सुमित्र उष्णिगिन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रा꣯यसा ॥ मा꣡गा꣯य꣢त । वा꣡इप्रा꣢ऽ१याबॄऽ२ । हा꣡ते꣯बृ꣢हत् ॥ ब्रा꣡ह्म꣪कृतेऽ२ ॥ विपा꣡ऽ२३ः ।
चा꣡ऽ२᳐इता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ प꣢नस्य꣡वेऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ५)(९)॥ बु ॥ ६७१ ॥

३८८-२
इ꣣न्द्रा꣢ऽ३४ । यसा꣯म । गा꣥꣯याऽ६ता꣥ ॥ वा꣡इप्रा꣢꣯यबॄ꣡ऽ२᳐ । ह꣣ता꣢ऽ३४५इ । बॄ꣣ऽ२३४हा꣥त् ।
र꣢ह्मकृ꣡ते꣰꣯ऽ२विपश्चि꣡ते꣰꣯ऽ२ ॥ ओ꣡ये꣢ऽ३ । पा꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्या꣣ऽ२३४वे꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ४)(१०)॥ ञी ॥ ६७२ ॥

३८८-३
औ꣢꣯ हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३हो꣤ऽ३इ । ओ꣢ऽ᳐३२३४५वाऽ६५६ । इ꣡न्द्रा꣰꣯ऽ२यसा꣡꣯मगा꣢꣯यत ॥
वि꣡प्रा꣰꣯ऽ२यबृहते꣡꣯बृ꣢ह꣡त् ॥ ब्र꣢ह्मकृ꣡ते꣰꣯ऽ२विपश्चि꣡ते꣰꣯ऽ२ ॥ औ꣯हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३हो꣤ऽ३इ ।
औ꣢ऽ᳐३२३४५वाऽ६५६ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । प꣢नस्य꣡वेऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ ११। मा॰ ५)(११)॥ कु ॥ ६७३ ॥
३८९-१ त्रैककुभानि त्रीणि।   त्रिककुबुष्णिग्वस्वीशानेन्द्रः ॥
य꣥ए꣯कइदिहा꣯हाउ ॥ वि꣢द꣡यताइ । वसुमाऽ२३र्ता꣢ । यदा꣡꣯शुषाइ । ई꣯शा꣯नोऽ२३आ꣢ ॥
प्रा꣯ति꣡ष्कुता꣢ऽ३१उवाऽ२३ । ईऽ२३४न्द्रा꣥: । अं ꣢गा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ९)(१२)॥ को ॥ ६७४ ॥

३८९-२
या꣣ऽ२३४ए꣥ । का꣣ऽ२३४ई꣥त् ॥ वी꣢दा᳐या꣣ऽ२३४ता꣥इ । वा꣡सु꣢मर्ता꣡ऽ२३हा꣢ऽ३ । या꣡दा꣢ ᳐शू꣣ऽ२३४षा꣥इ ।
आ꣡इशा꣢꣯नो꣯अ꣡ । प्रताऽ२३हा꣢इ᳐ ॥ ष्कू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ आ꣡इन्द्रो꣢꣯अ । गा꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ १३)(१३)॥ फि ॥ ६७५ ॥

३८९-३
य꣥ए꣯कइद्विदा꣯याऽ६ता꣥इ ॥ वा꣡सुमर्त्ताया꣢ऽ३दा꣢ । हि꣡म् । शू꣣ऽ२३४षा꣥इ । आ꣡इशा꣢꣯नो꣯अ꣡प्रति꣢ष्कुतः ।
आ꣡इशा꣢꣯ । नो꣣꣯अप्र꣢ता꣡इ ॥ ष्कू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ आ꣡इन्द्रो꣢꣯अ । गा꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥: ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ १६)(१४)॥ थू ॥ ६७६ ॥
३९०-१ औह््णोरन्ध्राणि नियानानि वा त्रीणि।   त्रयाणामुह््णोरन्ध्रो उष्णिगिन्द्रः ॥
स꣥खा꣯यआ꣯हाउ ॥ शि꣣षा꣢ऽ३म꣤हेहा꣥उ । ब्र꣡ह्मा꣢ऽ३इन्द्रा꣤हा꣥उ । य꣢व꣡श्रिणाइ । स्तूषऊषू꣢ऽ३हा꣢इ ।
वो꣡नृ꣪तमाऽ२३हा꣢ ॥ यधा꣡ऽ२३ ॥ ष्णा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ९)(१५)॥ थ्वो ॥ ६७७ ॥

३९०-२
स꣤खा꣥꣯यआ꣤꣯शि꣥षा꣯म । हा꣤इ । ब्र꣥ह्मे꣯न्द्रा꣯यवश्रिणो꣤वा꣥ ॥ आ꣡इती꣢ऽ३वा꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ऽ३ ।
हा꣢इ᳐ । स्तु꣣षऊ꣢꣯षू꣡ऽ२३४ । वोहोहा꣥इ ॥ ना꣡र्ता꣢ऽ३मा꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ ॥ यधा꣡ऽ२३ ॥
ष्णा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ १४। मा॰ ७)(१६)॥ र्ढे ॥ ६७८ ॥

३९०-३
सा꣣ऽ४खा꣥꣯यः । आ꣣꣯शि꣤षा꣥꣯ । मा꣢ऽ३हा꣤इ । ब्रह्मे꣯न्द्रा꣥꣯यवश्रि꣤णो । हाइ ॥ स्तु꣢षऊ꣯षुवो꣯ऽ३ना꣡र्त्तामा꣢ ᳐ ।
या꣣ऽ२३४धॄ꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ । वो꣯ना꣡र्त्तामा꣢ ᳐ । या꣣ऽ२३४धॄ꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢ ॥ ष्ण꣡वा꣭ऽ३इ । औ꣢ऽ३हो꣢ ᳐ ।
औ꣣꣯हो꣯वा꣢ ॥ ष्णवा꣭ऽ३इ । औ꣢ऽ३हो꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣯वा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १४। प॰ १९। मा॰ ७)(१७)॥ ध्ले ॥ ६७९ ॥
॥ अष्टाविंशति प्रथमः, चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ दशतिः ॥ १० ॥

॥ अथ पञ्चम खण्डः॥ (ऋ-८, सा-१५)

३९१-१ प्रयस्वम्, प्रयस्वद्वा।   प्रजापतिरुष्णिगिन्द्रः ॥
हा꣤उगृणा꣥इ ॥ त꣣दा꣢ऽ३इन्द्रा꣤ता꣥इ । श꣡वाऽ२३१२३ः । उपा꣢ऽ३मा꣤न्दे꣥ । व꣢ता꣡꣯तयाइ ।
यद्धꣳसाऽ२३इवा꣢ ᳐ । त्र꣣मो꣢ऽ३जा꣤सा꣥ ॥ शा꣤ची꣥ ॥ प꣡ते꣢꣯ । औ꣡ऽ२३हो꣯वा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥
द्यू꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ८)(१८)॥ फै ॥ ६८० ॥

३९१-२ आक्षारम्।   प्रजापतिरुष्णिगिन्द्रः ॥
गृ꣥णे꣯ । त꣣दा꣢ऽ३४ । औ꣣꣯हो꣤ऽ५इन्द्रते꣯श꣤वाः ॥ उ꣡पमां ꣯दे꣯व꣢ता꣡꣯ताऽ२३या꣢ऽ३४इ ॥ य꣣द्धा꣢ऽ३४ꣳसि꣣वा꣢ ॥
त्रमो꣯ज꣡सा । शा꣢ऽ३ची꣤꣯प꣥ ॥ ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ४)(१९)॥ डी ॥ ६८१ ॥

३९१-३ प्रयस्वम्, प्रयस्वद्वा।   प्रजापतिरुष्णिगिन्द्रः ॥
गृ꣤णे꣯तदौ꣯होऽ५इन्द्रते꣯श꣤वाः ॥ उ꣡पमा꣯न्दे꣰꣯ऽ२व꣡ता꣰꣯ऽ२तये꣯ । उ꣡पमां ꣢꣯दे꣯ । वता꣡꣯ताऽ२३या꣢इ ॥ य꣡द्धꣳसि꣢वृ ।
त्र꣡मोऽ२३जसा꣢उ । वाऽ᳐३ । शाऽ२३४ची꣥ । पा꣣ऽ२३४ता꣥इ । हो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ११। मा॰ ६)(२०)॥ पू ॥ ६८२ ॥
३९२-१ दैवोदासानि चत्वारि।   चतुर्णां दिवोदास उष्णिगिन्द्रः ॥
य꣣स्या꣢ऽ३१ । त्य꣣च्छा꣢ऽ३१२३४म् । बर꣥म् । मा꣢ऽ३दा꣢इ᳐ ॥ दि꣣वो꣢ऽ३१ । दा꣣꣯सा꣢ऽ३१२३४ ।
यर꣥ । धा꣢ऽ३या꣢ ᳐न् ॥ अ꣣या꣢ऽ३१म् । स꣣सो꣢ऽ३१२३४ । मइ꣥ । द्रा꣢ऽ३ता꣢इ᳐ ॥ सु꣣ता꣢ऽ३१ः ।
पि꣣बा꣢ऽ३ । ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १। प॰ १६। मा॰ ८)(२१)॥ क्वे ॥ ६८३ ॥

३९२-२
य꣤स्यत्यच्छाऽ५म्बरंम꣤दाइ ॥ दि꣡वो꣯दा꣯सा꣯यरन्धयन् ॥ आय꣪ꣳससो꣢ऽ३ ॥ म꣤इ꣥ । द्र꣣ता꣢ऽ३इ ।
सू꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ पी꣣ऽ२३४बा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ५)(२२)॥ फु ॥ ६८४ ॥

३९२-३
य꣥स्यत्या꣢ऽ३च्छा꣤ऽ५म्बर꣤म्मदा꣥इ ॥ दि꣡वो꣰꣯ऽ२दा꣯सा꣡꣯यरं ꣢ध꣡यन् ॥ आय꣪ꣳससो꣢ऽ३ । म꣤इ꣥ । द्र꣣ता꣢ऽ३इ ।
सु꣡त꣢आ꣡ऽ२३ः । पा꣡ऽ२᳐इबा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४ती꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ८)(२३)॥ बै ॥ ६८५ ॥

३९२-४
या꣣ऽ४स्य꣥त्यत् । हो꣢इ᳐ । श꣣म्ब꣤रंमदा꣥ऽ६ए꣥ ॥ दि꣢वो꣯दा꣯सा꣯यरंधयन्न꣡याꣳसा꣢ऽ३सो꣤ । मइ꣥ । द्र꣣ता꣢ऽ३४ ।
औ꣥꣯हो꣯वा । सू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ पि꣣बोऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ६)(२४)॥ मू ॥ ६८६ ॥
३९३-१ सांवर्तेद्वे।   द्वयोरिन्द्र उष्णिगिन्द्रः ॥
ए꣤꣯न्द्र꣥ना꣤: ॥ ग꣢धि꣡प्राऽ२३या꣢ । सा꣡त्रा꣯जि꣢त् । अगो꣡꣯हाऽ२३या꣢ऽ३४ ॥ गि꣣रा꣢ऽ३४इर्न꣣वा꣢इ ॥
श्वताᳲ꣡पार्थू꣢ऽ३ः । पा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ दी꣣ऽ२३४वा꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ७)(२५)॥ बे ॥ ६८७ ॥

३९३-२
ए꣤꣯न्द्रनोऽ५गधिप्रा꣤या ॥ सा꣡त्रा꣯जि꣢त् । अगो꣡हायौ꣢꣯ । होऽ३वा꣢ ॥ गिरा꣡इर्नवौ꣢꣯ । होऽ३वा꣢ ॥
श्वता꣡ऽ२३ः । पा꣡ऽ२᳐र्थू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ प꣡ति꣢र्दि꣣वा꣢ऽ१ः ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ५)(२६)॥ घु ॥ ६८८ ॥
३९४-१ यामम्, आक्षारं वा।   यम उष्णिगिन्द्रः ॥
य꣤इन्द्र꣥सो ॥ मा꣡पा꣢ऽ३ता꣤मा꣥: । म꣢दा꣡श्श꣢वा꣡इ । ष्ठ꣢चे꣯त꣡ताइ ॥ याइना꣢ऽ३हा꣤ꣳसी꣥ ॥ नि꣢यत्रि꣡णाम् ।
ता꣢ऽ३मी꣤꣯म꣥ ॥ हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ७)(२७)॥ जे ॥ ६८९ ॥
३९५-१ दीर्घायुष्यम्।   प्रजापतिरुष्णिगिन्द्रः आदित्यो वा ॥
तु꣤चे꣣꣯तु꣤ना꣥꣯ । य꣣ता꣢ऽ᳐३२त्सू꣣ऽ२३४ना꣥: ॥ द्रा꣢घी᳐या꣣ऽ२३४यूः꣥ । जी꣢꣯वा꣡साऽ२इ ॥ आ꣡दीऽ२त्या꣡साऽ२: ॥
स꣡म꣢ह꣡साऽ२᳐: । कृ꣣णो꣢ऽ३ता꣤ऽ५ ॥ ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ५)(२८)॥ डु ॥ ६९० ॥
३९६-१ शुन्ध्युस्साम।   भरद्वाज उष्णिगिन्द्रः ॥
वे꣤꣯ त्था꣥꣯हि꣤निर्ऋ꣥ती꣯ना꣤म् ॥ वा꣡श्रह꣢स्तपरिवृ꣡ । जाम् ॥ अह꣢र । हा꣡: ॥ शु꣢न्ध्यु꣡ᳲप꣢रि ।
प꣡दा꣢ऽ३मा꣤ऽ५᳚इवाऽ६५६ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ४)(२९)॥ ठी ॥ ६९१ ॥
३९७-१ अपामीवम्।   आदित्य उष्णिगादित्यः ॥
अ꣤पा꣯मी꣥꣯वा꣯म꣤पा ॥ स्रि꣡धाम् । अपसे꣯धत꣢दु꣡र्माऽ२३ती꣢म् । आ꣡दीऽ२त्या꣡साऽ२: ॥
युयो꣡꣯तना꣯नओवा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ हा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ६)(३०)॥ कू ॥ ६९२ ॥
३९८-१ वैराजे द्वे।   द्वयोरिन्द्रो विराडिन्द्रः ॥
पि꣥बा꣤ ॥ सो꣡꣯ममिन्द्रमन्दतुत्वाऽ२ । यंते꣡꣯सुषा꣯वहरिया ॥ श्वाऽ२३र्दी꣢: । सो꣡ऽ२३तू꣢: ॥
बा꣡꣯हूभी꣢ऽ३या꣢ऽ३म् । सु꣡याऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ना꣡꣯र्वाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ४)(३१)॥ झी ॥ ६९३ ॥

३९८-२ सहोदैर्घतमसम्।
हा꣤उपिबा꣥ ॥ सो꣡ममि꣢न्द्र । मा꣡ । दतुत्वा꣢ऽ३ । द꣡तुत्वा꣢ । यन्ते꣡꣯सुषा꣯वहरिया । श्वा꣢ऽ१द्रीऽ२: ।
श्वा꣡द्रीऽ२: । सो꣯तु꣡र्बा꣯हुभ्याम् । सुयता꣢ऽ३ः । सु꣡यता꣢ऽ३ः ॥ ना꣡ऽ२᳐र्वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ ७)(३२)॥ ग्रे ॥ ६९४ ॥
॥ इति पञ्चदश द्वितीयः, पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥ दशतिः ॥ १ ॥

॥ अथ खण्डः (३) ॥ (ऋ-२, सा-३)

३९९-१ अभ्रातृव्यम्।   इन्द्रः ककुबिन्द्रः ॥
अ꣤भ्रा꣯तृव्योऽ५अना꣯तु꣤वाम् ॥ अ꣢ना꣡꣯पि꣢रा꣡इन्द्राऽ२ । जनु꣡षाऽ᳐२ ॥ स꣣ना꣢ऽ३४५त् ॥
आ꣣ऽ२३४सी꣥ । यु꣢धे꣡꣯ दा꣰꣯ऽ२पित्व꣡मिच्छ꣢से꣯ ॥ यु꣣धा꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ४)(३३)॥ खी ॥ ६९५ ॥
४००-१ शार्करे द्वे।   द्वयोः शर्करः ककुबिन्द्रः ॥
यो꣤꣯नोहा꣥उ ॥ इ꣢दा꣡म् । इदंपुराऽ२३हा꣢उ । प्रवा꣡ । प्रवस्यआऽ२३हा꣢इ । निना꣡ ।
निना꣯यतमुवाऽ२३हा꣢उ ॥ स्तुषा꣡इ । सखा꣯यआऽ२३हा꣢इ ॥ द्रमू꣡꣯ताऽ२३या꣢ऽ३४३इ ॥
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ ११)(३४)॥ थ ॥ ६९६ ॥

४००-२
यो꣥꣯ना꣤ऽ३इ꣢द꣣मि꣤दंपु꣥रा ॥ यो꣡꣯नइदमिदा꣢ऽ१म्पू꣢ऽ३रा꣢ । प्र꣡वस्यआ꣯निना । य꣢ताऽ३मू꣤ऽ३व꣢स्तु꣣षा꣥इ ॥
नि꣡ना । य꣢ताऽ३मू꣤ऽ३व꣢स्तु꣣षा꣥इ ॥ स꣢खा꣡याऽ२: । आ꣡ऽ२३इ । द्रमू꣢ऽ३ता꣤ऽ५᳚याऽ६५६इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ८)(३५)॥ ढै ॥ ६९७ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने दशमः प्रपाठकः ॥ १० ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — एकादशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ खण्डः (३) (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-७, सा-१४)

४०१-१ बृहत्कम्।   बृहत्ककुभ्मरुतः ॥
आ꣤꣯ग꣥न्ता꣤ ॥ मा꣢꣯रिष꣡ण्याऽ२३ता꣢ । प्रा꣡स्था꣯वा꣢꣯नो꣯मा꣡꣯पस्था꣢꣯त । सा꣡म꣪न्यावाऽ२: ॥
दृ꣡ढाची꣢ऽ३द्या꣢ऽ३ ॥ म꣤योवा꣥ । ष्णा꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ २)(१)॥ छा ॥ ६९८ ॥
४०२-१ सौयवसानि त्रीणि।   त्रयाणां सूयवसः ककुबिन्द्रः ॥
आ꣤꣯ या꣥꣯ही꣤ ॥ अ꣢य꣡मिन्दवे꣯ । श्वपाऽ२३ता꣢इ । गो꣡पत꣢उ । र्वा꣡रा꣢ऽ१पाताऽ२३४इ ॥ सो꣣꣯मा꣢ऽ३म् ॥
सो꣡꣯माऽ२३ । पा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ पी꣣ऽ२३४बा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ५)(२)॥ झु ॥ ६९९ ॥

४०२-२
आ꣤꣯ या꣥꣯हिया꣤ ॥ या꣢ऽ३मा꣡इन्दा꣢ऽ३वे꣢ । आ꣡श्वप꣢ते꣯गो꣡꣯पते꣢꣯ । ऊ꣡ । र्व꣪राऽ२३हा꣢ऽ३इ । पा꣢ऽ३ता꣢इ ॥
सो꣡ऽ२३४मꣳहा꣥इ ॥ सो꣡ । म । पते꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ । पा꣡ऽ२३४इबा । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ७)(३)॥ घे ॥ ७०० ॥

४०२-३
आ꣥꣯या꣯ह्ययमिन्दाऽ६वा꣥इ ॥ अ꣢श्वा꣡पा꣢ऽ१ताऽ२इ । गो꣯पा꣡ताऊ꣢ऽ३ । र्व꣡राऽ२᳐पा꣣ऽ२३४ता꣥इ ॥
सो꣡मꣳसोमा꣢ऽ३१ ॥ प꣢ता꣡इ । पिबा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ । ऊ꣤पा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ६)(४)॥ ढू ॥ ७०१ ॥
४०३-१ धेनुषाम।   मरुतः ककुबिन्द्रः ॥
त्व꣥या꣯हस्वीत् ॥ यू꣡जा꣯व꣢यम् । प्रा꣡ति꣪श्वासाऽ२ । तं ꣡वृष꣢भ । ब्रू꣡वी꣢ऽ१माहाऽ२३४इ ॥
स꣣ꣳस्था꣢ऽ३इ ॥ जा꣡नस्य꣢गो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ मा꣣ऽ२३४ता꣥: ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ५)(५)॥ जु ॥ ७०२ ॥
४०५-१ आभरे द्वे।   द्वयोरिन्द्रः ककुबिन्द्रः ॥
त्व꣤न्न꣥ई꣤ ॥ द्र꣢आ꣡꣯भाऽ२३रा꣢ । ओ꣡जो꣯नृ꣢म्णम् । शा꣡तक्रता꣢ऽ३उ । वी꣡च꣢र्षा꣣ऽ२३४णा꣥इ ॥
आ꣡वी꣯रंपा꣢ऽ३हा꣢ऽ३ ॥ ता꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सा꣣ऽ२३४हा꣥म् ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ७)(७)॥ बे ॥ ७०४ ॥

४०५-२
त्व꣤न्न꣥इन्द्रा꣤ ॥ आ꣡꣯भाऽ२३रा꣢ । ओ꣡जो꣯नृ꣢म्णम् । शा꣡तक्रता꣢ऽ३उ । वी꣡च꣢र्षा꣣ऽ२३४णा꣥इ ॥
आ꣢꣯ वी꣡꣯राऽ२३म्पा꣢ ॥ त꣣ना꣯स꣢हा꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ६)(८)॥ मू ॥ ७०५ ॥
४०६-१ ऐषिराणि त्रीणि।   त्रयाणां वायुः ककुबिन्द्रः ॥
अ꣤धा꣥꣯हिया꣤ ॥ द्र꣢गि꣡र्वाऽ२३णा꣢: । उ꣡पत्वा꣢꣯का꣯ । मई꣡꣯माऽ२३हा꣢इ । ससृ꣡ग्माऽ२३हा꣢इ ॥ ऊ꣡देऽ२ ॥
वग्मा꣡ऽ२३न्ता꣢: । उ꣡दाऽ२३भा꣢इः । इ꣤डाऽ५भीः । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ९)(९)॥ तो ॥ ७०६ ॥

४०६-२
अ꣥धा꣯ही꣯न्द्रगिर्वाऽ६णा꣥: ॥ ऊ꣡पत्वा꣢꣯का꣯ । मा꣡ई꣢ऽ१माहाऽ२इ । सा꣡सृ꣪ग्माहाऽ२इ ॥
ऊ꣡दे꣢ऽ१वाग्माऽ२३ ॥ त꣤ओवा꣥ । दा꣤ऽ५भोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ६)(१०)॥ थू ॥ ७०७ ॥

४०६-३
अ꣥धा꣯ही꣯न्द्रगिर्वणाऽ६ए꣥ ॥ उ꣡पत्वा꣢꣯का꣯ । मा꣡ई꣢ऽ१माहा꣢ऽ३इ । सा꣡सृ꣢ग्मा꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥
उ꣢दौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३ । वा꣭ऽ३हा꣢ऽ३ ॥ ग्मा꣡ऽ२᳐ । त꣣ऊ꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ द꣢भीऽ३रे꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(११)॥ घू ॥ ७०८ ॥
४०७-१ सीदन्तीये द्वे।   द्वयोः प्रजापतिः ककुबिन्द्रः ॥
सा꣢ऽ᳐३४इ । दन्त꣥स्ते꣯व꣤ । यो꣥꣯याऽ६था꣥ ॥ गो꣢꣯श्रा꣡इते꣢꣯म꣡ । धौ꣢꣯मदि꣡राइ । वा꣢ऽ३इव꣤क्ष꣥ । णा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
अ꣢भि꣡त्वा꣯माइन्द्रा꣢ऽ३नो꣤ऽ३ ॥ नू꣢ऽ३४५ । मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ७)(१२)॥ ङे ॥ ७०९ ॥

४०७-२
सी꣣꣯द꣤न्त꣥स्ते꣯व꣤य꣥: । य꣣था꣢ऽ३ । गो꣡ऽ२३४ । श्री꣯ते꣥꣯म꣤धौ꣥꣯म । दि꣤रा꣥इ ॥ वि꣣वा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३ । क्षा꣡ऽ२३४णा꣥इ ॥
अ꣣भी꣢ऽ३ । हो꣢ऽ३इ । त्वा꣡ऽ२३४मी꣥ ॥ द्र꣣नो꣢ऽ३ । नू꣡ऽ२३४माः । उ꣥हुवाऽ६हा꣥उ ॥ वा ॥
(दी॰ ५। प॰ १५। मा॰ ६)(१३)॥ मू ॥ ७१० ॥
४०८-१ सौभरे द्वे (पक्थम्)।   द्वयोः सुभरिः ककुबिन्द्रः ॥
व꣥यमु꣣त्वा꣢꣯म꣣पू꣤꣯र्वि꣥या ॥ स्थू꣢꣯र꣡न्नकच्चिद्भरन्तआव꣪स्यावाऽ२३४ः ॥ वश्रि꣥न् ।
चि꣣त्रा꣢ऽ३म् ॥ हा꣡ऽ२३वा꣤ऽ३ । मा꣢ऽ३४५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ ५)(१४)॥ टु ॥ ७११ ॥

४०८-२ सौभरम्।
व꣥य꣤मु꣥त्वा꣤꣯म꣥पू꣯र्व्यस्थू꣯र꣤न्नकच्चि꣥द्भरन्तः । ओ꣤वा꣥ ॥ हा꣢ऽ३हा꣢इ᳐ । अ꣣व꣢स्या꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ हा꣢ऽ३हा꣢इ᳐ ।
व꣣श्रिञ्चि꣢त्रा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥ हा꣢ऽ३हा꣢इ᳐ ॥ ह꣣वा꣢ऽ३ । मा꣡ऽ२३४हाइ । उ꣥हुवाऽ६हा꣥उ ॥ वा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ८)(१५)॥ टै ॥ ७१२ ॥
॥ अष्टादशः तृतीयः, षष्ठः खण्डः ॥ ६ ॥ दशतिः ॥ २ ॥

॥ अथ सप्तम खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-२१)

४०९-१ यामम्।   यमः पंक्तिरिन्द्रः ॥
स्वा꣤꣯ दो꣣꣯रि꣤त्था꣣꣯वि꣤षू꣥꣯ । व꣣ता꣢ऽ३ः । मा꣡ऽ२३४ । धोᳲ꣯पि꣥बन्तिगौ꣯ । रि꣤या꣥: ॥ या꣡꣯इन्द्रे꣯ण꣢ । सया꣡꣯वाऽ२३री꣢: ।
वृ꣡ष्णा꣢꣯म꣡द꣢ । तिशो꣡꣯भाऽ२३था꣢ ॥ व꣡स्वाइरा꣢ऽ१नूऽ२ ॥ स्वा꣡रा꣯जि꣢यम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १२। प॰ १४। मा॰ ७)(१६)॥ झे ॥ ७१३ ॥
४१०-१ गृत्समदस्य मदौ द्वौ।   द्वयोः गृत्समदः पंक्तिरिन्द्रः ॥
इ꣥त्था꣯हिसो ॥ म꣢इ꣡न्माऽ२३दा꣢: । ब्र꣡ह्म꣢चका꣡꣯ । र꣢व꣡र्द्धाऽ२३ना꣢म् । श꣡विष्ठ꣢व । श्रिन्नो꣡꣯जाऽ२३सा꣢ ।
पृथिव्या꣡꣯निश्श꣢शा꣯अ꣡हि꣢म् ॥ अ꣡र्चाना꣢ऽ१नूऽ२ ॥ स्वरौ꣡होऽ२ । जि꣡यमोऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ६)(१७)॥ पू ॥ ७१४ ॥

४१०-२
इ꣤त्था꣯हिसोऽ५मइन्म꣤दाः ॥ ब्र꣡ह्म꣢चका꣡꣯ । र꣢व꣡र्द्धाऽ२३ना꣢म् । शाविष्ठा꣣ऽ२३४वा꣥ । श्रि꣢न्नो᳐जा꣣ऽ२३४सा꣥ ।
पृ꣢थिव्या꣡꣯निश्श꣢शा꣯अ꣡हि꣢म् ॥ अ꣡र्चा꣢ऽ३न्हो꣡इ । अ꣪नूऽ२३हो꣡ ॥ स्वारा꣯जि꣢यम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ८)(१८)॥ फै ॥ ७१५ ॥
४११-१ आभीके द्वे।   द्वयोराभीकः पंक्तिरिन्द्रः ॥
इ꣢न्द्रो꣯मदा꣯यवाऽ३ । वा꣤र्द्धा꣥इ ॥ श꣢वसे꣯वृत्रहाऽ३ । नॄ꣤भी꣥: । त꣢मिन्महत्सुवाऽ३ । जा꣤इषू꣥ ॥
ऊ꣢꣯तिमर्भे꣯हवाऽ३ । मा꣤हा꣥इ ॥ सा꣤वा꣥ । जा꣡इषुप्र꣢नो꣡ऽ२३४वा꣥ । वा꣤ऽ५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ७)(१९)॥ पे ॥ ७१६ ॥

४११-२
इ꣤न्द्रो꣯मदाऽ५यवा꣯वृ꣤धाइ ॥ श꣡वसे꣢꣯वृ । त्रहा꣡नॄभी꣢ऽ३४ः । ता꣥म् । इ꣢न्मा᳐हा꣣ऽ२३४त्सु꣥वाऽ६ ।
हा꣥उ ॥ जा꣤इषू꣥ । ऊ꣡꣯तिमर्भे꣯हवा꣢ऽ१ । मा꣢ऽ३हा꣤इ ॥ सावा꣥ । जा꣡इषुप्र꣢नो꣡ऽ२३४वा꣥ । वा꣤ऽ५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ९)(२०)॥ फो ॥ ७१७ ॥

४११-३ आभीशवे द्वे।   द्वयोरभीशुः पंक्तिरिन्द्रः ॥
इ꣤न्द्रो꣯मदाऽ५यवा꣯वृ꣤धाइ ॥ श꣡वसे꣢꣯वृ । त्रहाऽ२नृ꣡भि꣢: । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । औ꣯हो꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ । त꣢मि꣡न्मह । त्सु꣢वाऽ२जि꣡षु꣢ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । औ꣯हो꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡ । ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
ऊ꣢꣯ति꣡मर्भे꣢꣯ । हवाऽ२म꣡हे꣢꣯ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । औ꣯हो꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡ । ह꣣ꣳऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ स꣡वा꣯जे꣯षूप्रा꣢ऽ३नो꣤ऽ३ ॥
वा꣢ऽ३४५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ११। प॰ १८। मा॰ ७)(२१)॥ गे ॥ ७१८ ॥

४११-४
इ꣤न्द्रो꣥꣯म꣤दा꣥꣯यवा꣯वृधे꣯श꣤व꣥से꣯वॄ꣤ ॥ त्र꣢हा꣡नॄ꣢ऽ१भीऽ२: । ता꣡मिन्म꣢ह । त्सू꣡आ꣢ऽ१जिषू꣢ऽ३ ।
ऊ꣡ती꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४र्भा꣥इ । ह꣢वाऽ२मा꣡हाइ ॥ सवा꣯जे꣯षूप्रा꣢ऽ३नो꣤ऽ३ ॥ वा꣢ऽ३४५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ६)(२२)॥ जू ॥ ७१९ ॥

४११-५ बार्हद्गिराणि त्रीणि।   त्रयाणां बृहद्गिरिः पंक्तिरिन्द्रः ॥
इ꣣न्द्रो꣢ऽ३१२३४ । मदा ॥ य꣡वा꣯वृधे꣯शवाऽ२᳐सा꣣ऽ२३४इवॄ꣥ । त्र꣢हा꣭ऽ३ । औ꣢꣯होऽ३वा꣢ । आ꣭ऽ३ ।
औ꣢ ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । नृ꣤भाइः । त꣡मिन्महत्स्वा꣯जिषू꣯तिमाऽ२३र्भा꣢इ । हवा꣭ऽ३ । औ꣢꣯होऽ३वा꣢ ।
आ꣭ऽ३ । औ꣢ ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । म꣤हाइ ॥ स꣡वा꣯जे꣯षुप्रना꣭ऽ३ । औ꣢꣯होऽ३वा꣢ । आ꣭ऽ३ । औ꣢ ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
वा꣤ऽ५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ १९। मा॰ ७)(२३)॥ धे ॥ ७२० ॥

४११-६
इ꣣न्द्रो꣢ऽ३४ । मदा꣯य । वा꣥꣯वाऽ६र्द्धा꣥इ ॥ श꣡वसे꣢꣯वृ । त्रहा꣡नॄभी꣢ऽ३ः । हा꣤꣯उहौ꣥꣯ । हो꣣꣯वा꣢ ।
ता꣡मिन्म꣢ह । त्सू꣡आ꣢ऽ१जिषू꣢ऽ३ । हा꣤꣯उहौ꣥꣯ । हो꣣꣯वा꣢ । ऊ꣡तिम꣢र्भे꣯ । हवा꣡माहे꣢ऽ३ । हा꣤꣯उहौ꣥꣯ ।
हो꣣꣯वा꣢ ॥ स꣡वा꣯जे꣯षूप्रा꣢ऽ३नो꣤ऽ३ ॥ वा꣢ऽ३४५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १५। प॰ १७। मा॰ ८)(२४)॥ फै ॥ ७२१ ॥

४११-७
ओ꣥꣯हा꣯इ । इ꣣न्द्रो꣢ऽ३४ । मदा꣯य । वा꣥꣯वाऽ६र्द्धा꣥इ ॥ श꣡वसे꣢꣯वृ । त्रहा꣡नॄभी꣢ऽ३ः । आ꣤꣯उहौ꣥꣯ । हो꣣꣯वा꣢ ।
ता꣡मिन्म꣢ह । त्सू꣡आ꣢ऽ१जिषू꣢ऽ३ । आ꣤꣯उहौ꣥꣯ । हो꣣꣯वा꣢ । ऊ꣯ति꣡मर्भाइ । ह꣢वौ꣯ । होऽ३वा꣢ । मा꣡हाऽ२इ ॥
स꣡वा꣯जे꣯षूप्रा꣢ऽ३नो꣢ ॥ विषा꣡त् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १५। प॰ २१। मा॰ १०)(२५)॥ पौ ॥ ७२२ ॥
४१२-१ स्वाराज्यम्।   इन्द्रः पंक्तिरिन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रतुभ्यमिदद्रिवाऽ६ए꣥ ॥ आ꣡नुत्तं ꣢वश्रिन्वी꣯रि꣡यम् ॥ यद्धात्या꣢ऽ१म्माऽ२ । या꣡इनंमृ꣢गम् ।
त꣡वात्या꣢ऽ१न्माऽ२ । या꣡या꣯व꣢धी꣯: ॥ अ꣡र्चाना꣢ऽ१नूऽ२ ॥ स्वा꣡रा꣯जि꣢यम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ७)(२६)॥ ते ॥ ७२३ ॥
४१३-१ संघेशीयम्, धृष्णुसाम।   कश्यपः पंक्तिरिन्द्रः ॥
प्रा꣡इहीऽ२ । अभी꣡꣯हिधृष्णुहाऔ꣢ऽ३हो꣢ ॥ ना꣡ताऽ२इ । व꣡श्रो꣯नियꣳसताऔ꣢ऽ३हो꣢ । आ꣡इन्द्राऽ२ ।
नृम्ण꣡ꣳहिते꣯शवाऔ꣢ऽ३हो꣢ । हा꣡नाऽ२: । वृत्रं ꣡जया꣯अपाऔ꣢ऽ३हो꣢ ॥ आ꣡र्चाऽ२ना꣡नूऽ२ । स्वा꣡रा꣯जि꣢यम् ।
इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ ११)(२७)॥ ब ॥ ७२४ ॥
४१४-१ संवेशीयम्।   मरुतः पंक्तिरिन्द्रः ॥
य꣤दुदी꣯राऽ५तआ꣯ज꣤याः ॥ धृ꣢ष्ण꣡वे꣰꣯ऽ२धी꣯ । यता꣡इधा꣢ऽ१नाऽ२म् । युꣳह््वा꣡꣯मदच्युता꣢ऽ३ । हा꣤री꣥ ।
क꣢ꣳह꣡न:कंवसा꣢ऽ३उ । दा꣤धा꣥: । अ꣢स्मा꣡꣯ꣳआऽ२३इन्द्रा꣢ ॥ वसौ꣡꣯दाऽ२३धा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ १०)(२८)॥ चौ ॥ ७२५ ॥
४१५-१ यामे द्वे।   यमः पंक्तिरिन्द्रः चित्रा वा। (पितरो वा पूर्वस्य) ॥
अ꣣क्ष꣤न्न꣣मी꣤꣯म꣥द । त꣣ही꣢ऽ३ । आ꣡ऽ२३४ । वप्रि꣥या꣤꣯अ꣥धू꣯ । ष꣤ता꣥ । अ꣡स्तो꣢꣯षतस्व꣡भा꣢꣯नवः । वि꣡प्रा꣯नाऽ२३वी꣢ ।
ष्ठा꣡या꣯म꣢ती꣯ । यो꣡꣯जानू꣢ऽ३वा꣢ऽ३इ ॥ द्रा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ हा꣣ऽ२३४री꣥ ॥
(दी॰ ११। प॰ ११। मा॰ ४)(२९)॥ की ॥ ७२६ ॥
४१६-१ यामम्।   यमः पंक्तिरिन्द्रः ॥
उ꣣पो꣤꣯षु꣣शृ꣤णुही꣣꣯गि꣤र꣥: । ए꣢ऽ३ । औ꣢ऽ३हो꣤ऽ५वा ॥ मा꣡घ꣢वन्मा꣡꣯ । तथाआ꣢ऽ१इवाऽ२३४ । क꣣दा꣢ऽ३४न꣣स्सू꣢ ।
ना꣡र्त्ता꣯व꣢तः । क꣡रइ꣢द । था꣡या꣢ऽ१साईऽ२३४त् ॥ यो꣣꣯जा꣢ऽ३४नु꣣वा꣢ऽ३इ ॥ द्रा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
हा꣣ऽ२३४री꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ ९)(३०)॥ छो ॥ ७२७ ॥
४१७-१ त्रैतानि त्रीणि।   त्रयाणां त्रितः पंक्तिरिन्द्रो विश्वेदेवाः ॥
च꣢न्द्र꣡मा꣯आ꣢उवा । प्सुवा꣡न्तारा꣢उवा । सुपर्णो꣡꣯धा꣢उवा ॥ वते꣡꣯दिवि । नवो꣯हिरा꣢उवा । ण्यना꣡इमाया꣢उवा ।
पदं ꣡विन्दा꣢उवा । तिवि꣡द्युताः ॥ वित्तम्माआ꣢उवा । स्यरो꣡꣯दाऽ२३सा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ १३)(३१)॥ फि ॥ ७२८ ॥

४१७-२
च꣤न्द्र꣥मा꣯आ꣤ ॥ प्सू꣢ऽ३आ꣡न्ता꣢ऽ३रा꣢ । सू꣡पर्णो꣢꣯धा꣯व । ता꣡ऽ२३इ । दि꣢वि꣣या꣢ ।
न꣡वो꣰꣯ऽ२हि꣡रण्य꣢ने꣯मय:पदं ꣡विन्द꣢ । तिविद्यू꣡तोऽ२३४हा꣥इ ॥ वि꣢त्त꣡ꣳहोइ । मआऽ२३हो꣡ ॥
स्य꣢रो꣡꣯दाऽ२३सा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ८)(३३)॥ खै ॥ ७२९ ॥

४१७-३
च꣥न्द्रमा꣢ऽ३आ꣤प्सु꣥व꣤न्तरा꣥ ॥ सू꣡पर्णो꣢꣯धा꣯ । वता꣡इदा꣢ऽ१इवीऽ२ । न꣡वो꣰꣯ऽ२हि꣡रण्य꣢ने꣯मय:पदं ꣡विन्द꣢ ।
तिविद्यू꣡ताऽ२३ः ॥ वि꣢त्त꣡ꣳहोइ । मआऽ२३हो꣡ ॥ स्य꣢रो꣡꣯दाऽ२३सा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ८)(३३)॥ मैमे ॥ ७३० ॥

४१७-४ सौपर्णेद्वे।   द्वयोः सुपर्णः पंक्तिरिन्द्रो विश्वेदेवाः ॥
च꣥न्द्र꣤मा꣥꣯अप्सुवा꣤ । त꣡रा । सुपर्णो꣯धा꣯व꣢ते꣡꣯दाऽ२३इवी꣢ । न꣡वाऽ२३हो꣡इ । हिरण्य꣢ने꣯मय:पदं ꣡विन्द꣢ ।
तिविद्यू꣡ताऽ२३ः ॥ वि꣢त्त꣡ꣳहोइ । मआऽ२३हो꣡ ॥ स्य꣢रो꣡ऽ२३ । दा꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ७)(३४)॥ च्ले ॥ ७३१ ॥

४१७-५
च꣥न्द्रौ꣤꣯ हो꣥꣯मा꣯अप्सु꣤व꣥न्त꣤रा꣯ । ओ꣥ऽ६वा꣥ ॥ सु꣢पर्णो꣡꣯धा꣯वते꣯दाइवाये꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३हो꣡ऽ᳐२इ ।
हु꣣वा꣢ऽ᳐३꣡४꣡५꣡इ । न꣡वो꣯हाइरण्यनाइमायाऽ२३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हो꣡ऽ᳐२इ । हु꣣वा꣢ऽ᳐३꣡४꣡५꣡इ ॥
प꣢दं ꣡विन्दन्तिवाइद्यूताऽ२३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हो꣡ऽ᳐२इ । हु꣣वा꣢ऽ᳐३꣡४꣡५꣡इ ॥ वि꣢त्त꣡म्मे꣯अस्यरो꣯दासाये꣢ऽ३ ।
हो꣡वा꣢ऽ३हो꣡ऽ᳐२इ । हु꣣वा꣢ऽ३ओ꣤ऽ५वाऽ६५६ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ १५। मा॰ १६)(३५)॥ म्लू ॥ ७३२ ॥
४१८-१ लौशम्।   लुशः पंक्तिरश्विनौ ॥
प्रा꣡ऽ२३४ । तिप्रि꣥य꣤त꣥मम् । रा꣤था꣥म् ॥ वा꣡र्षणं ꣢व । सुवा꣡꣯हाऽ२३ना꣢म् । स्तो꣡꣯तावा꣢ऽ३मा꣢ऽ३ ।
श्वि꣡नाऽ२᳐वा꣣ऽ२३४र्षीः꣥ऽ३: । स्तो꣡꣯माइभी꣢ऽ३र्भू꣢ऽ३ । षा꣡ति꣢प्रा꣣ऽ२३४ती꣥ ॥ मा꣡꣯ध्वाइमा꣢ऽ३मा꣢ऽ३ ॥
श्रू꣡ऽ२३ता꣤ऽ३म् । हा꣢ऽ३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ ८)(३६)॥ थै ॥ ७३३ ॥
॥ एकविंशति चतुर्थः, सप्तमः खण्डः ॥ ७॥ दशतिः । ४ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — एकादशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ अष्टमः खण्डः॥ (ऋ-८, सा-१०)

४१९-१ संजये द्वे।   द्वयोरिन्द्रः पंक्तिरग्निः ॥
आ꣡ऽ२३४ । ते꣯अ꣥ग्नइधी꣯ । मा꣤हा꣥इ ॥ द्यु꣢मन्तंदे꣯वऽ३ । आ꣡ऽ२३ । ज꣢र꣣मा꣢ । य꣡द्धास्या꣢ऽ३ता꣢ऽ३इ ।
पा꣡नीऽ२᳐या꣣ऽ२३४सी꣥ । स꣢मि꣡द्दी꣰꣯ऽ२द꣡य । ताऽ२३इ । द्य꣢वि꣣या꣢ ॥ इ꣡षाꣳस्तो꣢ऽ३तॄ꣢ऽ३ ॥
भ्या꣡ऽ२३आ꣤ऽ३ । भा꣢ऽ३४५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १४। मा॰ ७)(१)॥ धे ॥ ७३४ ॥

४१९-२
आ꣣꣯ ते꣤꣯अ꣥ग्नइधी꣯ । मा꣢ऽ३हा꣤इ । द्यु꣥मन्ता꣢ऽ३न्दे꣤꣯व꣥अ꣤जर꣥म् ॥ य꣣द्ध꣤स्या꣣꣯ ते꣤꣯प꣣नी꣤꣯य꣥सी꣯ । स꣤मि꣣द्दी꣤꣯द꣣य꣤ता꣥इ ।
हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢ ᳐म् । द्या꣣ऽ२३४वी꣥ ॥ इ꣡षꣳस्तो꣯तॄभ्या꣢ऽ३आ꣢ ॥ हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म्ऽ३४३ ।
भा꣢ऽ३४५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ १२)(२)॥ मा ॥ ७३५ ॥
४२०-१ उत्सेधः, उत्सेधं वा।   अंगिरसः पंक्तिरग्निः ॥
हा꣢उ । औ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । आ꣡꣯ग्निन्नस्ववृक्ति꣢भी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ हा꣢उ । औ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ।
हो꣡꣯ ता꣢꣯रन्त्वा꣯वृणी꣯महे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ । हा꣢उ । औ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । शी꣢꣯रं ꣡पा꣢꣯वक꣡शो꣢꣯चिषम् । वि꣣वो꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४दा꣥इ ।
हा꣢उ । औ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । य꣢ज्ञा꣡इषु꣢स्ती꣯र्ण꣡ब꣢र्हिषा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥ हा꣢उ । औ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
वि꣡वक्ष꣢से꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ १६। मा॰ १०)(३)॥ तौ ॥ ७३६ ॥

४२०-२ निषेधः, निषेधं वा।   अंगिरसः पंक्तिरग्निः ॥
आ꣥꣯ग्निन्नस्ववृक्तिभिर्हइहा꣯हाइ ॥ हो꣡꣯ ता꣢꣯रन्त्वा꣯वृणी꣯महइ꣡ह꣢इ꣡हा꣢ऽ३ । हा꣢इ ।
शी꣯रं ꣡पा꣢꣯वक꣡शो꣢꣯चिषमि꣡ह꣢इ꣡हा꣢ऽ३ । हा꣢इ । वि꣣वो꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४दा꣥इ ॥ य꣢ज्ञा꣡इषु꣢स्ती꣯र्ण꣡ब꣢र्हिषमि꣡ह꣢इ꣡हा꣢ऽ३ ।
हा꣢ऽ३इ ॥ वा꣡ऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्षा꣣ऽ२३४से꣥ ॥
(दी॰ १२। प॰ १०। मा॰ १३)(४)॥ ञि ॥ ७३७ ॥
४२१-१ सत्यश्रवसः वाय्यस्य साम।   सत्यश्रवाः पंक्तिरुषा ॥
म꣣हा꣢ऽ३४इ । महे꣯नो꣥꣯अद्य꣤ । बो꣥꣯धाऽ६या꣥ ॥ उ꣡षो꣢꣯रा꣯ये꣯ । दिवि꣡त्माऽ२३ती꣢ । य꣡थाची꣢ऽ३न्ना꣢ऽ३ः ।
आ꣡बो꣢ ᳐धा꣣ऽ२३४या꣥: । स꣡त्याश्रा꣢ऽ३वा꣢ऽ३ । सि꣡वाऽ२᳐या꣣ऽ२३४या꣥इ ॥ सु꣡जाता꣢ऽ३आ꣢ऽ३ ॥
श्वा꣡ऽ२३सू꣤ऽ३ । ना꣢ऽ᳐३४५र्त्तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ७)(५)॥ खे ॥ ७३८ ॥
४२२-१ पौषम्।   पूषा पंक्ति सोमः ॥
भ꣢द्र꣡न्नोऽ२३अ꣤पिवा꣥꣯तया ॥ म꣡नो꣰꣯ऽ२द꣡ । क्षाम् । ऊत꣢क्रा꣣ऽ२३४तू꣥म् ॥ आ꣡था꣢꣯ते꣯ ।
सा꣡ । ख्ये꣢꣯अ꣣न्ध꣢सा꣡ऽ२᳐: । वि꣣वो꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४दा꣥इ । र꣡णा꣰꣯ऽ२गा꣡꣯ वा꣰꣯ऽ२न꣡य ॥ वसाये꣢ऽ३ ॥
वा꣡ऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्षा꣣ऽ२३४से꣥ ॥
(दी॰ १०। प॰ १२। मा॰ ८)(६)॥ फै ॥ ७३९ ॥
४२३-१ औषसम्।   उषा पंक्तिरिन्द्रः ॥
क्र꣥त्वा꣯महा꣯ꣳअनुष्वधाऽ६मे꣥ ॥ भी꣢꣯मआ꣯वा꣯वृऽ३ता꣡इशा꣢ऽ१वाऽ२: । श्रिय꣡ऋष्वा꣢ऽ३ः ।
ऊ꣡पा꣢ ᳐का꣣ऽ२३४यो꣥: । नि꣢शिप्री꣯हरिऽ३वा꣡न्दा꣢ऽ१धाऽ२इ ॥ ह꣡स्तायो꣢ऽ३र्वा꣢ऽ३ ॥ श्र꣢मो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
या꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ९)(७)॥ गो ॥ ७४० ॥
४२४-१ लौशम्।   लुशः पंक्तिरिन्द्रः ॥
स꣣घा꣤꣯तं ꣣वृष꣤ण꣥म् । र꣣था꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ आ꣡धिति꣢ष्ठा꣯ । तिगो꣡वा꣢ऽ१इदाऽ२म् । य:पा꣡꣯ त्र꣢ꣳहा꣡ ।
रि꣪योऽ२᳐जा꣣ऽ२३४ना꣥म् । पू꣢꣯र्ण꣡मि । द्रा । चीके꣢ ᳐ता꣣ऽ२३४ती꣥ ॥ यो꣡꣯जानू꣢ऽ३वा꣢ऽ३इ ॥
द्रा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ हा꣣ऽ२३४री꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ ७)(८)॥ थे ॥ ७४१ ॥
४२५-१ निषेधस्साम।   अंगिरसः पंक्तिरिन्द्रः ॥
अ꣥ग्निंता꣢ऽ३म्म꣤न्ये꣥꣯ यो꣤꣯वसू꣥: ॥ अ꣢स्तं ꣡यंया꣢ऽ३ । ती꣡धे꣢ ᳐ना꣣ऽ२३४वा꣥: । अ꣢स्त꣡मर्वा꣢ऽ३ ।
ता꣡आऽ२᳐शा꣣ऽ२३४वा꣥: । अ꣢स्त꣡न्नित्या꣢ऽ३ । सो꣡꣯वाऽ२᳐जा꣣ऽ२३४इना꣥: ॥ इ꣡षाꣳस्तो꣢ऽ३तॄ꣢ऽ३४ ।
हा꣣꣯होऽ२३४हा꣥ ॥ भ्या꣡ऽ२३आ꣤ऽ३ । भा꣢ऽ३४५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ८)(९)॥ तै ॥ ७४२ ॥
४२६-१ अꣳहोमुचस्साम, गौराङ्गिरसस्य साम वा।   अꣳहोमुचग्बृहती विश्वेदेवाः ॥
न꣤तमꣳहो꣥꣯न꣤दु꣥रित꣤म् । ईय꣥इ꣤याहा꣥इ ॥ दा꣡इवा꣰꣯ऽ२सो꣯अ꣡ष्ट꣢म꣡र्तिय꣢मी꣡꣯ । य꣢इ꣡याऽ२३हा꣢इ ॥
सजो꣡꣯षसो꣢꣯य꣡मर्य꣢मा꣡꣯ई꣯ । य꣢इ꣡याऽ२३हा꣢इ ॥ मा꣡इत्रोनाया꣢ऽ३ ॥ ति꣡वाऽ२᳐रू꣣ऽ२३४५णाऽ६५६ः ॥
अ꣡ति꣢द्वि꣡षा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ १३)(१०)॥ दि ॥ ७४३ ॥
॥ दशः पञ्चमः, अष्टमः खण्डः ॥ ८ ॥ दशतिः ॥ ४ ॥

॥ अथ नवम खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-२१)

४२७-१ इन्द्रस्य संक्रमे द्वे।   द्वयोरिन्द्रः पंक्तिरिन्द्रसोमौ ॥
प꣤रि꣥प्र꣤ध꣥न्वा꣤ ॥ इ꣡न्द्रा꣯यसो꣯मास्वा꣢ऽ१दूऽ२३४ः । हा꣥इ ॥ मि꣢त्रा꣡꣯या ॥ पू꣢꣯ ष्णे꣡꣯भाऽ२३४हा꣥इ ॥
गा꣡ऽ२३४यो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ६। मा॰ ४)(११)॥ पी ॥ ७४४ ॥

४२७-२
प꣤रि꣥प्र꣤ध꣥न्वा꣤ ॥ इ꣡न्द्रा꣯यसो꣯मा । ओ꣭ऽ३हा꣢ ᳐ । ओ꣭ऽ३हा꣢ ᳐ ॥ स्वा꣯दु꣡र्मित्रा꣯या । ओ꣭ऽ३हा꣢ ᳐ । ओ꣭ऽ३हा꣢ ᳐ ॥
पू꣣꣯ष्णा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भ꣢गाऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ १)(१२)॥ झ ॥ ७४५ ॥

४२७-३ सौहविषाणि त्रीणि (स्वर्निधनꣳसौहविषम्)।   त्रयाणां सुहविः पंक्तिरिन्द्रसोमौ ॥
प꣣री꣢ऽ३हो꣡इ । प्रधा꣣ऽ२३४न्वा꣥ ॥ इ꣣न्द्रा꣢ऽ३हो꣡ । यसो꣣ऽ२३४मा꣥ । स्वा꣣꣯दू꣢ऽ३र्हो꣡इ । मित्रा꣣ऽ२३४या꣥ ।
पू꣣꣯ष्णे꣢ऽ३हो꣡इ । भगा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ पू꣤꣯ ष्णे꣣꣯भगा꣤꣯य꣥ ॥ पू꣣꣯ष्णे꣢ऽ३४३ । हो꣢ऽ३४३इ । भा꣢ऽ३गा꣤ऽ५याऽ६५६ ॥
ए꣢ऽ᳐३ । सु꣡वर्व꣢ते꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ४)(१३)॥ घी ॥ ७४६ ॥

४२७-४
हा꣢ऽ३हा꣢इ । परिप्रऽ३धा꣡न्वा꣢ ᳐ । ए꣣ऽ२३४हि꣥या । हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ हाऽ३हा꣢इ । इन्द्रा꣯यऽ३सो꣡मा꣢ ᳐ ।
ए꣣ऽ२३४हि꣥या । हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ हाऽ३हा꣢इ । स्वा꣯दुर्मिऽ३त्रा꣡या꣢ ᳐ । ए꣣ऽ२३४हि꣥या । हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥
हाऽ३हा꣢इ । पू꣯ष्णे꣯भऽ३गा꣡या꣢ ᳐ । ए꣣ऽ२३४हि꣥या । हा꣢ऽ३हा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १८। मा॰ ९)(१४)॥ दो ॥ ७४७ ॥

४२७-५ वाङ्निधनꣳसौहविषम्।
प꣤ । र्येपारी꣥ ॥ प्र꣢ध꣡न्वा । होवा꣢ऽ३हो꣡इ । इन्द्रा꣯यसो꣯मा । होवा꣢ऽ३हो꣡इ । स्वा꣢꣯दु꣡र्मित्रा꣯या ।
होवा꣢ऽ३हो꣡ये꣢ऽ३ । पू꣯ष्णौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । भ꣤गाऽ५याउ ॥ वा ॥
(दी॰ ५। प॰ ११। मा॰ ४)(१५)॥ पी ॥ ७४८ ॥
४२८-१ बाकानि त्रीणि।   त्रयाणां बकोऽनुष्टुप्सोमः ॥
प꣢र्यू꣯षुप्रधन्वा꣯वा꣯जऽ३सा꣡ । ताया꣢इ । ओ꣡इ । पारी꣢ । ओ꣡इ । वृत्रा꣢꣯णि । स꣡क्षणिः । द्वाइष꣪स्ताराऽ२ ।
धि꣡याऽ२इ । अ꣡र्णायाऽ२: । नाऽ२: । ई꣡꣯रासाऽ२३इ । ओ꣡ये꣢ऽ३ । रसा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १६। मा॰ ११)(१६)॥ प ॥ ७४९ ॥

४२८-२
प꣥र्यू꣯षू ॥ प्र꣢ध꣡न्वा꣯वा꣢ऽ३ । जा꣡सा꣢ ᳐ता꣣ऽ२३४या꣥इ । प꣢रिवृत्रा꣯णिसक्षणिः ।
द्वि꣡षास्ता꣢ऽ३रा꣢ ॥ धि꣡या꣯ऋणया꣢ऽ१ना꣢ऽ३ई꣢ ॥ हि꣡म् । रा꣢ऽ३४५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(१७)॥ दू ॥ ७५० ॥

४२८-३
प꣤ । र्येपारी꣥ ॥ ऊ꣡꣯षुप्रधन्वा꣯वा꣯जसा꣯तये꣯परिवृत्रा꣯णिसक्षणिर्द्वाऽ२३इषा꣢: । ता꣡ऽ२३रा꣢ ॥
धि꣡या꣯ऋणया꣯नओवा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ रा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ६। मा॰ ६)(१८)॥ टू ॥ ७५१ ॥
४२९-१ धर्मधाम सामनी वा द्वे।   द्वयोः प्रजापतिः पंक्तिस्सोमः ॥
प꣤व꣥स्वसो꣯मा꣤ ॥ मा꣡हा꣢꣯न्त्स꣡मुद्राः । पि꣢ता꣡꣯ दे꣰꣯ऽ२वा꣡꣯नाऽ२३म् ॥ वा꣡ऽ२᳐इश्वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
भि꣢धा꣡꣯माऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ५। मा॰ ४)(१९)॥ णी ॥ ७५२ ॥

४२९-२ धर्मसाम।
औ꣥꣯होऽ६वा꣥ । औ꣢꣯होऽ३वा꣢ । औ꣯हो꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯होऽ६वा꣥ । प꣡वस्व꣢सो꣯म ॥
महा꣡꣯न्त्समु꣢द्र꣡: ॥ पि꣢ता꣡꣯ दे꣰꣯ऽ२वा꣡꣯ ना꣰꣯ऽ२म् ॥ वि꣡श्वा꣢꣯भि꣡धा꣯माऽ२३४ । औ꣥꣯होऽ६वा꣥ ॥
औ꣢꣯होऽ३वा꣢ । औ꣯हो꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯होऽ६वा꣥ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ध꣡र्माऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १६। प॰ १२। मा॰ ४)(२०)॥ खी ॥ ७५३ ॥
४३०-१ विधर्मसामनी द्वे।   द्वयोः प्रजापतिः पंक्तिस्सोमः ॥
ओ꣥꣯होऽ६वा꣥ । ओ꣢꣯होऽ३वा꣢ । ओ꣯हो꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४ओ꣥꣯होऽ६वा꣥ । प꣡वस्व꣢सो꣯म ॥ महे꣡꣯दक्षा꣢꣯य ॥
अ꣡श्वो꣢꣯न꣡नि꣢क्तः꣡ ॥ वा꣰꣯ऽ२जी꣡꣯धना꣰꣯ऽ२᳐या꣣ऽ२३४ । ओ꣥꣯होऽ६वा꣥ ॥ ओ꣢꣯होऽ३वा꣢ ।
ओ꣯हो꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४ओ꣥꣯होऽ६वा꣥ । ए꣢ऽ᳐३ । वि꣡ध꣢र्मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १५। प॰ १२। मा॰ ३)(२१)॥ फि ॥ ७५४ ॥

४३०-२ धनसाम।
प꣤व꣥स्वसो꣯मा꣤ ॥ म꣢हे꣯दऽ३क्षा꣡याऽ२ ॥ अ꣡श्वो꣯ननिक्तोऽ२३ ॥ वा꣯जा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ।
ध꣢नाऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ नास्ति)(२२)॥ क् ॥ ७५५ ॥
४३१-१ भागम्।   भगः पंक्तिस्सोमः ॥
इ꣤न्दु꣥:पविष्टा꣤ । चा꣡ऽ२३रूः꣢ । मदा꣯या꣡ ॥ अ꣢पा꣯मु꣡पाऽ२३स्था꣢ऽ३इ ॥ का꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ।
भ꣢गाऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ३)(२३)॥ ति ॥ ७५६ ॥
४३२-१ वाजिनाꣳसाम।   वाजिनोऽनुष्टुप्सोमः ॥
अ꣤नु꣥ । अनू꣤ ॥ हा꣡इत्वा꣢꣯सुत꣡ꣳ सो꣢꣯मम꣡दा꣢꣯म꣣सि । मदा꣯म꣢सा꣡ये꣢ऽ३ । महा꣢ऽ३४३इ । सा꣢ऽ३४मा꣥ ॥
र्य꣢रा꣡꣯ ज्ये꣢꣯ । वा꣡꣯ जा꣢꣯ꣳअभि꣡पवमा꣢꣯न꣣ । पवमा꣢꣯ना꣡ ॥ प्रागा꣢꣯हसा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ ४)(२४)॥ गी ॥ ७५७ ॥
४३३-१ हिकम्।   प्रजापतिः पंक्तिर्मरुतः ॥
क꣤ई꣥꣯म्व्य꣤ऽ५क्ता꣤: ॥ न꣢रस्सऽ३ना꣡इडाऽ२: ॥ रुद्र꣡स्यमर्याऽ२३ः ॥ आ꣡ऽ२᳐था꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
सु꣢वाऽ३श्वा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ३। प॰ ५। मा॰ ७)(२५)॥ णे ॥ ७५८ ॥

४३३-२ विकम्।   प्रजापतिः पंक्तिर्मरुतः ॥
क꣣ई꣢ऽ३४३म्वि꣢य꣣क्ताः꣥꣯ ॥ न꣣रा꣢ऽ३४३स्स꣢नी꣣꣯ डा꣥꣯: ॥ रु꣢द्र꣡स्याम꣪र्याऽ२३ः ॥ आ꣡ऽ२᳐था꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
सु꣢वाऽ३श्वा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ ५। मा॰ ६)(२६)॥ मू ॥ ७५९ ॥

४३३-३ निकम्।   प्रजापतिः पंक्तिर्मरुतः ॥
का꣤ई꣥म् । वि꣡याऽ२३ । ओ꣡वा꣢ऽ३ । आ꣤क्ता꣥: ॥ ना꣤रा꣥: । स꣡नाऽ२३ । ओ꣡वा꣢ऽ३ । आ꣤इडा꣥: ॥
रू꣤द्रा꣥ । स्य꣡माऽ२३ । ओ꣡वा꣢ऽ३ । आ꣤र्या꣥: ॥ आ꣤था꣥ । सु꣡वाऽ२३ । ओ꣡वा꣢ऽ३ । आ꣤श्वा꣥: ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ १८। मा॰ ९)(२७)॥ रो ॥ ७६० ॥
४३४-१ आश्वे द्वे।   द्वयोरश्वः पंक्तिरग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯तमा꣤द्या꣥ ॥ अ꣢श्वन्नस्तो꣡꣯माइः । क्र꣢तुन्नऽ३भा꣡द्राऽ२म् ॥ हा꣡र्दि꣢स्पृशा꣡म् ॥
ऋ꣢ध्या꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ त꣢ओ꣡꣯हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इः ॥
(दी॰ ५। प॰ ६। मा॰ ८)(२८)॥ पै ॥ ७६१ ॥

४३४-२
अ꣥ग्ने꣯ । हो꣢ऽ३४३इ । त꣢म꣣द्य꣥ ॥ अ꣢श्वन्नस्तो꣡꣯माइः । क्र꣢तुन्नऽ३भा꣡द्राऽ२म् ॥ हा꣡र्दा꣢ऽ३ओ꣡इ ।
स्पृश꣢म् ॥ ऋध्या꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । त꣢ओ꣡꣯हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इः ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ११)(२९)॥ भ ॥ ७६२ ॥
४३५-१ वाजिनाꣳसाम।   वाजिनोष्णिक् सविता ॥
आ꣢꣯वि꣡र्माऽ२३४र्या꣥: ॥ आ꣡꣯वा꣯जंवा꣯जिनो꣯अग्मान् । दे꣢꣯व꣡स्य꣢स ॥ वितु꣡स्साऽ२३४वा꣥म् ॥
स्व꣡र्गाꣳअ꣪र्वाऽ२३४५न्ताऽ६५६ः ॥ ज꣡यताऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ६)(३०)॥ कू ॥ ७६३ ॥
४३६-१ पवित्रम्।   आदित्याः पंक्तिस्सोमः ॥
प꣤व꣥स्वसो꣯मा꣤ ॥ द्यु꣣म्नी꣢ऽ३४३सु꣢धा꣣꣯र꣥: । मा꣡हाꣳ꣢꣯अ꣡वी꣯नाम् ॥ अनुपू꣢꣯ ॥ र्वि꣣यो꣢ऽ३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ६। मा॰ ४)(३१)॥ पी ॥ ७६४ ॥
॥ एकविंशति षष्ठः, नवमः खण्डः ॥ ९ ॥ दशतिः ॥ ५ ॥

॥ अथ दशम खण्डः॥ (ऋ-२, सा-७)

४३७-१ आभरे द्वे।   द्वयोरिन्द्रः पंक्तिरिन्द्रः ॥
वि꣥श्वतो꣯हाउ ॥ दा꣢꣯वन्विश्व꣡तोना꣢: । ओऽ३ । हा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४हा꣥इ । आ꣢꣯ । भरा꣯ । भा꣡ऽ२३रा꣢ ॥
या꣡न्त्वा꣢꣯श꣡विष्ठ꣢मा꣡इ ॥ माहा꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ ऐ꣢꣯ही꣯यै꣣꣯ही꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ ४)(३२)॥ थी ॥ ७६५ ॥

४३७-२
वि꣤श्व꣥तो꣯दा꣯वन्विश्व꣤तो꣥꣯नआ꣤ ॥ भ꣢रा꣯ । भा꣡ऽ२३रा꣢ ॥ या꣡न्त्वा꣢꣯श꣡विष्ठ꣢मा꣡इम꣢ ॥
हा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ३)(३३)॥ बि ॥ ७६६ ॥
४३८-१ वासुमन्दे द्वे।   द्वयोर्वसुमन्दो गायत्रीन्द्रः ॥
ए꣤षा꣥: । ब्रा꣡ह्मा꣯य꣢आऽ३१उवाऽ२३ । ए꣢ऽ३᳐ । त्वि꣢य꣣आ꣢ ॥ आ꣡ऽ२३इन्द्रा꣥: ॥
ना꣡मश्रु꣢ताऽ३१उवाऽ२३ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । गृ꣢ण꣣आ꣢ ॥
(दी॰ १। प॰ ८। मा॰ ८)(३४)॥ गै ॥ ७६७ ॥

४३८-२
ए꣤षा꣥ए꣤षा꣥: ॥ ब्रा꣡ह्माऽ२ब्रा꣡ह्माऽ२ । यऋ꣡त्वियोवा꣢ । ओ꣡वा꣢ । आ꣡इन्द्राऽ२आ꣡इन्द्राऽ२: ॥
ना꣡꣯मश्रुतोवा꣢ । ओ꣡वा꣢ । गृणा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ ११। मा॰ ८)(३५)॥ कै ॥ ७६८ ॥

४३८-३ कावषाणि त्रीणि।   त्रयाणां कवषो गायत्रीन्द्रः ॥
ए꣤षा꣥: । ओ꣤ । ओवा꣥ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯याः꣡ । ऋ꣪त्वियाऽ२: । आ꣡इन्द्रो꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ ॥ ना꣢ऽ३मा꣢ ॥ श्रू꣡ऽ२३तो꣢ ।
गृणा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ १२। मा॰ ६)(३६)॥ खू ॥ ७६९ ॥

४३८-४
ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३४३ । ओ꣢ऽ३४हा꣥ । ए꣢꣯षा꣡ब्राह्मा꣢ऽ३४३ । या꣢ऽ३४ः । ऋ꣥त्विया꣤: ॥ ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣢ऽ३४हा꣥ । इ꣢न्द्रो꣡नामा꣢ऽ३४३ । श्रू꣢ऽ३४ । तो꣥꣯गृणा꣤इ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३४३ ॥ ओ꣢ऽ३४५᳚हाऽ६५६ ॥
ए꣢ऽ᳐३ । सु꣡वर्व꣢ते꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २। प॰ १४। मा॰ ३)(३७)॥ झि ॥ ७७० ॥

४३८-५
ए꣢꣯षब्र꣡ह्मौ꣯हो ॥ या꣢꣯ऋ꣡त्वियाः ॥ इ꣢न्द्रो꣯ना꣡꣯मौ꣯हो ॥ श्रू꣢꣯ तो꣡꣯गृणा꣢ऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ५। मा॰ ३)(३८)॥ ण्यि ॥ ७७१ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने एकदशः प्रपाठकः ॥ ११ ॥

२. ऐन्द्रं पर्व — द्वादशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ दशम खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-८, सा-९)

४३९-१ श्लोके द्वे।   द्वयोः प्रजापतिस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
हा꣥꣯उस्वरता ॥ ब्र꣢ह्मा꣡णाऽ२: । इ꣡न्द्रम् । आ । म꣢ह꣡याऽ२᳐न्तो꣣ऽ२३४ । कै꣥: ॥ अ꣡वाऽ२र्द्धया꣡न् ।
अ꣢हये꣯ह᳐ । त꣣वा꣢ऽ३४५इ । ऊऽ६५६ ॥ श्लो꣢꣯क꣡यताऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ६)(१)॥ टू ॥ ७७२ ॥

४३९-२
हा꣥꣯उ । अभि । स्वरता ॥ ब्र꣢ह्मा꣡꣯णआइन्द्राऽ२म् । मह꣡याऽ२᳐न्तो꣣ऽ२३४ । कै꣥: ॥
अ꣢वर्द्धा꣡याऽ२न् ॥ अहये꣯हन्त꣡वाऽ२३४५ऊऽ६५६ ॥ श्लो꣣ऽ२३४का꣥: ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ८)(२)॥ ढै ॥ ७७३ ॥
४४०-१ अनुश्लोके द्वे।   द्वयोः प्रजापतिस्त्रिष्टुबिन्द्रः त्वष्टा वा ॥
हा꣥꣯उस्वरता ॥ स्व꣢रतस्व꣡राऽ२३ता꣢ । आ꣡नव꣢स्ते꣯र꣡थ꣢म । श्वा꣯या꣡ता꣢ऽ१क्षूऽ२३४ः ॥
हा꣥꣯उस्वरता । स्व꣢रतस्व꣡राऽ२३ता꣢ । त्व꣡ष्टा꣢꣯व꣡श्रं ꣢पु꣡रुहू꣢꣯ । ता꣡द्यु꣪मान्ताऽ२३४म् ।
हा꣥꣯उस्वरता ॥ स्व꣢रतस्व꣡ । राऽ२᳐ । ता꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्व꣢रऽ३ता꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ १४। मा॰ ५)(३)॥ धु ॥ ७७४ ॥
४४१-१
औ꣣꣯हो꣢इ᳐ । श꣣म्प꣤दा꣥म् ॥ म꣢घ꣡ꣳरया꣢ऽ३१२३४इ । षिणाइ । न꣡का꣯ममव्रतो꣯हिनो꣯तिनस्पृश꣢त् ॥
रयिमो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ६)(४)॥ थू ॥ ७७५ ॥
४४२-१ वाचः सामनी द्वे।   द्वयोर्वाग्पंक्तिर्वाक् ॥
सा꣤दा꣥ ॥ गा꣡꣯वश्शुचयो꣯विश्व꣢धा꣡꣯याऽ२३सा꣢ ᳐: ॥ सा꣣ऽ२३४दा꣥ ॥ दा꣡इवा꣯अ꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥
पा꣣ऽ२३४सा꣥: ॥
(दी॰ ४। प॰ ५। मा॰ ४)(५)॥ नी ॥ ७७६ ॥
४४३-१
औ꣣꣯हो꣢ऽ३इ । आ꣤याही꣥ ॥ व꣡नाऽ२सा꣡꣯सहा । गावस्स꣢च । ता꣡व꣪र्त्तानीऽ२म् ॥ या꣡त् । ऊऽ२३ ॥
ध꣢भिरो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ४)(६)॥ झी ॥ ७७७ ॥
४४४-१ माधुछन्दसम्।   मधुछन्दाः त्रिष्टुभ्मरुतः ॥
ओ꣤वा । उप꣥प्रक्षे꣤꣯मधु꣥मतिक्षिय꣤न्त꣥: । ओ꣤वा ॥ ओ꣡इ । पुष्ये꣯मरयिन्धी꣯महे꣯त꣢आ꣡ऽ२३इन्द्रा꣢ ।
ओ꣡ । वाओवा꣢ ॥ ओ꣡ ॥ वा꣢꣯हाऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ६)(७)॥ म्यू ॥ ७७८ ॥
४४५-१ मारुतम्।   मरुतस्त्रिष्टुभ्मरुतः ॥
अ꣤र्च्च꣥न्तिया꣤ ॥ क꣡म्मरुतस्सु꣢वा꣡ऽ२३र्का꣢: ॥ आ꣡स्तो꣢꣯भता꣡इ ॥ श्रु꣢तो꣡꣯युवा꣯सआइन्द्रा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥
ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ५। मा॰ ५)(८)॥ ण्यु ॥ ७७९ ॥
४४६-१ उदꣳशं साम।   । उद्वꣳशपुत्रः प्रजापतिस्त्रिष्टुबिन्द्रो वृत्रहा ॥
प्र꣥वा꣤: ॥ आ꣡इन्द्रा꣯यवृत्रहान्त꣪माऽ२३या꣢ ॥ वा꣡इप्रा꣯यगा꣯थंगा꣢ऽ१या꣢ऽ३ता꣢ । यां ꣡जुजौ꣢वाऽ३ ।
उ꣢प् । षा꣡ऽ२꣮तोऽ३५᳚हा꣢इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ ५)(९)॥ टु ॥ ७८० ॥
॥ .षोडश सप्तमः, दशमः खण्डः ॥ १० ॥ दशतिः ॥ ७ ॥

॥ अथ एकादश खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१७)

४४७-१ शाम्ये द्वे।   द्वयोर्धुरो गायत्र्यग्निः ॥
अ꣤चे꣥꣯ती꣤ ॥ अ꣢ग्निः꣡ । चिकाऽ२३इती꣢ऽ३ः ॥ हा꣡ऽ२३व्या꣢ऽ३ ॥ वा꣡ऽ२᳐त्ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
सु꣢म꣡द्रथा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ ५)(१०)॥ टु ॥ ७८१ ॥

४४७-२
अ꣤चे꣥꣯तिया꣤ ॥ ग्ना꣡इश्चाइकाइतीऽ२३ः । हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ ह꣡व्याऽ२३ ॥
वा꣡ऽ२᳐त्ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । सु꣢म꣡द्रथा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ७)(११)॥ दे ॥ ७८२ ॥
४४८-१ गूर्द्दः (गूर्दम्)।   प्रजापतिः पंक्तिरग्निः ॥
ओ꣤ग्ना꣥इ ॥ त्व꣡न्नोऽ२३आ꣢ । हि꣡म्माऽ२३ । ताऽ२३४मा꣥: । उ꣢त꣡त्रा꣢꣯ ता꣡꣯शि꣢वो꣡꣯भु꣢वः ॥ शिवो꣡꣯भुवाऽ२३ः ॥
व꣤रोवा꣥ । था꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(१२)॥ दू ॥ ७८३ ॥

४४८-२   अत्यर्द्दः । विश्वामित्रः पंक्तिरग्निः ॥
अ꣥ग्नौ꣯ । होइ । त्वौ꣯ । होइ ॥ नो꣢꣯अ꣡न्तमा꣢ऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊऽ२३४ता꣥ ॥ त्रा꣣꣯ता꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
शि꣢वो꣡꣯भु꣢वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ६)(१३)॥ बू ॥ ७८४ ॥

४४८-३ गूर्द्दः।   प्रजापतिः पंक्तिरग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯तू꣢ऽ३व꣤न्नो꣥꣯अ꣤न्तमा꣥: ॥ उ꣢त꣡त्रा꣢꣯ ता꣡꣯शि꣢वो꣡꣯भु꣢वः ॥ व꣡राऽ२३ ॥ औ꣯हौ꣢ ᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ।
था꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ५। मा॰ ४)(१४)॥ ङी ॥ ७८५ ॥

४४८-४ अत्यर्द्दः।   विश्वामित्रः पंक्तिरग्निः ॥
अ꣥ग्ने꣯ । हो꣢ऽ३इ । त्व꣤न्नो꣥꣯अ꣤ । तमा꣥: ॥ उ꣢ताऽ२ । हाऽ२इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ ॥ त्राताऽ२᳐ ॥
शि꣣वो꣢ऽ३४५ ॥ भू꣣ऽ२३४वा꣥: ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ६)(१५)॥ ञू ॥ ७८६ ॥
४४९-१ सान्तनिके द्वे।   द्वयोः प्रजापतिर्गायत्र्यग्निः ॥
भा꣤गा꣥: ॥ न꣡चित्रः ॥ अग्निर्महोऽ२३ना꣢ऽ३म् ॥ दा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ति꣢र꣡त्ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ २। प॰ ५। मा॰ ५)(१६)॥ ञु ॥ ७८७ ॥

४४९-२
भ꣤गो꣥꣯न꣤चि꣥त्राः꣤ ॥ अ꣢ग्नि꣡र्महोऽ२३ना꣢ऽ३म् ॥ दा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ति꣢र꣡त्ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ५। मा॰ ४)(१७)॥ णी ॥ ७८८ ॥
४५०-१ धनम् द्वे।   द्वयोः प्रजापतिर्गायत्री विश्वेदेवाः ॥
वि꣥श्वस्या ॥ प्र꣢स्तो꣡भाऽ२ । पुरो꣯वा꣯साऽ३न् । य꣡दिवे꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ नू꣡ऽ२३ ॥
ना꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ धा꣣ऽ२३४ना꣥म् ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ३)(१८)॥ थि ॥ ७८९ ॥

४५०-२ धर्मसाम।
औ꣥꣯हो꣯इविश्वस्या ॥ प्र꣢स्तो꣡भाऽ२ । पुरौ꣯हो꣯वऽ३हा꣢इ । वा꣡साऽ२न् । य꣡दिवे꣯हा ॥ नूऽ२३ ॥
ना꣡ऽ२᳐मा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ धा꣣ऽ२३४र्मा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ४)(१९)॥ जी ॥ ७९० ॥
४५१-१ उषसस्साम।   उषा पंक्तिरुषा ॥
उ꣥षा꣯अपा ॥ स्वा꣡सु꣢ष्टा꣣ऽ२३४मा꣥: । सं ꣡वाऽ२र्त्तया꣡ । ति꣪वाऽ२᳐र्त्ता꣣ऽ२३४नी꣥म् ॥
सू꣡ऽ२᳐जा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । त꣡ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ४)(२०)॥ ठी ॥ ७९१ ॥
४५२-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजः पंक्तिर्विश्वेदेवाः ॥
इ꣥मा꣤꣯नुकं ꣥भू꣤ऽ५व꣤ना ॥ सी꣢꣯ष꣡धाऽ२᳐इमा꣣ऽ२उवाऽ३ । ई꣢ऽ३४हा꣥ । इ꣢न्द्रश्च꣡वाऽ२᳐इश्वा꣣ऽ२उवाऽ३ ।
ई꣢ऽ३४हा꣥ ॥ च꣣दे꣢ऽ३ । वा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वी꣣ऽ२३४शा꣥: ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(२१)॥ दू ॥ ७९२ ॥
४५३-१ रातिसाम।   इन्द्रो गायत्रीन्द्रः ॥
वि꣤स्रू꣥वि꣤स्रू꣥ ॥ ता꣡याऽ२स्ता꣡याऽ२: । यथा꣯प꣡थः ॥ आइन्द्राऽ२त्वा꣡द्याऽ२३ ॥ तु꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
ता꣤ऽ५यो६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ६। मा॰ ४)(२२)॥ की ॥ ७९३ ॥
४५४-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजस्त्रिष्टुबिन्द्रः ॥
अ꣥या꣯वा꣯जाम् ॥ दा꣡इवहि । त꣢ꣳस꣣ने꣤मा꣥ । म꣢दे꣯मशऽ३ता꣡हि꣪माऽ२: ॥ शता꣡ऽ२३ ॥
हा꣡ऽ२᳐इमा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सु꣢वीऽ३रा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ६)(२३)॥ फू ॥ ७९४ ॥
४५५-१ ऐषम्।   इषस्त्रिष्टुभ्मित्रावरुणौ ॥
ऊ꣤र्जा꣥ ॥ मि꣡त्रो꣯वरुण:पिन्व꣢ता꣡ऽ२३इडाः꣢ ॥ पी꣡꣯वरी꣯मिषंकृणुही꣯नआइन्द्रा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ४। मा॰ ५)(२४)॥ ध्यु ॥ ७९५ ॥
४५६-१ वैराजे द्वे।   द्वयोरिन्द्रो गायत्रीन्द्रः ॥
इ꣣न्द्रो꣢ऽ३४ ॥ वि꣣श्व꣤स्य꣥रा꣯ ॥ ज꣢ति᳛हो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ ४। मा॰ १)(२५)॥ घ ॥ ७९६ ॥

४५६-२
इ꣡न्द्राऽ२होऽ१इ ॥ वाऽ२इश्वा꣡ ॥ स्य꣢राऽ२ज꣡ति꣢ ॥ हो꣡वाऽ२३हो꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ ५। मा॰ ३)(२६)॥ वि ॥ ७९७ ॥
॥ सप्तदशाष्टमः, एकादशः खण्डः ॥ ११ ॥ दशतिः ॥ ८ ॥

॥ अथ द्वादश खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१६)

४५७-१ वाजजित्।   प्रजापतिरष्टिर्विष्णुः ॥
ओ꣢इ᳐त्रि꣣क꣥ । द्रु꣡काइ । षू꣢ऽ३म꣡हि꣢षो꣡ । यवा꣢꣯शि꣣र꣥म् । तु꣣वी꣢शु꣣ष्म꣥: ॥ ओ꣢इ᳐तृ꣣ऽ२३४म्पा꣥त् । सो꣡꣯माम् ।
अपिबा꣢ऽ३द्वि꣡ । ष्णुना꣢꣯सु꣣त꣥म् । य꣣था꣢꣯व꣣श꣥म् । ओ꣢इ᳐सा꣣ऽ२३४ई꣥म् । म꣡मा । दा꣢ऽ३म꣡हि꣢क꣡ ।
मक꣢र्त꣣वे꣥꣯ । म꣣हा꣢꣯मु꣣रु꣥म् ॥ ओ꣢इ᳐सा꣣ऽ२३४इना꣥म् । स꣡श्चात् । दे꣢꣯ वो꣡꣯ दे꣢꣯वा꣡म् । स꣤त्यइन्दुस्सत्याऽ५मिन्द्राउ ॥
वा ॥
(दी॰ ९। प॰ २०। मा॰ २०)(२७)॥ नौ ॥ ७९८ ॥
४५८-१ गोरांगिरसस्य सामनी द्वे।   द्वयोर्गौरतिजगतीन्द्रः ॥
अ꣥यꣳसहो꣤हा꣥इ ॥ स्र꣣मा꣢ ᳐ना꣣ऽ२३४वा꣥: । दृ꣢शा꣡ᳲक꣢वी꣯ना꣡꣯म्मतिर्ज्यो꣯ । ति꣢र्विधा꣣ऽ२३४र्मा꣥ ॥
ब्र꣢ध्ना꣡स्स꣢मा꣡इची꣢꣯रुष꣡स꣢: । समा꣡इरा꣢ऽ१याऽ२᳐त् । अ꣣रा꣢ऽ३ । हो꣡वा꣢ऽ३ । पा꣤ । स꣥स्स꣤चे꣥꣯ । त꣣सा꣢ऽ३ः ।
स्वा꣡सरे꣢꣯ ॥ मन्यु꣡माऽ२३न्ता꣢ ᳐: ॥ चि꣣तो꣢ ᳐ ॥ या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ गो꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ १६। मा॰ १०)(२८)॥ टौ ॥ ७९९ ॥

४५८-२
अ꣥यꣳसहस्रमा꣯नाऽ६वा꣥: ॥ दृ꣢शा꣡ᳲक꣢वी꣯ना꣡꣯मतिर्ज्यो꣯ । ति꣢र्वि꣡धाऽ२३र्मा꣢ ॥ ब्रध्ना꣡स्स꣢मा꣡इची꣢꣯रुष꣡स꣢: ।
समा꣡इरा꣢ऽ१याऽ२३त् । ओ꣭ऽ३वा꣢ । अरे꣯प꣡स꣢स्स꣡चे꣢꣯तसः । स्वा꣡सरे꣢꣯ ॥ मन्यु꣡माऽ२३न्ता꣢: ।
ओ꣭ऽ३वा꣢ ᳐ । चि꣣ता꣢ऽ३ः । गो꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ बा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ ९)(२९)॥ बो ॥ ८०० ॥
४५९-१ प्रयस्वत्।   प्रजापति(रष्टि) रत्यष्टिरिन्द्रः ॥
ए꣤꣯न्द्र꣥या꣯ह्यु꣤प꣥ना꣤: ॥ पा꣡राऽ२᳐वा꣣ऽ२३४ता꣥: । ना꣡꣯यमच्छा । वि꣢द꣡था꣯नाइ । वास꣢ ᳐त्पा꣣ऽ२३४ती꣥: ।
अ꣡स्तारा꣢ऽ३जे꣢ऽ३ । वा꣡स꣢त्पा꣣ऽ२३४ती꣥: । ह꣤वा꣥꣯महे꣯त्वा꣯प्र꣤य꣥स्वन्ता꣤: । सु꣢ता꣡इषू꣢ऽ३वा꣢ ॥ पुत्रा꣡꣯सो꣯ना ।
पि꣢त꣡रंवा । जासा꣢ ᳐ता꣣ऽ२३४या꣥इ ॥ म꣡ꣳहाइष्ठा꣢ऽ३म्वा꣢ऽ३ ॥ जा꣡ऽ२३सा꣤ऽ३ । ता꣢ऽ३४५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ १५। मा॰ १०)(३०)॥ नौ ॥ ८०१ ॥
४६०-१ अक्षय्यम्।   रेवत्प्रजापतिरतिजगतीन्द्रः ॥
त꣤मिन्द्रं ꣥जो꣯हवी꣯मिमघ꣤वा꣥꣯ना꣤म् ॥ ऊ꣣ऽ२३४ग्रा꣥म् । स꣢त्रा꣡꣯होइ । दधा꣯नमप्रताऽ२᳐इष्कू꣣ऽ२३४ता꣥म् ।
श्र꣡वाऽ२३ꣳसा꣡ऽ२᳐इ । भू꣣ऽ२३४री꣥ । म꣡ꣳहिष्ठो꣯गी꣯र्भिरा । च꣪याऽ२᳐ज्ञा꣣ऽ२३४या꣥: । वा꣢꣯वा꣡र्त्ताऽ२ ॥
रा꣯ये꣡꣯होइ । नो꣢꣯विश्वा꣯सुपा꣣ऽ२३४था꣥ । कृ꣣णो꣢ऽ३ । तू꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १४। प॰ १४। मा॰ ९)(३१)॥ ध्वो ॥ ८०२ ॥
४६१-१ याज्ञतुरम्।   यज्ञतुरोऽत्यष्टिरिन्द्रः ॥
अ꣥स्तुश्रौ꣯षाट् ॥ पु꣢रो꣡꣯अग्निंधि꣢या꣡꣯दधे꣢꣯ । हा꣡ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ । आ꣡꣯नुत्यच्छर्द्धो꣢꣯दि꣡ । व्याम् ।
वृ꣪णाऽ२३हा꣢इ᳐ । मा꣣ऽ२३४हे꣥ । इ꣡न्द्रावा꣢ऽ३यू꣢ऽ३ । वृ꣡णीऽ२᳐मा꣣ऽ२३४हा꣥इ ।
य꣡द्धक्रा꣯णा꣯विवा꣢ऽ१स्वा꣢ऽ३ता꣢इ । ना꣯भा꣡꣯सन्दा꣯यना꣢ऽ३ । व्या꣤सा꣥इ । अ꣡धप्रनू꣯नमुपया । ति꣢धी꣯ता꣡या
ऽ२३ः । हा꣡ऽ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ ॥ दा꣡इवा꣢ऽ१ꣳअच्छाऽ२३ । हा꣡ऽ । औ꣢ऽ३होऽ२३४वा꣥ ।
न꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ । ता꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १३। प॰ २२। मा॰ ११)(३२)॥ ठ ॥ ८०३ ॥
४६२-१ एवयामरुतस्ः साम।   एवयामरुदतिजगतीन्द्रः ॥
प्रा꣡ऽ२३४ । वो꣯म꣥हे꣤꣯म꣥त꣤यो꣥꣯यन्तुवि꣤ष्ण꣥वो꣤ । हाइ ॥ म꣢रुत्वताऽ३इगि꣡रिजा꣢ऽ३४ः । हा꣣꣯हो꣢इ ।
ए꣯वा꣡याऽ२᳐ । मा꣣ऽ२३४रू꣥त् । प्रा꣡श꣪र्द्धायाऽ२ । प्रा꣡य꣪ज्यावाऽ२३इ । सू꣡खा꣢ ᳐दा꣣ऽ२३४या꣥इ ।
त꣡वसे꣢꣯भंद꣡दिष्ट꣢ये꣯ ॥ धु꣡ना᳐इव्रा꣢ऽ३ता꣢ऽ३ ॥ या꣡ऽ२᳐शा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣣ऽ२३४से꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ १४। मा॰ ९)(३३)॥ धो ॥ ८०४ ॥
४६३-१ विषमाणि त्रीणि, (विषमाणानि वा)।   भरद्वाजोऽत्यष्टिस्सोमः ॥
आ꣤या꣥ ॥ रु꣡चा । हरि । ण्या꣢ ᳐पु꣣ना꣤ना꣥: । वि꣡श्वा꣯द्वे꣯षा꣯ꣳसितरतीऽ२३सा꣤ऽ३यु꣢ग्व꣣भि꣥: ॥
सू꣢꣯रो꣡ऽ२३ना꣢ऽ३ । सा꣡ऽ२᳐यू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ग्वा꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ४)(३४)॥ गी ॥ ८०५ ॥

४६३-२
अ꣥या꣯रु꣣चा꣢꣯ह꣣रि꣤ण्या꣥ ॥ पु꣢ना꣯न꣡: । विश्वा꣯द्वाऽ२३इषा꣢ । सा꣡इतर꣢ । त्यौ꣯हो꣯ । वाऽ३हा꣢ऽ३इ ।
सा꣡यूऽ२᳐ग्वा꣣ऽ२३४भी꣥: ॥ सू꣢꣯रो꣡ऽ२३ना꣢ ᳐ ॥ स꣣यू꣢ऽ३ग्वा꣤ऽ५᳚भा꣥ऽ६५६इः ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ७)(३५)॥ झे ॥ ८०६ ॥

४६३-३
अ꣤या꣣꣯रु꣤चा꣣꣯हरि꣤ण्या꣥꣯ । पू꣡ऽ२३४ । ना꣯नो꣯विश्वा꣥꣯द्वे꣤षा꣥ ॥ सा꣡इतर꣢ति । सा꣡यु꣪ग्वाभीऽ२: । सू꣡रोना꣢ऽ३ ।
सा꣡यूऽ२᳐ग्वा꣣ऽ२३४भी꣥: । धा꣤꣯ रा꣥꣯पृष्ठा꣤ । स्या꣡रोऽ२चता꣡इ । पु꣢ना꣡नोआ꣢ऽ३ । रू꣡षो꣢ ᳐हा꣣ऽ२३४री꣥: ।
वि꣤श्वा꣥꣯यद्रू꣤ । पा꣡परि꣢या꣯ । सा꣡ऋ꣪क्वाभीऽ२: ॥ स꣡प्तासी꣢ऽ३ये꣢ऽ३ ॥ भा꣡ऽ२३इरा꣤ऽ३ ।
क्वा꣢ऽ३४५भोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ १०)(३६)॥ फौ ॥ ८०७ ॥
४६४-१ सवितुस्साम।   सवितात्यष्टिः सविता ॥
अ꣥भि꣤त्यन्दे꣥꣯ व꣤ꣳस꣥विता꣤꣯र꣥म् । औ꣯हौ꣤꣯होवाहा꣥इ ॥ ओ꣡꣯णाऽ२३४यो꣥: । क꣢वि꣡क्राऽ२३४तू꣥म् ।
आ꣢र्चा᳐मी꣣ऽ२३४सा꣥ । त्या꣢सा᳐वा꣣ऽ२३४ꣳरा꣥ । त्न꣢धा꣡꣯माऽ२३४भी꣥ । प्रि꣢य꣡म्माऽ२३४ती꣥म् ।
औ꣢꣯ हो꣡꣯ औ꣢꣯हो꣡वाऽ२३४हा꣥उ ॥ ऊ꣢र्ध्वा᳐या꣣ऽ२३४स्या꣥ । आ꣢मा᳐ती꣣ऽ२३४र्भा꣥: । अ꣢दि꣡द्यूऽ२३४ता꣥त् ।
स꣢वी꣡꣯माऽ२३४नी꣥ । औ꣢꣯ हो꣡꣯ औ꣢꣯हो꣡वाऽ२३४हा꣥उ ॥ ही꣢र᳐ण्या꣣ऽ२३४पा꣥ । णी꣢रा᳐मी꣣ऽ२३४मी꣥ ।
त꣢सु꣡क्राऽ२३४तू꣥: । औ꣢꣯ हो꣡꣯ औ꣢꣯हो꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡हाउ । वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । कृ꣢पा꣡꣯सुवाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १७। प॰ २१। मा॰ १५)(३७)॥ चु ॥ ८०८ ॥
४६५-१ भारद्वाजे द्वे।   भरद्वाजोऽत्यष्टिरग्निः ॥
अ꣥ग्निꣳहो꣯ता ॥ र꣢म्मन्ये꣯ऽ३दा꣡स्व꣢न्तम् । ओऽ᳐३वा꣢ऽ३ । वा꣡सो꣢ ᳐स्सू꣣ऽ२३४नू꣥म् ।
स꣢हसो꣯जा꣯ऽ३ता꣡वे꣢ऽ१दासाऽ२म् । विप्रन्नजा꣯ । ओऽ᳐३वा꣢ऽ३ । त꣡वेऽ२᳐दा꣣ऽ२३४सा꣥म् ।
य꣢ऊ꣡र्ध्वा꣢ऽ१याऽ२ । सुवा꣡ध्वा꣢ऽ१राऽ२꣮: । दे꣯वो꣯दे꣯वा꣯ । ओऽ᳐३वा꣢ऽ३ । चि꣡याऽ२᳐का꣣ऽ२३४र्पा꣥ ।
घृतो꣤वा । स्य꣢वि꣡भ्रा꣰꣯ऽ२ष्टिम् । अनुशुक्रशा । ओऽ᳐३वा꣢ । चि꣡षः ॥ आ꣯जुह्वाऽ२३ना꣢ ॥ स्यसा ।
ओऽ᳐३वा꣢ऽ३ । पा꣡ऽ२᳐इषा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १३। प॰ २३। मा॰ १०)(३८)॥ ड्वो ॥ ८०९ ॥

४६५-२
अ꣤ग्नि꣣ꣳहो꣯ता꣤꣯र꣥म्मन्ये꣯ । दा꣡ऽ२३४ । स्वन्तं ꣥व꣤सो꣥꣯स्सू꣯नु꣤म् ॥ स꣢हसो꣯जा꣯ऽ३ता꣡वे꣢ऽ१दासाऽ२म् ।
विप्रन्नजा꣯ऽ३ता꣡वे꣢ऽ१दासाऽ२म् । यऊ꣯र्ध्वया꣯ऽ३सू꣡व꣪ध्वाराऽ२: । दे꣯वो꣯दे꣯꣯वा꣯ऽ३चा꣡या꣢ऽ१कृपाऽ२ ।
घृता꣡स्य꣢वि꣡भ्रा꣢꣯ष्टिम꣡नुशु꣢ । क्रा꣡शो꣢ऽ१चिषाऽ२: । आ꣡꣯जूह्वा꣢ऽ३ना꣢ऽ३ ॥ स्या꣡ऽ२३सा꣤ऽ३ ।
पा꣢ऽ३४५इषोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १६। प॰ १२। मा॰ ८)(३९)॥ खै ॥ ८१० ॥

४६५-३ अवभृथसाम।   बृहस्पतिरत्यष्टिरग्निः ॥
अ꣣हा꣢वो᳐हा꣣ऽ२३४वा꣥: । (त्रिः) । अ꣢ग्नि꣡ष्टपती । प्र꣣ति꣢द꣣ह꣤ती꣥ । अ꣢ग्नि꣡ꣳहो । ता꣢꣯रम्माऽ३न्ये꣤ऽ३दा꣢꣯स्व꣣न्त꣥म् ॥
व꣢सो꣡: । सू꣢꣯नुꣳसहसो꣯जाऽ३ता꣤ऽ३वे꣢꣯द꣣स꣥म् । वि꣢प्रा꣡म् । न꣢जाऽ३ता꣤ऽ३वे꣢꣯द꣣स꣥म् । य꣢ऊ꣡ ।
ध्व꣢याऽ३सू꣤ऽ३व꣢ध्व꣣र꣥: । दे꣢꣯वो꣡ । दे꣢꣯वाऽ३ची꣤ऽ३या꣢꣯कृ꣣पा꣥꣯ ॥ घृ꣢ता꣡ । स्य꣢विभ्रा꣯ष्टिमनुशूऽ३क्रा꣤ऽ३शो꣢꣯चि꣣ष꣥: ॥
आ꣢꣯जू꣡ । ह्वा꣢꣯नाऽ३स्या꣤ऽ३स꣢र्पि꣣ष꣥: । अ꣣हा꣢वो᳐हा꣣ऽ२३४वा꣥: । (त्रिः) । अ꣢ग्नि꣡ष्टपती ।
प्र꣣ति꣢द꣣हा꣤ऽ५ताऽ६५६इ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । वि꣡श्व꣢ꣳस꣡मत्रिणंद꣢ह । (द्वे द्विः) । ए꣢ऽ᳐३ ।
वि꣡श्व꣢ꣳस꣡मत्रिणंद꣢हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १४। प॰ ३०। मा॰ १६)(४०)॥ नू ॥ ८११ ॥

४६५-४ प्रवर्ग्यसाम।   बृहस्पतिरत्यष्टिरग्निः ॥
त्य꣢ग्ना᳐इः । प्र꣣ति꣢द꣣ह꣤ती꣥ । हा꣢उ᳐हो꣣ऽ५हाउ । अ꣢ग्नि꣡ꣳहो । ता꣢꣯रम्माऽ३न्ये꣤ऽ३दा꣢꣯स्व꣣न्त꣥म् ॥ व꣢सो꣡: ।
सू꣢꣯नुꣳसहसो꣯जाऽ३ता꣤ऽ३वे꣢꣯द꣣स꣥म् । वि꣢प्रा꣡म् । न꣢जाऽ३ता꣤ऽ३वे꣢꣯द꣣स꣥म् । य꣢ऊ꣡ ।
व꣢याऽ३सू꣤ऽ३व꣢ध्व꣣र꣥: ॥ दे꣢꣯वो꣡ । दे꣢꣯वाऽ३ची꣤ऽ३या꣢꣯कृ꣣पा꣥꣯ ॥ घृ꣢ता꣡ । स्य꣢विभ्रा꣯ष्टिमनुशूऽ३क्रा꣤ऽ३शो꣢꣯चि꣣ष꣥: ॥
आ꣢꣯जू꣡ । ह्वा꣢꣯नाऽ३स्या꣤ऽ३स꣢र्पि꣣ष꣥: । त्य꣢ग्ना᳐इः । प्र꣣ति꣢द꣣ह꣤ती꣥ । हा꣢उ᳐हो꣣ऽ५हा᳐उ । वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ ।
वि꣡श्व꣢ꣳस꣡मत्रिणंद꣢ह । एऽ᳐३ । वि꣡श्वं ꣢व्य꣡त्रिणंद꣢ह । ए꣢ऽ᳐३ । वि꣡श्व꣢न्य꣡त्रिणंद꣢हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १४। प॰ २७। मा॰ १७)(४१)॥ थे ॥ ८१२ ॥
४६६-१ ऐषम्।   इषोऽष्टिरिन्द्रः ॥
ता꣡ऽ२३४वत्यन्नाऽ५रियन्नृ꣤ताउ ॥ अ꣢प꣡इन्द्राऽ२ । प्र꣡थमंपूऽ२᳐ । र्वि꣣यं ꣢दि꣣वि꣥ । प्र꣣वा꣢꣯ । चि꣣यं ꣢कृ꣣त꣥म् ।
यो꣢꣯ दे꣡꣯वास्याऽ२ । श꣡वसाप्राऽ२᳐ । रि꣣णा꣢꣯अ꣣सु꣥ । रि꣣ण꣢न्न꣣प꣥: । भु꣢वो꣡꣯विश्वाऽ२म् । अ꣡भ्यदाऽ२᳐इ ।
व꣣मो꣢꣯ज꣣सा꣥꣯ । वि꣣दे꣢꣯ दू꣣꣯र्ज꣥म् । श꣣ता꣢ ᳐क्रा꣣ऽ२३४तू꣥: ॥ वि꣤दाऽ५इदिषाउ ॥ वा ॥
(दी॰ ९। प॰ १७। मा॰ ११)(४२)॥ था ॥ ८१३ ॥
॥ षोडशः नवमः, द्वादशः खण्डः ॥ १२ ॥ दशतिः ॥ ८ ॥
॥ इति प्रथमोऽर्द्धः प्रपाठकः ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने द्वादशस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥
॥ इति ऐन्द्रं काण्डम् ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — द्वादशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ प्रथमः खण्डः॥ (ऋ-३, सा-३१)

४६७-१ आजिगम्।   अजिगो प्रजापतिर्वागायत्री सोमः ॥
ओ꣡म् ॥ उ꣥च्चा꣤ ॥ ते꣢꣯जा꣯ऽ३ता꣡म꣪न्धासाऽ२: । दिवि꣡सद्भू꣯म्या꣯ददाइ ॥ उ꣢ग्र꣡ꣳशाऽ२३ र्मा꣢ऽ३ ॥
मा꣡ऽ२᳐हा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣢ ᳐प् । श्रा꣣ऽ२३४वा꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ५)(१)॥ खु ॥ ८१४ ॥

४६७-२ आभीकम्।   अङ्गिरसो गायत्री सोमः ॥
उ꣢च्चा꣡꣯तेऽ२३४जा꣥ । त꣢म꣡न्धाऽ२३४सा꣥: । दि꣢वा꣡इसाऽ२३४द्भू꣥ ॥ मि꣢या꣡꣯ददाइ ॥ उ꣢ग्र꣡ꣳशाऽ२३र्मा꣢ ॥
महा꣡ये꣢ऽ३ । श्रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ५)(२)॥ द्रु ॥ ८१५ ॥

४६७-३ ऋषभः पावमानम्।   ऋषभो गायत्री सोमः ॥
हा꣥꣯हा꣯उच्चा꣯ते꣯जा ॥ हा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३इ । ता꣡माऽ२᳐न्धा꣣ऽ२३४सा꣥: । दि꣢वि꣡सद्भू꣯मिया꣢ऽ१दा꣢ऽ३दे꣢ ॥
उग्रꣳशा꣣ऽ२३४र्मा꣥ ॥ ओ꣡मो꣢ऽ३ । म꣤होवा꣥ । श्रा꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ४)(३)॥ भी ॥ ८१६ ॥

४६७-४ आभीकम्।   अङ्गिरसो गायत्री सोमः ॥
ऊ꣡ऽ२३४च्चा꣯ते꣯जाऽ५ । तमौ꣯हो꣤न्धासा꣥: ॥ दि꣢वि꣡सद्भू꣯मिया꣢ऽ१दा꣢ऽ३दे꣢ ॥ उग्र᳐ꣳशा꣣ऽ२३४र्मा꣥ ॥
मा꣡हा꣭ऽ३उवा꣢ऽ३४३ । श्रा꣢ऽ३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ३)(४)॥ ति ॥ ८१७ ॥

४६७-५ बाभ्रवे द्वे।   द्वयोः बभ्रुर्गायत्री सोमः ॥
उ꣥च्चा꣯ते꣯जा ॥ त꣢म꣡ । धासाऽ२३ः । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ । दि꣡विस꣢द्भू꣯ । मिया꣡दा꣢ऽ१देऽ२३ ॥ ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ ॥
उग्रा꣡ꣳशा꣢ऽ१र्माऽ२३ ॥ ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ऽ३ । मा꣡ऽ२᳐हा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ श्र꣢वऽ३ई꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ३)(५)॥ टि ॥ ८१८ ॥

४६७-६ ग्वानिधनबाभ्रवम्।
उ꣥च्चा꣯ते꣯जा ॥ त꣢म꣡न्धाऽ२३सा꣢: । दि꣡विस꣢द्भू꣯ । मिया꣡꣯दाऽ२३दा꣢इ ॥ ऊ꣡ग्रा꣢ऽ३ꣳहा꣢इ । शा꣡र्मा꣢ऽ३हा꣢इ ॥
म꣣हा꣢ऽ३हो꣡ये꣢ऽ३ । श्रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ग्वा꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(६)॥ घू ॥ ८१९ ॥

४६७-७ इन्द्राण्याः साम।   इन्द्राणी गायत्री सोमः ॥
उ꣥च्चा꣤꣯ ते꣥꣯जा꣯त꣤मा । धा꣡साऽ२३ः । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ । दि꣡विस꣢द्भू꣯ । मिया꣡दा꣢ऽ१ देऽ२३ । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ ।
उग्रा꣡ꣳशा꣢ऽ१र्माऽ२३ । ओ꣡꣯मो꣭ऽ३वा꣢ । महा꣡ये꣢ऽ३ । श्रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ २)(७)॥ त्ला ॥ ८२० ॥

४६७-८ शैशवे द्वे।   द्वयोः शिशुर्गायत्री सोमः ॥
उ꣥च्चा꣯ते꣯जा꣯तमन्धा꣤सा꣥: ॥ दि꣢वि꣡सद्भू꣯म्या꣯ददाइ ॥ उ꣢ग्र꣡ꣳशाऽ२३४र्मा꣥ ॥ म꣣हा꣢ऽ३इश्रा꣤ऽ५᳚वाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ५। प॰ ४। मा॰ ४)(८)॥ भी ॥ ८२१ ॥

४६७-९
उ꣥च्चा꣯ते꣯जा꣯तमन्धाऽ६सा꣥: ॥ दि꣢वि꣡सद्भू꣯ । म्या꣯दाऽ२३दा꣢इ । उ । ग्र꣡ꣳशाऽ२३र्मा꣢ ॥ म꣡हाऽ२ ।
हाऽ२इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ । श्रवाऽ२: । हाऽ२इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ ॥
इ꣣या꣢ऽ३हो꣡इ । इ꣣योऽ२३४५वाऽ६५६ ॥ ऊ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ १४। मा॰ ८)(९)॥ र्भै ॥ ८२२ ॥

४६७-१० दोहसामनी द्वे।   द्वयोः प्रजापतिर्गायत्री सोमः ॥
उ꣣च्चा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ ते꣡जाऽ२᳐ । त꣣मा꣢ऽ३४५ । धा꣣ऽ२३४सा꣥: । दि꣢वि꣡सद्भू꣯म्या꣯ददे꣢꣯ ॥
ऊ꣡ग्र꣪ꣳशाऽ२३र्मा꣢ ॥ म꣣हिश्र꣢वा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ ॥ हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ३)(१०)॥ मि ॥ ८२३ ॥

४६७-११ दोहीयसाम।
उ꣥च्चा꣯ते꣯जा꣯तमन्धसो꣯दो꣯हा꣯इदो꣯हाऽ६ए꣥ ॥ दि꣢वि꣡सद्भू꣯म्या꣯ददे꣢꣯ । दो꣭ऽ३हा꣢इ । दो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ए꣢ ॥
उग्र꣡ꣳशाऽ२३र्मा꣢ । दो꣭ऽ३हा꣢इ । दो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ए꣢ ॥ महि꣡श्राऽ२३ वा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ ८)(११)॥ मै ॥ ८२४ ॥

४६७-१२ इन्द्राण्याः साम।   इन्द्राणी गायत्री सोमः ॥
उ꣣च्चा꣢ ᳐ते꣣꣯ जा꣤꣯तम꣥न्धसाः ॥ दि꣢वा꣡इसाऽ२३४द्भू꣥ । मि꣢याऽ२द꣡दे꣢꣯ । ओ꣡꣯म् । ओ꣭ऽ३वा꣢ । ओ꣭ऽ३वा꣢ ।
व꣡वाऽ२३हो꣡इ ॥ उ꣢ग्र꣡ꣳशाऽ२३र्मा꣢ । ओ꣭ऽ३वा꣢ । ओ꣭ऽ३वा꣢ । व꣡वाऽ२३हो꣡इ ॥ म꣢हि꣣श्र꣢वो꣡ऽ२᳐ ।
या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ य꣢युरे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १४। मा॰ ६)(१२)॥ घू ॥ ८२५ ॥

४६७-१३ आमहीयवम्।   अमहीयुर्गायत्री सोमः ॥
उ꣥च्चा꣯ता꣢ऽ३इजा꣤꣯तम꣥न्धसाः ॥ दि꣢वा꣡इसा꣢ऽ१द्भूऽ२ । मि꣡याऽ२३ददा꣢इ ॥ उग्र꣡ꣳश꣢र्मा꣡ ॥
महाऽ२३इश्रवा꣢उ । वाऽ३ ॥ स्तौ꣢꣯षेऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ६)(१३)॥ ठू ॥ ८२६ ॥
४६८-१ आजिगम्।   अजिगो गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
स्वा꣡꣯दाइष्ठाया꣢ । म꣡दाइष्ठाया꣢ ॥ प꣡वस्व꣢सो꣯ । मा꣡धा꣢ऽ१राऽ२३या꣢ ॥ इ꣡न्द्रायापा꣢ ।
तवा꣡इसूऽ२३ता꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ५)(१४)॥ जु ॥ ८२७ ॥

४६८-२ सुरूपे द्वे।   द्वयोः सुरूपोगायत्री सोमेन्द्रौ ॥
स्वा꣢꣯दिष्ठ꣡याऽ२ । इ꣡याऽ२इ꣡या । म꣢दिष्ठा꣡याऽ२ ॥ पवस्व꣡सोऽ२ । इ꣡याऽ२इ꣡या । म꣢धा꣯रा꣡याऽ२ ॥
इन्द्रा꣯य꣡पाऽ२ । इ꣡याऽ२इ꣡या ॥ त꣢वा꣡इसूऽ२३ता꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ६)(१५)॥ टू ॥ ८२८ ॥

४६८-३ सुरूपोत्तरम्।
स्वा꣢꣯दिष्ठ꣡यौहोऽ२ । इ꣡या । म꣢दिष्ठा꣡याऽ२ ॥ पवस्व꣡सौहोऽ२ । इ꣡या । म꣢धा꣯रा꣡याऽ२ ॥
इन्द्रा꣯य꣡पौहोऽ२ । इ꣡या ॥ त꣢वा꣡इसूऽ२३ता꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ३)(१६)॥ टि ॥ ८२९ ॥

४६८-४ जमदग्नेः शिल्पे द्वे।   द्वयोः जमदग्निर्गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
ओ꣢इ᳐स्वा꣣ऽ२३४दी꣥ ॥ ष्ठ꣢या꣯ऽ३मा꣡दि꣪ष्ठया꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । प꣡वस्व꣢सो꣯म धा꣡꣯रया꣢ऽ᳐३ ॥
ओ꣢ ᳐ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥ ॥ या꣡ऽ२᳐पा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ त꣢वे꣯सु꣣ता꣢ऽ१ः ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ४)(१७)॥ खी ॥ ८३० ॥

४६८-५
उ꣣हुवा꣢इ᳐ । स्वा꣣ऽ२३४दी꣥ ॥ ष्ठ꣢या꣯ऽ३मा꣡दि꣪ष्ठया꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । प꣡वस्व꣢सो꣯मधा꣡꣯रया꣢ऽ᳐३ ॥
उहुवा꣢इ । इ꣤न्रा꣣ऽऽ५यपा ॥ ता꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ४)(१८)॥ भी ॥ ८३१ ॥

४६८-६ सꣳहितम्।   सꣳहितः साध्या देवा गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
स्वा꣤꣯दाइष्ठ꣥या ॥ म꣢दिष्ठयाऽ३ । पा꣡वा꣢ऽ३स्वा꣤सो꣥ । म꣢धा꣯रयाऽ३ ॥ आ꣡इन्द्रा꣢ऽ३ या꣤पा꣥ऽ६ ।
हा꣥उ ॥ त꣤वाऽ५इसुताउ ॥ वा ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ५)(१९)॥ जु ॥ ८३२ ॥

४६८-७ शकुलः।   वसिष्ठो गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
स्वा꣤꣯दि꣥ष्ठया꣯म꣤दि꣥ष्ठया꣯प꣤व꣥स्वसो꣯मधा꣤꣯र꣥या꣯इ꣤ । द्राऽ५यपा꣤ ॥ त꣢वाऽ२इ । ऊऽ२ । तवाऽ२इ ।
ऊ꣡ऽ२᳐ ॥ त꣣वा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा । सू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ५)(२०)॥ डु ॥ ८३३ ॥

४६८-८ गंभीरम्।   जमदग्निर्गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
औ꣥꣯हो꣯हि꣯म्(स्थि)हा꣯ए꣤हिया꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ । स्वा꣡꣯दाइष्ठाया꣢ ᳐ । मा꣣ऽ२३४दी꣥ ॥ ओ꣢इ᳐मा꣣ऽ२३४दी꣥ ॥
औ꣯हो꣯हि꣯म्(स्थि)हा꣯ए꣤हिया꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ । ष्ठ꣡यापाव꣢ । स्वा꣣ऽ२३४सो꣥ ॥ ओ꣢ ᳐स्वा꣣ऽ२३४सो꣥ ॥
औ꣯हो꣯हि꣯म्(स्थि)हा꣯ए꣤हिया꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ । म꣡धारया꣢ ᳐ । ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥ । ओ꣢ ᳐ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥ ॥
औ꣯हो꣯हि꣯म्(स्थि)हा꣯ए꣤हिया꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ । य꣡पातवा꣢इ । सू꣣ऽ२३४ता꣥: । ओ꣢इ᳐सू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥
औ꣯हो꣯हि꣯म्(स्थि) हा꣯ए꣤हिया꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा । ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २३। प॰ २४। मा॰ २१)(२१)॥ ढृ ॥ ८३४ ॥

४६८-९ सꣳहितम्।   संहितः साध्या देवा गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
स्वा꣤꣯दि꣥ष्ठया꣯म । दा꣤ऽ५इष्ठया꣤ ॥ प꣢वाऽ२ । स्वा꣡ऽ२३सो꣢ । म꣡धाऽ२रा꣡या ॥ आऽ२३इन्द्रा꣢ ॥
याऽ२पा꣡ । त꣪वाऽ२३ ॥ हा꣢उवाऽ३ ॥ सूऽ२३४ता꣥: ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ४)(२२)॥ ञी ॥ ८३५ ॥
४६९-१ सोम सामनी द्वे।   द्वयोः सोमो गायत्त्री सोमौ इन्द्रो वा ॥
वृ꣥षा꣯पवा ॥ स्व꣢धा꣯रा꣡याऽ२ । मरु꣡त्वताइ । चमत्साऽ२३रा꣥: ॥ वा꣡इश्वा ऽ२३ ॥
दा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ न꣢ओ꣡꣯जसा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ५)(२३)॥ फु ॥ ८३६ ॥

४६९-२
वृ꣤षाहा꣥उ ॥ पा꣣ऽ२३४वा꣥ । स्वा꣢धा᳐रा꣣ऽ२३४या꣥ । मा꣣ऽ२३४रू꣥ । त्वा꣣ऽ२३४ ता꣥इ ।
चा꣢म᳐त्सा꣣ऽ२३४रा꣥: ॥ वा꣡इश्वा꣢꣯दधा꣡ऽ२३ ॥ ना꣡ऽ२᳐ओ꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ जा꣣ऽ२३४सा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ६)(२४)॥ ढू ॥ ८३७ ॥

४६९-३ आशुभार्गवम्।   भृगुर्गायत्रीन्द्र सोमौ इन्द्रो वा ॥
वृ꣤षा꣥꣯पव꣤ । स्व꣥धा꣯राऽ६या꣥ ॥ मा꣡रुत्वता꣢ऽ३इ । चा꣡माऽ२᳐त्सा꣣ऽ२३४रा꣥: ॥ वि꣡श्वादा꣢ऽ१धाऽ२᳐ ॥
न꣣ओ꣢ऽ३ । जा꣡ऽ२३४सो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ४)(२५)॥ छी ॥ ८३८ ॥

४६९-४ वैश्वदेवे द्वे।   द्वयोर्विश्वेदेवा गायत्रीन्द्रसोमौ इन्द्रो वा ॥
आ꣤इवृ꣥षा꣤ ॥ प꣢वा꣡ । इ꣣हा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ । स्वधा꣡꣯राऽ२३४या꣥ । म꣢ । रू꣡ । त्वते꣢ऽ३हा꣢इ । च । मा꣡ ।
त्स꣪राऽ२३हा꣢ऽ३४इ ॥ वि꣥श्वा꣯दधा꣯हाउ । नओ꣯जसा꣯हाउ ॥ ओ꣢꣯वाऽ३४३ओ꣢ऽ३४५वाऽ६५६ ॥
अ꣢स्मे꣡꣯रा꣯या꣰꣯ऽ२उत꣡श्रवाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ९। प॰ १५। मा॰ ९)(२६)॥ नो ॥ ८३९ ॥

४६९-५
वृ꣥षा꣯ । प꣣वा꣢ऽ३ । ए꣤हिया꣥ ॥ स्व꣢धा꣡ऽ२᳐ । र꣣या꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । मा꣡रू꣢ऽ३४ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥
त्व꣡ते꣯चमा꣢ऽ१त्सा꣢ऽ३रा꣥: ॥ औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१ये꣢ऽ३ । औ꣯होऽ२३४५ वाऽ६५६ ॥
वि꣡श्वा꣢꣯द꣡धा꣢꣯नओ꣡꣯जसा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ ११। मा॰ ३)(२७)॥ पि ॥ ८४० ॥

४६९-६ इन्द्र सामनी द्वे।   द्वयोरिन्द्रो गायत्रीन्द्रसोमौ इन्द्रो वा ॥
वृ꣡षापावाऽ२३ । हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ स्व꣡धारायाऽ२३ । हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
म꣡रूत्वातेऽ२३ । हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ । च꣡मात्सारा ऽ२३ः । हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३होऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
वि꣡श्वादाधाऽ२३ । हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३ होऽ२३꣡४꣡५꣡ । न꣡ओजासाऽ२३ । हौ꣡꣯होइ । औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३४३ ॥
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ २०। मा॰ ९)(२८)॥ ङो ॥ ८४१ ॥

४६९-७
वृ꣢षा꣡पावा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ । स्व꣢धा꣡राया꣢ ᳐ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ म꣢रू꣡त्वाता꣢ ᳐ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ ।
च꣢मा꣡त्सारा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ वि꣢श्वा꣡दाधा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ ॥ न꣢ओ꣡जासा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हौ꣯होऽ२३४वा꣥ ॥
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १२। प॰ १४। मा॰ २)(२९)॥ झा ॥ ८४२ ॥

४६९-८ यौक्ताश्वे द्वे।   द्वयोर्युक्ताश्वो गायत्री सोमः इन्द्रो वा (यौक्ताश्वाद्यम्) ॥
औ꣥꣯हो꣤होहा꣥इ । वृ꣤षा꣥ ॥ प꣢वस्वऽ३धा꣡राया꣢ऽ३ । मा꣡रूऽ२᳐त्वा꣣ऽ२३४ता꣥इ । ओ꣡इ । च꣪माऽ२३ ।
च꣡माऽ२᳐त्सा꣣ऽ२३४रा꣥: ॥ औ꣯हो꣤होहा꣥इ । वि꣤श्वा꣥ ॥ द꣡धाऽ२᳐ना꣣ऽ२३४ओ꣥ । जा꣢ ᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ओ꣢इ । ज्वर꣣आ꣢ ॥
(दी॰ ४। प॰ १३। मा॰ ९)(३०)॥ दो ॥ ८४३ ॥

४६९-९ यौक्ताश्वोत्तरम्।
वृ꣥षा꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ ॥ प꣢वऽ३स्वा꣡धा꣢ऽ१राया꣢ऽ३ । मा꣡रूऽ२᳐त्वा꣣ऽ२३४ता꣥इ । च꣣मा꣢ऽ३ । ओ꣡इ ।
च꣪माऽ२᳐त्सा꣣ऽ२३४रा꣥: ॥ विश्वा꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ ॥ द꣡धाऽ२᳐ना꣣ऽ२३४ओ꣥ ।
जा꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ओ꣢इ᳐ । जू꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ १०)(३१)॥ कौ ॥ ८४४ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने द्वादशः प्रपाठकः ॥ १२ ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — त्रयोदशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ प्रथमः खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-७, सा-३८)

४७०-१ भासम्।   अत्रिर्गायत्री सोमः ॥
या꣤स्ता꣥इ ॥ मा꣡दो । वारा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । णी꣣ऽ२३४या꣥: । ता꣤इना꣥ ॥ पा꣡वा ।
स्वा꣢꣭ऽ३आ꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । धा꣣ऽ२३४सा꣥ ॥ दा꣤इवा꣥ ॥ वा꣡इरा । घाश꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
सा꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ १२। मा॰ ९)(१)॥ यो ॥ ८४५ ॥

४७०-२ सोम साम।   सोमो गायत्री सोमः ॥
य꣤स्तेम꣥दाः ॥ व꣢रा᳐इणि꣣या꣢: । ता꣡इनापावा꣢ऽ३स्वा꣢ऽ३ । अ꣢न्ध꣣सा꣢ ॥ दा꣡इवावाइरा꣢ऽ३४ । हा꣥उ ॥
घ꣤शाऽ५ꣳसहा । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ ९। मा॰ १८)(२)॥ लै ॥ ८४६ ॥

४७०-३ प्राजापत्यम्।   प्रजापतिर्गायत्री सोमः ॥
य꣣स्ता꣢ऽ३२᳐इमा꣣ऽ२३४दा꣥: ॥ व꣢रा꣡इणाया꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४ वा꣥ । हा꣢इ ।
ता꣡इना꣯प꣢व । स्वआ꣡न्धासा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢इ ॥ दा꣡इवावाइरा꣢ ᳐ ।
ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ऽ३इ ॥ घा꣡ऽ२᳐शा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣢हो꣯रयिऽ३ष्ठा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ४। प॰ १९। मा॰ १२)(३)॥ धा ॥ ८४७ ॥

४७०-४ सोम साम।   सोमो गायत्री सोमः ॥
य꣢स्ता꣡इमाऽ२३दो꣤꣯वरे꣥꣯णियाः ॥ ता꣡इना꣯प꣢व । स्वआ꣡न्धा꣢ऽ१साऽ२ ॥ दा꣡इवाऽ२वा꣡इराऽ२३ ॥
घ꣢शो꣡ऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ ७)(४)॥ टे ॥ ८४८ ॥

४७०-५ भासम्।   अत्रिर्गायत्री सोमः ॥
य꣥स्ते꣯ । मा꣢ऽ३दो꣤ । वा꣥ । ई꣤या꣥ ॥ रा꣡इणा꣢ऽ१याऽ२: । ता꣡इना꣯प꣢व । स्व । औ꣭ऽ३हो꣢꣯ । वा꣣꣯हा꣢ ।
ध꣡साऽ२ ॥ दा꣡इवाऽ२३ ॥ वा꣡ऽ२᳐इरा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ घ꣢शꣳस꣣हा꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ ६)(५)॥ गू ॥ ८४९ ॥

४७०-६ अध्यर्द्धेडꣳसोम साम।   सोमो गायत्री सोमः ॥
य꣥स्ते꣯मदो꣯वरे꣯णियाऽ६ए꣥ ॥ ते꣢꣯ ना꣡꣯पवस्वा꣯न्धसा ॥ दे꣢꣯ वा꣡꣯वी꣯राऽ२३ । हा꣢इ ॥ घा꣡शा꣢उवा ।
सा꣡हा꣢उवाऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ ७। मा॰ ४)(४)॥ थ्ली ॥ ८५० ॥
४७१-१ वैष्टम्म्भे द्वे।   द्वयोर्विष्टंभो वा देवा गायत्री सोमः ॥
ति꣥स्रो꣯वा꣯चाः ॥ उ꣡दाइ । उ꣢दाऽ३१उ । वाये꣢ऽ३ । राऽ२३४ते꣥ ॥ गा꣯वो꣯मिमा ॥ ति꣢धा꣡इ ।
ति꣢धाऽ३१उ । वाये꣢ऽ३ । नाऽ२३४वा꣥: ॥ हरिरे꣯ती ॥ क꣢ना꣡इ । क꣢नाऽ३१उ । वाये꣢ऽ३ ॥
क्राऽ२३४दा꣥त् ॥
(दी॰ ५। प॰ १५। मा॰ ९)(७)॥ मो ॥ ८५१ ॥

४७१-२
ति꣥स्रो꣯वा꣯चाः ॥ उ꣡दाइरा꣢ऽ३ते꣢ । गा꣡꣯वो꣯मिमन्तिधा꣢ऽ१इना꣢ऽ३वा꣢: । हरिरे꣯तो꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥
का꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्रा꣣ऽ२३४दा꣥त् ॥
(दी॰ ७। प॰ ६। मा॰ ७)(८)॥ चे ॥ ८५२ ॥

४७१-३ पाष्ठौहे द्वे।   द्वयोः पष्ठवाड् गायत्री सोमः ॥
ति꣢स्रो꣯वा꣡चोऽ२३४हा꣥इ ॥ उ꣢दी꣯र꣡ताइ । गा꣢꣯वो꣯मि꣡माऽ२३४हा꣥ ॥ ति꣢धे꣯न꣡वाः ॥ ह꣢रिरा꣡इतोऽ२३४हा꣥इ ॥
क꣢ना꣡ये꣢ऽ३ । क्रा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢स्म꣡भ्यं ꣢गा꣯तुवि꣡त्त꣢मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ७)(१)॥ डे ॥ ८५३ ॥

४७१-४
ति꣥स्रो꣤꣯वा꣯च꣥उ꣤दी꣥꣯रतो꣤ । वाहा꣥इ ॥ गा꣢꣯वो꣯मिमाऽ३ । ती꣡धे꣢ ᳐ना꣣ऽ२३४वा꣥: ॥ हा꣤री꣥रा꣤इती꣥ ॥
का꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्रा꣣ऽ२३४दा꣥त् ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ ६)(१०)॥ छू ॥ ८५४ ॥

४७१-५ क्षुल्लक वैष्टंभम्।   विष्टंभो वा देवा गायत्री सोमः ॥
ति꣤स्रो꣣ऽ५वा꣯ । चा꣤ऽ३उ꣢दी꣣꣯र꣥ताइ ॥ गा꣡वो꣯मि꣢म । तिधा꣡इना꣢ऽ१वाऽ२३ः । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥
ह꣡राइरा꣢ऽ१इतीऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ कना꣡ये꣢ऽ३ । क्रा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ दी꣣ऽ२३४शा꣥: ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ १०)(११)॥ मौ ॥ ८५५ ॥

४७१-६ पाष्ठौहम्।   पष्ठवाड्गायत्री सोमः ॥
ति꣤स्रो꣯वा꣯चाऽ५उदी꣯र꣤ताइ ॥ गा꣢꣯ वो꣡꣯मिमन्ति꣢धे꣡꣯नवः । हरिराऽ२३इती꣢ ॥ कनौऽ२ । हु꣡वाइ ।
हो꣭ऽ३वा꣢ऽ३ ॥ क्रा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ हा꣢꣯ओ꣡वा꣢ । ओ꣡वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ७)(१२)॥ धे ॥ ८५६ ॥
४७२-१ इषो वृधीयम्।   इषावृधीयो गायत्रीन्द्रसोमौ ॥
इ꣥न्द्रा꣯ये꣯न्दाउ ॥ म꣢रुत्व꣡ताइ । प꣢वस्वा꣡माऽ२ । धुमत्त꣡माः ॥ अ꣢र्कस्या꣡योऽ२ ॥ निमा꣡ऽ२३ ।
सा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ इ꣢षो꣡꣯वृधे꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ४)(१३)॥ बी ॥ ८५७ ॥

४७२-२ इन्द्रसाम।   इन्द्रो गायत्रीन्द्रसोमौ इन्द्रो वा ॥
आ꣣ऽ२३४इन्द्रा꣥ । या꣣ऽ२३४इन्दो꣥ ॥ म꣢रू꣡त्वते꣢ऽ३ । पाऽ२३४वा꣥ । स्वा꣣ऽ२३४मा꣥ । धु꣢मा꣡त्तमा꣢ऽ३ः ॥
आऽ२३४र्का꣥ ॥ स्या꣣ऽ२३४यो꣥ ॥ नि꣢मा꣡꣯स꣢दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ १। प॰ ९। मा॰ ४)(१४)॥ घी ॥ ८५८ ॥

४७२-३ वैश्वदेवे द्वे।   द्वयोर्विश्वेदेवागायत्रीन्द्रासोमौ इन्द्रो वा ॥
इ꣢न्द्रा꣯या꣡इन्दोऽ२३ । हा꣡ऽ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣢ । मरुत्वा꣡तेऽ२३ । हा꣡ऽ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣢ ॥ पवस्वा꣡माऽ२३ ।
हा꣡ऽ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣢ । धुमत्ता꣡माऽ२३ः । हा꣡ऽ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣢ ॥ अर्कस्या꣡योऽ२३ । हा꣡ऽ ।
औ꣢ऽ३हो꣯वा꣢ । निमा꣯सा꣡दाऽ२३म् । हा꣡ऽ । औ꣢ऽ३हो꣯वा꣢ऽ३४३ ॥ ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ २०। मा॰ ४)(१५)॥ णी ॥ ८५९ ॥

४७२-४
इ꣤न्द्रा꣥꣯ये꣯न्दो꣯ । ए꣤ऽ५ । म꣤रू ॥ त्व꣡ताइ । पवस्वमधु꣢म꣡त्ताऽ२३माः꣢ । हुवा꣡इ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥
अर्का꣡स्याऽ२३यो꣢ । हुवा꣡इ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ निमा꣡꣯साऽ२३ दा꣢ऽ३४३म् । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १३। मा॰ ६)(१६)॥ ढू ॥ ८६० ॥

४७२-५ आग्नेये द्वे।   द्वयोरग्निर्गायत्रीन्द्रासोमौ इन्द्रो वा ॥
इ꣥न्द्रा꣯ये꣯न्दो꣯हाउ ॥ म꣢ । रू꣡ । त्वते꣢ऽ३हा꣢उ । प꣡वस्व꣢मधु । मा꣡ । त꣪माऽ२३ हा꣢उ । अ । का꣡ ।
स्य꣪योऽ२३हा꣢ऽ३इ ॥ नि꣡माऽ२३ । होऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ १३। मा॰ ५)(१७)॥ डु ॥ ८६१ ॥

४७२-६
इ꣥न्द्रा꣯ये꣯न्दो꣤वा꣥ । ओ꣤वा꣥ ॥ म꣢रुत्व꣡तोवा꣢ । ओ꣡वा꣢ । पवस्व꣡मोवा꣢ । ओ꣡वा꣢ । धुमत्त꣡मोवा꣢ । ओ꣡वा꣢ऽ३ ॥
अ꣤र्काहा꣥उ । स्य꣤योहा꣥उ ॥ नि꣢मो꣡वा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ १२। मा॰ ४)(१८)॥ छी ॥ ८६२ ॥

४७२-७ वैश्वदेवम्।   विश्वेदेवा गायत्रीन्द्रासोमौ इन्द्रो वा ॥
इ꣤न्द्रा꣥꣯ये꣯न्दो꣯मरु꣤त्व꣥ते꣯ । ओ꣤हाइ ॥ प꣡वस्व꣢म꣡धु꣢मत्तमः । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३४३ । ओ꣢ऽ३४हा꣥ ॥
आ꣡र्क꣪स्यायोऽ२३ ॥ ना꣡ऽ२᳐इमा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣢प् । सा꣣ऽ२३४दा꣥म् ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(१९)॥ घू ॥ ८६३ ॥

४७२-८ आग्नेयम्।   अग्निर्गायत्रीन्द्रासोमौ इन्द्रो वा ॥
इ꣥न्द्रा꣯ये꣯न्दो꣯मरुत्वाऽ६ता꣥इ ॥ प꣡वस्व꣢म । धुमा꣡त्ता꣢ऽ१माऽ२३४ः ॥ अ꣥र्कस्य यो꣯निमाऽ६हा꣥उ ।
सा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ५। मा॰ ४)(२०)॥ नी ॥ ८६४ ॥
४७३-१ शैशवानि चत्वारि।   चतुर्णां शिशुर्गायत्री श्येनसोमौ ॥
आ꣤सा꣥ ॥ वि꣡यꣳशु꣢र्माऽ३१उवाऽ२३ । दाऽ२३४या꣥ । आ꣤प्सू꣥दा꣤क्षा꣥: । गि꣢राऽ३१उवाये꣢ऽ३ ।
ष्ठाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ श्ये꣢꣯ नो꣡꣯नाऽ२३यो꣢ । निमाऽ३१उवाऽ२३ ॥ साऽ२३४दा꣥त् ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ६)(२१)॥ झू ॥ ८६५ ॥

४७३-२
अ꣤सा꣥꣯विया꣤ ॥ शू꣡र्म꣪दाऽ२ । य । आ꣡प्सू꣪दाक्षाऽ२: । गा꣡इरिष्ठा꣢꣯: ॥ श्या꣡इनो꣢ऽ१नायोऽ२३ ॥
नि꣢मो꣡ऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ५)(२२)॥ जु ॥ ८६६ ॥

४७३-३
अ꣥सा꣯ । वि꣣या꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ शू꣡र्म꣪दाया꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । आ꣡प्सा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ द꣡क्षो꣯गिराइ ।
ष्ठा꣢ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ श्ये꣢꣯ नो꣡꣯नयो꣯निमा꣯स꣢दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡त् ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ५)(२३)॥ गु ॥ ८६७ ॥

४७३-४
अ꣥सा꣯ । वि꣣यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ शु꣢र्म꣡दायौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । अप्सू । द꣣क्षौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
गि꣡राइ । ष्ठौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । श्ये꣯नः । न꣣यौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ नि꣡मा । सादौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १४। मा॰ ९)(२४)॥ झो ॥ ८६८ ॥

४७३-५ च्यावनानि चत्वारि।   चतुर्णां च्यवनो गायत्री श्येना सोमौ ॥
अ꣤सा꣥꣯ । व्युहु꣤वाहा꣥इ ॥ अ꣢ꣳशु꣡र्मदा꣯या꣯प्सुदक्षो꣯गिरिष्ठा꣯उहुवाऽ२३हो꣡इ ॥ श्याऽ२३इनो꣢ऽ३ ॥
ना꣡ऽ२᳐यो꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ नि꣢मा꣡꣯स꣢दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡त् ॥
(दी॰ ८। प॰ ६। मा॰ ६)(२५)॥ टू ॥ ८६९ ॥

४७३-६
अ꣤सा꣥꣯व्यꣳशुः꣤ । औ꣥꣯हो꣤वाहा꣥इ ॥ म꣡दाऽ२३या꣢ । आ꣡प्सुद꣢क्षो꣯गिरिष्ठाः꣯ । श्या꣡इनोना꣢ऽ३यो꣢ऽ३ ॥
ना꣡ऽ२᳐इमा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣢प् । सा꣣ऽ२३४दा꣥त् ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ८)(२६)॥ गै ॥ ८७० ॥

४७३-७
इ꣣हा꣢ऽ३१२३४ । इहा꣯ । सा꣥꣯व्यꣳशु꣤र्मदा꣥꣯य । इ꣤हा ॥ अ꣢प्सु꣡दक्षो꣯गिरिष्ठा꣢ऽ३४५ः । ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
श्ये꣢꣯ नो꣡꣯नयोऽ२᳐नि꣣मा꣢ऽ३४५ । ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ आ꣡ऽ२᳐स꣣दा꣢ऽ३४५त् ॥ ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ २)(२७)॥ ङा ॥ ८७१ ॥

४७३-८
अ꣣साऽ२३४ । विय꣥ꣳशुः । म꣣दाऽ२३४या꣥ऽ६ । हा꣥उ ॥ आ꣢प्सू᳐दा꣣ऽ२३४क्षा꣥: ।
गि꣢रा꣡इष्ठाऽ२३४हा꣥इ ॥ श्या꣡इनोना꣢ऽ३यो꣢ऽ३ । ना꣡इमाऽ२३हा꣢ऽ३४३इ । सा꣡ऽ२३४दो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ ९। मा॰ ९)(२८)॥ लो ॥ ८७२ ॥
४७४-१ प्राजापत्ये द्वे।   द्वयोः प्रजापतिर्गायत्री मरुद्वायू ॥
प꣤व꣥स्वदौ꣯ । हौ꣤꣯होवाहा꣥इ ॥ क्षा꣡सा꣢꣯धना꣭ऽ३ः । औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३४इ । औ꣯हो꣥꣯ । वा꣣꣯हा꣢इ । दे꣯वे꣡꣯ भ्य꣢ᳲपा꣡इ ।
त꣢ये꣣꣯ह꣢रा꣭ऽ३इ । औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३४इ । औ꣯हो꣥꣯ । वा꣣꣯हा꣢इ ॥ मरु꣡द्भ्यो꣢꣯वा꣭ऽ३ । औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३४इ ।
औ꣯हो꣥꣯ । वा꣣꣯हा꣢ऽ३इ ॥ या꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४ औ꣥꣯हो꣯वा ॥ मा꣣ऽ२३४दा꣥: ॥
(दी॰ १८। प॰ १७। मा॰ १२)(२९)॥ ठा ॥ ८७३ ॥

४७४-२
प꣤व꣥स्वदक्षसा꣤꣯ध꣥नः । ओऽ६वा꣥ ॥ दे꣢꣯ वे꣡꣯भ्य:पी꣯तयाऽ२ओ꣡इ । ह꣢राऽ२इ ॥ मरु꣡द्भ्यो꣢꣯वाऽ२ । ओ꣡ऽ२३ ॥
य꣤वोवा꣥ । मा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ५)(३०)॥ बु ॥ ८७४ ॥
४७५-१ वैदन्वतानि चत्वारि।   चतुर्णां विदन्वान्गायत्री सोमः ॥
पा꣤री꣥ ॥ स्वा꣢꣯नो꣯गिरिष्ठा꣯: । पवा꣡ऽ२᳐इत्रे꣣ऽ२३४सो꣥ । मो꣢꣯अक्षा꣡राऽ२त् ॥ म꣡दाइषूसा꣢ऽ३ ।
ई꣭ऽ३या꣢ऽ३ ॥ र्व꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(३१)॥ ढू ॥ ८७५ ॥

४७५-२
प꣤ । र्येपारी꣥ ॥ स्वा꣢꣯नो꣯गिरिष्ठा꣯: । पवा꣡ऽ२᳐इत्रे꣣ऽ२३४सो꣥ । मो꣢꣯अक्षा꣡राऽ२त् ॥ म꣡दाइषूसा꣢ऽ३हा꣢ऽ३ ॥
र्वा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । अ꣡सी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(३२)॥ घू ॥ ८७६ ॥

४७५-३
पा꣣ऽ५रि । स्वा꣯नो꣤ऽ३गा꣢ऽ३इरि꣤ष्ठा꣥: ॥ प꣢वि꣡त्रे꣢꣯सो꣡ । मो꣢꣯अ꣣क्ष꣢रा꣡त् । प꣢वि꣡त्रे꣢꣯ । सो꣡मोऽ२३ ।
क्षा꣤रा꣥त् । ओ꣡इ । मदौ꣢ । वाऽ३४३ओ꣢ऽ३४वा꣥ । षुवा꣤ ॥ स꣢र्वधा꣡꣯: । असाये꣢ऽ३ ।
मा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । षु꣢सर्वधा꣡꣯असी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ १६। मा॰ १०)(३३)॥ टौ ॥ ८७७ ॥

४७५-४
औ꣭ऽ३हो꣢इ । इ꣡ह꣢हा꣣꣯ह꣢हा꣡इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । प꣢राइस्वा꣣ऽ᳐२३४नो꣥ । गि꣢रा꣣ऽ२३४इष्ठा꣥: ॥
पा꣢वित्रे꣣ऽ२३४सो꣥ । मो꣢अक्षा꣣ऽ२३४रा꣥त् ॥ म꣢दाइषू꣣ऽ२᳐३४ सा꣥ । र्व꣢धाआ꣣ऽ२᳐३४सी꣥ ॥ औ꣭ऽ३हो꣢इ ।
इ꣡ह꣢हा꣣꣯ह꣢हा꣡इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४५वा ऽ६५६ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । उ꣡पा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २। प॰ १४। मा॰ )(३५)॥ झ ॥ ८७८ ॥

४७५-५ आङ्गिरसस्य रजेः पदस्तोभौ द्वौ।   द्वयोराजिर्गायत्री सोमः ॥
प꣤ । र्येस्वाना꣥: ॥ गा꣡ऽ२इ । रिष्ठाऽ२या꣡ । हा꣣꣯हा꣢इ । उ꣡वाऽ२३हो꣡꣡इ । पावित्रेसो꣢ । मो꣡अ꣪क्षाराऽ२᳐त् ।
हा꣣꣯हा꣢इ । उ꣡वाऽ२३हो꣡इ ॥ मदाऽ२᳐इषु꣣सा꣢ । हा꣣꣯हा꣢इ । उ꣡वाऽ२३हो꣡ ॥ र्व꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
आ꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ १५। मा॰ ११)(३५)॥ ण ॥ ८७९ ॥

४७५-६
प꣥र्यौ꣯हो꣯वा꣯हा꣯इस्वा꣤ना꣥: ॥ गा꣡ऽ२इ । रिष्ठाऽ२या꣡ । ओ꣣ऽ२३४ । हा꣣꣯हो꣢इ᳐ । हा꣣꣯हा꣢ ।
हो꣡वा꣢ । हो꣡वा꣢ । पा꣡वित्रेसो꣢ । मो꣡अ꣪क्षाराऽ२᳐त् । ओ꣣ऽ२३४ । हा꣣꣯हो꣢इ । हा꣣꣯हा꣢ ।
हो꣡वा꣢ । हो꣡वा꣢ । म꣡दाऽ२᳐इषु꣣सा꣢ । ओ꣣ऽ२३४ । हा꣣꣯हो꣢इ᳐ । हा꣣꣯हा꣢ ।
हो꣡वा꣢ । हो꣡वा꣢ऽ३ । र्व꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १०। प॰ २३। मा॰ १०)(३६)॥ बौ ॥ ८८० ॥
४७६-१ और्णायवे द्वे।   द्वयोरूर्णायुर्गायत्री सोमः ॥
प꣥रिप्रिया꣯दिव:का꣤वी꣥: ॥ व꣡या꣯ꣳसिनप्त्यो꣯र्हितः ॥ स्वा꣯नै꣯र्याऽ२३ती꣢ ॥ आ꣡याऽ२ । इ꣡याऽ२ई꣭ऽ३या꣢ ᳐ ॥
क꣣विक्र꣢तो꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ४)(३७)॥ श्री ॥ ८८१ ॥

४७६-२ और्णायवोत्तरम्।
प꣤रिप्रियाऽ५दिव:क꣤वाइः ॥ व꣡या꣰꣯ऽ२होऽ१वा꣯ꣳसि꣢न꣡प्त्यो꣯वो꣯र्हि꣢तः꣡ ॥ स्वा꣯नै꣯र्याऽ२३ती꣢ ॥ हुवा꣡ ।
होवा꣢ । हो꣡वा꣢ । हु꣡वाऽ२इ । ई꣭ऽ३या꣢ । क꣣विक्र꣢तो꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४ औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣢ऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ८। प॰ ११। मा॰ ६)(३८)॥ टू ॥ ८८२ ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥ दशतिः ॥ ९ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने त्रयोदशस्यार्धः प्रपाठकः ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — त्रयोदशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ द्वितीयः खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१९)

४७७-१ सौभरे द्वे।   द्वयोः सुभरिर्गायत्री सोमः ॥
प्र꣢सो᳐मा꣣ऽ२३४सा꣥: ॥ म꣢दच्यु꣡त꣢: । औ꣡ऽ२३हो꣯वा꣢ऽ३ । श्र꣡वाऽ२᳐सा꣣ऽ२३४ इना꣥: । ओ꣡इम꣪घोनाऽ२म् ॥
सु꣡ताऽ२३ः ॥ वा꣡ऽ२᳐इदा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ थे꣢꣯अक्रमू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ११)(१)॥ द ॥ ८८३ ॥
४७८-१
प्र꣥सो꣯मा꣯साः ॥ वा꣡इपश्चि꣢तः । आ꣡पो꣢ऽ१नायाऽ२ । ता꣡ऊ꣯र्म꣢यः ॥ वा꣡ना꣢ऽ१ निमाऽ२ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ।
हि꣡षा꣢꣯इव । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ८)(२)॥ नै ॥ ८८४ ॥
४७९-१ वृषकाणि त्रीणि।   त्रयाणामिन्द्रो गायत्री सोमः ॥
प꣤वस्वे꣯न्दोऽ५वृषा꣯सु꣤ताः ॥ कृ꣢धी꣡꣯नो꣯यशसो꣯जनाये꣢ऽ३ ॥ वा꣢इश्वा᳐आ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
द्वा꣡ऽ२᳐इषा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ जा꣣ऽ२३४ही꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ५। मा॰ ५)(३)॥ ञु ॥ ८८५ ॥
४८०-१
वृ꣤षा꣥꣯हिया꣤ ॥ सि꣢भा꣡꣯नूऽ२३ना꣢ । द्युम꣡न्तन्त्वा꣯हावा꣢ऽ१माहाऽ२३४इ ॥ प꣣वा꣢ऽ३ ॥
मा꣡नसु꣢वो꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ दॄ꣣ऽ२३४शा꣥म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ६। मा॰ २)(४)॥ टा ॥ ८८६ ॥

४८०-२
वृ꣤षा꣯हियाऽ५सिभा꣯नु꣤ना ॥ द्यु꣢म꣡न्तन्त्वा꣢꣯ह꣡वा꣰꣯ऽ२महे꣯ । हाऽ२इ । ऊऽ२ । हो꣭ऽ३वा꣢ ᳐ ।
प꣡वमा꣢꣯नसुवर्दृ꣡श꣢म् । हाऽ२इ । ऊऽ२ । हो꣭ऽ३वा꣢ ᳐ ॥ हु꣣वो꣢ऽ३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ४)(५)॥ की ॥ ८८७ ॥
४८१-१ बभ्रोः सामानि त्रीणि, कौम्भ्यस्य वा।   त्रयाणां बभ्रुर्गायत्री सोमः ॥
इ꣣न्दु꣢रौ꣣꣯हो꣤वाहा꣥इ । पा꣤वी꣥ ॥ ष्ट꣢चा꣡ऽ२इ᳐ । तनो꣣ऽ२३४हा꣥ । हा꣢꣯हो꣡इ । हो꣭ऽ३हा꣢ । प्रियाᳲ꣡क꣢वी꣯ ।
ना꣡꣯म्म । ति꣢रो꣣ऽ२३४हा꣥ । हा꣢꣯हो꣡इ । हो꣭ऽ३हा꣢ ॥ सृ꣡जा ऽ२꣮त् । अश्वो꣣ऽ२३४हा꣥ । हा꣢꣯हो꣡इ ।
हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ ॥ रा꣡ऽ२᳐था꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ १७। मा॰ ७)(६)॥ ठे ॥ ८८८ ॥

४८१-२
इ꣤न्दु꣥:पविष्टचे꣤꣯त꣥न:प्रिय꣤ᳲक꣥वा꣤इ ॥ हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म् । नाम्मा꣣ऽ२३४ ती꣥: ॥ सृ꣡जादाऽ२३श्वा꣢म् ॥
हि꣭म्ऽ३(स्थि)हि꣢म्ऽ३ । रा꣡ऽ२᳐था꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ८)(७)॥ ठै ॥ ८८९ ॥

४८१-३
इ꣤न्दु꣥:पविष्टचे꣤꣯त꣥न:प्रिय꣤ᳲक꣥वी꣯ना꣤꣯म्म꣥ति꣤स्सृ꣥ । जा꣤ऽ५दश्वा꣤म् ॥ ओ꣡वाऽ२३ । ओ꣡वाऽ२३ ॥
रा꣡ऽ२᳐था꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ६। मा॰ २)(८)॥ पा ॥ ८९० ॥
४८२-१ कार्तवेशस्य सामानि त्रीणि।   त्रयाणां कृतवेशोगायत्री सोमः ॥
अ꣥सृक्षा꣢ऽ३ता꣤प्र꣥वा꣤꣯जिना꣥: ॥ गा꣡व्याऽ२सो꣡माऽ२ । सो꣯अ । श्व꣡या ॥ शू꣢ऽ१क्राऽ२सो꣡वीऽ२ ॥
रयाऽ२श꣡द्वा꣢: । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ४)(९)॥ जी ॥ ८९१ ॥

४८२-२
अ꣥सृक्षताप्राऽ६वा꣥꣯जिनाः ॥ ग꣢व्या꣡꣯सोमासोअश्वयाऽ२३हो꣡इ ॥ शु꣢क्रा꣡꣯सो वा꣢ऽ३१इ ॥ र꣢या꣡ऽ२३ ।
शा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ग्वा꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ १०। प॰ ६। मा॰ ६)(१०)॥ पू ॥ ८९२ ॥

४८२-३
अ꣣सृ꣤क्षतप्र꣣वा꣤꣯जिन꣥: । ए꣢ऽ᳐३ । ग꣤व्यासो꣥꣯मा ॥ सो꣢ऽ३आ꣡श्वा꣢ऽ३या꣢ ॥ शु꣡क्राऽ२᳐सो꣣ऽ२३४वी꣥ ॥
र꣢यो꣡ऽ२३४वा꣥ । शा꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ३)(११)॥ छि ॥ ८९३ ॥
४८३-१ शाम्मदे द्वे।   द्वयोः शम्मद्गायत्रीन्द्रवायू ॥
पा꣤व꣥स्वा꣤दे꣥ ॥ व꣣या꣢ऽ३ । वा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । यू꣣ऽ२३४षा꣥क् । आ꣤इन्द्रं ꣥ग꣤च्छा꣥ । तु꣣ता꣢ऽ३इ ।
तू꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । मा꣣ऽ२३४दा꣥: ॥ वा꣢꣯यूऽ२ꣳहोऽ१इ । आऽ२३रो꣢ ᳐ । ह꣣धा꣢ऽ३ ।
हा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ मा꣣ऽ२३४णा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ८)(१२)॥ जै ॥ ८९४ ॥

४८३-२
प꣣व꣤स्व꣥दे꣯वऐ । ही꣢ऐ᳐ही꣣ऽ२३४या꣥ ॥ आ꣡꣯युषागैऽ२ही꣡ऐऽ२ही꣭ऽ३या꣢ । इ꣡न्द्रंगच्छतु
तेमदऐऽ२ही꣡ऐऽ२ही꣭ऽ३या꣢ ॥ वा꣡यूमारो꣢ऽ३१२३ ॥ ह꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ । मा꣤ऽ५णोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ६)(१३)॥ थू ॥ ८९५ ॥
४८४-१ जनित्रे द्वे।   द्वयोर्वसिष्ठो गायत्री सोमवैश्वानरौ ॥
पा꣤वा꣥ ॥ मा꣡꣯नो । अ꣣जी꣢जा꣣ऽ२३४ना꣥त् । दि꣢व꣡श्चित्राम् । नतन्यतूम् ॥ ज्योति꣢र्वैश्वा꣡ऽ२३ ॥
ना꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ बॄ꣣ऽ२३४हा꣥त् ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ५)(१४)॥ ढु ॥ ८९६ ॥

४८४-२
प꣥वमानाः ॥ अ꣡जाइजा꣢ऽ३ना꣢त् । दिव꣡श्चि꣢त्रा꣡ऽ२३ꣳहा꣢ऽ३इ । ना꣡त꣢न्या꣣ऽ२३४तू꣥म् ॥
ज्यो꣣ऽ२३४ती꣥: । वा꣣ऽ२३४इश्वा꣥ ॥ न꣤रोवा꣥ । बॄ꣤ऽ५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ८। मा॰ ८)(१५)॥ गै ॥ ८९७ ॥
४८५-१ प्रक्रीडास्त्रयः (स्त्रीणि) (प्रक्रीडम्)।   मरुतो गायत्री सोमः ॥
पा꣤री꣥ ॥ स्वा꣢꣯नासइन्दवोमदायब । ह꣡णाऽ२᳐३गिरा꣢ऽ३४ । म꣣धो꣢ऽ३४ अ꣣र्षा꣢ऽ३ ॥ ति꣢धो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
रा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ३)(१६)॥ ति ॥ ८९८ ॥

४८५-२ संक्रीडम्।
पा꣤री꣥ ॥ स्वा꣢꣯ ना꣡꣯सइन्दवाउवाऽ२३हो꣡वाऽ२३हाऽ२ई꣡या ॥
मदायबर्हणागिराउवाऽ२३हो꣡वाऽ२३हाऽ२ई꣡या ॥
मधोअर्षन्तिधारयाउवाऽ२३हो꣡वाऽ२३हाऽ२ई꣡याऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ६। मा॰ ९)(१७)॥ ट्वो ॥ ८९९ ॥

४८५-३ निक्रीडम्।
पा꣣ऽ५रि । स्वाना꣤ऽ३सा꣢ऽ३इ꣤न्दवा꣥: ॥ म꣡दा꣰꣯ऽ२यबर्ह꣡णा꣰꣯ऽ२गिरा꣡ ॥ मधोऽ२३र्षा꣢ ॥
ऊ꣡र्मि꣪रिवाऽ२ । ई꣭ऽ३या꣢ । ति꣣धार꣢या꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ३)(१८)॥ नि ॥ ९०० ॥
४८६-१ औशनम्।   उशना गायत्री सोमः ॥
प꣥रिप्रासी ॥ ष्य꣢दत्का꣡वीऽ२: । सि꣡न्धोरूर्मावाधि꣪श्रिताऽ२: ॥ का꣡꣯रूऽ२३म् ॥
बा꣡ऽ२᳐इभ्रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ पु꣢रुस्पृ꣡हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ७। प॰ ६। मा॰ ६)(१९)॥ चू ॥ ९०१ ॥
॥ एकोनविंशति द्वितीयः, द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥ दशतिः ॥ १० ॥

॥ अथ तृतीयः खण्डः॥ (ऋ-१०, सा-१६)

४८७-१ यामानि त्रीणि।   ॥ त्रयाणां यमो गायत्री देवाः ॥
इ꣢हाऽ२इहा꣡ । उपो꣯षुजा꣯तमाऽ२प्तुरा꣡म् । इहा ॥ इ꣢हाऽ२इहा꣡ । गो꣯भिर्भङ्ग ंपराऽ२इष्कृता꣡म् ।
इहा ॥ इ꣢हाऽ२इहा꣡ । इन्दुन्दे꣯वा꣯अयाऽ२सिषू꣡: । इहा꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ८)(२०)॥ भै ॥ ९०२ ॥

४८७-२
ऊ꣡पो꣯षुजा꣯तमाऽ२प्तुरा꣡म् । उपा ॥ गो꣯भाऽ२३इर्हो꣡इ । भङ्ग ंपराऽ२इष्कृ ता꣡म् । उपा ॥
इन्दूऽ२३ꣳहो꣡इ । दे꣯वा꣯अयाऽ२ । सि꣡षु꣢राऽ३१उवाऽ२३ । ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ८)(२१)॥ ल्लै ॥ ९०३ ॥

४८७-३
उ꣤पो꣥꣯ ष्वौ꣤꣯ । होइजाता꣥म् ॥ आ꣡प्तू꣢ऽ३रा꣢म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ऽ३ । गो꣡भि꣢र्भा꣣ऽ२३४ङ्गा꣥म् ॥
ओ꣡इपारि꣪ष्कृताऽ२म् ॥ इ꣡न्दूऽ२३म् ॥ दे꣯वा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢या꣯सिषू꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ९)(२२)॥ घो ॥ ९०४ ॥
४८८-१ अंकतेः साम (वैरूपम्)।   अङ्कतिर्गायत्री सोमः ॥
पु꣥नानोआ ॥ क्रा꣢मी᳐दा꣣ऽ२३४भी꣥ । वि꣡श्वाऽ२᳐मा꣣ऽ२३४र्द्धा꣥: । वी꣢च᳐र्षा꣣ऽ२३४णी꣥: ॥
शु꣡म्म्भाऽ२᳐न्ता꣣ऽ२३४इवी꣥ ॥ प्रा꣡ऽ२᳐न्धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ती꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ ६)(२३)॥ थू ॥ ९०५ ॥
४८९-१ औशने द्वे।   द्वयोरुशना गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
आ꣥꣯विशन्कालाऽ६श꣥ꣳसुताः ॥ वा꣡इश्वा꣢꣯अ꣡र्ष꣢न् । अभा꣡इश्राया꣢ऽ३ः । ओ꣭ऽ३ हा꣢ऽ३ । ओ꣡वा꣢ ᳐ ।
ओ꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ इ꣡न्दूऽ२३ः ॥ आ꣡ऽ२᳐इन्द्रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ य꣢धीयते꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ १०)(२४)॥ घौ ॥ ९०६ ॥

४८९-२
आ꣤꣯विश꣣न्क꣤लश꣥म् । सु꣣ता꣢ऽ३ः । वा꣤इश्वा꣥: ॥ अ꣡र्ष꣢न् । अभा꣡इश्राया꣢ ᳐ । औ꣣꣯हौहोऽ२३४वा꣥ ॥
औ꣡हौ꣢꣯होऽ१इ । इन्दूरा꣢ऽ१इन्द्राऽ२ । य । धी꣡꣯याऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ९)(२५)॥ च्वो ॥ ९०७ ॥
४९०-१ सोमसाम।   सोमो गायत्री सोमः ॥
अ꣥सर्जिरा ॥ थि꣢ । यो꣡꣯याऽ२३था꣢ । पवि꣡त्रे꣢꣯ । चा꣡ । मु꣪वोऽ२᳐स्सू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ का꣢꣯र्ष्म꣡न्वाऽ२३जी꣢ ॥
नि꣡यक्र꣢मा꣡इत् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ४)(२६)॥ टी ॥ ९०८ ॥
४९१-१ कार्ष्णेद्वे।   द्वयोः कृष्णो गायत्री सोमः ॥
प्र꣤यद्धा꣥उ । गा꣢꣯वोनऽ३भू꣡र्णा꣢ऽ१याऽ२३४ः । त्वे꣣꣯षा꣢ऽ३ः । आ꣡या꣰꣯ऽ२सोअक्रमुः ॥
घ्नन्ता꣡:काऽ२३र्ष्णा꣢म् । अपा꣡त्वच꣢म् । औहो꣡ऽ२᳐हा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ८)(२७)॥ ड्र ै ॥ ९०९ ॥

४९१-२
प्र꣢य꣡द्गा꣢ऽ३वो꣤꣯नभू꣥꣯र्णयाः ॥ त्वा꣡इषाअ꣢या । सो꣡अ꣪क्रमूऽ२३ः ॥ घ्ना꣡ऽ२३४न्तो꣯हा꣥इ ॥
का꣡ऽ२᳐र्ष्णा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣡प꣢त्व꣡चा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ७। प॰ ६। मा॰ ८)(२८)॥ चै ॥ ९१० ॥
४९२-१ सोमसाम (वैश्वदेवम्)।   सोमो गायत्री सोमः ॥
अ꣥पघ्नौ꣤꣯ । होइपावा꣥ ॥ सा꣡इमा꣢ऽ१र्द्धाऽ२: । क्रा꣡तुवि꣢त्सो । ममा꣡त्सा꣢ऽ१राऽ२: ॥ नु꣡दाऽ२३ ।
स्वा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ व꣢युञ्ज꣡नाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ६)(२९)॥ ढू ॥ ९११ ॥
४९३-१ सूर्यसाम (वैश्वदेवम्)।   सूर्योगायत्री सूर्यः ॥
ए꣥꣯अयापवा ॥ स्व꣢धाऽ२ । र꣡या꣢ऽ३१उवाऽ२३ । ऊ꣢ऽ३४पा꣥ । य꣡यासूर्यमरोऽ२ । च꣡या꣢ऽ३१उवाऽ२३ ।
ऊ꣢ऽ३४पा꣥ ॥ हि꣡न्वानोमानुषाऽ२३इर्हो꣡इ ॥ आप꣢आऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ७)(३०)॥ ञ्ले ॥ ९१२ ॥
४९४-१ वार्त्रघ्नम्।   इन्द्रो गायत्रीन्द्रो वृत्रहा ॥
स꣣हो꣢ऽ३४३इ । प꣢व꣣स्व꣥ ॥ य꣡आऽ२विथा꣡ । इ꣢न्द्रं ꣡वृत्रा꣢ऽ३ । या꣡ह꣢न्ता꣣ऽ२३४वे꣥ । ओ꣡वा꣢ऽ३ओ꣤वा꣥ ॥
व꣢व्रि꣡वाऽ२३ꣳसा꣢म् ॥ मा꣡ही꣢꣯रपा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १। प॰ ११। मा॰ ५)(३१)॥ कु ॥ ९१३ ॥
४९५-१ सोम सामानि त्रीणि।   त्रयाणां सोमो गायत्री सोमः ॥
अ꣥या꣯वी꣯ती ॥ पा꣢꣯रि꣡स्रवा । य꣢स्तइ꣡न्दाउ । मा꣢꣯दा꣡इषुवा ॥ अवाहा꣢ऽ३न्ना꣢ऽ३ ॥ व꣢तो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
ना꣤ऽ५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ७। मा॰ ४)(३२)॥ थी ॥ ९१४ ॥

४९५-२
अ꣢या꣡꣯वी꣯ता꣢ ᳐ ॥ औ꣣꣯हो꣡वा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯ । हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ प꣡रिस्र꣢व ॥
यस्त꣡इन्दा꣢ ॥ औ꣣꣯हो꣡वा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯ । हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ म꣡दे꣰꣯ऽ२षुवा꣡꣯ ॥
अवा꣯हन्ना꣢ ᳐ ॥ औ꣣꣯हो꣡वा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३४इ । औ꣢꣯ । हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ व꣢ती꣡꣯र्नवाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २१। प॰ २४। मा॰ ४)(३३)॥ घी ॥ ९१५ ॥

४९५-३
अ꣤या꣣ऽ५वी꣯ । ता꣤ऽ३इपा꣢ऽ३रि꣤स्रवा꣥ ॥ या꣡स्तइ꣢न्दो꣯ । मदा꣡इषू꣢ऽ१वाऽ२ ॥ अ꣡वाहा꣢ऽ३न्ना꣢ ᳐ ॥
व꣣ती꣯र्न꣢वा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ४)(३४)॥ ढी ॥ ९१६ ॥
४९६-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजो गायत्री सोमः ॥
प꣥रिद्युक्षाम् ॥ ओ꣡इ । सनद्रायीऽ२म् । ओ꣡इ । भरद्वाजाऽ२म् । ओ꣡इ । नो꣯अन्धासाऽ२३४ ॥
स्वा꣣꣯नो꣢ऽ३४अ꣣र्षा꣢ऽ३ ॥ प꣤वोवा꣥ । त्रा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ९)(३५)॥ ञो ॥ ९१७ ॥
॥ षोडशतृतीयः, तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ दशतिः ॥ १ ॥
॥ इति पञ्चमः प्रपाठकः ॥ ५ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने त्रयोदशः प्रपाठकः ॥ १३ ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — चतुर्दशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ अथ चतुर्थः खण्डः॥ (ऋ-१४, सा-२०)

४९७-१ वार्षाहरम्।   वृषाहरिर्गायत्री सूर्यः ॥
अ꣢चिक्रदाऽ३त् । आ꣡चिक्रदा꣢ऽ३त् । अ꣤चिक्रदाऽ५दे ॥ वृ꣢षा꣯हराऽ३इ । वा꣡र्षा꣯हरा꣢ऽ३इ ।
वृ꣤षा꣯हराऽ५ए । म꣢हा꣯न्मित्राऽ३ः । मा꣡हा꣯न्मित्रा꣢ऽ३ः । म꣤हा꣯न्मित्राऽ५ए ॥ न꣢दर्शताऽ३ः । ना꣡दर्शता꣢ऽ३ः ।
न꣤दर्शताऽ५ए ॥ स꣢ꣳसू꣯रिया ऽ३इ । सा꣢ꣳसू꣯रिया꣢ऽ३इ । स꣤ꣳसू꣯रियाऽ५ए । ण꣢दिद्युताऽ३इ ।
णा꣡दिद्युता꣢ऽ३इ । ण꣤दाऽ५इद्युताउ ॥ वा ॥
(दी॰ ९। प॰ १९। मा॰ १८)(१)॥ धै ॥ ९१८ ॥
४९८-१ वार्शाणि त्रीणि।   त्रयाणां वृशो गायत्री सोमः ॥
आ꣥꣯ते꣯दक्षाम् ॥ म꣢यो꣡भू꣢ऽ३वा꣢म् । व꣡ह्नि꣢म । द्या꣡ । वृ꣪णीऽ२᳐मा꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ पा꣡न्तमा꣢ऽ३ ।
ई꣭ऽ३या꣢ ॥ पुरू꣡ऽ२३ । स्पॄ꣡ऽ२᳐हा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ४)(२)॥ न्ली ॥ ९१९ ॥

४९८-२
आ꣢ते᳐दा꣣ऽ२३४क्षा꣥म् । मा꣢यो᳐भू꣣ऽ२३४वा꣥म् ॥ व꣣ह्नि꣤मद्या꣣꣯वृ꣤णी꣥꣯ । म꣣होऽ२३४हा꣥इ ॥ पा꣡न्ता꣢ऽ३मा꣢ऽ३ ।
ई꣭ऽ३या꣢ऽ३ ॥ पू꣡ऽ२᳐रू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स्पॄ꣣ऽ२३४हा꣥म् ॥
(दी॰ ४। प॰ ८। मा॰ ५)(३)॥ ढु ॥ ९२० ॥

४९८-३
आ꣣꣯ ते꣤꣯द꣣क्ष꣤म्म꣥यः । भु꣣वोऽ२३४हा꣥इ ॥ व꣣ह्नि꣤मद्या꣣꣯वृ꣤णी꣥꣯ । म꣣होऽ२३४हा꣥इ ॥ पा꣡न्ता꣢ऽ१माऽ२ ॥
पू꣡रुस्पृ꣢हम् । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ५)(४)॥ धु ॥ ९२१ ॥
४९९-१ वैरूपे द्वे।   द्वयोरिन्द्रो गायत्री सोमः ॥
अ꣢ध्व꣡र्योऽ२३४आ꣥ ॥ द्रि꣢भा꣡इस्सू꣢ऽ३ता꣢ऽ३म् । सो꣡꣯माऽ२᳐म्पा꣣ऽ२३४वी꣥ । त्रा꣡आ꣢ऽ१नायाऽ२ ॥
पु꣡नाऽ२३ ॥ ही꣯न्द्रा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ य꣢पा꣡꣯त꣢वे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ५)(५)॥ फु ॥ ९२२ ॥

४९९-२
अ꣤ध्व꣥र्यौ꣯ । हो꣤अद्री꣥ ॥ भि꣢स्सुत꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ऽ३ । सो꣡꣯माऽ२᳐म्पा꣣ऽ२३४वी꣥ ।
ओ꣡त्राआ꣢ऽ१नायाऽ२ ॥ पु꣡नाऽ२३ ॥ हा꣡ऽ२᳐इन्द्रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ य꣢पा꣡꣯त꣢वे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ५)(६)॥ भु ॥ ९२३ ॥
५००-१ तरन्तस्य साम।   तरन्तो गायत्री सोमः ॥
त꣥रत्समा ॥ दी꣢꣯धा꣡वा꣢ऽ१ताऽ२३इ । धा꣡꣯राऽ२᳐सू꣣ऽ२३४ता꣥ ॥ स्य꣢आ꣡ऽ२३ ॥
धा꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ त꣡रत्समन्दी꣯धा꣢꣯वती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ३)(७)॥ कि ॥ ९२४ ॥
५०१-१ सोमसाम।   सोमा गायत्री सोमः ॥
आ꣥꣯पवस्वा ॥ स꣢हस्रि꣡णाम् । हुवाइ । हुवाऽ२३हो꣡ ॥ र꣢यिꣳसो꣡꣯मा । सु꣢वी꣯रि꣡याम् । हुवाइ ।
हुवाऽ२३हो꣡इ ॥ अ꣢स्मे꣯श्र꣡वा । सि꣢धा꣯र꣡या । हुवाइ । हुवाऽ२३हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ १४। मा॰ ७)(८)॥ झ्वे ॥ ९२५ ॥
५०२-१ सूर्यसाम।   सूर्योगायत्री सूर्यः ॥
अ꣥नुप्रत्ना꣯सआ꣯याऽ६वा꣥: ॥ प꣢द꣡न्नवी꣯यो꣯अक्रमूः ॥ रुचाइज꣪ना ॥ ता꣢ऽ३सू꣢ । हि꣡म्माये꣢ऽ३ ॥
रीऽ२३४या꣥म् ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ६)(९)॥ तू ॥ ९२६ ॥
५०३-१ दार्ढच्युतानि त्रीणि।   त्रयाणां दृढच्युतिर्गायत्री सोमः ॥
अ꣢र्षा꣡ ॥ इहा । सो꣯मद्युमाऽ२त्तमा꣡ । इहा ॥ अ꣢भा꣡इ ॥ इहा । द्रो꣯णा꣯निरोऽ२रुवा꣡ । इहा ॥
सी꣢꣯दा꣡ ॥ इहा ॥ यो꣯नौ꣯वनाऽ२इषुवा꣡ ॥ इहा꣢ऽ१ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ २)(१०)॥ खा ॥ ९२७ ॥

५०३-२
अ꣤र्षाहा꣥उ ॥ सो꣡꣯मद्युमत्तमो꣯ । भिद्रोऽ२३णा꣢ । निरा꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । रू꣡वाऽ२३त् ॥ सी꣯दा꣢उवा ॥
यो꣡꣯नौवा꣢ऽ३ने꣢ । हि꣡म्माये꣢ऽ३ ॥ षूऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ४)(११)॥ धी ॥ ९२८ ॥

५०३-३
अ꣣र्षा꣤꣯ सो꣥꣯मद्युम । त꣣माः꣢ ᳐ । अ꣣र्षा꣤꣯ सो꣥꣯मा ॥ द्यू꣡मत्त꣢मः । अ꣡भि꣢द्रो꣯णा꣡ऽ२३हा꣢ । निरो꣡꣯रुव꣢त् ॥
सा꣡इदन्यो꣢꣯ना꣡ऽ२३उहा꣢इ ॥ वना꣡इषूऽ२᳐३वा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ८)(१२)॥ ञै ॥ ९२९ ॥
५०४-१ वृषकम्।   इन्द्रो गायत्री सोमः ॥
वृ꣥षा꣯सो꣯मा ॥ द्यु꣢माऽ२ꣳआ꣡साऽ२इ । वृ꣡षादेवा꣢ऽ३हा꣢ऽ३इ । वा꣡र्ष꣢व्रा꣣ऽ२३४ता꣥: ॥ वृ꣡षाधर्मा꣢ऽ३ ॥
ई꣭ऽ३या꣢ ॥ णा꣡इदध्रि꣢षे꣯ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ६)(१३)॥ णू ॥ ९३० ॥
५०५-१ ऐषम्।   इषो गायत्री सोमः ॥
इ꣥षे꣯पवा ॥ स्व꣢धा꣯रयौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा । मृ꣢ज्य꣡मा꣰꣯ऽ२नो꣯मनी꣯षि꣡भिः꣢ ᳐ ॥ इ꣣न्दो꣢꣯रु꣣चा꣥꣯ ॥
अ꣢भिगौ꣯हो꣯वाऽ३हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣡प् । इ꣢ही꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १५। प॰ ९। मा॰ २)(१४)॥ भा ॥ ९३१ ॥
५०६-१ श्यावाश्वम्।   श्यावाश्वो गायत्री सोमः ॥
म꣥न्द्रया꣯सो ॥ म꣢धा꣡꣯रया । वृषा꣯पाऽ२३वा꣢ । स्वदा꣡इवाऽ२३यू꣢: ॥ अ꣡व्याऽ२३ः ॥
वा꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भि꣢रस्म꣣यू꣢ऽ१ः ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ५)(१५)॥ फु ॥ ९३२ ॥
५०७-१ अयासोमीयम्।   अयासोमो गायत्री सोमः ॥
अ꣥या꣤ऽ३सो꣢ऽ३म꣤सुकृ꣥त्यया ॥ म꣢हा꣡꣯न्त्सन्ना । भ्य꣪वाऽ२᳐र्द्धा꣣ऽ२३४था꣥: ॥ मा꣡न्दा꣢꣯नआ꣡ये꣢ऽ३त् ।
वृषा꣢ऽ३या꣤ऽ५᳚साऽ६५६इ ॥
(दी॰ २। प॰ ५। मा॰ ४)(१६)॥ ञी ॥ ९३३ ॥
५०८-१ आग्नेयम्।   अग्निर्गायत्री सोमः ॥
आ꣢ ᳐ । औ꣣꣯ हौ꣤꣯होवाहा꣥इ । अयंविचा ॥ ष꣢णा꣡इर्हाइता꣢ ᳐ । औ꣣꣯ हौ꣤꣯होवाहा꣥इ ॥ पवमा꣯नाः ॥ स꣢चा꣡इताता꣢ ᳐ ।
औ꣣꣯ हौ꣤꣯होवाहा꣥इ ॥ हिन्वा꣯नआ ॥ पि꣢यौ꣭ऽ३हौ꣢ऽ३ । ह꣤वोवा꣥ । बॄ꣤ऽ५होऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ९)(१७)॥ ठो ॥ ९३४ ॥
५०९-१ आयास्ये द्वे।   द्वयोरयास्यो गायत्री सोमः ॥
प्र꣣न꣤इ꣥न्दो꣯ऐ꣯ । ही꣢ऐ᳐ही꣣ऽ२३४या꣥ ॥ म꣢हे꣡꣯तुनऐऽ२ही꣡ऐऽ२ही꣭ऽ३या꣢ ।
ऊ꣯र्मि꣡न्नबिभ्रदर्षसऐऽ२ही꣡ऐऽ२ही꣭ऽ३या꣢ ॥ अ꣡भाये꣢ऽ३ ॥
दा꣡ऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣢या꣡꣯सि꣢या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ १०)(१८)॥ छौ ॥ ९३५ ॥

५०९-२
प्र꣣न꣤इ꣥न्दो꣯ । इ꣢याऽ३४३ई꣢ऽ३४या꣥ । म꣢हे꣡꣯तुनइयाऽ२ई꣭ऽ३या꣢ । ऊ꣯र्मि꣡न्नबिभ्रदर्षसइयाऽ२ई꣭ऽ३या꣢ ।
अ꣡भाये꣢ऽ३ ॥ दा꣡ऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । अ꣢या꣡꣯सि꣢या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ९)(१९)॥ गो ॥ ९३६ ॥
५१०-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाजो गायत्री सोमेन्द्रौ ॥
हो꣢ई꣣ऽ२३४या꣥ । (द्विः) । इ꣤याहा꣥इ । अ꣢प꣡घ्नाऽ२३न्पा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
हो꣢ई꣣ऽ२३४या꣥ । (द्विः) । इ꣤याहा꣥इ । व꣢ता꣡इ । माऽ२᳐ । धा꣣ऽ२३४ ।
औ꣥꣯हो꣯वा ॥ अ꣡पसो꣯मो꣰꣯ऽ२ अ꣡रा꣰꣯ऽ२व्णाऽ३꣡४꣡५꣡: ॥ हो꣢ई꣣ऽ२३४या꣥ । (द्विः) ।
इ꣤याहा꣥इ । ग꣢च्छ꣡न्नाऽ२३ इन्द्रा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ । हो꣢ई꣣ऽ२३४या꣥ । (द्विः) । इ꣤याहा꣥इ ।
स्य꣢ना꣡इः । काऽ२᳐ । ता꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ २४। मा॰ १८)(२०)॥ झ्रे ॥ ९३७ ॥
॥ विंशतिश्चतुथः, चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ दशतिः ॥ २ ॥

॥ अथ पञ्चमः खण्डः॥ (ऋ-१, सा-१६)

५११-१ आयास्यम्।   अयास्यो बृहती सोमः ॥
पु꣥ना꣯नस्सो ॥ मा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । रा꣣ऽ२३४या꣥ । अ꣢पो꣡꣯वसो꣢꣯नो꣯अर्षसि ॥ आ꣡꣯रात्ना꣢ऽ३धा꣢: ।
यो꣡꣯नाइमा꣢ऽ३र्त्ता꣢ऽ३ । स्या꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । दा꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ उ꣡त्सोदे꣢ऽ३वो꣢ऽ३ ॥
हा꣡ऽ२᳐इरा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ण्या꣣ऽ२३४या꣥: ॥
(दी॰ १२। प॰ ११। मा॰ ८)(२१)॥ चै ॥ ९३८ ॥

५११-२ माण्डवम्।   मण्डुर्बृहती सोमः ॥
इ꣡याऽ२ई꣭ऽ३या꣢ । पु꣡ना꣯नस्सोऽ२᳐ । म꣣धा꣢ ᳐रा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ अ꣢पो꣡꣯वसा꣯नो꣢꣯अ꣡र्षाऽ२३सी꣢ ।
आ꣡꣯रत्नधा꣯यो꣯निमृतस्य꣢सी꣡꣯दाऽ२३सी꣢ ॥ उ꣣त्सो꣯दे꣢꣯वो꣡ऽ२३ ॥ हा꣡ऽ२᳐इरा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ण्या꣢ऽ᳐३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ ८। मा॰ ५)(२२)॥ जु ॥ ९३९ ॥

५११-३ अपदासम्।   वसिष्ठो बृहती सोमः ॥
पु꣥ना꣯न꣤:सो꣥꣯मधा꣤꣯र꣥या꣤ ॥ अ꣢पो꣡꣯वसा꣢꣯नो꣯अर्ष । स्यो꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ । आ꣡꣯रत्न꣢धा꣡꣯यो꣯निमृ꣢त꣡स्य꣢सी꣯द ।
स्यो꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ ॥ उ꣡त्सोदा꣢ऽ१इवाऽ२: । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ ॥ हिर꣡ण्याऽ२᳐३या꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ ५)(२३)॥ बु ॥ ९४० ॥

५११-४ सोमसाम।   सोमो बृहती सोमः ॥
पु꣤ना꣯न:सोऽ५मधा꣯र꣤या ॥ आ꣡पोऽ२वा꣡साऽ२ । नो꣯अ꣡र्षसी । आराऽ२त्ना꣡धाऽ२: । यो꣯निमा꣡र्त्ताऽ२ ।
स्यसी꣡꣯दसी ॥ ऊत्सोऽ२दा꣡इवाऽ२: ॥ हिर꣡ण्याऽ२᳐३या꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ६)(२४)॥ मू ॥ ९४१ ॥

५११-५ ऐडमायास्यम्।   अयास्यो बृहती सोमः ॥
आ꣤इपु꣥ना꣤ ॥ ना꣡:सो । म꣢धा꣡꣯रया । आपो꣯वसा꣢ऽ३१ । नो꣢꣯अ꣡र्षसी । आरत्नधा꣢ऽ३१ः । यो꣯निमृता ।
स्य꣢सी꣡꣯दसी ॥ ऊत्सोदेवा꣢ऽ३१ः । हि꣢र꣡ण्याऽ२᳐३या꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ६)(२५)॥ फू ॥ ९४२ ॥

५११-६ माण्डवम्।   मण्डुर्बृहती सोमः ॥
पु꣥ना꣯न꣤स्सो꣥꣯मधा꣤꣯र꣥या꣯ । पो꣯वसो꣤वा꣥ ॥ नो꣡꣯अर्ष꣢सि । आ꣡꣯रत्न꣢ । धा꣡उवाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ।
यो꣡꣯निमृ꣢त꣡स्य꣢सी꣯दसि ॥ उ꣡त्सो꣢꣯दे । वा꣡उवाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ हिर꣡ण्याऽ२᳐३या꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ ७)(२६)॥ गे ॥ ९४३ ॥

५११-७ उद्वत्प्राजापत्यम्।   प्रजापतिर्बृहती सोमः ॥
पु꣥ना꣯न꣤:सो꣥꣯मधा꣤꣯ । होऽ५रया꣤ ॥ अ꣢पो꣡꣯वसा꣯न꣢आ꣡होऽ२ । षा꣡सीऽ२ । आ꣡꣯रत्न
धा꣯यो꣯निमृतस्य꣢सा꣡होऽ२इ । दा꣡सीऽ२ । उ꣡त्साऽ२होऽ१इ । दाऽ२३इवो꣢ऽ३ । हि꣢रो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
ण्या꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ ५)(२७)॥ णु ॥ ९४४ ॥

५११-८ त्रिणिधनमायास्यम्।   अयास्यो बृहती सोमः ॥
पु꣥ना꣯न:सो꣯मधा꣯हा꣯उहो꣤वा꣥ ॥ रा꣡या꣢ ᳐आ꣣ऽ२३४पो꣥ । व꣡साऽ२᳐ । न꣣आ꣢ऽ३४५ । षा꣣ऽ२३४सी꣥ ॥
आ꣡꣯रा꣢ऽ᳐३४ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ त्न꣡धा꣯यो꣯निमृताऽ२᳐ । स्य꣣सा꣢ऽ३४५इ । दा꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ उ꣡त्सा꣢ऽ३४ ।
औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ दा꣡इवोऽ२᳐ । हि꣣रा꣢ऽ३४५ ॥ ण्या꣣ऽ२३४या꣥: ॥
(दी॰ ११। प॰ १५। मा॰ ६)(२८)॥ ङू ॥ ९४५ ॥

५११-९ कण्वरथन्तम्।   कण्वो बृहती सोमः ॥
पू꣥꣯ना꣯न꣤:सो꣥꣯मधा꣤꣯र꣥या꣤ ॥ अ꣢पो꣡꣯वसा । नो꣢ऽ३आ꣡र्षा꣢ऽ३सी꣢ । आ꣯रत्नधा꣯यो꣯निमृतस्यसी꣯दसा꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही ॥
उ꣢त्सो꣡꣯दाऽ२३४इवा꣥: ॥ हि꣢राऽ३१उवाऽ२३ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ण्य꣢य꣣आ꣢ ॥
(दी॰ ११। प॰ ८। मा॰ ६)(२९)॥ गू ॥ ९४६ ॥

५११-१० तिरश्ची (द्वि) निधनमायास्यम्।   अयास्यो बृहती सोमः ॥
पु꣤ना꣯न꣣:सो꣤꣯मधा꣣꣯र꣤या꣥꣯ । ए꣢ऽ᳐३ । औ꣢ऽ३हो꣤ऽ५वा ॥ आ꣡पो꣢ऽ३ । व꣡साऽ२᳐ । न꣣आ꣢ऽ३४५ । षा꣢ऽ३सीऽ२ ।
आ꣡रत्न꣢धाः꣡ । योनिमृ꣢ता꣡ । स्यासा꣢ऽ३आ꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤ऽ३ । दाऽ२३४सी꣥ ॥ उ꣢त्सा꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ॥
दा꣡इवोऽ२᳐ । हि꣣रा꣢ऽ३४५ ॥ ण्या꣢ऽ३या꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ४। प॰ १६। मा॰ ६)(३०)॥ तू ॥ ९४७ ॥

५११-११ सदोविशीयम्।   प्रजापतिर्बृहती सोमः ॥
पु꣥ना꣯न:सो꣯मधा꣯रया꣯ओ꣯हा꣯ओ꣯हाऽ६ए꣥ । औ꣯हो꣯औ꣯होऽ६वा꣥ ॥ अ꣢पो꣡꣯वसा꣢꣯नो꣯अर्ष । स्यो꣭ऽ३हा꣢ ।
ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ए꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । आ꣡꣯रत्न꣢धा꣡꣯यो꣯नि मृ꣢त꣡स्य꣢सी꣯द । स्यो꣭ऽ३हा꣢ ।
ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ए꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ॥ उ꣡त्सोदा꣢ऽ१इवाऽ२: । ओ꣭ऽ३हा꣢ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ३ए꣢ ।
औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ॥ हिर꣡ । ण्याऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ स꣢दो꣯वि꣡शा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ २०। प॰ २०। मा॰ १५)(३१)॥ मु ॥ ९४८ ॥

५११-१२ स्ववासिनी द्वे।   द्वयोर्जमदग्निर्बृहती सोमः ॥
ओ꣡ऽ२होऽ१ । वाओवा꣢ । ओ꣡ऽ२होऽ१ । वाओवा꣢ । ओ꣡ऽ२होऽ१ । वाओवा꣢ऽ३ ।
ओ꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । पु꣢ना꣯न꣡स्सो꣢꣯मधा꣡꣯रया꣢꣯ ॥ पो꣡꣯वसा꣢꣯नो꣯अर्षसि । आ꣡꣯रत्न꣢धा꣡꣯यो꣯निमृ꣢त꣡स्य꣢सी꣯दसि ॥
उ꣡त्सो꣢꣯दे꣯वा꣡: । ओऽ२होऽ१ । वाओवा꣢ । ओ꣡ऽ२होऽ१ । वाओवा꣢ । ओ꣡ऽ२होऽ१ । वाओवा꣢ऽ३ ।
ओ꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । हि꣢रण्य꣡याऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १७। प॰ २०। मा॰ ११)(३२)॥ ञ ॥ ९४९ ॥

५११-१३
ओ꣢ऽ᳐३ । हो꣢ऽ१ । वाओवा꣢ऽ३ । ओ꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । पु꣢ना꣯न꣡स्सो꣢꣯मधा꣡꣯रया꣢꣯ ।
पो꣡꣯वसा꣢꣯नो꣯अर्षसि ॥ आ꣡꣯रत्न꣢धा꣡꣯यो꣯निमृ꣢त꣡स्य꣢सी꣯द । स्योऽ३ । हो꣢ऽ१ । वाओवा꣢ऽ३ ।
ओ꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣡त्सो꣢꣯दे꣯वो꣡꣯हि꣢रण्ययः । इ꣡डाऽ२३ भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ १८। प॰ १५। मा॰ ७)(३३)॥ णे ॥ ९५० ॥

५११-१४ प्लवः।   वसिष्ठो बृहती सोमः ॥
हा꣢ ᳐ । वोऽ३हा꣢ । वोऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢इ । पूना᳐ना꣣ऽ२३४स्सो꣥ ।
मा꣢धा᳐रा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ आ꣢पो᳐वा꣣ऽ२३४सा꣥ ॥ नो꣢अ᳐र्षा꣣ऽ२३४सी꣥ । आ꣢र᳐त्ना꣣ऽ२३४धा꣥: ।
यो꣢नी᳐मा꣣ऽ२३४र्त्ता꣥ । स्या꣢सी᳐दा꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ ऊ꣢त्सो᳐दा꣣ऽ२३४इवो꣥ । हा꣢इर᳐ण्या꣣ऽ२३४या꣥: ।
हा꣢ ᳐ । वोऽ३हा꣢ । वोऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ ।
अ꣡ति꣢वि꣡श्वा꣢꣯निदुरिता꣡꣯त꣢रे꣯मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ २४। मा॰ ६)(३४)॥ भू ॥ ९५१ ॥

५११-१५ रौरवम्।   रुरुर्बृहती सोमः ॥
पु꣢ना꣯न:सो꣯माऽ३धा꣡राऽ२३४या꣥ ॥ आ꣡पो꣯वसा꣯नो꣯अर्षस्या꣯रत्नधा꣯यो꣯निमृतस्यसाऽ२᳐इद꣣सा꣢इ ।
ओ꣡हा꣢ऽ३उवा꣢ ॥ उ꣡त्सो꣯दे꣯वो꣯हिराऽ२३हा꣢इ । ओ꣡हा꣢ऽ३उवा꣢ ॥ ण्यया꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ११। प॰ ९। मा॰ ७)(३५)॥ घे ॥ ९५२ ॥

५११-१६ यौधाजयम्।   युधाजिद्बृहती सोमः ॥
पु꣣ना꣢ऽ३१ । ना꣢ऽ᳐३:सो꣤ । म꣥ । धा꣢ ᳐रा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ आ꣡पो꣢ऽ३ । व꣡साऽ२᳐ । न꣣आ꣢ऽ३४५ । षा꣣ऽ२३४सी꣥ ।
आ꣢꣯रा꣡त्न꣢धाः꣡ । यो꣢꣯ । नि꣡मृताऽ२᳐ । स्य꣣सा꣢ऽ३४५इ । दा꣣ऽ२३४सी꣥ ॥ उ꣢त्साऽ२: ॥ दा꣡इवोऽ२᳐ ।
हि꣣रा꣢ऽ३४५ । ण्या꣣ऽ२३४या꣥: ॥
(दी॰ २। प॰ १७। मा॰ )(६४)॥ छू ॥ ९५३ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने चतुर्दशस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — चतुर्दशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ पञ्चमः खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-४, सा-३०)

५१२-१ अच्छिद्रम्।   विश्वामित्रो बृहती सोमः ॥
प꣥री꣯तो꣯षी ॥ च꣢ताऽ३᳐१उवाऽ२३ । सूऽ२३४ता꣥म् । सो꣡꣯ मो꣰꣯ऽ२य꣡उत्त꣢म꣡ꣳह꣢वीः꣡ ॥ सो꣥꣯मो꣯यऊ ।
त꣢माऽ३१उवाऽ२३ । हाऽ२३४वी꣥: । द꣢धन्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣰꣯ऽ२प्सु꣡वन्त꣢रा꣡꣯ ॥ द꣥धन्वा꣯ꣳयाः ॥ न꣡र्यो꣰꣯ऽ२ ।
आ꣡ । प्सु꣢वाऽ३१उवाऽ२३ । ताऽ२३४ रा꣥ । सु꣢षा꣡꣯वसो꣯ममद्रिभी꣣ऽ२३४ः ॥ सु꣥षा꣯वसो ॥
म꣢माऽ३१उवाऽ२३ ॥ द्राऽ२३४इभी꣥: ॥
(दी॰ १५। प॰ १७। मा॰ १३)(१)॥ फि ॥ ९५४ ॥

५१२-२ रयिष्ठम्।   इन्द्रो बृहती सोमः ॥
प꣥री꣯तो꣯षी ॥ च꣢ता꣡सू꣢ऽ३ता꣢म् । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ऽ३४ ।
हा꣥ । हा꣢उवा । सो꣡꣯ मो꣰꣯ऽ२य꣡उत्त꣢म꣡ꣳह꣢वीः꣡ ॥ सो꣥꣯मो꣯यऊ ॥ त꣢मा꣡ꣳहा꣢ऽ३र्वी꣢: । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ।
औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ऽ३४ । हा꣥ । हा꣢उवा । दधन्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣰꣯ऽ२प्सु꣡वन्त꣢रा꣡꣯ ॥
द꣥धन्वा꣯ꣳयाः ॥ न꣡र्यो꣰꣯ऽ२᳐ । आ꣡ । प्सू꣢ऽ३आ꣡न्ता꣢ऽ३रा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ ।
ई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ऽ३४ । हा꣥ । हा꣢उवा । सुषा꣡꣯वसो꣯ममद्रिभी꣣ऽ२३४ः ॥ सु꣥षा꣯वसो ॥ म꣢मा꣡द्री꣢ऽ३भा꣢इ ।
औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ३वा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ऽ३४ । हा꣥ । हा꣢उवाऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ १५। प॰ ३८। मा॰ १३)(२)॥ ञ्लि ॥ ९५५ ॥

५१२-३ भारद्वाजे द्वे।   द्वयोर्भरद्वाजो बृहती सोमः ॥
औ꣥꣯हो꣯इपरी꣯तो꣯षी ॥ च꣢ता꣯सुत꣡म् । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣢इ᳐ । आ꣭ऽ३ । औ꣢꣯होऽ३वा꣢ ।
सो꣡꣯ मो꣰꣯ऽ२य꣡उत्त꣢म꣡ꣳह꣢विः꣡ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣢इ । आ꣭ऽ३ । औ꣢꣯होऽ३वा꣢ ॥
दधन्वाꣳ꣡꣯यो꣯नर्यो꣰꣯ऽ२प्सु꣡वन्त꣢रा꣡꣯ ॥ औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣢इ । आ꣭ऽ३ । औ꣢꣯होऽ३वा꣢ ॥
सुषा꣡꣯वसो꣯ममद्रिभि꣢: । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣢इ । आ꣡ऽ२३४ । उ꣥हुवाऽ६हा꣥उ ॥ वा ॥
(दी॰ २०। प॰ २२। मा॰ १४)(३)॥ फी ॥ ९५६ ॥

५१२-४
प꣤ । र्येपारी꣥ ॥ तो꣢꣯षि꣡ञ्चता꣰꣯ऽ२सुत꣡म् । आउवाऽ२३ । हा꣢꣯उ꣣हा꣢꣯उ꣣ । हो꣭ऽ३वा꣢ । सो꣡꣯ मो꣰꣯ऽ२य꣡उत्त꣢म꣡ꣳविः꣡ ।
आउवाऽ२३ । हा꣢꣯उ꣣हा꣢꣯उ꣣ । हो꣭ऽ३वा꣢ । दधन्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣰꣯ऽ२प्सु꣡वन्त꣢रा꣡उ । वाऽ२३ । हा꣢꣯उ꣣हा꣢꣯उ꣣ ।
हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ सुषा꣡꣯वाऽ२३ सो꣢ऽ३ । हा꣢꣯उ꣣हा꣢꣯उ꣣ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ म꣣म꣢ । द्रा꣡ऽ२३४इभाइ । उ꣥हुवाऽ६᳚हा꣥उ ॥
वा ॥
(दी॰ १६। प॰ २१। मा॰ १७)(४)॥ के ॥ ९५७ ॥

५१२-५ आभीशवे द्वे।   द्वयोरभीशुर्बहती सोमः ॥
प꣥री꣯तो꣯षिञ्चता꣯सुतम् । ए ॥ सो꣢꣯मो꣯यउऽ३त्ता꣡म꣪ꣳहावि꣢ ᳐: ॥ दा꣣ऽ२३४धा꣥ । हा꣢इ ।
न्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣯अप्सूअ꣪न्तारा꣢ ᳐ ॥ सू꣣ऽ२३४षा꣥ । हा꣢इ ॥ वा꣡सो꣯म꣢मो꣡ऽ२३४वा꣥ । द्रा꣤ऽ५इभोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ १०। मा॰ ९)(५)॥ नो ॥ ९५८ ॥

५१२-६ आभीशवोत्तरम्।
प꣥री꣯तो꣯षिञ्चता꣯सुतम् । ए । सो꣢꣯मो꣯यउऽ३त्ता꣡म꣪ꣳहावि꣢ ᳐: ॥ दा꣣ऽ२३४ धा꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥
न्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣯अप्सूअ꣪न्तारा꣢ ᳐ ॥ सू꣣ऽ२३४षा꣥ । हा꣢ऽ३हा꣢इ ॥ वा꣡सो꣯म꣢मो꣡ऽ२३४वा꣥ । द्रा꣤ऽ५इभोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ ९)(६)॥ तो ॥ ९५९ ॥

५१२-७ माण्डवे द्वे।   द्वयोर्मण्डुर्बृहती सोमः ॥
प꣤री꣥꣯ तो꣤꣯षि꣥ञ्चता꣯सुत꣤म् । इहा ॥ सो꣡꣯मो꣯यउत्त꣢म꣡ꣳहाऽ२३र्वी꣢: । इ꣡हा꣢ ।
दधन्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣯अप्सु꣢व꣡न्ताऽ२३रा꣢ । इ꣡हा꣢ ॥ सुषा꣡꣯वाऽ२३सो꣢ । इ꣡हा꣢ ॥ ममा꣡ऽ२३ ।
द्रा꣡ऽ२᳐इभा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ई꣣ऽ२३४हा꣥ ॥
(दी॰ ११। प॰ ११। मा॰ ६)(७)॥ कू ॥ ९६० ॥

५१२-८
इ꣤हा । परी꣥꣯ तो꣤꣯षि꣥ञ्चता꣯सुत꣤म् । इहा ॥ सो꣡꣯मो꣯यउत्त꣢म꣡ꣳहाऽ२३र्वी꣢: । इ꣡हा꣢उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ३४पा꣥ ।
द꣢धन्वाꣳ꣡꣯यो꣯नर्यो꣯अप्सु꣢व꣡न्ताऽ२३रा꣢ । इ꣡हा꣢उवाऽ३ । ऊ꣢ऽ३४पा꣥ ॥ सु꣢षा꣡꣯वाऽ२३सो꣢ । इ꣡हा꣢उवाऽ३ ।
ऊ꣢ऽ३४पा꣥ । म꣢म꣡द्राऽ२३इभीः꣢ । इ꣡हा꣢उवाऽ३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ १५। मा॰ १०)(८)॥ न्लौ ॥ ९६१ ॥

५१२-९ अभिवाससाम।   अङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
प꣤री꣥꣯ तो꣤꣯षि꣥ञ्चता꣯सुता꣤म् ॥ सो꣢꣯ मो꣡꣯य꣢उ꣡ । त꣢म꣣ꣳह꣢वा꣡इः । दाधा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ।
न्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣯अप्सु꣢व꣡न्ताऽ२३रा꣢ ॥ सुषा꣡꣯वाऽ२३सो꣢ ॥ मा꣡मद्रि꣢भिः । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ ११। मा॰ ८)(९)॥ तै ॥ ९६२ ॥

५१२-१० परिवाससाम।   अङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
प꣤री꣥꣯ तो꣤꣯षि꣥ञ्चता꣯सुत꣤म् । ओ꣥ऽ६वा꣥ ॥ सो꣡꣯ मो꣰꣯ऽ२य꣡उत्त꣢म꣡ꣳह꣢विः꣡ । दधान्वाꣳयो꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢इ ।
न꣡र्यो꣰꣯ऽ२प्सु꣡वन्त꣢रा꣡꣯ ॥ सुषावासो꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३हा꣢ ॥ मा꣡मद्रि꣢भिः । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ ६)(१०)॥ छू ॥ ९६३ ॥

५१२-११ वैष्णवम्।   वेणुर्बहती सोमः ॥
प꣤री꣥꣯ तो꣤꣯षि꣥ञ्च । ता꣤ऽ५सुता꣤म् ॥ सो꣡꣯मो꣯यउत्तामाऽ२१२म् । हा꣡वीऽ२: ।
दधन्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣯अप्सुवाऽ२१२ । ता꣡राऽ२ ॥ सुषा꣡꣯वाऽ२३सो꣢ऽ३ ॥ म꣢मो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
द्रा꣤ऽ५इभोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ७)(११)॥ ढे ॥ ९६४ ॥

५१२-१२ सौमक्रतवीयम्, माण्डवं वा।   सोमक्रतुर्बृहती सोमः ॥
प꣡री꣯तो꣯षाऽ२इ । च꣡ता꣯सुताऽ२म् । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हि꣢हाऽ२इ । उ꣡वाऽ२इ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥
सो꣡꣯मो꣯यऊऽ२ । त꣡मꣳहवीऽ२: । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हि꣢हाऽ२इ । उ꣡वाऽ२इ । ई꣭ऽ३या꣢ ।
द꣡धन्वा꣯ꣳयो꣯नर्योऽ२ । प्सु꣡वन्तराऽ२ । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हि꣢हाऽ२इ । उ꣡वाऽ२इ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥
सु꣡षा꣯वसोऽ२ । म꣡मद्रिभाऽ२इ । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हीऽ२ । ऐ꣡꣯हि꣢हाऽ२इ । उ꣡वाऽ२इ । ई꣭ऽ३या꣢ऽ᳐३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २०। प॰ ३०। मा॰ १४)(१२)॥ मी ॥ ९६५ ॥

५१२-१३ गूर्द्दः।   प्रजापतिर्बृहती सोमः ॥
उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ । उ꣣पा꣢ऽ᳐३१ । उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ । प꣢री꣯तो꣯षि᳐ञ्च꣣ता꣢꣯सु꣣त꣢ ᳐म् ॥ उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ । उ꣣पा꣢ऽ᳐३१ । उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ ।
सो꣢꣯मो꣯यउत्त꣣म꣢ꣳह꣣विः꣢ ᳐ ॥ उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ । उ꣣पा꣢ऽ᳐३१ । उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ । द꣢धन्वा꣯ꣳयो꣯नर्यो꣯ऽ३प्सु꣢वन्त꣣रा꣢꣯ ॥
उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ । उ꣣पा꣢ऽ᳐३१ । उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ । सु꣢षा꣯वसो꣯म꣣म꣢द्रि꣣भिः꣢ ᳐ । उ꣣पा꣢ ᳐उ꣣प꣥ ।
उ꣣पा꣢ऽ᳐३१ । उ꣣पा꣢ऽ३᳐ऊ꣤ऽ५पाऽ६५६ । ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ११। प॰ २०। मा॰ १४)(१३)॥ ङ्वी ॥ ९६६ ॥

५१२-१४ प्रतोदः संगिरसाम् गोष्टः।   अंगिरसो बृहती सोमः ॥ पुꣳस्ति । अंगिरसो बृहती सोमः । महरौरवम् । रुरुर्बृहती सोमः । कश्यपो बृहती सोमः ॥
हा꣥उहाउहाउवा । प꣡री꣯तो꣯षिञ्च꣢ता꣯सुत꣡म् । उपा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ १ ॥
अङ्गिरसां गोष्ठः । अङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
(१५) हा꣥उहाउहाउवा । प꣡री꣯तो꣯षिञ्च꣢ता꣯सुत꣡म् । इहा । उपा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ २ ॥
पुꣳस्ति । अङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
(१६). हा꣥उहाउहाउवा । प꣡री꣯तो꣯षिञ्च꣢ता꣯सुत꣡म् । श्रवो꣯बृ꣢ह꣡त् । उपा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ ३ ॥
महारौरवम् । रुरुर्बृहती सोमः ॥
(१७) हाउहाउवा । प꣡री꣯तो꣯षिञ्च꣢ता꣯सुत꣡म् ॥
(१८) सो꣯मो꣰꣯ऽ२य꣡उत्त꣢म꣡ꣳह꣢विः꣡ ॥ द꣢धन्न्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣰꣯ऽ२प्सु꣡वन्त꣢रा꣡꣯ ॥ सुषा꣯वसो꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ।
हा꣥उहाउहाउवा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । म꣢म꣡द्रिभी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ २०। प॰ १९। मा॰ २३)(१४)॥ भि ॥ ९६७ ॥

५१२-१५ महायौधाजयम्।   युधाजिद्बृहती सोमः ॥
हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ऽ᳐३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । हा꣢उवा । प꣡री꣯तो꣯षिञ्च꣢ता꣯सुत꣡म् ॥
सो꣯मो꣰꣯ऽ२य꣡उत्त꣢म꣡ꣳह꣢विः꣡ ॥ द꣢धन्वा꣡꣯ꣳयो꣯नर्यो꣰꣯ऽ२प्सु꣡वन्त꣢रा꣡꣯ ॥ सुषा꣯वसो꣯ममा । हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हा꣢ऽ᳐३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । हा꣢उवाऽ᳐३ ॥ द्रा꣢ऽ३इभी꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ १३)(१५)॥ गि ॥ ९६८ ॥
५१३-१ आश्वानि चत्वारि (आशम्)।   चतुर्णामश्वो बृहत्यश्वः ईश्वरो वा ॥
आ꣣ऽ२३४सो꣥ ॥ म꣢स्वा꣯नो꣯ऽ३आ꣡ । द्राइभा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ति꣢रो꣡꣯वा꣯रा꣰꣯ऽ२ णिअव्य꣡याऽ२३ ।
जा꣡ना꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ना꣡पा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । रि꣡चमुवो꣰꣯ऽ२र्विश द्ध꣡रीऽ२३ः ॥ सा꣡दा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
वा꣡ना꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । षु꣥दाऽ५ग्निषाइ ॥ हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ११)(१६)॥ ख ॥ ९६९ ॥

५१३-२ सोम साम।
हा꣥꣯वा꣯सो꣯मस्वा ॥ नो꣢अ᳐द्रा꣣ऽ२३४इभी꣥: । ति꣢रो᳐वा꣣ऽ२३४रा꣥ । णि꣢याऽ᳐३१ उवाऽ२३ । व्याऽ२३४या꣥ ॥
ज꣢नो᳐ना꣣ऽ२३४पू꣥ ॥ रा꣢इचा᳐मू꣣ऽ२३४वो꣥: । वि꣢शाऽ᳐३१उवाऽ२३ । हाऽ२३४री꣥: ॥ स꣢दो᳐वा꣣ऽ२३४ने꣥ ॥
षु꣢दाऽ᳐३१उवाऽ२३ ॥ ध्रीऽ२३४षे꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ९)(१७)॥ ठो ॥ ९७० ॥

५१३-३
आ꣤꣯ सो꣥꣯मस्वा꣯नो꣤꣯अद्रि꣥भा꣤इः ॥ ति꣢रो꣡꣯वा꣯रा꣯णिआव्या꣢ऽ१याऽ२ । ज꣡नो꣯नपुरि चामू꣢ऽ१वोऽ२: ।
विशा꣡द्धा꣢ऽ१रीऽ२᳐: ॥ स꣣दो꣯व꣢ना꣡इ ॥ षूऽ२᳐द꣣ध्रि꣢षो꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ ७। मा॰ ८)(१८)॥ थै ॥ ९७१ ॥

५१३-४
आ꣣꣯ सो꣤꣯मस्वा꣯नो꣣꣯अद्रि꣤भि꣥: । तिरो꣯वा꣢ऽ᳐३रा꣤꣯णि꣥अ꣤व्यया꣥ ॥ ज꣡नो꣯नपुरिचमुवो꣯र्वि꣢श꣡द्धरिः । औऽ२ ।
हु꣡वाइ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ स꣡दो꣯वने꣯षु꣢दौऽ२ । हु꣡वाइ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ ध्रिषा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ ७)(१९)॥ बे ॥ ९७२ ॥
५१४-१ त्रिणिधनमाग्नेयम्।   अग्निर्बृहती सोमः ॥
प्र꣥सो꣯मदा । वा꣢वी᳐ता꣣ऽ२३४या꣥इ । सि꣢न्धू꣡र्नापाइप्य꣢आऽ᳐३१उवाऽ२३ । णाऽ२३४सा꣥ ।
आ꣡ꣳ शो᳐ᳲपा꣣ऽ२३४या꣥ ॥ सा꣢꣯म꣡दाइरो꣯न꣢जाऽ᳐३१उवाऽ२३ । गॄऽ२३४वी꣥: ॥ आ꣢च्छा᳐को꣣ऽ२३४शा꣥म् ॥
म꣢धाऽ᳐३१उवाऽ२३ ॥ श्चूऽ२३४ता꣥म् ॥ १
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ १०)(२०)॥ णौ ॥ ९७३ ॥

५१४-२ अग्नेर्वैश्वानरस्य साम।   अग्निर्बृहती सोमः ॥
प्र꣣सो꣤꣯म꣥दे꣯व꣤वी꣥꣯ । त꣣योऽ२३४हा꣥इ ॥ सि꣣न्धु꣤र्न꣣पि꣤प्ये꣥꣯अ । ण꣣सोऽ२३४हा꣥इ ॥ आ꣡ꣳशा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
पा꣡या꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ सा꣤꣯मदिरो꣣꣯न꣤जा꣥꣯ । गॄ꣣ऽ२३४ । वी꣥ऽ६ र्हा꣥इ ॥ आ꣡च्छा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
को꣡शा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ म꣤धूऽ५श्चुताम् । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १४। मा॰ १०)(११)॥ झौ ॥ ९७४ ॥

५१४-३ द्विहिङ्कारं वामदेव्यम्।   वामदेवो बृहती सोमः ॥
प्र꣢सो꣡꣯माऽ२३दे꣤꣯ववी꣥꣯तयाइ ॥ सा꣡इन्धुर्नपिप्ये꣯अर्णसा꣯ꣳ शो꣯ᳲपयसा꣯मदिरो न꣢जौ꣣꣯हो꣢ऽ३᳐ । हि꣡म्माऽ२ ।
गॄ꣡ऽ२३र्वी꣢: ॥ अ꣡च्छा꣯को꣯शाम्म꣢धौ꣣꣯हो꣢ऽ३᳐ । हि꣡म्माऽ२ ॥ श्चुता꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १०। मा॰ ६)(२२)॥ ङू ॥ ९७५ ॥

५१४-४ उत्सेधः।   अङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
प्र꣣सो꣤꣯मदे꣯व꣣वी꣤꣯त꣥ये꣯ । सिन्धुः । न꣣पा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ प्ये꣢꣯अ꣡र्णसाऽ२꣮ । हाऽ᳐३१उवाऽ२३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
अ꣣ꣳशो꣢ऽ३:प꣤या । औ꣥꣯हो꣤वाहा꣥इ ॥ सा꣡मदि꣢रो꣡ । न꣢जा꣯गॄ꣡विः꣢ । हाऽ᳐३१उवाऽ२३ । ऊ꣢ऽ᳐३४पा꣥ ॥
अ꣣च्छा꣢ऽ३को꣤꣯शम् । औ꣥꣯हो꣤वाहा꣥इ ॥ म꣣धू꣢ऽ᳐३श्चू꣤ऽ५ताऽ६५६म् ॥ ऊ꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ १६। मा॰ १०)(२३)॥ र्कौ ॥ ९७६ ॥

५१४-५ निषेधः।   अङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
प्र꣥सो꣯मदा꣯इवाऽ६वी꣥꣯तयाइ ॥ सि꣢न्धू꣡र्न꣢पा꣡इ । प्ये꣢꣯अर्ण꣡साऽ२ । इ꣡हा꣢ऽ᳐३ ॥ आ꣡ꣳशो꣢ऽ᳐३:पा꣤या꣥ ।
हा꣢ ᳐हो꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ सा꣡मदि꣢रो꣡ । न꣢जा꣯गॄ꣡ऽ२३र्वी꣢: । इ꣡हा꣢ऽ᳐३ ॥ आ꣡च्छा꣢ऽ᳐३को꣤श꣥म् । हा꣢हो꣣ऽ२३४हा꣥
॥ म꣣धू꣢ऽ३श्चू꣤ऽ५ताऽ६५६म् ॥ हे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ ७)(२४)॥ बे ॥ ९७७ ॥
५१५-१ सोम सामानि षट्।   षण्णां सोमो बृहती सोमाश्वौ ॥
हा꣤उसोमा꣥: ॥ उ꣢ष्वा꣯णऽ᳐३स्सो꣡तॄ꣢ऽ१भीऽ२: । आ꣡धि꣢ष्णु꣡भि꣢र꣡वी꣰꣯ऽ२ना꣯म् । आ꣡श्वौ꣭ऽ३हो꣢ ॥
ये꣡꣯वहरिता꣯या꣯ता᳐इधा꣢ऽ१रायाऽ२ ॥ म꣡न्द्राया꣢ऽ᳐३या꣢ऽ३४ । हा꣥꣯ओ꣤वा꣥ ॥ ति꣢धा꣡꣯रया꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ६)(२५)॥ डू ॥ ९७८ ॥

५१५-२
सो꣥꣯मऊ꣢ऽ᳐३ष्वा꣤꣯ण꣥स्सो꣤꣯तृभा꣥इः ॥ आ꣡धिष्णु꣢भिरवी꣯ना꣯म् । आ꣡श्व꣪येऽ२३४वा꣥ ।
ह꣢रि꣡ता꣯या꣯तिधा꣢ऽ१रा꣢ऽ३या꣢ ॥ मन्द्रा᳐या꣣ऽ२३४या꣥ ॥ ता꣣ऽ२३४इधा꣥ । र꣢या꣡ ।
औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ६)(२६)॥ ञू ॥ ९७९ ॥

५१५-३
सो꣤꣯म꣥उष्वा꣯ण꣤स्सो꣥꣯तृ꣤भि꣥: । ए꣤ऽ५ । अ꣤धी ॥ ष्णु꣡भि꣢राऽ᳐३१उवाऽ२३ । वीऽ२३४ ना꣥म् ॥
आ꣡ऽ२३श्वा꣢ ॥ ये꣡꣯वहरिता꣯या꣯ति꣢धाऽ३᳐१उवाऽ२३ । राऽ२३४या꣥ ॥ मा꣡ऽ२३न्द्रा꣢ ॥
या꣡या꣯ति꣢धाऽ᳐३१उवाऽ२३ ॥ राऽ२३४या꣥ ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ ६)(२७)॥ चू ॥ ९८० ॥

५१५-४
सो꣤꣯म꣥उष्वा꣯ण꣤स्सो꣥꣯तृ꣤भि꣥: । ए꣤ऽ५ । अ꣤धी ॥ ष्णु꣡भि꣢र꣡वी꣰꣯ऽ२ । ना꣡म् । आश्वये꣢꣯व । हा꣡रि꣪तायाऽ२ ।
ता꣡इधा꣯र꣢या꣯ । मा꣡न्द्रयायौ꣢वा᳐ ॥ ती꣣ऽ२३४धा꣥ । र꣢या꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ १४। मा॰ ५)(२८)॥ झु ॥ ९८१ ॥

५१५-५
सो꣤꣯म꣥उष्वा꣯ण꣤स्सो꣥꣯तृ꣤ । भाइ । अधि꣥ष्णु꣤भि꣥र꣤वी꣥꣯ । नाम् ॥ अ꣡धि꣢ष्णु꣡भि꣢र꣡वी꣰꣯ऽ२ । ना꣡म् । अश्वये꣯वा ।
ह꣢रि꣡ता꣯या꣯ताऽ२३इधा꣢ । रयाऽ३१उवाऽ२३ ॥ माऽ२३४न्द्रा꣥ ॥ या꣢या᳐ती꣣ऽ२३४धा꣥ ॥ र꣣या꣢ ᳐औ꣣꣯हो꣤वा꣥ ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १४। मा॰ ८)(२९)॥ धै ॥ ९८२ ॥

५१५-६
सो꣣꣯म꣤उष्वा꣯ण꣣स्सो꣤꣯तृभि꣥: । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ᳐३इ । आ꣡ऽ२३४ । धिष्णुभि꣥र꣤वी꣥꣯नाम् ॥ आ꣡श्वये꣢꣯वहरिता꣯या꣯ ।
तिधा꣡रायौ꣢ । वाओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ म꣢न्द्र꣡या꣯याती꣢ऽ᳐३धा꣢ ॥ हि꣭म्ऽ३स्थिहि꣢म्ऽ᳐३४३ । रा꣢ऽ३४५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ ८)(३०)॥ णै ॥ ९८३ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने चतुर्दशः प्रपाठकः ॥ १४ ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — पञ्चदशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ पञ्चमः खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-७, सा-२७)

५१६-१ वैष्णवे द्वे।   द्वयोर्विष्णुर्बृहती सोमः ॥
त꣥वा꣯हꣳसो ॥ म꣢राऽ२रणा꣡ । रण । सख्यइन्दो꣯दिवाऽ२इदिवा꣡इ । दिवे꣯ ।
पुरू꣯णिबभ्रो꣯निचरन्तिमाऽ२मवा꣡ । अव ॥ परिधी꣯ꣳरतिताऽ२ꣳइहा꣡ऽ२३इ । आ꣡ऽ२᳐इ ।
हा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ६)(१)॥ ठ्रू ॥ ९८४ ॥

५१६-२ वैष्णवोत्तरम्।
त꣤वा꣥꣯ । तवा꣤ ॥ अ꣢ह꣡ꣳसो꣯मरा꣯रण । सख्याई꣢ऽ᳐३न्दो꣢ । दिवा꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ । दा꣡इवेऽ२ ।
पुरू꣡꣯णिबभ्रो꣯निचरन्तिमा꣢ऽ१मा꣢ऽ᳐३वा꣢ ॥ परा꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ ॥ धा꣡इꣳरति꣢तो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
आ꣤ऽ५इहोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ७)(२)॥ मे ॥ ९८५ ॥

५१६-३ आङ्गिरसानि त्रीणि।   त्रयाणामङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
त꣥वा꣯हꣳसो꣯माऽ६रा꣥꣯रणा ॥ सा꣢ख्या᳐ई꣣ऽ२३४न्दो꣥ । दि꣢वे᳐दा꣣ऽ२३४इवे꣥ । पु꣤रू꣣꣯णि꣤बभ्रो꣯नि꣣च꣤र꣥न्तिमा꣯म् ।
आ꣡वाऽ२३४हा꣥इ ॥ पा꣤री꣥धा꣤इꣳरा꣥ । ति꣢तो꣡ऽ२३४वा꣥ । आ꣤ऽ५इहोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ७)(३)॥ गे ॥ ९८६ ॥

५१६-४
त꣤वा꣥꣯ ह꣤ꣳ सो꣥꣯मरौ꣯ । हो꣤ऽ५रणा꣤ ॥ सा꣡ख्य꣢इ꣡न्दोऽ२᳐ ॥ दि꣣वा꣢ऽ३४५इ । दी꣣ऽ२३४वे꣥ ।
पू꣡रूऽ२णा꣡इबाऽ२ । भ्रो꣡꣯निचराऽ२᳐ । ति꣣मा꣢ऽ३४५म् । आ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ पा꣡रीऽ२धा꣡इꣳराऽ२᳐ ॥
ति꣣ता꣢ꣳऽ३४५ ॥ ई꣣ऽ२३४ही꣥ ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ ५)(४)॥ थु ॥ ९८७ ॥

५१६-५
त꣣वा꣤꣯ ह꣣ꣳ सो꣤꣯म꣥रा꣯रण । सख्यइ꣢न्दो꣣꣯दि꣤वे꣯दि꣥वाइ ॥ स꣢ख्य꣡इन्दो꣯दि꣢वे꣡꣯दाऽ२३ इवे꣢ ।
पुरू꣡꣯णिबभ्रो꣯निचरन्ति꣢मा꣡꣯माऽ२३वा꣢ ॥ परा꣡इधाऽ२३इꣳरा꣢ ॥ तिता꣡ऽ२३ꣳइहा꣢ऽ᳐३४३इ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ ८। मा॰ ९)(५)॥ बो ॥ ९८८ ॥
५१७-१ औह््णोरंध्राणि त्रीणि (स्वारम्)।   त्रयाणामुह््णोरन्ध्रो बृहती सोमः ॥
मृ꣥ज्यमा꣯नाः ॥ सु꣢हस्तियाऽ᳐३ । सा꣡मू꣢ऽ᳐३द्रा꣤इवा꣥ । च꣢मिन्वसाऽ᳐३इ । रा꣡यी꣢ऽ३᳐म्पा꣤इशा꣥ ।
गं ꣢बहुलाऽ᳐३म् । पू꣡रूऽ२᳐स्पॄ꣣ऽ२३४हा꣥म् ॥ प꣡वमा꣢꣯ । ना꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣢ ॥ भियो꣡ऽ२३४वा꣥ ।
षा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ १२। मा॰ ७)(६)॥ छे ॥ ९८९ ॥

५१७-२
मृ꣥ज्यमा꣯नाः ॥ सु꣢हस्ता꣡याऽ२ । स꣡मुद्रे꣢꣯वा꣯ । चा꣡मि꣪न्वासाऽ२३४इ ॥ र꣣या꣢ऽ᳐᳐३४इम्पि꣣शा꣢ ।
गं ꣡बहुलंपूरु꣪स्पृहाऽ२म् ॥ प꣡वाऽ२३ । मा꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भि꣡या꣰꣯ऽ२र्षसी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ५)(७)॥ घु ॥ ९९० ॥

५१७-३
मृ꣥ज्यमा꣯नाः ॥ सु꣢ह । स्ति꣡या । सा꣢ऽ१मूऽ२द्रा꣡इवाऽ२ । चमि । न्व꣡साइ । रा꣢ऽ१यीऽ२म्पा꣡इशाऽ२ ।
गं ꣡बहु꣢लं ꣡पुरु꣢ । स्पृ꣡हाम् ॥ पा꣢ऽ१वाऽ२मा꣡नाऽ२३ ॥ भा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ षा꣣ऽ२३४सी꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ६)(८)॥ ठू ॥ ९९१ ॥

५१७-४ आग्नेयानि त्रीणि।   त्रयाणामग्निर्बृहती सोमः ॥
मृ꣥ज्याऽ६ए꣥ ॥ मा꣡꣯नस्सुहस्तियाऔ꣢ऽ᳐३हो꣢ । समुद्रे꣡꣯वा꣯चमिन्वसाऔ꣢ऽ᳐३हो꣢ ।
रयिं ꣡पिशङ्ग ंबहुलंपुरुस्पृहाऔ꣢ऽ᳐३हो꣢ ॥ पव꣡माऽ२३ना꣢ऽ᳐३ ॥ भि꣢यो꣡ऽ२३४वा꣥ । षा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ५)(९)॥ ठु ॥ ९९२ ॥

५१७-५
मृ꣥ज्य꣤मा꣥꣯नस्सुहस्त्यो꣤ । वाहा꣥इ ॥ स꣢मुद्रा꣡इवा । च꣪मीऽ२᳐न्वा꣣ऽ२३४सी꣥ । र꣣या꣢ऽ᳐३४इम्पि꣣शा꣢ ।
गं ꣡बहु꣢लम् । पू꣡रु꣪स्पृहाऽ२३४म् ॥ प꣣वा꣢ऽ३४मा꣣꣯ना꣢ऽ᳐३ ॥ भि꣢यो꣡ऽ२३४वा꣥ । षा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ६)(१०)॥ ञू ॥ ९९३ ॥

५१७-६
मृ꣤ज्यमा꣯नाऽ५स्सुहस्ति꣤या ॥ स꣡मूऽ२द्रा꣡इवाऽ२ । च꣡माऽ२इन्वा꣡सीऽ२ । रयिं ꣡पिशङ्ग ंबहुलं ।
पू꣡र꣪स्पृहाऽ२३४म् ॥ प꣣वा꣢ऽ३४मा꣢꣯ना꣢ऽ᳐३ ॥ भि꣢यो꣡ऽ२३४वा꣥ । षा꣤ऽ५सोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ७। मा॰ ४)(११)॥ खी ॥ ९९४ ॥

५१७-७ ऐडमौह््णोरन्ध्रम्।   उह््णोरन्ध्रो बृहती सोमः ॥
मृ꣥ज्य꣤मा꣥꣯नस्सुहस्त्या꣯ । समुद्रे꣯वो꣤वा꣥ ॥ चा꣡मिन्व꣢सि । रा꣡यिं ꣪पिशा꣢ऽ᳐३ । हा꣢ऽ३हा꣢ ॥ गं ꣡बहु꣢लं ꣡पुरु꣢स्पृ꣡ह꣢म् ।
प꣡वमाना꣢ऽ३ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ ॥ भिय꣡र्षाऽ२३सा꣢ऽ᳐३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ३)(१२)॥ टि ॥ ९९५ ॥

५१७-८ वाजजित्।   प्रजापतिर्बृहती सोमः ॥
मृ꣥ज्य꣤मा꣥꣯नस्सुहा꣤ ॥ स्ति꣡याऽ२ । स꣡मूऽ२हो꣡ । द्रे꣯वाऽ२हो꣡ । चा꣢꣯मि꣡न्वसाइ । रयाऽ२इꣳहो꣡इ ।
पिशाऽ२हो꣡ । ग꣢म्ब꣡हुलाम् । पू꣢꣯रु꣡स्पृहाम् । पवाऽ२हो꣡ । मा꣯नाऽ२ हो꣡ । भी꣢꣯य꣡र्षसा꣢ऽ᳐३१उवाऽ२३ ।
वा꣢꣯ जी꣡꣯जिगी꣢ऽ᳐३वा꣢ꣳऽ१ ॥
(दी॰ ८। प॰ १३। मा॰ ६)(१३)॥ डू ॥ ९९६ ॥
५१८-१ वैश्वदेवे द्वे।   द्वयोर्विश्वेदेवा बृहती सोमः ॥
हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ । अभिसो꣯मा꣯सऽ३᳐आ꣡या꣢ऽ१वाऽ२३ः ॥ हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ । पवन्ते꣯मदिऽ३᳐या꣡म्मा꣢ऽ१दाऽ२३म् ॥
हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ । समुद्रस्या꣯धिविष्टपे꣯मऽ३᳐ना꣡इषा꣢ऽ१ इणाऽ२३ः ॥ हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ।
मत्सरा꣯सो꣯मऽ३दा꣡च्यू꣢ऽ१ताऽ२३ः । हा꣢ऽ३᳐हा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ११। मा॰ १३)(१४)॥ चि ॥ ९९७ ॥

५१८-२
आ꣤भी꣥सो꣤मा꣥ ॥ स꣢आऽ३१उवाऽ२३ । याऽ२३४वा꣥: । पा꣤व꣥न्ता꣤इमा꣥ । दि꣢याऽ३१उवाऽ२३ ।
माऽ२३४दा꣥म् । सा꣤मु꣥द्र꣤स्या꣥ ॥ धि꣢वि꣡ष्टापे꣯म꣢नाऽ᳐३१ उवाये꣢ऽ᳐३ । षीऽ२३४णा꣥: ।
मा꣤त्सा꣥रा꣤सा꣥: ॥ म꣢दाऽ३१उवाऽ᳐२३ ॥ च्यूऽ२३४ता꣥: ॥
(दी॰ १। प॰ १२। मा॰ ११)(१५)॥ ख ॥ ९९८ ॥

५१८-३ इन्द्रसामनी द्वे।   द्वयोरिन्द्रो बृहती सोमः ॥
अ꣢भि꣡सो꣢ऽ᳐३मा꣤꣯सआ꣥꣯यवाः ॥ प꣡वन्ते꣢꣯म꣡दिय꣢म्म꣡ । दा । औ꣢ऽ᳐३हो꣢ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ ॥
समुद्र꣡स्या꣯धिवि꣢ष्ट꣡पे꣯म꣢नी꣯षि꣡ । णाऽ । औ꣢ऽ᳐३हो꣢ । आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ । मत्सरा꣡꣯सो꣯म꣢दच्यु꣡ । ताऽ ।
औ꣢ऽ᳐३हो꣢ ॥ आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ १५। मा॰ ६)(१६)॥ णू ॥ ९९९ ॥

५१८-४
अ꣥भि꣤सो꣯मा꣥꣯सआ꣯ । हो꣤ऽ५यवा꣤: ॥ प꣡वन्ते꣯मद्यम्मदम्पवन्ते꣯म । दि꣢या꣡ꣳहोइ । माऽ२३दा꣢म् ॥
समुद्र꣡स्या꣯धिविष्टपे꣯मनी꣯षिणाः । म꣢ना꣡होइ । षाऽ२३इणा꣢: । मत्सरा꣡꣯सो꣯मदच्युताः । म꣢दा꣡होइ ।
च्यूऽ२३ता꣢ऽ᳐३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ १२)(१७)॥ बा ॥ १००० ॥

५१८-५ स्वःपृष्ठमाङ्गिरसम्।   अङ्गिरसो बृहती सोमः ॥
अ꣡भाऽ२᳐इसो꣣꣯मा꣢ऽ३४ । औ꣣꣯हो꣤ऽ५सआ꣯य꣤वाः ॥ प꣡वाऽ२᳐न्ते꣣꣯मा꣢ऽ३४ । औ꣣꣯हो꣤ऽ५दियम्म꣤दाम् ।
स꣡मूऽ२᳐द्र꣣स्या꣢ऽ३४ । औ꣣꣯हो꣤ऽ५धिविष्ट꣤पाइ । ओ꣡ये꣢ऽ᳐३ । मा꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । षी꣣ऽ२३४णा꣥: ।
ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ । ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥ म꣣त्स रा꣢꣯सो꣡ऽ२३ ॥ मा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ च्यू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥
(दी॰ ११। प॰ १४। मा॰ ९)(१८)॥ घो ॥ १००१ ॥

५१८-६ इन्द्रसामानि त्रीणि।   त्रयाणामिन्द्रो बृहती सोमः ॥
औ꣤꣯ हो꣥꣯वा꣤ । अ꣥भि꣤सो꣯मा꣥꣯सआ꣯य꣤व꣥: । औ꣤꣯ हो꣥꣯वा꣤ । प꣡वाऽ२᳐ । ते꣣꣯मा꣢ऽ३ऽ५वाऽ६५६ । दि꣢यम्म꣡द꣢म् ।
स꣡मूऽ२᳐ । द्र꣣स्या꣢ऽ᳐३ओ꣤ऽ५वाऽ६५६ । धि꣢विष्ट॒꣡पे꣢꣯ऽ२मनी꣯षषि꣡णा꣰꣯ऽ२: । वौ꣭ऽ३हो꣢ऽ३१इ ।
मत्साऽ२᳐ । रा꣣꣯सा꣢ऽ३ओ꣤ऽ५वाऽ६५६ ॥ म꣢दच्यु꣡ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ १३। मा॰ ९)(१९)॥ जो ॥ १००२ ॥

५१८-७
अ꣥भिसो꣯मा꣯सआ꣯याऽ६वा꣥: । प꣡वाऽ२᳐ । ते꣣꣯मा꣢ऽ᳐३ओ꣤ऽ५वाऽ६५६ । दि꣢यंम꣡द꣢म् । स꣡मूऽ२᳐ ।
द्र꣣स्या꣢ऽ३ओ꣤ऽ५वाऽ६५६ । धि꣢विष्ट꣡पे꣰꣯ऽ२मनी꣯षि꣡णा꣰꣯ऽ२: ॥ म꣡त्साऽ२᳐ ॥ रा꣣꣯सा꣢ऽ᳐३ओ꣤ऽ५वाऽ६५६ ।
म꣢दच्यु꣡ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ १०। मा॰ ८)(२०)॥ णै ॥ १००३ ॥

५१८-८
अ꣥भिसो꣯मा꣯सआ꣯याऽ६वा꣥: ॥ प꣡वन्ताइमा । दि꣪याऽ२᳐म्मा꣣ऽ२३४दा꣥म् । स꣣मुद्र꣢स्या꣡ । धि꣢वि꣡ष्टपाइ ।
मना꣢ऽ᳐३इषा꣤इणा꣥: ॥ मा꣡त्स꣢रा꣯सो꣡ऽ२३ ॥ मा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ च्यू꣣ऽ२३४ता꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ १०)(२१)॥ घौ ॥ १००४ ॥
५१९-१ सोमसाम।   सोमो बृहती सोमः ॥
पु꣥ना꣯न꣤स्सो꣥꣯मजा꣤꣯गृ꣥विर꣤व्याः ॥ वा꣡꣯ रै꣯ᳲपारि꣪प्रियाऽ२: । त्वं ꣡विप्रो꣯अभवो꣯ङ्गाइराऽ२३४ । स्त꣣मा꣢ऽ३ ॥
मा꣡ध्वा꣢꣯यज्ञा꣡ऽ२३म् । मा꣡ऽ२᳐इमा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्षा꣣ऽ२३४णा꣥: ॥
(दी॰ १०। प॰ ७। मा॰ ८)(२२)॥ फै ॥ १००५ ॥
५२०-१ सोमसाम।   सोमो बृहतीन्द्रो मरुत्वान् ॥
इ꣥न्द्रा꣯यपा ॥ व꣢ताऽ२इमा꣡दाऽ२: । सो꣡꣯मो꣯मरुत्वताऽ२इसू꣡ताऽ२: । स । हा꣡स्रधा꣢꣯रः ।
अ꣡तिअव्यमाऽ२र्षा꣡तीऽ२ ॥ तमाऽ२इमा꣡र्जाऽ२ ॥ तिआ꣡꣯याऽ२वा꣢ऽ᳐३४३: । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ १०)(२३)॥ मौ ॥ १००६ ॥

५२०-२ स्वः पृष्ठमाङ्गिरसम्।   अङ्गिरसो बृहतीन्द्रो मरुत्वान् ॥
इ꣥न्द्रा꣯यपा ॥ व꣢ते꣯म꣡दाः । सो꣢꣯मो꣯मा꣡रूऽ२ । त्व꣡तेहोऽ२इ । सू꣡ताऽ२: । स । हा꣡स्रधा꣢꣯रः ।
अ꣡तिअव्यमा । षाता꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥ त꣡मीहोऽ२इ । मा꣡र्जाऽ२ ॥
तिआ꣡꣯याऽ२३वा꣢ऽ᳐३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १५। मा॰ १०)(२४)॥ ङौ ॥ १००७ ॥

५२०-३ सोमसाम।   सोमो बृहतीन्द्रो मरुत्वान् ॥
इ꣥न्द्रा꣯या꣢ऽ᳐३पा꣤व꣥ता꣤इमदा꣥: ॥ सो꣡꣯मो꣯मरुत्वता꣢ऽ१इसू꣢ऽ᳐३ता꣢: । स । हा꣡स्रधा꣢꣯रः ॥ अ꣡तिअव्यमा꣢ऽ᳐३ ।
षा꣤ती꣥ ॥ त꣢मा꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ऽ᳐३इ । मा꣤र्जा꣥ ॥ ता꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ या꣣ऽ२३४वा꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ १०)(२५)॥ ङौ ॥ १००८ ॥
५२१-१ सोमसाम।   देवाः देवताः सोमश्च ॥
प꣤व꣥स्ववा꣯जसा꣤꣯ । इहा । ता꣣ऽ२३४मा꣥: । अ꣢भि꣡विश्वा꣢꣯निवा꣡꣯रिया꣢꣯ । त्व꣡ꣳसाऽ२᳐मू꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ।
द्रᳲ꣡प्र꣢थमे꣡꣯विध꣢र्मन् ॥ दा꣡इवाये꣢ऽ३ ॥ भ्या꣡ऽ२᳐स्सो꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ म꣢मत्स꣣रा꣢ऽ१ः ॥
(दी॰ १०। प॰ ९। मा॰ ६)(२६)॥ भू ॥ १००९ ॥
५२२-१ पवित्रम्।   आदित्योबृहतीमरुत्वान्त्सोमः ॥
प꣤व꣥मा꣯ना꣯असृक्षतपवा꣤इ ॥ त्रा꣡मतिधा꣯रया꣯मरुत्वन्तो꣯मत्सरा꣯इन्द्री꣢ऽ३या꣢: ॥ हयाः꣡ ॥
माऽ२३इधा꣢म् ॥ अ꣡भाये꣢ऽ३ । प्रा꣡ऽ२᳐या꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ सी꣣ऽ२३४चा꣥ ॥
(दी॰ ८। प॰ ७। मा॰ ८)(२७)॥ ठै ॥ १०१० ॥
॥ त्रिसप्तति पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥ दशतिः ॥ ३ ॥

॥ अथ षष्ठः खण्डः॥ (ऋ-२, सा-९)

५२३-१ औशनानि पञ्।   उशनास्त्रिष्टुबश्वः अग्निर्वा ॥
ओ꣢इ᳐प्र꣣तु꣥ । इ꣣हा꣢ऽ३१ । द्र꣢वा꣡ । परिको꣢ऽ᳐३ । श꣢न्नि꣣षी꣤दा꣥ ॥ ओ꣢इ᳐नृ꣣भि꣥: । इ꣣हा꣢ऽ३१ । पु꣢ना꣡ ।
नो꣢ऽ᳐३अ꣡भि । वा꣢ ᳐ज꣣म꣤र्षा꣥ ॥ ओ꣢ ᳐अ꣣श्व꣥म् । इ꣣हा꣢ऽ३१ । न꣢त्वा꣡ । वा꣢ऽ३जि꣡नम् । म꣢र्ज꣣य꣤न्ता꣥: ॥
ओ꣢ ᳐अ꣣च्छ꣥ । इ꣣हा꣢ऽ३१ । ब꣢र्हा꣡इः । र꣢श꣡ना꣯ । भा꣢ऽ३४३इः । ना꣢ऽ᳐३या꣤ऽ५न्ताऽ६᳚५६इ ॥
(दी॰ १। प॰ २१। मा॰ १४)(२८)॥ की ॥ १०११ ॥

५२३-२ वृषौशनं साम।
प्र꣤तु꣥ । ए꣤प्रतू꣥ । द्र꣢वा꣡ । (द्विः) । परिको꣢ऽ᳐३ । श꣢न्नि꣣षी꣤दा꣥ ॥ नृ꣤भि꣥: । ए꣤नृभी꣥: । पु꣢ना꣡ । (द्विः) ।
नो꣢ऽ᳐३अ꣡भि । वा꣢ ᳐ज꣣म꣤र्षा꣥ ॥ अ꣤श्व꣥म् । ए꣤अश्वा꣥म् । न꣢त्वा꣡ । (द्विः) । वा꣢ऽ᳐३जि꣡नम् । म꣢र्ज꣣य꣤न्ता꣥: ।
अ꣤च्छ꣥ । ए꣤अच्छा꣥ । ब꣢र्हा꣡इ । ब꣢र्हा꣡इः । र꣢शना꣡꣯भिः꣢ ᳐ । न꣣ये꣢ऽ३४ । हि꣥याऽ६हा꣥उवा ॥ ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ १। प॰ २६। मा॰ १५)(२९)॥ कु ॥ १०१२ ॥

५२३-३ जानस्याभीवर्तौद्वौ।
प्र꣤तु꣥द्रा꣤ ॥ वा꣡परिको꣯शाम् । निषी꣢ऽ᳐३दा꣢ । सा꣡इदा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३वा꣢ । नृ꣡भि:पुना꣯नो꣯अभिवा ।
ज꣪माऽ२३र्षा꣢ । आ꣡र्षा꣢ । औ꣣꣯हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३वा꣢ । अ꣡श्व न्नत्वा꣯वा꣯जिनम्मा । ज꣪याऽ२३न्ता꣢: ।
या꣡न्ता꣢ । औ꣣꣯हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ अच्छा꣡꣯ब꣢र्हा꣡इः ॥ र꣢शना꣡꣯भि꣢: । न꣣ये꣢ऽ३४ । हि꣥याऽ६हा꣥उवा ॥
ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ १३। प॰ २१। मा॰ १२)(३०)॥ टा ॥ १०१३ ॥

५२३-४
हा꣥꣯ओऽ६हा꣥ । उ꣣हुवा꣢ऽ३४ । ओ꣥ऽ६हा꣥ । प्र꣢तु꣡द्रवा । परिको꣢ऽ᳐३ । श꣢न्नि꣣षी꣤दा꣥ ॥ नृ꣢भा꣡इ:पु꣢ना꣡ ।
नो꣢ऽ३अ꣡भि । वा꣢ ᳐ज꣣म꣤र्षा꣥ ॥ अ꣢श्व꣡न्नत्वा । वा꣢ऽ᳐३जि꣡नम् । म꣢र्ज꣣य꣤न्ता꣥: ॥ हा꣥꣯ओऽ६हा꣥ । उ꣣हुवा꣢ऽ३४ ।
ओ꣥ऽ६हा꣥ । अच्छा꣡꣯ब꣢र्हा꣡इः । र꣢श꣡ना꣯ । भा꣢꣯ऽ३४३इः । ना꣢ऽ᳐३या꣤ऽ५᳚न्ताऽ६५६इ ॥
(दी॰ ४। प॰ १९। मा॰ ११)(३१)॥ ध ॥ १०१४ ॥

५२३-५ त्रिष्टुबौशनम्।
प्रा꣤तू꣥ ॥ द्र꣡वापरिको꣯शाम् । निषी꣢ऽ३दा꣢ । नृभा꣡इ:पु꣢ना꣡ । नो꣢ऽ᳐३अ꣡भि । वा꣢ ᳐ज꣣म꣤र्षा꣥ ॥
अ꣡श्वन्नत्वा꣯वा꣯जिनम्मा । ज꣪याऽ२३न्ता꣢: ॥ अच्छा꣡꣯ब꣢र्हा꣡इः । र꣢श꣡ना꣯ । भा꣢ऽ᳐३४३इः ।
ना꣢ऽ३या꣤ऽ५᳚न्ताऽ६५६इ ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ९)(३२)॥ फो ॥ १०१५ ॥
५२४-१ वाराहाणि चत्वारि (वाजसनी द्वे)।   चतुर्णां वराहस्त्रिष्टुब्देववराहौ ॥
प्रा꣤ऽ ॥ का꣡꣯वियाऽ२म् । उ꣡शनेवाऽ२ । ब्रुवा꣡ऽ२३णा꣢: । दे꣡꣯वो꣯देवाऽ२ । ना꣡꣯ञ्जनिमाऽ२ ।
विवा꣡ऽ२३क्ती꣢ ॥ म꣡हिव्राताऽ२: । शु꣡चिबन्धूऽ२: । पवा꣡ऽ२३का꣢: ॥ प꣡दा꣯वाराऽ२ ।
हो꣡꣯अभियाऽ२᳐इ । ति꣣रा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡न् ॥
(दी॰ ८। प॰ १४। मा॰ ९)(३३)॥ ढो ॥ १०१६ ॥

५२४-२
प्र꣡का꣯वियाऽ२म् । उ꣡शनेवाऽ२ । ब्रुवा꣡णाऽ२: ॥ दे꣡꣯वो꣯देवाऽ२ । ना꣡꣯ञ्ज निमाऽ२ । विवा꣡क्तीऽ२ ॥
म꣡हिव्राताऽ२: । शु꣡चिबन्धूऽ२: । पवा꣡काऽ२: ॥ प꣡दा꣯वाराऽ२ । हो꣡ऽ२᳐ । भि꣣या꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ति꣢रे꣡꣯भा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡न् ॥
(दी॰ ८। प॰ १३। मा॰ ७)(३४)॥ डे ॥ १०१७ ॥

५२४-३
प्र꣢का꣯व्यमुशने꣯वब्रूऽ᳐३वा꣡णो꣢ ᳐ । दे꣣ऽ२३४वा꣥: ॥ दे꣢꣯वा꣯ना꣯ञ्जनिमा꣯विऽ᳐३वा꣡क्ती꣢ ᳐ । मा꣣ऽ२३४ही꣥ ॥
व्र꣢तश्शुचिबन्धु:पऽ३वा꣡क꣢: । पा꣣ऽ२३४दा꣥ ॥ व꣢रा꣯हो꣯अभ्ये꣯ति꣡राऽ२३ । हा꣢उवाऽ३ ॥
भाऽ२३꣡४꣡५꣡न् ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ५)(३५)॥ धु ॥ १०१८ ॥

५२४-४ वाराहम्।
हा꣥꣯उहा꣯उ । हु꣡प् । प्र꣢का꣡꣯वियाम् । उ꣢श꣡ने꣯ । व꣢ब्रु꣣वा꣤णा꣥: ॥ दे꣢꣯ वो꣡꣯दे꣯वा । ना꣢ऽ३ञ्ज꣡नि । मा꣢ ᳐वि꣣व꣤क्ती꣥ ॥
म꣢हि꣡व्रताः । शुचिबा꣢ऽ᳐३ । धु꣢:प꣣वा꣤का꣥: ॥ हा꣯उहा꣯उ । हु꣡प् । प꣢दा꣡꣯वरा । हो꣢ऽ᳐३अ꣡भि । आ꣢ऽ३४३इ ।
ती꣢ऽ३रा꣤ऽ५᳚इभाऽ६५६न् ॥
(दी॰ १०। प॰ १७। मा॰ १४)(३६)॥ फी ॥ १०१९ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने पञ्चदशस्यार्धः प्रपाठकः ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — पञ्चदशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ षष्ठः खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-८, सा-१५)

५२५-१ संक्रोशास्त्रयः।   त्रयाणामङ्गिरसत्रिष्टुप्सोमः सूर्योवा ॥
हो꣡इ । हो । हा꣢ऽ᳐३हो꣡इ । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ १ ॥
हो꣡इयाऽ२३हो꣡इ । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ २ ॥
आ꣢꣯ । हो꣡इयाऽ२३ हो꣡इ । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ ३ ॥
॥ सामसुरसी द्वे । द्वयोः समसुरास्त्रिष्टुप्सोमः सूर्योवा ॥
हो꣡इहा । इ꣢हो꣡इहा । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ᳐३१इ । इहा । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ ४ ॥
हो꣡इया । इ꣢यो꣡इया । औ꣭ऽ३हो꣢ऽ᳐३१इ । इया । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ ५ ॥
(दी॰ ११। प॰ २९। मा॰ २२)(१)॥ घा ॥ १०२० ॥

५२५-२ वेणोर्विशाले द्वे।   वेणुस्त्रिष्टुप्सोमः सूर्योवा ॥
इ꣣हो꣢ ᳐इ꣣ह꣥ । इ꣢हो꣯इहाऽ᳐३हो꣡ । वा꣣꣯हो꣢ ᳐इ꣣ह꣥ । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ ६ ॥
इ꣥हो꣤꣯वाऽ५ । इ꣢हो꣡वाऽ२३ । ई꣢ऽ᳐३४हहा꣥इ । ई꣤ऽ५ । इ꣤हा । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ ७ ॥
॥ तन्त्रातन्त्रे द्वे । गोतमास्त्रिष्टुप्सोमः सूर्योवा ॥
इ꣢हो꣡वाऽ२३ । ई꣢ऽ३४हहा꣥इ । इ꣤हा । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ ८ ॥
आ꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ । आ꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा । हा꣢ऽ᳐३हा꣢इ । तिस्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ ९ ॥
॥ अगस्त्यस्य यमिके द्वे । द्वयोरगस्त्यस्त्रिष्टुप्सोमः सूर्योवा ॥
आ꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣯वा꣯हा꣢ऽ३४ । औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । ति꣢स्रो꣡꣯वा꣯चाः । ई꣢ऽ᳐३र꣡य । ति꣢प्र꣣व꣤ह्नी꣥: ॥ १० ॥
(दी॰ १९। प॰ ३३। मा॰ १८)(२)॥ दै ॥ १०२१ ॥

५२५-३
ओ꣣꣯हा꣢ऽ᳐३ । ओ꣤हा꣥ओ꣤हा꣥ । ऋ꣢त꣡स्यधाइ । ती꣢ऽ᳐३म्ब्र꣡ह्म । णो꣢ ᳐म꣣नी꣤षा꣥म् ॥ ११ ॥
॥ वारवन्तीये द्वे ॥ द्वयोरिन्द्रस्त्रिष्टुप्सोमः ॥
ह꣡ह꣢हो꣡इ । हह꣢हा꣣꣯ह꣢हो꣡इ । गा꣢꣯ वो꣡꣯यन्ताइ । गो꣢ऽ᳐३प꣡तिम् । पृ꣢च्छ꣣मा꣤ना꣥: ॥ १२ ॥
इ꣡ह꣢हो꣡इ । इह꣢हा꣣꣯ह꣢हो꣡इ । सो꣢꣯मं ꣡यन्ताइ । म꣢त꣡यः । वा꣢ऽ᳐३४३ । वा꣢ऽ᳐३शा꣤ऽ५᳚नाऽ६५६ः ॥ १३ ॥
(दी॰ ६। प॰ १६। मा॰ १३)(३)॥ कि ॥ १०२२ ॥
५२६-१ अगस्त्यस्य यमिके द्वे, अष्टौ वासिष्ठानि।   उत्तरयोर्विश्वेदेवाः । षण्णां वसिष्ठस्त्रिष्टुब्देवाः ॥
अ꣣स्या꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । प्रे꣡꣯षा । हे꣢ऽ᳐३म꣡ना꣯ । पू꣢ ᳐य꣣मा꣤ना꣥: ॥ १ ॥
उ꣣हुवा꣢इ᳐ । अ꣣स्या꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । प्रे꣡꣯षा । हे꣢ऽ᳐३म꣡ना꣯ । पू꣢ ᳐य꣣मा꣤ना꣥: ॥ २ ॥
हा꣢इ । उहुवा᳐ । दे꣣꣯वा꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । दे꣡꣯वाइ । भी꣢ऽ३᳐स्स꣡म । पृ꣢क्त꣣र꣤सा꣥म् ॥ ३ ॥
हा꣢उ । हो᳐इ । सु꣣ता꣢ऽ३४ औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । प꣡वाइ । त्रा꣢ऽ३म्प꣡रि । ए꣢ ᳐ति꣣रे꣤भा꣥न् ॥ ४ ॥
हा । हा꣢औ꣯हो᳐इ । मि꣣ता꣢ऽ᳐३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ । व꣡सा । द्मा꣢ऽ᳐३प꣡शु । म꣢न्ति꣣हो꣤ता꣥ । प꣡शु । मा꣢ऽ३४३ ।
ती꣢ऽ᳐३हो꣤ऽ५᳚ताऽ६५६ ॥ ५ ॥
(दी॰ १७। प॰ ३०। मा॰ १७)(४)॥ ञे ॥ १०२३ ॥

५२६-२ वासिष्ठम्।
औ꣡꣯ हो꣢꣯ वा꣣꣯हा꣢ऽ᳐३हो꣡इ । इ꣣हा꣢ । अस्य꣡प्रे꣯षा । हे꣢ऽ३म꣡ना꣯ । पू꣢ ᳐य꣣मा꣤ना꣥: ॥ दे꣢꣯ वो꣡꣯दे꣯वाइ । भी꣢ऽ३स्स꣡म ।
पृ꣢क्त꣣र꣤सा꣥म् ॥ सु꣢त꣡ᳲपवाइ । त्रा꣢ऽ᳐३म्प꣡रि । ए꣢ ᳐ति꣣रे꣤भा꣥न् ॥ औ꣡꣯ हो꣢꣯ वा꣣꣯हा꣢ऽ᳐३हो꣡इ । इ꣣हा꣢ । मिते꣡꣯वसा ।
द्मा꣢ऽ᳐३प꣡शु । मा꣢ऽ᳐३४३ । ती꣢ऽ᳐३हो꣤ऽ५᳚ताऽ६५६ ॥ ६ ॥
(दी॰ १२। प॰ १७। मा॰ ७)(५)॥ छे ॥ १०२४ ॥
५२७-१ कालकाक्रन्दौ द्वौ।
सो꣢꣯म:पवते꣯जनिता꣯मऽ᳐३ता꣡इनाऽ२म् ॥ जनिता꣯दिवो꣯जनिता꣯पृऽ᳐३था꣡इव्याऽ२: ॥
जनिता꣡꣯ग्ने꣯र्जनिता꣯सू । रि꣪याऽ२३स्या꣢ ॥ जनिते꣡꣯न्द्रा । स्या꣢ऽ᳐३ज꣡नि । तो꣢ऽ᳐३४३ ।
ता꣢ऽ᳐३वा꣤ऽ५᳚इष्णोऽ६५६ः ॥ ७ ॥
(दी॰ १०। प॰ ८। मा॰ ६)(६)॥ बू ॥ १०२५ ॥

५२७-२
सो꣣꣯ म꣤ᳲप꣥वते꣯जनिता꣯ । ए꣢ऽ᳐३ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤ऽ५वा ॥ मा꣡ताऽ२३४५इनाऽ६५६म् ।
ज꣢निता꣡꣯दि꣢वो꣡꣯जनि꣢ता꣡꣯पृथि꣢व्याः꣡꣯ ॥ जनाऽ२᳐इता꣣ऽ२३४ग्नेः꣥ । ज꣢निता꣯ । सूऽ३४३ ।
री꣢ऽ᳐३या꣤ऽ५स्याऽ६५६ ॥ ज꣢निते꣡꣯न्द्रस्य꣢जनितो꣡꣯तविष्णो꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ ८ ॥ (इत्यष्टौ वासिष्ठानि)
(दी॰ १०। प॰ १०। मा॰ ६)(७)॥ मू ॥ १०२६ ॥

५२७-३ जनित्रे द्वे।   द्वयोर्वसिष्ठस्त्रिष्टुञ्विश्वेदेवाः ॥
हा꣥꣯उज꣤नत् । (त्रिः) । जनद्धा꣥उ । (त्रिः) । हो꣡इ । जनत् । (द्वे द्विः) । होइ । जनात् । सो꣢꣯ मᳲ꣡पवा ।
ते꣢ऽ᳐३ज꣡नि । ता꣢ ᳐म꣣ती꣤ना꣥म् ॥ ज꣢निता꣡꣯दाइ । वो꣢ऽ᳐३ज꣡नि । ता꣢ ᳐पृ꣣थि꣤व्या꣥: ॥ ज꣢निता꣡꣯ग्नाइः ।
ज꣢नि꣡ता꣯ । सू꣢ ᳐रि꣣य꣤स्या꣥ ॥ हा꣯उज꣤नत् । (त्रिः) । जनद्धा꣥उ । (त्रिः) । हो꣡इ । जनत् । (द्वे द्विः) ।
होइ । जनात् । ज꣢निते꣡꣯न्द्रा । स्या꣢ऽ᳐३ज꣡नि । तो꣢ऽ᳐३४३ । ता꣢ऽ᳐३वा꣤ऽ५᳚इष्णोऽ६५६ः ॥
(दी॰ ११। प॰ ३७। मा॰ ३७)(८)॥ खे ॥ १०२७ ॥

५२७-४
ज꣤नद्धा꣥उ । (त्रिः) । ज꣤नदा꣥उ । (त्रिः) । ज꣡नत् । होइ । (द्वे त्रिः) । सो꣢꣯ मᳲ꣡पवा । ते꣢ऽ᳐३ज꣡नि ।
ता꣢ ᳐म꣣ती꣤ना꣥म् ॥ ज꣢निता꣡꣯दाइ । वो꣢ऽ᳐३ज꣡नि । ता꣢ ᳐पृ꣣थि꣤व्या꣥: ॥ ज꣢निता꣡꣯ग्नाइः । ज꣢नि꣡ता꣯ । सू꣢ ᳐रि꣣य꣤स्या꣥ ॥
ज꣤नद्धा꣥उ । (त्रिः) । ज꣤नदा꣥उ । (त्रिः) । ज꣡नत् । होइ । (द्वे त्रिः) । ज꣢निते꣡꣯न्द्रा । स्या꣢ऽ᳐३ज꣡नि ।
तो꣢ऽ᳐३४३ । ता꣢ऽ᳐३वा꣤ऽ५᳚इष्णोऽ६५६ः ॥
(दी॰ ५। प॰ ३७। मा॰ ३१)(९)॥ फ ॥ १०२८ ॥
५२८-१ अङ्गिरसां व्रतोपोहः (सम्पा)।   वसिष्ठस्त्रिष्टुञ्वरुणः ॥
ओ꣢ऽ᳐३हा꣡इ । ओ꣭ऽ३हा꣢ ᳐ । ओ꣣꣯हा꣢ । इ꣡याऽ२ । ओ꣭ऽ३हा꣢ऽ᳐३ए꣢ । अभि꣡त्रिपा । ष्ठा꣢ऽ३म्वृ꣡ष ।
णं ꣢व꣣यो꣤धा꣥म् ॥ अं ꣢गो꣡꣯षिणाम् । अ꣢वा꣡꣯व । श꣢न्त꣣वा꣤णी꣥: ॥ व꣢ना꣡꣯वसा । नो꣢ऽ᳐३व꣡रु । णो꣢ ᳐न꣣सि꣤न्धू꣥: ॥
ओ꣢ऽ᳐३हा꣡इ । ओ꣭ऽ३हा꣢ ᳐ । ओ꣣꣯हा꣢ । इ꣡याऽ२ । ओ꣭ऽ३ हा꣢ऽ३ए꣢ । विर꣡त्नधाः । द꣢य꣡ते꣯ । वा꣢ऽ᳐३४३ ।
री꣢ऽ३या꣤ऽ५᳚णाऽ६५६इ ॥
(दी॰ ६। प॰ २३। मा॰ १०)(१०)॥ गौ ॥ १०२९ ॥
५२९-१ सम्पा वैयश्वम्।   व्यश्वस्त्रिष्टुप्सूर्यः ॥
हो꣡ । होइ । अक्रा꣢꣯न्त्समुद्र꣡ᳲप्र꣢थमे꣡꣯विध꣢ । मा꣡न् ॥ हो । होइ । ज꣢न꣡यन्प्र꣢जा꣡꣯भुवन꣢स्यगो꣯ । पा꣡: ॥
हो । होइ । वृषा꣢꣯पवि꣡त्रे꣢꣯अ꣡धि꣢सा꣡꣯ नो꣰꣯ऽ२अ꣡ । व्याइ ॥ हो । हो । बृ꣢ह꣡त्सो꣯मो꣰꣯ऽ२वा꣯वृधे꣯स्वा꣯नो꣡꣯अ ।
द्रा । औ꣢ऽ᳐३हो꣯वा꣯हा꣢उवाऽ३ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । स्वा꣢꣯ नो꣡꣯अ । द्रीऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १८। प॰ २०। मा॰ १२)(११)॥ णा ॥ १०३० ॥
५३०-१ सोम सामनी द्वे।   द्वयोस्सोमस्त्रिष्टुप्सोमः ॥
का꣤नी꣥ ॥ क्रा꣡न्तीऽ२क्रा꣡न्तीऽ२ । हरिरा꣯सृज्य꣡माऽ२३ना꣢ऽ३ः ॥ सा꣤इदा꣥न् । वा꣡नाऽ२वा꣡नाऽ२ ।
स्यजठरे꣯पु꣡नाऽ२३ना꣢ऽ३ः ॥ नॄ꣤भी꣥: । या꣡ताऽ२या꣡ताऽ२: । कृणुते꣯निर्णि꣡जाऽ२३ङ्गा꣢ऽ३म् ॥
आ꣤ता꣥: । मा꣡तीऽ२म्मा꣡तीऽ२म् । ज꣡नयताऽ२३ । स्वा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ १४। मा॰ ११)(१२)॥ भ ॥ १०३१ ॥

५३०-२
क꣣नि꣤क्र꣥न्तिहा꣯ । हो꣢इ । हरि꣣रा꣢꣯सृ꣣ज्य꣢ ᳐ । मा꣣ऽ२३४ना꣥: ॥ हा꣢꣯हो꣡इ । सी꣯दन्वनस्यजठरे꣯पु꣢ना꣡ऽ२३ना꣢: ॥
हा꣯हो꣡इ । नृभिर्यत:कृणुते꣯निर्णि꣢जा꣡ऽ२३ङ्गा꣢म् ॥ हा꣯हो꣡इ । अतो꣯मताइम् । ज꣪नयताऽ२३ ॥
स्वा꣡ऽ२᳐धा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ ११)(१३)॥ ग ॥ १०३२ ॥
५३१-१ ऐषम्।   इषस्त्रिष्टुबिन्द्रसोमौ ॥
ए꣤षा꣥ए꣤षा꣥: ॥ स्य꣣ता꣢ऽ᳐३१२३४इ । मधु꣥मा꣯ꣳइन्द्रसो꣤꣯म꣥: । वृषा꣯वृषाऽ६ए । वृ꣣ष्णा꣢ऽ३१२३४ः ।
परि꣥पवि꣤त्रे꣥꣯अक्षाः꣯ ॥ सहसहाऽ६ए꣥ । स्र꣣दा꣢ऽ᳐३१२३४ः । शत꣥दा꣤꣯ भू꣥꣯रिदा꣤꣯ वा꣥꣯ ॥ शश्वच्छश्वाऽ६दे꣥ ।
त꣣मा꣢ऽ३१२३४म् । बर्हिरा꣯वा꣥꣯जि꣤येऽ५ । हियाऽ६हा꣥उवा ॥ स्था꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡त् ॥
(दी॰ ११। प॰ १४। मा॰ १४)(१४)॥ घी ॥ १०३३ ॥
५३२-१ माधुच्छन्दसम्।   मधुच्छन्दास्त्रिष्टुप्सोमः ॥
हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४हा꣥इ । इ꣣हा꣢ऽ३१ । प꣢व꣡स्वसो । मा꣢ऽ᳐३म꣡धु । मा꣢ ᳐ꣳऋ꣣ता꣤वा꣥ ॥ अ꣢पो꣡꣯वसा । नो꣢ऽ᳐३अ꣡धि ।
सा꣢ ᳐नो꣣꣯अ꣤व्या꣥इ ॥ अ꣢व꣡द्रो꣯णा । नी꣢ऽ᳐३घृ꣡त । व꣢न्ति꣣रो꣤हा꣥ ॥ हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४हा꣥इ । इ꣣हा꣢ऽ३१ । म꣢दि꣡न्तमो ।
म꣢त्स꣡रः । आ꣢ऽ᳐३४३इ । द्रा꣢ऽ᳐३पा꣤ऽ५᳚नाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ३। प॰ १७। मा॰ ११)(१५)॥ ठ ॥ १०३४ ॥
॥ चतुर्विंशतिःषष्ठः, षष्ठः खण्दः ॥ ६ ॥ दशतिः ॥ ४ ॥

॥ अथ सप्तमः खण्डः ॥ (ऋ-८, सा-१५)

५३३-१ कुत्सस्याधिरथीयानि त्रीणि।   त्रयाणां कुत्सस्त्रिष्टुप्सोमः ॥
हो꣣ऽ४वा꣥ । उ꣣हुवा꣢ऽ३ । हो꣤वा꣥ । प्र꣢से꣡꣯ ना꣢꣯ना꣡इः । शू꣯रो꣯आ꣢ऽ᳐३ । ग्रा꣢इ᳐र꣣था꣤ना꣥म् ॥ ग꣢व्य꣡न्ने꣢꣯ता꣡इ ।
हर्षता꣢ऽ᳐३इ । अ꣢स्य꣣से꣤ना꣥ ॥ भ꣢द्रा꣡꣯न्कृ꣢ण्वा꣡न् । इन्द्रहा꣢ऽ᳐३ । वा꣢ ᳐न्त्स꣣खि꣤भ्या꣥: ॥ आ꣢꣯ सो꣡꣯ मो꣢꣯वा꣡ ।
स्त्रा꣢ऽ३र꣡भ । सा꣢ ᳐नि꣣द꣤त्ता꣥इ । हो꣣ऽ४वा꣥ । उ꣣हुवा꣢ऽ᳐३ । हो꣤वा꣥ऽ६ ॥ हा꣥उवा ॥
(दी॰ ९। प॰ १९। मा॰ ११)(१६)॥ ध ॥ १०३५ ॥

५३३-२
औ꣥꣯हो꣤ऽ३वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ । प्र꣢से꣡꣯ ना꣢꣯ना꣡इः । शू꣯रो꣯आ꣢ऽ᳐३ । ग्रा꣢इ᳐र꣣था꣤ना꣥म् ॥ ग꣢व्य꣡न्ने꣢꣯ता꣡इ । हर्षता꣢ऽ᳐३इ ।
अ꣢स्य꣣से꣤ना꣥ ॥ भ꣢द्रा꣡꣯न्कृ꣢ण्वा꣡न् । इन्द्रहा꣢ऽ᳐३ । वा꣢ ᳐न्त्स꣣खि꣤भ्या꣥: ॥ औ꣯हो꣤ऽ३वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ । आ꣢꣯ सो꣡꣯ मो꣢꣯वा꣡ ।
स्त्रा꣢ऽ᳐३र꣡भ । सा꣢ऽ᳐३४३ । नी꣢ऽ᳐३दा꣤ऽ५᳚त्ताऽ६५६इ ॥
(दी॰ ११। प॰ १५। मा॰ १०)(१७)॥ ङौ ॥ १०३६ ॥

५३३-३
ओ꣥꣯हो꣤ऽ३वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ । प्र꣣से꣯ना꣢꣯ना꣡इः । शू꣯रो꣯आ꣢ऽ᳐३ । ग्रा꣢इ᳐र꣣था꣤ना꣥म् ॥ ग꣣व्य न्ने꣢꣯ता꣡इ । हर्षता꣢ऽ᳐३इ ।
अ꣢स्य꣣से꣤ना꣥ ॥ भ꣣द्रा꣯न्कृ꣢ण्वा꣡न् । इन्द्रहा꣢ऽ᳐३ । वा꣢ ᳐न्त्स꣣खि꣤भ्या꣥: ॥ ओ꣯हो꣤ऽ३वा꣢ऽ३꣡४꣡५꣡ । आ꣣꣯सो꣯मो꣢꣯वा꣡ ।
स्त्रा꣢ऽ᳐३र꣡भ । सा꣢ऽ᳐३४३ । नी꣢ऽ᳐३ दा꣤ऽ५ ॥ ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ११। प॰ १६। मा॰ १०)(१८)॥ कौ ॥ १०३७ ॥
५३४-१ वैश्वज्योतिषाणि त्रीणि।   त्रयाणां विश्वज्योतिस्त्रिष्टुप्सूर्यः ॥
हा꣢꣯उहो꣯वाऽ३᳐हा꣢इ । प्रते꣯धा꣯रा꣯मधुमऽ३ता꣡इर꣪सृग्राऽ२३꣡४꣡५꣡न् ॥ हा꣢꣯उहो꣯वा ऽ᳐३हा꣢इ ।
वा꣯रंयत्पू꣯तो꣯अतिऽ३या꣡इषि꣪आव्याऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥ हा꣢꣯उहो꣯वाऽ᳐३हा꣢इ ।
पवमा꣯नपवसे꣯ऽ३धा꣡म꣪गोनाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥ हा꣢꣯उहो꣯वाऽ᳐३हा꣢इ ।
जनयन्त्सू꣯र्यमऽ३ पा꣡इन्वो꣪अर्काऽ२३꣡४꣡५꣡इः । हा꣢꣯उहो꣯वाऽ᳐३हा꣢उ । वाऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २०। प॰ १०। मा॰ २१)(१९)॥ म ॥ १०३८ ॥
५३५-१ अस्य देवा देवता।
प्र꣢गा꣡꣯यता । अ꣢भि꣡य । चा꣢ ᳐म꣣दे꣤वा꣥न् ॥ सो꣢꣯ म꣡ꣳहिनो । ता꣢ऽ᳐३म꣡ह । ते꣢ ᳐ध꣣ना꣤या꣥ ॥ स्वा꣢꣯ दु꣡ᳲपवा ।
ता꣢ऽ᳐३म꣡ति । वा꣢ ᳐र꣣म꣤व्या꣥म् ॥ आ꣢꣯ सी꣡꣯दतू । क꣢ल꣡शम् । दा꣢ऽ᳐३४३इ । वा꣢ऽ᳐३आ꣤ऽ५᳚इन्दूऽ६५६ः ॥
(दी॰ ५। प॰ १३। मा॰ ७)(२०)॥ बे ॥ १०३९ ॥
५३६-१ इन्द्रोऽस्य देवता।
हा꣢꣯उहो꣯वाऽ३हा꣢इ । प्रहिन्वा꣯नो꣯जनिता꣯रोऽ३४३द꣢सी꣣꣯ यो꣥꣯: ॥ हा꣢꣯उहो꣯वाऽ३हा꣢इ ।
रथो꣯नवा꣯जꣳसनिषाऽ३४३न꣢या꣣꣯ सी꣥꣯त् ॥ हा꣢꣯उहो꣯वाऽ३हा꣢इ ।
इन्द्रङ्गच्छन्ना꣯युधा꣯साऽ३४३ꣳशि꣢शा꣣꣯न꣥: ॥ हा꣢꣯उहो꣯वाऽ३हा꣢इ । विश्वा꣯वसुहस्तयो꣯राऽ३४३
द꣢धा꣣꣯न꣥: । द꣤धाऽ५नाउ ॥ वा ॥
(दी॰ २३। प॰ १०। मा॰ १३)(२१)॥ णि ॥ १०४० ॥
५३७-१ वाचस्सामनी द्वे।   द्वयोः वाक्त्रिष्टुप्वाक्सोमौ ॥
त꣣क्ष꣤द्यदी꣥꣯ । हो꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥ म꣣न꣤सो꣯वे꣣꣯न꣤त꣥: । वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡क् ॥ ज्ये꣣꣯ष्ठ꣤स्य꣥धा । हो꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
म꣤न्न्दुक्षो꣣꣯र꣤नी꣥꣯ । का꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥ आ꣣꣯ दी꣤꣯ मा꣥꣯यन् । हो꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥ व꣣र꣤मा꣣꣯ वा꣤꣯व꣥शा꣯ । ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
जु꣣ष्ट꣤म्पति꣥म् । हो꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥ क꣤लशे꣯गाऽ५वः । इ । दाउ ॥ वा ॥
(दी॰ १३। प॰ १८। मा॰ ११)(२२)॥ ड ॥ १०४१ ॥

५३७-२
त꣢क्ष꣡द्यदा꣢ऽ᳐३१२३४इ । म꣣न꣤सो꣯वे꣣꣯न꣤त꣥: । वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡क् ॥ ज्ये꣢꣯ष्ठ꣡स्यधा꣢ऽ᳐३१२३४ । म꣤न्न्दुक्षो꣣꣯र꣤नी꣤꣯ ।
का꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ । आ꣢꣯दा꣡इमा꣯या꣢ऽ३१२३४न् । व꣣र꣤मा꣣꣯ वा꣤꣯व꣥शा꣯ । ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
जु꣢ष्ट꣡म्पता꣢ऽ᳐३१२३४इम् । क꣤लशे꣯गाऽ५वः । इ । दा꣱उ ॥ वा ॥
(दी॰ ११। प॰ १४। मा॰ ११)(२३)॥ घ ॥ १०४२ ॥
५३८-१ दाशस्पत्ये द्वे।   द्वयोर्दशस्पतिस्त्रिष्टुप्सूर्यः ॥
सा꣤का꣥म् ॥ उ꣡क्षो꣯मर्जयन्तस्व꣢सा꣡ऽ२३रा꣥: । दा꣡शाऽ२ । धी꣡꣯रस्यधी꣯तयो꣯ध꣢नू꣡ऽ२३त्री꣢: । हा꣡रीऽ२: ।
प꣡र्यद्रवज्जा꣯स्सूरि꣪याऽ२३स्या꣢ । द्रो꣡णाऽ२म् । न꣡नक्षे꣯अत्यो꣯नवाऽ२३ । हा꣢उवाऽ᳐३ । जीऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ७)(२४)॥ ञे ॥ १०४३ ॥

५३८-२
सा꣥꣯कमुक्षाऽ६ए꣥ ॥ ए꣢ऽ᳐३१२३४ । मर्ज꣥यन्तस्व꣤सा꣥꣯रः । दशधी꣯राऽ६ए꣥ । ए꣢ऽ३१२३४ ।
स्यधी꣥꣯त꣤यो꣥꣯ध꣤नु꣥त्रीः꣯ ॥ हरि:पर्याऽ६ए꣥ । ए꣢ऽ᳐३१२३४ । द्रव꣥ज्जा꣤꣯स्सू꣯र्य꣥स्य ॥ द्रो꣯णन्ननाऽ६ए꣥ ।
ए꣢ऽ᳐३१२३४ । क्षे꣯अत्यो꣥꣯न꣤वा꣥ऽ६ । हा꣥उवा ॥ जी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ११। प॰ १४। मा॰ ८)(२५)॥ घै ॥ १०४४ ॥
५३९-१ कश्यपस्य शोभनम्।   कश्यपस्त्रिटुप्सूर्यः ॥
अ꣤धि꣥यदा꣤ ॥ स्मा꣡इन्वा꣰꣯ऽ२जि꣡नी꣰꣯ऽ२वशु꣡ । भाः । स्पर्द्ध꣢न्ते꣯धि꣡यस्सू꣯ । रा꣢इ᳐न꣣वि꣤शा꣥: ।
अ꣢पो꣡꣯वृणा꣯न:पवताइ । क꣪वीऽ२३या꣢न् । व्रज꣡न्न । पा । शु꣢व꣡र्द्ध । ना꣢ऽ᳐३४३ ।
या꣢ऽ᳐३मा꣤ऽ५᳚न्माऽ६५६ ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ६)(२६)॥ खू ॥ १०४५ ॥
५४०-१ दाशस्पत्यानि चत्वारि।   चतुर्णां दशस्पतिस्त्रिष्टुप्सूर्यसोमेन्द्राः । सोमेन्दौ वा ॥
इ꣢न्दुऽ३र्वा꣡जीऽ२ । प꣡वते꣯गो꣯नियोघा꣢: ॥ इन्द्रा꣡इसोऽ२३४मा꣥: । सा꣡हइन्वन्मदाया꣢ ॥
हन्ता꣡इराऽ२३४क्षा꣥: । बा꣡꣯धतेपर्यराति꣢म् ॥ वरा꣡इवाऽ२३४स्कॄ꣥ । ण्व꣢न्वृजा꣡नाऽ२३ ।
स्या꣡ऽ । रा꣢꣭ऽ३जै꣡वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ १०)(२७)॥ थौ ॥ १०४६ ॥

५४०-२
इ꣤न्दु꣥र्वा꣯जी꣤꣯प꣥वतौ꣯ । हौ꣤꣯होवाहा꣥इ ॥ गो꣡नि꣪योघौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । इ꣡न्द्रे꣰꣯ऽ२सो꣡꣯ मा꣰꣯ऽ२स्स꣡ह꣢इ꣡ ।
न्वान्म꣪दायौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ ह꣡न्ति꣢र꣡क्षो꣢꣯ बा꣡꣯ध꣢ते꣯ । पा꣡र्य꣪रातौ꣢ । वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
व꣢स्कृण्व꣡न्वृजना꣢ऽ᳐३ । स्या꣡ । रा꣭ऽ३जौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १५। मा॰ ७)(२८)॥ मे ॥ १०४७ ॥

५४०-३ दाशस्पत्यम्।
इ꣥न्दुरौ꣯हो꣯वा꣯हा꣯ई꣤या꣥ ॥ वा꣢꣯जाउ । वाऽ᳐३ । हा꣢उवा । पवते꣯गो꣯नि꣡योघा꣢उ । वाऽ᳐३ । हा꣢उवा ।
इन्द्रा꣡इसोमः꣢ । सह꣡इन्वा꣢उ । वाऽ᳐३ । हा꣢उवाऽ᳐३ । मा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
ह꣢न्ता꣡इरक्षो꣢ । बा꣯धा꣡ताइपा꣢उ । वाऽ᳐३ । हा꣢उवाऽ᳐३ । र्या꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ती꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
व꣢रा꣡इवस्कृ꣢ । ण्व꣡न्वृज ना꣢उ । वाऽ᳐३ । हा꣢उवाऽ᳐३ ॥ स्या꣡ऽ२᳐रा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ जा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १४। प॰ २५। मा॰ २१)(२९)॥ न ॥ १०४८ ॥

५४०-४
इ꣥न्दुर्वा꣯जी꣯पवते꣯गो꣯नियो꣤घाः꣥ ॥ इन्द्रे꣯सो꣯मस्सहइन्वन्मदा꣤या꣥ ॥ हन्तिरक्षो꣯बा꣯धते꣯पर्यरा꣤ती꣥म् ॥
वरिवस्कृण्वन्वृजनस्यरा꣤जा꣥ । रा꣣꣯जा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । स्य꣢रा꣡꣯जा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १३। प॰ ७। मा॰ ४)(३०)॥ ठी ॥ १०४९ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने पञ्चदशः प्रपाठकः ॥ १५ ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — षोडशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ सप्तमः खण्डः (उत्तरभागः) ॥ (ऋ-४, सा-६)

५४१-१ श्नौष्टानि त्रीणि।   त्रयाणां श्नुष्टिस्त्रिष्टुप्सोमः ॥
औ꣥꣯हो꣤हा꣥इ । अयो꣤हा꣥इ ॥ प꣡वापवस्वैनाव꣢सू꣡ऽ२३नी꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢इ᳐ । इ꣣हा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ ।
माꣳश्चत्व꣡इन्दोसरसिप्र꣢धा꣡ऽ२३न्वा꣢ । औ꣭ऽ३हो꣢इ᳐ । इ꣣हा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ ।
ब्रध्न꣡श्चिद्यस्यवातोन꣢जू꣡ऽ२३ती꣢म् ॥ औ꣭ऽ३हो꣢इ᳐ । इ꣣हा꣢ । ई꣭ऽ३या꣢ ।
पुरुमे꣡꣯धाश्चित्तकवेन꣢रा꣡ऽ२३न्धा꣢त् ॥ औ꣭ऽ३हो꣢इ᳐ । इ꣣हा꣢ । ई꣡ऽ२᳐ ।
या꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯होवा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । दी꣢꣯दि꣣ही꣢ऽ१ ॥
(दी॰ १४। प॰ २२। मा॰ ९)(१)॥ थो ॥ १०५० ॥

५४१-२
अ꣥यो꣤हा꣥इ । पवो꣤हा꣥इ ॥ प꣡वस्वैनाव꣢सू꣡ऽ२३नी꣢ । इहोइयाऽ᳐३ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥
माꣳश्चत्व꣡इन्दोसरसिप्र꣢धा꣡ऽ२३न्वा꣢ । इहोइयाऽ᳐३ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥ ब्रध्न꣡श्चिद्यस्यवातोन꣢जू꣡ऽ२३ती꣢म् ।
इहोइयाऽ᳐३ । ई꣭ऽ३या꣢ ॥ पुरुमे꣡꣯धाश्चित्तकवेन꣢रा꣡ऽ२३न्धा꣢त् । इहोइयाऽ᳐३ । ई꣡ऽ२᳐ । या꣣ऽ२३४ ।
औ꣥꣯होवा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । दी꣢꣯द꣡याऽ२३꣡४꣡५꣡त् ॥
(दी॰ १६। प॰ १८। मा॰ १०)(२)॥ गौ ॥ १०५१ ॥

५४१-३
हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । (द्विः) । हा꣢ऽ᳐३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । हा꣢उवा । अया꣡꣯प꣢वा꣡꣯प꣢वस्वै ना꣡꣯वसू꣢꣯नि । इ꣡ह꣢इ ।
हि꣡याऽ२ । इ꣡हा꣢ । इ꣡हा꣢ ॥ मा꣯ꣳश्चत्व꣡इन्दो꣢꣯स꣡रसि꣢प्र꣡ध꣢न्व । इ꣡ह꣢इ । हि꣡याऽ२ । इ꣡हा꣢ । इ꣡हा꣢ ॥
ब्रध्न꣡श्चि꣢द्य꣡स्य꣢वा꣡꣯ तो꣢꣯न꣡जू꣢꣯ति꣡म् । इह꣢इ । हि꣡याऽ२ । इ꣡हा꣢ । इ꣡हा꣢ऽ᳐३ ॥ हा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । (द्विः) ।
हा꣢ऽ᳐३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । हा꣢उवा । पुरुमे꣡꣯ धा꣢꣯श्चित्त꣡कवे꣢꣯न꣡रन्धा꣢꣯त् । इ꣡ह꣢इ । हि꣡याऽ२ । इ꣡हा꣢ ॥
इ꣡हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १४। प॰ २८। मा॰ १५)(३)॥ ढु ॥ १०५२ ॥
५४२-१ आत्रम्।   अत्रिस्त्रिष्टुप्सूर्योविश्वेदेवा वा ॥
म꣢हत्तत्सोमोमहिषश्चऽ᳐३का꣡राऽ२ ॥ अपांयद्गर्भोवृणीतऽ३दा꣡इवाऽ२न् ॥
अदधादिन्द्रेपवमानऽ३ओ꣡जाऽ२: ॥ अजनयत्सूर्येऽ३ज्यो꣡ऽ२३ । तिरिन्दा꣢उवाऽ३ ॥ ए꣢ऽ᳐३ ।
अ꣡जन꣢यत्सू꣡꣯ र्ये꣢꣯ ज्यो꣡꣯ति꣢रि꣡ । दूऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १३। प॰ ८। मा॰ ६)(४)॥ डू ॥ १०५३ ॥
५४३-१ वासिष्ठम्।   वसिष्ठस्त्रिष्टुप्सोमः ॥
अ꣢सा꣡औ꣢ऽ३᳐हो꣢ । जिवा꣡क्वाऽ२ । र꣡थ्याइया꣢ऽ३४ । था꣥꣯ । जा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡उ ॥ धि꣢या꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ ।
मनो꣡ताऽ२ । प्र꣡थमामा꣢ऽ३४ । नी꣥꣯ । षा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥ द꣢शा꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ । स्वसा꣡राऽ२: । अ꣡धिसानो꣢ऽ३४ ।
अ꣥ । व्या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥ मृ꣢जा꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ । तिवा꣡ह्नीऽ२म् । स꣡दनाइषू꣢ऽ᳐३४ । अच्छा꣥ऽ२उ ।
वाऽ३꣡४꣡५꣡ ॥ ॥
(दी॰ २। प॰ २०। मा॰ ११)(५)॥ ञ ॥ १०५४ ॥
५४४-१ अपां साम।   आपस्त्रिष्टुप्सोमः ॥
अ꣥पा꣤꣯मि꣥वे꣤꣯ दू꣥꣯र्म꣤य꣥स्तौ꣤꣯ । होवाहा꣥इ ॥ तु꣣रा꣢ ᳐णा꣣ऽ२३४ः । हा꣣꣯हो꣢इ । प्र꣡मनी꣢꣯ । षा꣡: । ई꣢꣯रतेऽ᳐३ ।
सो꣢म꣣म꣥ । छा꣢ऽ३४ । हा꣣꣯हो꣢इ ॥ नमस्य꣡ । ताइः । उपचा꣢ऽ३ । य꣢न्ति꣣स꣥म् । चा꣢ऽ᳐३४ । हा꣣꣯हो꣢इ ॥
आ꣡च꣢वि । शा꣡ । ति꣢युश꣣ । ती꣢रु꣣ष꣥ । ता꣢ऽ᳐३४म् । हा꣣꣯हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯होवा ॥ वा꣢ऽ᳐३हा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १२। प॰ २४। मा॰ ११)(६)॥ झ ॥ १०५५ ॥
॥ सप्तमः खण्डः ॥ ७ ॥ दशतिः ॥ ५ ॥

॥ अथ अष्टमः खण्डः॥ (ऋ-९, सा-३३)

५४५-१ प्रेङ्खौ द्वौ।   नकुलोऽनुष्टुप्सोमः ॥
पु꣥रोजिती ॥ वो꣢अ᳐न्धा꣣ऽ२३४सा꣥: । सु꣢ता꣡꣯यामा꣮ऽ२दयाऽ᳐३१उवाये꣢ऽ३ । त्नाऽ२३४वे꣥ ॥
अ꣡पश्वाना꣮ऽ२ꣳश्नथाऽ३१उवाये꣢ऽ३ । ष्टाऽ२३४ना꣥ ॥ स꣡खायोदी꣮ऽ२र्घजाऽ᳐३१उवाये꣢ऽ३ ॥
ह्वीऽ२३४या꣥म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ६)(७)॥ डू ॥ १०५६ ॥

५४५-२ वामदेवोऽनुष्टुप्सोमः।
पु꣥रोजिती ॥ वो꣢ऽ᳐३ओ꣡न्धा꣢ऽ३सा꣢: । सू꣡ता꣢꣯यमाऽ२ । ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊ꣡ऽ२꣮ । दाऽ३या꣡इत्ना꣢ऽ३वे꣢ ।
आ꣡पश्वा꣢꣯नाऽ२म् । ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊ꣡ऽ२꣮ । श्नाऽ३था꣡इष्टा꣢ऽ३ना꣢ ॥ सा꣡खा꣢꣯योदाऽ२इ ।
ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊ꣡ऽ२३ ॥ घा꣡ऽ२᳐जा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । ह्वि꣡याऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ७। प॰ १९। मा॰ ११)(८)॥ झ ॥ १०५७ ॥

५४५-३ कार्तयशम्।   कृतयशाऽनुष्टुप्सोमः ॥
पु꣥रो꣯हा꣯हाउ ॥ जा꣣ऽ२३४इती꣥ । वो꣢꣯आ꣡औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३ । धा꣤सा꣥: । सु꣢ता꣡औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३ । या꣤मा꣥ऽ६ ।
हा꣥उवा । द꣢यित्न꣡वे꣰꣯ऽ२ । उ꣡पा꣢ ॥ अ꣡पश्वानꣳश्नथा꣢ऽ१इष्टा꣢ऽ३ना꣢ ॥ सखा꣡औ꣢ऽ३हो꣢ऽ३ । यो꣤दा꣥ऽ६ ।
हा꣥उवा । घ꣢जिह्वि꣡यम् ॥ उपा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ १५। मा॰ ११)(९)॥ म ॥ १०५८ ॥

५४५-४ और्ध्वसद्मनम्।   ऊर्ध्वसद्मानुष्टुप्सोमः ॥
पु꣥रो꣤꣯जि꣥तीवोअ꣤न्ध꣥सः । उ꣤वाहा꣥इ ॥ सु꣢ता꣡꣯यमा꣯दयित्नवउवाऽ२३हो꣡इ ।
अपश्वानꣳश्नथिष्टनउवाऽ२३हो꣡इ ॥ साखा꣢꣯योदा꣡इ ॥ घाजि꣢ह्वा꣣ऽ२३४५याऽ६५६म् ॥
सु꣢वृक्ति꣡भि꣢र्न्नृमा꣡꣯द꣢न꣡म्म्भ꣰꣯रेऽ२षु꣣वा꣢ऽ१ ॥
(दी॰ १०। प॰ ७। मा॰ ९)(१०)॥ फो ॥ १०५९ ॥

५४५-५ श्यावाश्वम्।   श्यावाश्वोऽनुष्टुप्सोमः ॥
पु꣣रो꣢ऽ३१ । जी꣢ऽ᳐३ती꣤ । वोअ꣥ । धा꣢ऽ᳐३सः꣤ । एहिया꣥ ॥ सू꣡ । तायमादा । यि꣢ । त्न꣡वाऽ२इ ।
ए꣡꣯हियाऽ२ । अपश्वा꣡꣯नाꣳश्ना꣢ऽ३थी꣤ऽ३ ॥ ष्टाऽ२३४ना꣥ ॥ ऐ꣢꣯हाऽ२इ । ए꣡꣯हियाऽ२ ।
सखायो꣡꣯दाइर्घा꣢ऽ३जी꣤ऽ३ । ह्वा꣢ऽ३४५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ९। प॰ १६। मा॰ ६)(११)॥ तू ॥ १०६० ॥

५४५-६ आन्धीगवम्।   अन्धीगुरनुष्टुप्सोमः ॥
पु꣥रोजितीवोऽ४न्धासा꣥: ॥ सु꣢ता꣡꣯य । मादाऽ२३या꣢ । हि꣡म्माऽ२१२ । त्न꣡वेअपश्वानꣳश्न꣢थिष्टन ॥
सा꣡खा꣢ऽ३उवा꣢ ॥ योऽ२दी꣡ । घाऽ२३जी꣢ । ह्विया꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ५)(१२)॥ खु ॥ १०६१ ॥
५४६-१ क्रौञ्चानि त्रीणि।   त्रयाणां क्रुङनुष्टुप्पूषाभगोद्यावापृथिवी ॥
अ꣢यंपू꣡꣯षौहो । रा꣢꣯यि꣡र्भगाः ॥ सो꣢꣯म:पुनाऽ᳐३ । नो꣡आ꣢ऽ३र्षा꣤ऽ५ताऽ६५६इ ॥ प꣢तिर्वि꣡श्वौहो ।
स्या꣢꣯ भू꣡꣯मनाः ॥ वि꣢यख्यद्रोऽ᳐३ । दा꣡सी꣢ऽ᳐३ऊ꣤ऽ५᳚भाऽ६५६इ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ६)(१३)॥ जू ॥ १०६२ ॥

५४६-२
अ꣥यंपू꣯षा । अयंपूषा ॥ र꣢यिर्भ꣡गाः । सो꣢꣯म:पू꣡नाऽ२ । नो꣯अर्ष꣡ताइ । प꣢तिर्वा꣡इश्वाऽ२ ।
ओ꣡स्याभू꣢ऽ१मानाऽ२: ॥ ओ꣡इवियख्याऽ२३द्रो꣢ ॥ दा꣡सीउ꣢भ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ३४३ ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ८)(१४)॥ फै ॥ १०६३ ॥

५४६-३ तृतीयं क्रौञ्चम्।
अ꣤यं ꣣पू꣤꣯ षा꣥꣯ । हो꣢ । र꣣यि꣤र्भगा꣥ऽ६ए꣥ ॥ सो꣡माऽ२:पु꣡नाऽ२᳐ । न꣣आ꣢ऽ३४५ । षा꣣ऽ२३४ती꣥ ।
प꣡तिर्विश्वस्य꣢भू꣡꣯मन꣢: ॥ विय꣡ख्याऽ२३द्रो꣢ ॥ दसी꣡꣯ऊऽ२३ भा꣢ऽ३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ६)(१५)॥ तू ॥ १०६४ ॥
५४७-१ त्वार्ष्टी सामनी द्वे।   द्वयोस्त्वाष्ट्र््योऽनुष्टुप्सोमेन्द्रौ ॥
सु꣥तासोमा ॥ धु꣢माऽ᳐३त्त꣢माः । सो꣡꣯माइ꣢न्द्राऽ᳐३य꣢माऽ३ । ए꣢ऽ᳐३ । दि꣢न꣣आ꣢ । प꣡वाइत्र꣢वऽ३न्तो꣢ऽ३ ।
ए꣢ऽ᳐३ । क्ष꣢र꣣न्ना꣢ । दा꣡इवान्ग꣢च्छाऽ३न्तु꣢वऽ३ः । ए꣢ऽ᳐३ ॥ म꣢दा꣣꣯आ꣢ ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ ७)(१६)॥ ते ॥ १०६५ ॥

५४७-२ ऊर्ध्वेडंत्वार्ष्टी साम।
सु꣥ता꣤꣯ सो꣥꣯म꣤धु꣥मत्तमाः꣤ ॥ सो꣡माऽ२इ꣡न्द्राऽ२᳐ । य꣣मा꣢ऽ३४५ । दी꣣ऽ२३४ना꣥: । प꣢वि꣡त्रव꣢न्तोअक्षरन् ॥
दे꣣꣯वान्ग꣢च्छा꣡ ॥ तु꣢वो꣡꣯माऽ२३दा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ७)(१७)॥ घे ॥ १०६६ ॥

५४७-३ वासिष्ठम्।   वसिष्ठोऽनुष्टुप्सोमेन्द्रौ ॥
सु꣥ता꣤꣯ सो꣥꣯म꣤धु꣥मत्तमाः । सो꣤꣯माइ꣥न्द्रा ॥ य꣢मन्दि꣡नः । पावि꣪त्रावाऽ२ । तो꣡꣯अक्ष꣢रन् ॥
दा꣡इवान्गच्छौ꣢वा᳐ ॥ तू꣣ऽ२३४वा꣥: । म꣢दा꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ८)(१८)॥ कै ॥ १०६७ ॥

५४७-४ आष्कारणिधनं त्वार्ष्टी साम।   त्वाष्ट्र््योऽनुष्टुप्सोमेन्द्रौ ॥
सु꣥ता꣤꣯ सो꣥꣯म꣤धु꣥मत्तमाः । सो꣤꣯माहा꣥उ ॥ इ꣢न्द्राऽ३या꣡म꣪न्दिनाऽ२᳐: । इ꣣न्द्रा꣢ऽ३हो꣡ ।
य꣪माऽ᳐२०दा꣣ऽ२३४इना꣥: । प꣢वित्रव३ओतोअ꣪क्षाराऽ२᳐न् । त्र꣣वा꣢ऽ३हो꣡ ।
तो꣪ऽ२᳐क्षा꣣ऽ२३४रा꣥ण् । दे꣢꣯वा꣯ङ्गच्छऽ३०तू꣡वो꣢ऽ१मादाऽ२᳐: ॥ दे꣣꣯वा꣢ऽ३न्हो꣡इ ।
गच्छो꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ तू꣡ऽ᳐२वा꣣ऽ२३४औ꣤꣯हो꣯वा ॥ म꣢दाऽ᳐३आ꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ १२)(१९)॥ बा ॥ १०६८ ॥

५४७-५ वासिष्ठम्।   वसिष्ठोऽनुष्टोप्सोमेन्द्रौ ॥
सु꣥तासोमधुमत्तमाऽ६ए꣥ ॥ सो꣢꣯माइन्द्राऽ३या꣡म꣪न्दिनाऽ२: । दा꣡इनाऽ२: ।
पवित्रवऽ३न्तो꣡अ꣪क्षाराऽ२न् । क्षा꣡राऽ२न् । देवान्गच्छऽ३न्तू꣡वो꣢ऽ१मादाऽ२: । मा꣡दाऽ२᳐: ।
दे꣣꣯वा꣢ऽ᳐३न्हो꣡इ । गच्छो꣣ऽ२३४हा꣥ ॥ तू꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ म꣢दाऽ᳐३ई꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १०। प॰ ११। मा॰ १३)(२०)॥ पि ॥ १०६९ ॥

५४७-६ त्वार्ष्टी सामनी द्वे (स्वारत्वार्ष्टी साम)।   द्वयोस्त्वाष्ट्र््योऽनुष्टुप्सोमेन्द्रौ ॥
सु꣡तासोमा꣢ऽ३हा꣢ ᳐ । धु꣣म꣢त्ता꣡माऽ२: ॥ सो꣡꣯माइन्द्रा꣢ऽ᳐३हा꣢ ᳐ । य꣣म꣢न्दा꣡इनाऽ२: ॥ प꣡वित्रवा꣢ऽ३हा꣢ ᳐ ।
तो꣣꣯अ꣢क्षा꣡राऽ२न् ॥ दे꣡꣯वान्गच्छा꣢ऽ३हा꣢ ᳐ । तु꣣वो꣢ऽ३हो꣡ऽ२३४ । वा꣥ । मा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ ७)(२१)॥ ञे ॥ १०७० ॥

५४७-७ द्विरभ्यासं त्वार्ष्टी साम।
सु꣥ता । सो꣣꣯मा꣢ऽ᳐३ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ । धु꣣म꣢त्ता꣡माऽ२३४ः ॥ सो꣯मा꣥꣯: । इ꣣न्द्रा꣢ऽ᳐३ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ ।
य꣣म꣢न्दा꣡इनाऽ२३४ः ॥ पवि꣥ । त्र꣣वा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ । तो꣣꣯अ꣢क्षा꣡रा ऽ२३४न् ॥ देवा꣥꣯न् ।
ग꣣च्छा꣢ऽ᳐३ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ । तु꣣वो꣢ऽ᳐३हो꣡ऽ२३४ ॥ वा꣥ । मा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ७। प॰ १८। मा॰ ८)(२२)॥ जै ॥ १०७१ ॥

५४७-८ वासिष्ठम्।   वसिष्ठोऽनुष्टुप्सोमेन्द्रौ ॥
सु꣥तासो꣢ऽ३मा꣤धु꣥म꣤त्तमा꣥: ॥ सो꣢꣯ मा꣡꣯इ꣢न्द्रा꣡ । य꣢मन्दि꣡नः । पावा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । त्र꣢वन्तोअक्षरन् ॥
दे꣣꣯वान्ग꣢च्छा꣡ ॥ तु꣢वो꣡꣯माऽ२३दा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ८)(२३)॥ झै ॥ १०७२ ॥
५४८-१ क्रौञ्चे द्वे।   द्वयोः क्रुङनुष्टुप्सोमः ॥
हा꣤उसोमा꣥: ॥ प꣢वाऽ᳐३न्ता꣡इ꣪न्दावा꣢उ । वाऽ᳐३ । हा꣢उवा । अस्म꣡भ्यङ्गातूवि꣪त्तामा꣢उ । वाऽ᳐३ ।
हा꣢उवा । मित्रा꣡꣯स्स्वानाआरे꣢ऽ१पासा꣢उ । वाऽ᳐३ । हा꣢उवाऽ३४ ॥ सुवा꣥꣯ । धि꣣या꣢ऽ᳐३ः ॥ सू꣡ऽ२३वा꣤ऽ३ः ।
वा꣢ऽ३४५इदोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ १४। मा॰ १४)(२४)॥ भी ॥ १०७३ ॥

५४८-२
सो꣥꣯मा:प꣣व꣢न्त꣣इ꣤न्द꣥वाः ॥ अ꣢स्मा꣡भ्य꣢ङ्गा꣡ । तु꣢वि꣣त्त꣢माः꣡ । माइत्रा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४ वा꣥ । स्वा꣢꣯ ना꣡꣯अरे꣢꣯प꣡स꣢: ।
सु꣣वाधि꣢याः꣡ । सु꣢व꣡र्वाऽ२३इदा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ११)(२५)॥ घ ॥ १०७४ ॥
५४९-१ सोम सामानि त्रीणि।   त्रयाणां सोमोऽनुष्टुप्सोमः ॥
अ꣥भी꣯नो꣯वा ॥ जा꣡ऽ२᳐सा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । ता꣣ऽ२३४मा꣥म् । र꣢यि꣡मर्ष꣢शतस्पृ꣡ह꣢म् ॥
इ꣡न्द्रो꣯सहस्रभाऽ२३हो꣡ । ण꣪साऽ२म् ॥ तु꣡विद्युम्नंविभाऽ२३हो꣡ये꣢ऽ३ ॥ स꣢हमो꣣ऽ२३४इ ॥
डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ५)(२६)॥ भु ॥ १०७५ ॥

५४९-२
अ꣥भी꣯नो꣯वा ॥ जा꣡सा꣯त꣢मम् । रयि꣡म । षाउवाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ३हा꣢इ । शतस्पृ꣡ह꣢म् । इ꣡न्दो꣰꣯ऽ२स ।
हा꣡उवाऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢ । स्र꣡भर्णसम् ॥ तुवाये꣢ऽ३ ॥ द्यू꣡ऽ२᳐म्ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
वि꣢भास꣡हा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ७। प॰ १३। मा॰ ८)(२७)॥ जै ॥ १०७६ ॥

५४९-३
अ꣢भीऽ२हो꣡इ । नो꣢꣯वाजाऽ᳐३सा꣤ऽ३ । हा꣢ ᳐ता꣣ऽ२३४मा꣥म् ॥ र꣢यीऽ२ꣳहो꣡इ । अ꣢र्षशाऽ᳐३ता꣤ऽ३ ।
हा꣢ ᳐स्पॄ꣣ऽ२३४हा꣥म् ॥ इ꣢न्दोऽ२हो꣡इ । स꣢हस्राऽ᳐३भा꣤ऽ३ । हा꣢ ᳐र्णा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ तु꣢वाऽ२हो꣡इ ।
द्यु꣢म्नंवीऽ३भा꣤ऽ३ । हा꣢ऽ᳐३सा꣤ऽ५᳚हाऽ६५६म् ॥
(दी॰ २। प॰ १२। मा॰ ८)(२८)॥ छै ॥ १०७७ ॥

५४९-४ क्रौञ्चम्।   क्रुङनुष्टुप्सोमः ॥
अ꣢भी꣡नोवा꣢ऽ᳐३१२३४ । जसा꣥꣯ । त꣣मा꣢ऽ᳐३म् ॥ र꣢यि꣡मर्षा꣢ऽ᳐३१२३४ । शत꣥ । स्पृ꣣हा꣢ऽ३म् ॥
इ꣢न्दो꣡साहा꣢ऽ३१२३४ । स्रभ꣥ । ण꣣सा꣢ऽ३म् ॥ तु꣢वा꣡इद्यूम्ना꣢ऽ᳐३१२᳐३म् । वि꣤भाऽ५सहाउ ॥
वा ॥
(दी॰ १। प॰ १२। मा॰ ६)(२९)॥ खू ॥ १०७८ ॥

५४९-५ सोमसाम।   सोमोऽनुष्टुप्सोमः ॥
अ꣤भी꣯नो꣯वा꣯होऽ५जसात꣤माम् ॥ रयिमर्षौहोऽ५शतस्पृ꣤हाम् ॥ इन्द्रो꣯सहौ꣯होऽ५स्रभर्ण꣤साम्
॥ तुविद्युम्नम्नौ꣯होऽ५विभा꣯स꣤हाम् । सह꣥म् । तुविद्युम्नं ꣤वि꣥भाऽ६ । हा꣥उवा ॥ स꣢हऽ᳐३मे꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ६)(३०)॥ दू ॥ १०७९ ॥
५५०-१ आङ्गिरसानि त्रीणि।   त्रयाणामङ्गिरसोऽनुष्टुबिन्द्रः ॥
आ꣣ऽ२३४भी꣥ ॥ ओ꣡इनवन्तआद्रू꣢ऽ१हाऽ२: । ओ꣡इप्रियमिन्द्रस्यकामा꣢ऽ१याऽ२म् ॥
ओ꣡इवत्सन्नपूर्वआयू꣢ऽ१नीऽ२ ॥ ओ꣡इ । जातꣳरिहन्तिमो꣢ऽ१२३४ । वा꣥ । ता꣤ऽ५रोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ९)(३१)॥ जो ॥ १०८० ॥

५५०-२
अ꣥भी꣯ । न꣣वा꣢ऽ३२ । त꣤आऽ५द्रुहाः ॥ प्रि꣢यामिन्द्राऽ᳐३ । स्या꣡का꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४या꣥म् । व꣢त्सन्नपूऽ᳐३ ।
र्वा꣡आ꣢ ᳐यू꣣ऽ२३४नी꣥ ॥ जा꣡꣯ता꣢ऽ३ꣳहो꣡इ । रिहा꣢ऽ३हो꣡ ॥ ति꣢मा꣡꣯ताऽ२३रा꣢ऽ᳐३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ७)(३२)॥ ठे ॥ १०८१ ॥

५५०-३
अ꣥भी꣤꣯न꣥वन्तेअद्रु꣤हः꣥ । ओ꣤हाइ ॥ प्रि꣥य꣤मिन्द्र꣥स्यका꣤꣯मि꣥यम् । ओ꣤हाइ ॥ व꣥त्स꣤न्नपूर्व꣥आ꣤꣯यु꣥नि ।
औहो꣤वाहा꣥इ ॥ जा꣡तꣳरिहौ꣢वा᳐ । ती꣣ऽ२३४मा꣥ । त꣢रा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ८)(३३)॥ खै ॥ १०८२ ॥
५५१-१ गृत्समदस्य सूक्तानि चत्वारि।   चतुर्णां गृत्समदो बृहती सोमः ॥
आ꣣꣯हा꣢ऽ᳐३ । ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ र्य꣢ता꣡꣯यधृ꣢ष्ण꣡वे꣰꣯ऽ२ । ध꣣नू꣢ऽ३ः । ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ त꣢न्वन्तिपौ꣡꣯ꣳसिय꣢ ᳐म् ।
शु꣣क्रा꣢ऽ३: । ओ꣡ऽ२३४वा꣥ । वि꣡न्यत्यसुरा꣢꣯यनिर्णि꣡ज꣰꣯ऽ२᳐ । वि꣣पा꣢ऽ३ । ओ꣡ऽ२३४वा꣡ ।
अ꣡ग्रे꣰꣯ऽ२मही꣯यु꣡वाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ १२। मा॰ ४)(३४)॥ ठी ॥ १०८३ ॥

५५१-२
हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ । आ꣡ह꣪र्यता꣢ ᳐ । या꣣ऽ२३४धॄ꣥ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯होवा । ष्णा꣣ऽ२३४वे꣥ ॥ हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ ।
ध꣡नूष्टान्वा꣢ ᳐ । ती꣣ऽ२३४पौ꣥ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯होवा । सी꣣ऽ२३४या꣥म् ॥ हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ । शु꣡क्रावि꣢य ।
ता꣡अ꣪सुरा꣢ ᳐ । या꣣ऽ२३४नी꣥ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯होवा । णी꣣ऽ२३४जे꣥ ॥ हा꣢ऽ३᳐हा꣢इ । वि꣡पामाग्रा꣢इ᳐ ।
मा꣣ऽ२३४ही꣥ । हा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯होवा ॥ यू꣣ऽ२३४वा꣥: ॥
(दी॰ ९। प॰ २५। मा॰ ८)(३५)॥ नै ॥ १०८४ ॥

५५१-३
आ꣤꣯ह꣥र्यता꣤꣯य꣥धृष्ण꣤व꣥आ꣤ ॥ ध꣡नूष्टा꣢ऽ१न्वाऽ२ । ति꣡पौ᳐ꣳसा꣢ऽ१याऽ२म् । शु꣡क्रावि꣢य । ता꣡अ꣪सुरा꣢ऽ३ ।
या꣡नीऽ२᳐र्णा꣣ऽ२३४इजा꣥इ ॥ वि꣡पामा꣢ऽ१ग्राऽ२इ ॥ ओ꣡इ । माऽ२३ही꣤ऽ३ । यू꣢ऽ᳐३४५वोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ८)(३६)॥ णै ॥ १०८५ ॥

५५१-४
आ꣣ऽ४ह꣥र्य । ता꣣ऽ४य꣥धृ । ष्णा꣢ऽ᳐३वे꣤ । धनुष्ट꣥न्वा ॥ ति꣢पौ᳐ꣳसि꣣या꣢म् । शु꣡क्रावि꣢य । ता꣡अ꣪सुरा꣢ ᳐ ।
य꣣ना꣢उवाऽ३ । णीऽ२३४जे꣥ ॥ वा꣡इपा꣢ऽ᳐३ꣳहा꣢इ । आ꣡ग्रे꣢ऽ३हा꣢इ ॥ मही꣡꣯यूऽ२३वा꣢ऽ३४३ः ।
ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १४। मा॰ ८)(३७)॥ झै ॥ १०८६ ॥
५५२-१ द्विरभ्यस्तमाकूपारम्।   अकूपारोऽनुष्टुब्देवाः ॥
प꣣रि꣤त्य꣣ꣳह꣤र्यत꣣ꣳह꣤रि꣥म् । पा꣡ऽ२३४ । रित्यꣳहौहोऽ५र्यतꣳह꣤राइम् ॥ ब꣤भ्रुं ꣣पु꣤नन्तिवा꣣꣯ रे꣤꣯ण꣥ ।
बा꣡ऽ२३४ । भ्रुम्पुनौहोऽ५न्तिवारे꣤꣯णा ॥ यो꣣꣯ दे꣤꣯ वा꣣꣯न्विश्वाꣳ꣤꣯इ꣣त्प꣤रि꣥ । यो꣡ऽ२३४ ।
देवान्वौहोऽ५श्वाꣳइत्प꣤राइ ॥ म꣣दे꣤꣯नसह꣣गच्छ꣤ति꣥ । मा꣡ऽ२३४ । देनसौहोऽ५हग ।
छा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १७। प॰ १३। मा॰ ७)(३८)॥ जे ॥ १०८७ ॥
५५३-१ वैरूपम्।   विरूपोऽनुष्टुप्सोमः ॥
प्र꣢सु꣡न्वाऽ२३ना꣤꣯यअ꣥न्धसाः ॥ म꣡र्त꣢: । न꣡वाऽ२᳐ । ष्ट꣣त꣢द्वा꣣ऽ२३४चा꣥: । अ꣢पश्वानम꣣रा꣢ ᳐ ।
धा꣣ऽ२३४सा꣥म् ॥ हता꣡꣯माऽ२३ख꣢म् ॥ न꣣भॄ꣢ऽ३गा꣤ऽ५᳚वाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ७)(३९)॥ डे ॥ १०८८ ॥
॥ त्रयस्त्रिंशदष्टमः, अष्टमः खण्डः ॥ ८ ॥ दशतिः ॥ ६ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने षोडशस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — षोडशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ नवमः खण्डः॥ (ऋ-१२, सा-३५)

५५४-१ कावम्।   (कुत्सो)। कविः जगती सोमसूर्यौ ॥
आ꣢भि᳐प्री꣣ऽ२३४या꣥ । णी꣢पा᳐वा꣣ऽ२३४ता꣥इ । चा꣢꣯ नो꣡꣯हिताऽ२३ः ॥ ना꣢मा᳐नी꣣ऽ२३४या꣥ ।
ह्वो꣢अ᳐धी꣣ऽ२३४ये꣥ । षू꣢꣯व꣡र्द्धताये꣢ऽ३ ॥ आ꣢सू᳐री꣣ऽ२३४या꣥ । स्या꣢बॄ᳐हा꣣ऽ२३४ता꣥: । बॄ꣢꣯ह꣡न्नधाये꣢ऽ३ ॥
रा꣢थं᳐वा꣣ऽ२३४इश्वा꣥ । चा꣢मा᳐रू꣣ऽ२३४हा꣥त् । वि꣢चाऽ᳐३१उवाऽ२३ ॥ क्षाऽ२३४णा꣥: ॥
(दी॰ ४। प॰ १३। मा॰ ८)(१)॥ दै ॥ १०८९ ॥

५५४-२ ऐडंकावम्।   कविर्जगती सोमसूर्यौ ॥
ए꣤ऽ५ । अ꣤भिप्रि꣥याऽ२᳐ । णि꣣प꣤वता꣥इ । ए꣤ऽ५ । च꣤नो꣯हि꣥ताः ॥ ए꣤ऽ५ । ना꣤꣯मा꣯नि꣥याऽ२᳐ । ह्वो꣣꣯अ꣤धिया꣥इ ।
ए꣤ऽ५ । षु꣤वर्द्ध꣥ताइ ॥ ए꣤ऽ५ । आ꣤꣯सू꣯रि꣥याऽ२᳐ । स्य꣣बृ꣤हता꣥: । ए꣤ऽ५ । बृ꣤हन्न꣥धी ॥ ए꣤ऽ५ ।
र꣤थंवि꣥श्वाऽ२᳐ । च꣣म꣤रुहा꣥त् । ए꣤ऽ५ । वि꣤चक्ष꣥णाः । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ २२। मा॰ ९)(२)॥ खो ॥ १०९० ॥

५५४-३ वाजसनि।   वाजसनिर्जगती सोमसूर्यौ ॥
अ꣥भ्यौ꣯हो꣯वा꣯हा꣯इप्रिया꣤णी꣥ ॥ प꣡वता꣢इ᳐चा꣣ऽ२३४नो꣥ । हि꣢ताः꣡ । ना꣢꣯मा꣡नि꣢यह्वो꣯अधिये꣯षुवर्द्धता꣡इ ॥
आ꣢꣯सू꣡र्य꣢स्यबृहतो꣯बृहन्नधा꣡इ ॥ र꣢थ꣡म् । वाइश्व꣢ञ्चमरु꣡ह꣢त् । विचाऽ३᳐१उवाऽ२३ ॥ क्षा꣢ऽ᳐३णा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ९। प॰ ९। मा॰ ११)(३)॥ ध ॥ १०९१ ॥

५५४-४ वाजजिनी द्वे।   द्वयोर्वाजजित् (प्रजापतिः) जगती सोमसूर्यौ ॥
अ꣢भिप्रि꣡या । णी꣢꣯प꣡वताइ । होइहोवा꣢ऽ᳐३हो꣡ये꣢ऽ३४ । चनो꣥꣯हिता꣤: । हा꣥꣯हो꣤ । वाहा꣥इ ॥ ना꣢꣯मा꣯नि꣡या ।
ह्वो꣢꣯अ꣡धियाइ । होइहोवा꣢ऽ᳐३हो꣡ये꣢ऽ३४ । षुव꣥र्द्धता꣤इ । हा꣥꣯हो꣤ । वाहा꣥इ ॥ आ꣢꣯सू꣯रि꣡या । स्या꣢꣯बृ꣡हताः ।
होइहोवा꣢ऽ᳐३हो꣡ये꣢ऽ३४ । बृह꣥न्नधी꣤ । हा꣥꣯हो꣤ । वाहा꣥इ ॥ र꣢थंवि꣡श्वा । चा꣢꣯म꣡रुहात् । होइहोवा꣢ऽ᳐३हो꣡ये꣢ऽ३४ ।
विच꣥क्षणाः꣤ । हा꣥꣯हो꣤ । वा꣥ऽ६हा꣥उ । वा ॥ वा꣢꣯ जी꣡꣯जिगी꣢ऽ३वा꣢ꣳऽ१ ॥
(दी॰ १५। प॰ २६। मा॰ १६)(४)॥ पू ॥ १०९२ ॥

५५४-५
अ꣢भिप्रि꣡या । णी꣢꣯प꣡वताइ । चा꣢꣯ नो꣡꣯हिताः । होवा꣢ऽ᳐३हो꣡इ ॥ ना꣢꣯मा꣯नि꣡या । ह्वो꣢꣯अ꣡धियाइ । षू꣢꣯व꣡र्द्धताइ ।
होवा꣢ऽ᳐३हो꣡इ ॥ आ꣢꣯सू꣯रि꣡या । स्या꣢꣯बृ꣡हताः । बॄ꣢꣯ह꣡न्नधाइ । होवा꣢ऽ᳐३हो꣡ ॥ र꣢थंवि꣡श्वा । चा꣢꣯म꣡रुहात् ।
वी꣢꣯च꣡क्षणाः । होवा꣢ऽ३हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ वा꣢꣯ जी꣡꣯जिगी꣢꣯ वा꣡꣯विश्वा꣢꣯ध꣡ना꣰꣯ऽ२᳐नी꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २१। प॰ १८। मा॰ १२)(५)॥ गा ॥ १०९३ ॥

५५४-६ स्वारंकावम्।   कविः प्रजापतिर्जगती सोमसूर्यौ ॥
अ꣥भ्यो꣤वा ॥ प्रि꣢या꣡꣯णिपवताइ । च꣢नो꣯हा꣡इताऽ२: । ना꣡꣯मा꣯नियह्वो꣯अधियाइ । षु꣢वर्द्धा꣡ताऽ२इ ।
आ꣡꣯सू꣯र्यस्यबृहतो । बृ꣢हन्ना꣡धीऽ२३ ॥ रा꣡था꣢ऽ᳐३म्वा꣤इश्वा꣥ । च꣢मरू꣡हाऽ२३त् ।
वा꣡इचा꣢ऽ᳐३क्षा꣤ऽ५"'णाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ७। प॰ १०। मा॰ १०)(६)॥ ञौ ॥ १०९४ ॥
५५५-१ उद्वद्भार्गवम् आङ्गिरसानि त्रीणि वा।   त्रयाणां भृगुर्जगती सोमो देवाः ॥
अ꣢चो꣯दा꣡सोऽ२३ । नो꣢꣯धनू꣡वाऽ२३ । तू꣢꣯इ꣡न्दवाः ॥ प्र꣢स्वा꣯ना꣡सोऽ२३ । बृ꣢हद्दा꣡इवेऽ२३ । षू꣢꣯ह꣡रयाः ॥
वि꣢चिदा꣡श्नाऽ२३ । ना꣢꣯इषा꣡याऽ२३ः । आ꣢꣯ रा꣡꣯तयाः ॥ अ꣢र्यो꣯ना꣡स्साऽ२३ । तू꣢꣯सना꣡इषाऽ२३ ।
तू꣢꣯ नो꣡꣯धिया꣢ऽ३१उवाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १२। प॰ १२। मा॰ ९)(७)॥ छो ॥ १०९५ ॥

५५५-२ आङ्गिरसे द्वे।   द्वयोरङ्गिरसो जगती सोमो देवाश्च ॥
आ꣡चो꣢꣯द꣣सो꣢ । नो꣣꣯ध꣤नुवन्तु꣥ । इ꣤न्दवा꣥: ॥ प्रा꣡स्वा꣢꣯ ना꣣꣯सो꣢ ᳐ ॥ बृ꣣ह꣤द्दे꣯वे꣯षु꣥ । ह꣤रया꣥: । वा꣡इचि꣢द꣣श्ना꣢ ᳐ ।
ना꣣꣯इ꣤षयो꣯अ꣥ । रा꣤꣯तया꣥: ॥ आ꣡र्यो꣢꣯न꣣स्सा꣢ ᳐ । तु꣣स꣤निष꣥ । तु꣤नोऽ५धियाउ ॥ वा ॥
(दी॰ १०। प॰ १३। मा॰ ७)(८)॥ बे ॥ १०९६ ॥

५५५-३
हा꣢꣯उहो꣯वाऽ᳐३हा꣢इ । अचो꣯दसो꣯नो꣯ऽ३धा꣡ । नु꣢वाऽ᳐३न्तू꣤ऽ३ । इ꣢न्दवा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
हा꣢꣯उहो꣯वाऽ᳐३हा꣢इ । प्रस्वा꣯ना꣯सो꣯बॄऽ᳐३हा꣡त् । दे꣢꣯वेऽ᳐३षू꣤ऽ३ । ह꣢र᳐या꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
हा꣢꣯उहो꣯वाऽ᳐३हा꣢इ । विचिदश्ना꣯ना꣯ऽ३आ꣡इ । ष꣢योऽ᳐३आ꣤ऽ३ । रा꣢꣯तया꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
हा꣢꣯उहो꣯वाऽ᳐३हा꣢इ । अर्यो꣯नस्सन्तुऽ᳐३सा꣡ । नि꣢षाऽ᳐३न्तू꣤ऽ३ । नो꣢꣯धियाऽ᳐३२उवाऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ २०। प॰ १६। मा॰ १६)(९)॥ पू ॥ १०९७ ॥

५५५-४ सामराजे द्वे (महा सामराजं)।   द्वयोः सामराजो जगती सोमो देवाश्च ॥
अ꣥चो꣤हाइ ॥ दा꣡सो꣯नो꣯धनुवा । तु꣢इन्दा꣡वाऽ२: । प्र꣡स्वा꣯ना꣯꣯सो꣯बृहद्दे꣯वाइ । षु꣢हरा꣡याऽ२᳐: ।
वि꣣चोऽ२३४हा꣥इ । अ꣣श्नोऽ२३४हा꣥इ । ना꣢꣯इषयः । अ꣣रोऽ२३४हा꣥इ । ता꣡या꣢: ॥ अर्यो꣣ऽ२३४हा꣥इ ।
न꣣स्सोऽ२३४हा꣥ ॥ तू꣢सा᳐नी꣣ऽ२३४षा꣥ । तू꣡ना꣭ऽ३ उवा꣢ऽ᳐३ ॥ धी꣣ऽ२३४या꣥: ॥
(दी॰ ७। प॰ १५। मा॰ १४)(१०)॥ ञी ॥ १०९८ ॥

५५५-५ स्वार सामराजम्।
अ꣥चौ꣯हो꣤वा꣥ ॥ दा꣡सो꣯नो꣯धनुवा । तु꣢इन्दा꣡वाऽ२: । प्र꣡स्वा꣯ना꣯सो꣯बृहद्दे꣯वाइ । षु꣢꣢हरा꣡याऽ२३ः ।
वा꣡इची꣢ऽ३दा꣤श्ना꣥ । ना꣢इषा꣣ऽ२३४या꣥: । हो꣢इ᳐ । अ꣣रा꣢ ᳐ता꣣ऽ२३४ या꣥: ॥ हो꣢ऽ३इ । आ꣡र्यो꣢ऽ३ना꣤स्सा꣥ ॥
तू꣢सा᳐नी꣣ऽ२३४षा꣥ । हो꣢ । तु꣣नो꣢ऽ᳐३धा꣤ऽ५᳚याऽ६५६ः ॥
(दी॰ ७। प॰ १४। मा॰ ११)(११)॥ झ ॥ १०९९ ॥

५५५-६ सिमानान्निषेधः।
अ꣥चो꣤ । वाहा꣥इ ॥ दा꣡सो꣯नो꣯धनुवा । तु꣢इन्दा꣡वाऽ२: । प्रा꣡स्वा꣯ना꣯सो꣯बृहद्दे꣯वाइ । षु꣢हरा꣡याऽ२३ः ।
वा꣡ऽ२३इची꣢त् । आ꣡ऽ२३श्ना꣢ऽ३४ । ना꣣꣯इ꣤ष꣣यो꣤꣯अरा꣥꣯ । ता꣢ऽ३या꣢: ॥ आ꣡ऽ२३र्यो꣢ ॥ ना꣡ऽ२३स्सा꣢ऽ३४ ।
तुस꣣नि꣤ष꣥ । तु꣣नो꣢ऽ३धा꣤ऽ५᳚याऽ६५६ः ॥
(दी॰ ९। प॰ १४। मा॰ ११)(१२)॥ ध ॥ ११०० ॥
५५६-१ वैधृतं वासिष्ठम्।   वसिष्ठो जगती इन्द्रः ॥
ए꣢꣯ष꣡प्रकोशेऽ२ । म । धु꣡माꣳऽ२᳐ । अ꣣चा꣢इ᳐क्रा꣣ऽ२३४दा꣥त् ॥ इ꣢न्द्रा꣡स्य꣢वा꣡श्राऽ२: । व ।
पु꣡षोऽ२᳐ । व꣣पु꣢ष्टा꣣ऽ२३४मा꣥: । अ꣢भा꣡ऋ꣢ता꣡स्याऽ२ । सु । दु꣡घाऽ२᳐: । घृ꣣ता꣢ ᳐श्चू꣣ऽ२३४ता꣥: ।
वा꣢꣯ श्रा꣡꣯अ꣢र्षा꣡न्तीऽ२ । प । य꣡साऽ२३ । च꣣धा꣢ऽ᳐३इना꣤ऽ५᳚वाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ३। प॰ १६। मा॰ १०)(१३)॥ टौ ॥ ११०१ ॥
५५७-१ लौशे द्वे।   द्वयोर्लुशो जगती इन्द्रसोमौ ॥
प्रो꣢ ᳐या꣣ऽ२३४सी꣥त् । इ꣡न्दुरिन्द्राऽ२३ । स्या꣤ऽ३नि꣢ष्कृ꣣त꣥म् । स꣣खा꣢꣯स꣣ख्यु꣥: । न꣡प्रमिनाऽ२३ ।
ती꣤ऽ३स꣢ङ्गि꣣र꣥म् । म꣣र्य꣢इ꣣व꣥ । यु꣡वतिभाऽ२३इः । सा꣤ऽ३म꣢र्ष꣣ति꣥ । सो꣣꣯ म꣢ᳲक꣣ला꣥ । शे꣡꣯शतयाऽ२३ ।
मना꣢ऽ᳐३पा꣤ऽ५᳚थाऽ६५६ ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ७)(१४)॥ ठे ॥ ११०२ ॥

५५७-२
प्रो꣣꣯ या꣤꣯सी꣯दि꣣न्दु꣤रि꣣न्द्र꣤स्य꣥निः । कृ꣣ता꣢म् । कृता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥ स꣣खा꣢ऽ३१२३४ । सख्यु꣥र्न꣤प्रमि꣥ना꣯तिसम् ।
गि꣤रा꣥ङ्गि꣤रा꣥म् ॥ म꣣र्या꣢ऽ३१२३४ः । इव꣥युवति꣤भि꣥स्स꣤म꣥ । ष꣤ता꣥इष꣤ता꣥इ ॥ सो꣣꣯मा꣢ऽ३१२३४ः ।
कलशे꣥꣯शत꣤या꣥꣯ । म꣣ना꣢ऽ᳐३पा꣤ऽ५᳚थाऽ६५६ ॥
(दी॰ ७। प॰ १२। मा॰ ९)(१५)॥ छो ॥ ११०३ ॥

५५७-३ प्रवद्भार्गवम्।   भृगुः जगती इन्द्रसोमौ ॥
प्रो꣢꣯अया꣡꣯साइत् । इ꣢न्दुरि꣡न्द्रा । स्याऽ२नि꣡ष्कृताम् ॥ स꣢खा꣯स꣡ख्यूः । न꣢प्र꣡मिना । ताऽ२इस꣡ङ्गिराम् ॥
म꣢र्यइ꣡वा । यु꣢वति꣡भाइः । साऽ२म꣡र्षताइ ॥ सो꣢꣯म:क꣡ला । शे꣢꣯श꣡तया । माऽ२ना꣡꣯पथा꣢ऽ३१उ ॥
वाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १३। मा॰ १२)(१६)॥ गा ॥ ११०४ ॥

५५७-४ तन्त्रम्।   विरूपो जगतीन्द्रसोमौ ॥
प्रो꣢꣯अया꣡꣯साइत् । इ꣢न्दुरि꣡न्द्रा । स्या꣢꣯नि꣡ष्कृताऽ२३म् ॥ सखा꣢꣯स꣣ख्युः꣥ । न꣣प्रा꣢ ᳐मि꣣ना꣥꣯ ।
ति꣣स꣢ङ्गा꣣ऽ२३४इरा꣥म् ॥ म꣢र्यइ꣡वा । यु꣢वति꣡भाइः । सा꣢꣯म꣡र्षताये꣢ऽ३ ॥ सो꣯मᳲ꣢क꣣ला꣥ । शे꣣꣯शा꣢ ᳐त꣣या꣥꣯ ।
म꣣ना꣢ऽ᳐३पा꣤ऽ५᳚थाऽ६५६ ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ १०)(१७)॥ थौ ॥ ११०५ ॥

५५७-५ यामम्।   यमो जगतीन्द्रसमौ ॥
आ꣡ऽ२इ । इ꣡या । प्रो꣯अया꣯साइदि꣪न्दुरिन्द्राऽ२३ । स्या꣤ऽ३नि꣢ष्कृ꣣त꣥म् ॥ स꣡खा꣯सख्यूर्न꣪प्रमिनाऽ२३ ।
ती꣤ऽ३स꣢ङ्गि꣣र꣥म् ॥ म꣡र्यइवायु꣪वतिभाऽ२३इः । सा꣤ऽ३ म꣢र्ष꣣ति꣥ ॥ आ꣡ऽ२इ । इ꣡या ।
सो꣯म:कलाशे꣢ऽ१शतयाऽ२३ । मना꣢ऽ᳐३पा꣤ऽ५᳚थाऽ६५६ ॥
(दी॰ ४। प॰ १२। मा॰ ९)(१८)॥ थो ॥ ११०६ ॥
५५८-१ दास (वात्स) शिरसी द्वे।   द्वयोर्दसशिरा जगती सोमः ॥
ध꣢र्ता꣡दाइवा꣢ऽ३ । ओ꣤꣯वाऽ५ए ॥ प꣢वते꣯कृत्विऽ३यो꣡रासा꣢ऽ३ । ओ꣤꣯वाऽ५ए । द꣢क्षो꣡दाइवा꣢ऽ᳐३ ।
ओ꣤꣯वाऽ५ए ॥ ना꣢꣯मनुमा꣯दिऽ३यो꣡नॄभा꣢ऽ३ । ओ꣤꣯वाऽ५ए ॥ ह꣢रा꣡इस्सार्जा꣢ऽ३ ।
ओ꣤꣯वाऽ५ए ॥ नो꣢꣯अतियो꣯नऽ३सा꣡त्वाभा꣢ऽ३ । ओ꣤꣯वाऽ५ए । वृ꣢था꣡पाजा꣢ऽ᳐३ ।
ओ꣤꣯वाऽ५ए ॥ सि꣢कृणुषाइनदा꣡इषूवा꣢ऽ३ । ओ꣤꣯वाऽ५ए । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ १३। प॰ १८। मा॰ १५)(१९)॥ डु ॥ ११०७ ॥

५५८-२
ध꣥र्ता꣯औ꣯हो꣤होहा꣥इ ॥ दि꣢वः꣡ । पवतेका꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ᳐३ । हा꣢ । त्वियो꣡꣯रसो । दक्षो꣯देवा꣢ ᳐ ।
औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ । ना꣡꣯मनुमा । दि꣢यो꣡꣯नृभाइः । हराइस्सार्जा꣢ ᳐ ॥ औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ ।
नो꣡꣯अतियो । न꣢स꣡त्वभाइः ॥ वृथा꣯पाजा꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ ॥ सिकृणू꣡षा꣢ । औ꣣꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ᳐३ ।
हा꣢इ᳐ । न꣣दी꣯षु꣢वा꣡ । औ꣢꣯हो꣭ऽ३हा꣢ऽ३ । हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । न꣢दी꣡꣯षुवा꣢ऽ१ ॥
(दी॰ १८। प॰ २८। मा॰ १०)(२०)॥ डौ ॥ ११०८ ॥
५५९-१ यामानि त्रीणि (ऐडयामम्)।   त्रयाणां यमो जगती सोमेन्द्रौ ॥
वृ꣢षा꣯मा꣡तीऽ२३ । ना꣢꣯म्पवा꣡ताऽ२३इ । ए꣢ऽ᳐३ । वि꣢चक्षणएऽ᳐३ ॥ सो꣢꣯मो꣯आ꣡ह्नाऽ२३म् । प्र꣢तरा꣡इताऽ२३ ।
ए꣢ऽ᳐३ । उ꣢षसा꣯न्दिवएऽ᳐३ ॥ प्रा꣢꣯णा꣯सा꣡इन्धू ऽ२३ । नां ꣢꣯कला꣡शाꣳऽ२३ । ए꣢ऽ᳐३ । अ꣢चिक्रददेऽ᳐३ ॥
इ꣢न्द्रस्या꣡हाऽ२३ । दि꣢या꣯वा꣡इशाऽ२३न् । ए꣢ऽ᳐३ । म꣢नी꣯षिभिरेऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥
डा ॥
(दी॰ १०। प॰ १८। मा॰ १०)(२१)॥ बो ॥ ११०९ ॥

५५९-२
वृ꣡षा꣢꣯मती꣯ना꣡꣯म्पव । ताइवा꣢ऽ१इचाऽ२३४ । क्ष꣥ । णा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ सो꣡꣯ मो꣢꣯अ꣡ह्ना꣢꣯म्प्र꣡तरी꣢꣯ ।
तो꣡षा꣢ऽ१साऽ२३४म् । दि꣥ । वा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ प्रा꣢꣯ णा꣡꣯सिन्धू꣢꣯नां ꣯कल꣡ । शाꣳआ꣢ऽ१चाऽ२३४इ ।
क्र꣥ । दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡त् ॥ आ꣡इन्द्रस्य꣢हा꣡꣯र्दिया꣯वि । शान्मा꣢ऽ१नाऽ२३४इ । षिभा꣥ऽ२उ । वाऽ३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १३। प॰ १६। मा॰ १२)(२२)॥ टा ॥ १११० ॥

५५९-३
वृ꣡षाऽ२म꣡ताऽ२इ । ना꣡꣯म्पवते꣯वि꣢च꣡क्षाऽ२३णा꣢: ॥ सो꣡꣯मोऽ२अ꣡ह्नाऽ२म् ।
प्र꣡तरी꣯तो꣯ष꣢सा꣡꣯न्दाऽ२३इवा꣢: ॥ प्रा꣡꣯णाऽ२सि꣡न्धूऽ२ । नां ꣡꣯कलशा꣯ꣳअ꣢चि꣡क्राऽ२३दा꣢त् ॥
इ꣡न्द्राऽ२स्य꣡हाऽ२ । दि꣡या꣯विशन्म꣢नी꣡꣯षाऽ२३इभा꣢ऽ३४३इः ॥ ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १०। मा॰ ११)(२३)॥ ङा ॥ ११११ ॥
५६०-१ मरुतान्धेनु।   मरुतो जगती सोमः ॥
त्रा꣡ऽ२३४इः । अस्मै꣥꣯सप्त꣤धे꣥꣯न꣤वो꣥꣯दुदौ꣯ । हो꣤ह्राइरा꣥इ ॥ स꣢त्या꣡꣯मा꣯शिरम्परमाइ । वि꣢यो꣯मा꣡नीऽ२ ।
चत्वा꣡꣯र्यन्या꣯भुवना । नि꣢निर्णा꣡इजाऽ२३इ ॥ चा꣢रू᳐णा꣣ऽ२३४ इचा꣥ ॥ क्रे꣢꣯य꣡दृतैः꣢꣯ ।
आ꣡वा꣢ऽ३र्द्धा꣤ऽ५᳚ताऽ६५६ ॥
(दी॰ ११। प॰ १०। मा॰ ९)(२४)॥ ङो ॥ १११२ ॥
५६१-१ इन्द्रस्यापामीवम्।   इन्द्रो जगतीन्द्रसोमौ ॥
इ꣢न्द्रा꣡ । य꣢सो꣯मसुषुताऽ᳐३:पा꣤ऽ३रि꣢स्र꣣व꣥ ॥ अ꣢पा꣡ । मी꣢꣯वा꣯भवतुराऽ३क्षा꣤ऽ३सा꣢꣯स꣣ह꣥ ॥ मा꣢꣯ता꣡इ ।
र꣢सस्यमत्सताऽ᳐३द्वा꣤ऽ३या꣢꣯वि꣣न꣥: ॥ द्र꣢वा꣡इ । ण꣢स्वन्तइहस । तु꣣वा꣢ऽ᳐३इन्दा꣤ऽ५᳚वाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ६)(२५)॥ घू ॥ १११३ ॥

५६१-२ वायोरभिक्रन्दम् (वायोरभिदः)।   वायुर्जगतीन्द्रसोमौ ॥
इ꣤न्द्रा꣥꣯यसो꣯मसु꣤षु꣥त:प꣤र्यौ꣥꣯ । हो꣤इस्रावा꣥ ॥ अ꣡पा꣯मी꣯वा꣯भवतुरक्षसा꣢ऽ१सा꣢ऽ᳐३हा꣢ ।
मा꣡꣯ते꣯रसस्यमत्सतद्वया꣢ऽ१वी꣢ऽ३नो꣢ ᳐ । द्रा꣣ऽ२३४वी꣥ । णा꣣ऽ२३४स्वा꣥ ॥ ता꣡इ꣢ह꣣सा꣢ऽ᳐३ । हा꣡ऽ२३ ।
तुवा꣢ऽ᳐३इन्दा꣤ऽ५᳚वाऽ६५६ः ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ४)(२६)॥ ढी ॥ १११४ ॥
५६२-१ यामानि त्रीणि।   त्रयाणां यमो जगती सोमश्येनौ ॥
अ꣢सा꣯वि꣡सो । मो꣢꣯अ꣡रुषोऽ२३४ । वृषा꣥꣯ह꣤राइः ॥ रा꣢꣯जे꣯व꣡दा । स्मो꣢꣯अ꣡भिगा ऽ२३४ः । अचि꣥क्र꣤दात् ।
पु꣢ना꣯नो꣡꣯वा ॥ रा꣢꣯म꣡तियाऽ२३४इ । षिअ꣥व्य꣤याम् । श्ये꣢꣯नो꣯न꣡यो । निं ꣢घृ꣡तवाऽ२३ । त꣤माऽ५सदात् ।
हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ १४। मा॰ ११)(२७)॥ घ ॥ १११५ ॥

५६२-२
आ꣢सा᳐वी꣣ऽ२३४सो꣥ । मो꣢अ᳐रू꣣ऽ२३४षा꣥: । वा꣢꣯ र्षा꣡꣯हराये꣢ऽ३ः ॥ रा꣢जे᳐वा꣣ऽ२३४दा꣥ ।
स्मो꣢अभी꣣ऽ२३४गा꣥: । आ꣢꣯चि꣡क्रदाऽ२३त् ॥ पू꣢ना᳐नो꣣ऽ२३४वा꣥ । रा꣢मा᳐ती꣣ऽ२३४ये꣥ ।
षी꣢꣯अ꣡व्ययाऽ२३म् ॥ श्ये꣢नो᳐ना꣣ऽ२३४यो꣥ । नि꣢घा᳐र्त्ता꣣ऽ२३४वा꣥ । त꣣मा꣢ऽ᳐३ ।
सा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ दे꣢ऽ३ । दि꣡वीऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ १५। मा॰ ९)(२८)॥ ङो ॥ १११६ ॥

५६२-३
अ꣤सा꣥꣯विसो꣤꣯ मो꣥꣯अरुषो꣤꣯वृषा꣥꣯ह꣤ । राइः ॥ रा꣯जे꣥꣯वदस्मो꣤꣯अ꣥भि꣤गा꣯अ꣥चिक्र । दा꣤त् ॥ पु꣥ना꣯नो꣤꣯वा꣯र꣥म꣤त्ये꣥꣯ष्यव्य꣤ ।
याम् ॥ श्ये꣥꣯ नो꣤꣯नयो꣯निं ꣥घृत꣤ । वा । त꣣मा꣢ऽ᳐३ । सा꣡ऽ२᳐दा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ए꣢ऽ᳐३ । दि꣡वीऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ १८। प॰ १२। मा॰ ८)(२९)॥ ठै ॥ १११७ ॥
५६३-१ मरुतान्धेनु।   मरुतो जगती सोमः ॥
प्रा꣤दे꣥ ॥ व꣢म꣡च्छा꣢꣯म꣡धु꣢म । तआऽ२इन्दवा꣡: । आसि꣢ष्या꣣ऽ२३४दा꣥ । त꣢गा꣡꣯वआ꣢꣯ । नधाऽ२इनवा꣡: ।
बर्हि꣢षा꣣ऽ२३४दा꣥: । व꣢चना꣡꣯ वा꣰꣯ऽ२ । तऊऽ२धभा꣡इः ॥ पारि꣢स्रू꣣ऽ२३४ता꣥म् ॥
उ꣢स्रि꣡या꣯निर्णिजन्धाइराये꣢ऽ᳐३ ॥ धाइरा꣢ऽ३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ धा꣢ऽ᳐३इरा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡इ ॥
(दी॰ ८। प॰ १३। मा॰ १६)(३०)॥ डू ॥ १११८ ॥
५६४-१ काक्षीवतानि (शार्ङ्गाणि) त्रीणि।   अञ्जतः कक्षीवान् जगती सोमः ॥
अ꣢ञ्ज꣡ताइ । वि꣢यञ्ज꣡ताइ । स꣢मञ्जा꣡ताऽ२इ । क्रतुꣳरि꣡हा । ती꣢꣯म꣡धुवा । भि꣢यञ्जा꣡ताऽ२इ ।
सिन्धो꣯रु꣡च्छ्वा । से꣢꣯प꣡तया । त꣢मुक्षा꣡णाऽ२म् । हिरण्य꣡पा । वा꣢꣯ᳲप꣡शुमा । प्सू꣢꣯गृ꣡भ्णता꣢ऽ᳐३१उ᳚वाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ ६)(३१)॥ फू ॥ १११९ ॥

५६४-२ व्यञ्जत: कक्षीवान्।
अ꣣ञ्जा꣢ऽ३हो꣡ । ते꣢ऽ᳐३हो꣡इ । वि꣢यञ्जतेऽ᳐३सा꣤ऽ३म꣢ञ्ज꣣ता꣥इ ॥ क्र꣣तू꣢ऽ३ꣳहो꣡इ । रि꣣हा꣢ऽ᳐३हो꣡ ।
ति꣢मधुवाऽ᳐३भी꣤ऽ३अ꣢ञ्ज꣣ता꣥इ ॥ सि꣣न्धो꣢ऽ३᳐र्हो꣡इ । उ꣣च्छ्वा꣢ऽ३हो꣡ । से꣢꣯पतयाऽ᳐३०ता꣤ऽ३मु꣢क्ष꣣ण꣥म् ॥
हि꣣रा꣢ऽ᳐३हो꣡ । ण्य꣣पा꣢ऽ३हो꣡ । वा꣢꣯:पशुम । प्सु꣣गा꣢ऽ३᳐र्भ्णा꣤५᳚ताऽ६५६इ ॥
(दी॰ २। प॰ १३। मा॰ ८)(३२)॥ जै ॥ ११२० ॥

५६४-३ समञ्जत: कक्षीवान्।
हा꣤वाञ्जा꣥ ॥ ता꣡ऽ२३४इ । वि꣣य꣤ञ्ज꣥ते꣯स꣣म꣤ञ्ज꣥ते꣯ । ए꣡हि꣣या꣢ । ए꣡हि꣣या꣢ऽ३४ ॥
हाउक्रातू꣥म् । रा꣡ऽ२३४इ । हन्तिम꣣धु꣤वा꣯भि꣣य꣤ञ्ज꣥ते꣯ । ए꣡हि꣣या꣢ । ए꣡हि꣣या꣢ऽ३४ ॥
हाउसाइन्धो꣥: । ऊ꣡ऽ२३४त् । श्वा꣯से꣣꣯प꣤त꣣य꣤न्त꣥मुक्ष꣤ण꣥म् । ए꣡हि꣣या꣢ । ए꣡हि꣣या꣢ऽ३४ ॥
हाउहाइरा꣥ । ण्या꣡ऽ२३४ । पा꣯वा꣣꣯ᳲप꣤शु꣣म꣤प्सु꣣गृ꣤भ्ण꣥ते꣯ । ए꣡हि꣣या꣢ । ए꣡हि꣣या꣢ऽ३४ । हा꣥उ । हो꣤ऽ५इ ॥
डा ॥
(दी॰ ९। प॰ २३। मा॰ १३)(३३)॥ दि ॥ ११२१ ॥
५६५-१ अर्कपुष्पे द्वे।   द्वयोरादित्यो जगती ब्रह्मणस्पतिः ॥
प꣢वि꣡त्रंते꣢꣯वि꣡ततं ꣢ब्र꣡ह्मण꣢स्पतेऽ᳐३ । हु꣡वेऽ२३ । हु꣡वेऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ᳐३ । हा꣢इ ॥
प्रभु꣡र्गा꣯त्रा꣢꣯णिप꣡रिये꣢꣯षिविश्व꣡ताऽ२३ः । हु꣡वेऽ२३ । हु꣡वेऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३ हा꣢ऽ᳐३ । हा꣢इ ॥
अ꣡तप्त꣢तनू꣯र्न्न꣡तदा꣰꣯ऽ२मो꣡꣯अश्नु꣢तेऽ᳐३ । हु꣡वेऽ२३ । हु꣡वेऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ᳐३ । हा꣢इ ॥
शृता꣡꣯स꣢इ꣡द्वह꣢न्तस्स꣡न्तदा꣰꣯ऽ२शत । हु꣡वेऽ२३ । हु꣡वेऽ२३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हा꣢ऽ᳐३ । हा꣢ऽ३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥
अ꣢र्को꣡꣯दे꣯वा꣯ना꣰꣯ऽ२म्परमे꣡꣯वियो꣰꣯ऽ२मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡न् ॥
(दी॰ १७। प॰ २२। मा॰ ७)(३४)॥ छे ॥ ११२२ ॥

५६५-२ अर्कपुष्पोत्तरम्।
प꣢वि꣡त्रंते꣢꣯वि꣡ततं ꣢ब्र꣡ह्मण꣢स्पतेऽ३ । हु꣡वाइ । औ꣢꣯हो꣡वाऽ२ ॥ प्रभु꣡र्गा꣯त्रा꣢꣯णि प꣡रिये꣢꣯षिविश्व꣡ताऽ२३ः ।
हु꣡वाइ । औ꣢꣯हो꣡वाऽ२ ॥ अ꣡तप्त꣢तनू꣯र्न्न꣡तदा꣰꣯ऽ२मो꣡꣯अश्नु꣢तेऽ᳐३ । हु꣡वाइ । औ꣢꣯हो꣡वाऽ२ ॥
शृता꣡꣯स꣢इ꣡द्वह꣢न्तस्स꣡न्तदा꣰꣯ऽ२शत । हु꣡वाइ । औ꣢꣯ । हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥
अ꣢र्क꣡स्य꣢दे꣯वा꣡꣯ᳲप꣢रमे꣡꣯वियो꣰꣯ऽ२मा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡न् ॥
(दी॰ १९। प॰ १६। मा॰ ८)(३५)॥ तै ॥ ११२३ ॥
॥ पञ्चविंशन्नवमः, नवमः खण्डः ॥ ९ ॥ दशतिः ॥ ७ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने षोडशः प्रपाठकः ॥ १६ ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — सप्तदशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः

॥ अथ दशमः खण्डः॥ (ऋ-१२, सा-३९)

५६६-१ पदे द्वे।   द्वयोर्वसिष्ठ उष्णिगिन्द्रः ॥
इ꣥न्द्रमच्छा ॥ सु꣢ता꣡इमा꣢ ᳐ । औ꣣꣯होऽ२३४वा꣥ । वृ꣡षणं ꣢य । तू꣡ह꣪रया꣢ ᳐ । औ꣣꣯हो ऽ२३४वा꣥ ॥
श्रु꣢ष्टा꣡इजा꣢꣯ता꣡ । स꣢इ꣣न्द꣢वा꣡: ॥ सु꣢व꣡र्वाऽ२३इदा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५ इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ७)(१)॥ टे ॥ ११२४ ॥

५६६-२
इ꣥न्द्रमच्छा ॥ सु꣢ता꣡इमा꣢ऽ᳐३इ । ता꣡ई꣢ऽ᳐३मा꣢इ । वृ꣡षणं ꣢य । तू꣡ह꣪रयाऽ२: । हा꣡रा꣢ऽ᳐३या꣢: ।
श्रुष्टे꣯जा꣯ता꣯ऽ३सा꣡इ꣪न्दवाऽ२: ॥ आ꣡इन्दा꣢ऽ᳐३वा꣢ऽ᳐३ः ॥ सु꣡वरा꣢ऽ᳐३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥
वि꣢दो꣯विऽ᳐३दा꣡ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ६। प॰ ११। मा॰ ११)(२)॥ क ॥ ११२५ ॥

५६६-३ अनुपदे द्वे।   द्वयोर्वसिष्ठ उष्णिगिन्द्रः ॥
इ꣤न्द्र꣥म् । इन्द्रा꣤म् ॥ अ꣢च्छऽ᳐३सू꣡ता꣢ऽ१इमेऽ२ । आ꣡इमेऽ२ । वृ꣡षणं ꣢य । तू꣡ह꣪रयाऽ२: ।
रा꣡याऽ२: । श्रुष्टे꣯जा꣯ता꣯ऽ३सा꣡इ꣪न्दवाऽ२: ॥ दा꣡वाऽ२३ः ॥ सु꣡वरा꣢ऽ᳐३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥
वि꣢दोऽ᳐३वि꣡दाऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ १२। मा॰ १०)(३)॥ फौ ॥ ११२६ ॥

५६६-४
इ꣣न्द्र꣤म꣣च्छ꣤सुता꣣꣯इ꣤मे꣣꣯वृष꣤णं ꣥यन्तुहा । हो꣢ऽ᳐३४३ । र꣢य꣣आ꣢ ॥ श्रू꣡ष्टा꣢उवा । जा꣡ता꣢उवाऽ३४ ॥
सइ꣣न्द꣤व꣥स्सुवा । हो꣢ ॥ विद꣣ओ꣢ऽ᳐३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ ९। मा॰ ७)(४)॥ झे ॥ ११२७ ॥

५६६-५ पौष्कलम्।   प्रजापतिः उष्णिगिन्द्रः ॥
इ꣢न्द्र꣡मा꣢ऽ᳐३च्छ꣤सु꣥ । ता꣢ ᳐ई꣣ऽ२३४मा꣥इ ॥ वृ꣢षा꣡णं ꣢या꣡ । तूहा꣢ ᳐रा꣣ऽ२३४या꣥: ॥ श्रु꣢ष्टा꣡इजा꣯ता ।
स꣪ईऽ२᳐न्दा꣣ऽ२३४५वाऽ६५६ः ॥ सु꣢वर्वि꣡दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १। प॰ ७। मा॰ ७)(५)॥ खे ॥ ११२८ ॥
५६७-१ ऐषिराणि पञ्च।   इषिर उष्णिगिन्द्रः ॥
प्र꣢धन्वा꣡꣯सौ꣯होइ । औ꣢ऽ᳐३होऽ२३४वा꣥ । म꣢जा꣡꣯गृ꣢विः ॥ इन्द्रा꣯ये꣡꣯न्दौ꣯होइ । औ꣢ऽ᳐३होऽ२३४वा꣥ ।
प꣡रिस्र꣢व ॥ द्युमन्त꣡ꣳशौ꣯होइ । औ꣢ऽ᳐३होऽ२३४वा꣥ । ष्म꣢मा꣡꣯भ꣢र ॥ सुवर्वि꣡दौ꣯होइ ।
औ꣢ऽ᳐३होऽ२३४५वाऽ६५६ ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ९। प॰ १२। मा॰ ५)(६)॥ थ्वु ॥ ११२९ ॥

५६७-२
प्र꣢धन्वा꣡꣯सौ꣯हो । वा꣢ऽ᳐३हो꣡ । म꣢जा꣯गॄ꣡वीऽ२: ॥ इन्द्रा꣯ये꣡꣯न्दौ꣯हो । वा꣢ऽ᳐३हो꣡इ । प꣢रिस्रा꣡वाऽ२ ॥
द्युमन्त꣡ꣳशौ꣯हो । वा꣢ऽ᳐३हो꣡ । ष्म꣢मा꣯भा꣡राऽ२ ॥ सुवर्वि꣡दौ꣯हो । वा꣢ऽ३᳐हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ।
ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ११। प॰ १३। मा॰ ३)(७)॥ ग्वि ॥ ११३० ॥

५६७-३
औ꣢꣯ हौ꣡꣯होइ । प्र꣢धन्वा꣡सोऽ२ । औ꣯हौ꣡꣯हो । म꣢जा꣯गॄ꣡वीऽ२: ॥ औ꣯꣯ हौ꣡꣯होइ । इ꣢न्द्रा꣯या꣡इन्दोऽ२ ।
औ꣢꣯ हौ꣡꣯होइ । प꣢रिस्रा꣡वाऽ२ । औ꣢꣯ हौ꣡꣯होइ । द्यु꣢मन्तं ꣡ꣳशूऽ२ । औ꣢꣯ हौ꣡꣯हो । ष्म꣢मा꣯भा꣡राऽ२ ।
औ꣢꣯ हौ꣡꣯होइ । सु꣢वः । वा꣡ऽ᳐२इ । दा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ १९। प॰ १८। मा॰ ९)(८)॥ द्वो ॥ ११३१ ॥

५६७-४
हु꣡वाऽ२इ । हु꣡वाऽ२इ । हु꣡वाऽ२३हो꣡इ । प्र꣢धन्वा꣡सोऽ२ । मजा꣯गॄ꣡वीऽ२: ॥ इन्द्रा꣯या꣡इन्दोऽ२ ।
परिस्रा꣡वाऽ२ ॥ द्युमन्ता꣡ꣳशूऽ२ । ष्ममा꣯भा꣡राऽ२ ॥ सुवर्वा꣡इदाऽ२म् । हु꣡वाऽ२इ । हु꣡वाऽ२इ ।
हु꣡वाऽ२३हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣣ऽ२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ १५। मा॰ १०)(९)॥ म्वौ ॥ ११३२ ॥

५६७-५
प्र꣢ध꣡न्वाऽ२३सो꣤꣯मजा꣥꣯गृवीः ॥ इ꣡न्द्राऽ२᳐या꣣ऽ२३४इन्दो꣥ । ओ꣡इ । पा꣢ऽ᳐३रा꣡इस्रा꣢ऽ᳐३वा꣢ ॥
द्यु꣡माऽ२᳐न्ता꣣ऽ२३४ꣳशू꣥ ॥ ओ꣡ । ष्म꣪माऽ२᳐भा꣣ऽ२३४५राऽ६५६ ॥ सु꣢वर्वि꣡दाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ २। प॰ ८। मा॰ ५)(१०)॥ जु ॥ ११३३ ॥
५६८-१ शौक्तानि पञ्च।   शुक्तिरुष्णिक्सोमः ॥
स꣢खा꣯ऽ३या꣡आऽ२ । निषी꣡꣯दता ॥ पुना꣯नाऽ२३या꣢ । प्रगा꣡꣯यता ॥ शिशुन्नाऽ२३या꣢ ॥
ज्ञै꣯ꣳपरा꣡इभूऽ२ । षता꣡श्राऽ२३या꣢ऽ᳐३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ४)(११)॥ भी ॥ ११३४ ॥

५६८-२
सा꣤खा꣥या꣤आ꣥ ॥ नि꣢षी᳐दा꣣ऽ२३४ता꣥ । पु꣡नाऽ२᳐ना꣣ऽ२३४या꣥ । प्रा꣡ऽ२᳐गा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ।
या꣣ऽ२३४ता꣥ ॥ शि꣢शू꣡न्न꣢या꣡ । ज्ञै꣢꣯ꣳप꣣रि꣢भू꣡ऽ२३ ॥ षा꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ श्रि꣢येऽ१ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ३)(१२)॥ भि ॥ ११३५ ॥

५६८-३
स꣤खा꣥꣯यआ꣤꣯नि । षी꣥꣯दाऽ६ता꣥ ॥ पु꣢ना꣯ना꣡꣯यप्रगा꣯याता ॥ शिशुन्नयज्ञै꣯ꣳपराऽ२इ ॥
भू꣡꣯षाऽ२३ता꣢ऽ᳐३ । श्रा꣡ऽ२३या꣢ऽ᳐३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ८। मा॰ ४)(१३)॥ डी ॥ ११३६ ॥

५६८-४
औ꣥꣯हा꣯इ । स꣤खा꣥꣯यआ꣤꣯नि । षी꣥꣯दाऽ६ता꣥ ॥ पु꣢ना꣯नौ꣡꣯होइ । पु꣢ना꣯नौ꣡꣯होये꣢ऽ᳐३ । या꣤प्रा꣥या꣤प्रा꣥ ॥ गा꣢꣯य꣡तौ꣯होइ ।
गा꣢꣯य꣡तौ꣯होये꣢ऽ᳐३ । शा꣤इशू꣥ꣳशा꣤इशू꣥म् ॥ न꣢य꣡ज्ञौ꣯होइ । न꣢य꣡ज्ञौ꣯होये꣢ऽ३ । पा꣤री꣥ । पा꣣रा꣢ऽ᳐३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
ए꣢ऽ᳐३ । भू꣢꣯षतश्रि꣣ये꣢ऽ१ ॥
(दी॰ १८। प॰ १५। मा॰ ९)(१४)॥ णो ॥ ११३७ ॥

५६८-५
स꣥खा꣯ । य꣣आ꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ नि꣢षा꣡इ । दाता꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । पु꣢ना꣯ना꣡꣯यप्रगा꣰꣯ऽ᳐२यत ॥
शा꣡इशा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ न꣡यज्ञै꣯ꣳपरिभू꣢ऽ३ । षा꣡ता꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ श्रि꣢येऽ१ ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ७)(१५)॥ भे ॥ ११३८ ॥
५६९-१ कार्णश्रवसानि त्रीणि।   त्रयाणां कर्णश्रवा उष्णिक्सोमः ॥
ता꣣ऽ२३४म्व꣥: । सा꣣ऽ२३४खा꣥ ॥ यो꣢꣯म꣡दाऽ२३या꣢ । पू꣡ना꣯न꣢म । भिगा꣡꣯याऽ२३ता꣢ ॥ शा꣡इशु꣢न्न꣡ह꣢ ᳐ ।
व्यै꣣꣯स्स्वद꣢या꣡ऽ२३ ॥ त꣢गू꣣꣯र्तिभा꣢ऽ᳐३४३इः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ५)(१६)॥ मु ॥ ११३९ ॥

५६९-२
ओ꣢इ᳐तं ꣣व꣤स्स꣥खा ॥ यो꣢꣯म꣡ । दाया꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । पु꣢ना꣯न꣡मभिगा꣭ऽ३ । आ꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
य꣣ता꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ शि꣡शु꣢न्न꣡ह꣢व्यै꣡꣯स्स्व꣢दयाऽ३ । आ꣢ ᳐ । ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । त꣣गा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
ती꣣ऽ२३४भी꣥: ॥
(दी॰ ३। प॰ १२। मा॰ ५)(१७)॥ ठु ॥ ११४० ॥

५६९-३
तं ꣥वस्सखा꣯यो꣯मदाऽ६या꣥ ॥ पु꣢ना꣯न꣡मभिगा꣰꣯ऽ२यत । शा꣡इशु꣪न्नहा꣢ऽ᳐३ । व्यै꣤꣯स्स्व꣥ । द꣣या꣢ऽ᳐३ ॥
ता꣡ऽ२३गू꣤ऽ३ ॥ ता꣢ऽ᳐३४५इभोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ )(१८)॥ फि ॥ ११४१ ॥
५७०-१ वाचस्सामनी द्वे।   द्वयोर्वागुष्णिक्सोमः ॥
प्रा꣤णा꣥ ॥ शा꣣ऽ२३४इशूः꣥ । म꣢हा꣣ऽ२३४इना꣥म् । हि꣡न्वाऽ२᳐ना꣣ऽ२३४र्ता꣥ । स्या꣢ऽ᳐३दा꣡इधी꣢ऽ᳐३ती꣢म् ॥
वा꣡इश्वा꣢꣯प꣡रि । प्रि꣢या꣣꣯भु꣢वा꣡ऽ२३त् ॥ अ꣢ध꣣द्विता꣢ऽ३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ २। प॰ १०। मा॰ ९)(१९)॥ ञो ॥ ११४२ ॥

५७०-२
प्रा꣤णा꣥प्रा꣤णा꣥ ॥ शा꣡इशूऽ२श्शा꣡इशूऽ२᳐: । महाऽ३१उवाये꣢ऽ᳐३ । नाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ।
हि꣢न्व꣡न्नार्तस्य꣢दाऽ३१उवाये꣢ऽ३ । धीऽ२३४ती꣥म् । वि꣡श्वा꣯पारिप्रि꣢याऽ३१उवाऽ२३ ।
भूऽ२३४वा꣥त् । अ꣢धौऽ२ । हौऽ२ । हु꣡वाये꣢ऽ३ ॥ द्वा꣡ऽ२᳐इता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ १३। मा॰ ११)(२०)॥ ड्र ॥ ११४३ ॥

५७०-३ इन्द्रसामनी द्वे।   द्वयोरिन्द्रोउष्णिक्सोमः ॥
प्रा꣤꣯ णा꣥꣯शिशू꣤: ॥ म꣢हा꣡ऽ२꣮इना꣯म् । औ꣯होऽ᳐३वा꣢ । हिन्व꣡न्नृतस्यदी꣯धि꣢तिम् ॥ वा꣡इश्वा꣢उवा ।
पा꣡रा꣢उवा ॥ प्रियाऽ२भु꣡वत् । अ꣣धा꣢उवाऽ३ ॥ ए꣢ऽ᳐३ । द्वि꣢ताऽ१ ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ९)(२१)॥ मो ॥ ११४४ ॥

५७०-४
प्रा꣥꣯णा꣯ । हो꣢ऽ᳐३इ । इ꣤याहा꣥इ ॥ शा꣡इशु꣢र्महा꣡इ । नाऽ२३म् । आ꣢꣯उ꣣हा꣢꣯उ꣣ । हो꣭ऽ३वा꣢ ।
हिन्व꣡न्नृतस्यदी꣯धिताइम् । आ꣢꣯उ꣣हा꣢꣯उ꣣ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥ वि꣡श्वा꣯पा । र्या꣢꣯उ꣣हा꣢꣯उ꣣ । हो꣭ऽ३वा꣢ ॥
प्रिया꣡ऽ२३ । भू꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । अ꣡ध꣢द्वि꣣ता꣢ऽ१ ॥
(दी॰ १२। प॰ १६। मा॰ १४)(२२)॥ ची ॥ ११४५ ॥

५७०-५ मरुतां प्रेङ्खम्।   मरुत उष्णिक्सोमः ॥
प्रा꣥꣯णा꣯ । ह꣣हो꣢इ᳐ । शा꣣ऽ२३४इशूः꣥ । ह꣣हो꣢ऽ᳐३इ । म꣢ही꣡꣯नाऽ२३म् । हो꣡वा꣢ऽ᳐३ हो꣡ये꣢ऽ᳐३४ ॥
हि꣥न्वन् । ह꣣हो꣢इ᳐ । आ꣣ऽ२३४र्ता꣥ । ह꣣हो꣢ऽ᳐३ । स्य꣢दी꣡꣯धिताऽ२३इम् । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हो꣡ये꣢ऽ᳐३४ ॥
वि꣥श्वा꣯ । ह꣣हो꣢इ᳐ । पा꣣ऽ२३४री꣥ । ह꣣हो꣢ऽ᳐३इ । प्रि꣢या꣡꣯भुवा ऽ२३त् । हो꣡वा꣢ऽ᳐३हो꣡ये꣢ऽ᳐३ ॥ आ꣡ऽ२३धा꣤ऽ३ ।
द्वा꣢ऽ३४५इतोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ २०। मा॰ १४)(२३)॥ ङी ॥ ११४६ ॥
५७१-१ प्राजापत्ये द्वे।   द्वयोः प्रजापतिरुष्णिगिन्द्रसोमौ ॥
प꣡वस्वदाऽ२᳐इ । व꣣वी꣢ ᳐ता꣣ऽ२३४या꣥इ ॥ आ꣡इन्दो꣯धा꣯राऽ२᳐ । भि꣣रो꣢ ᳐जा꣣ऽ२३४सा꣥ । आ꣡꣯कालशाम् ।
माधू꣢ ᳐मा꣣ऽ२३४न्त्सो꣥ ॥ म꣡नए꣢꣯मा꣡नाऽ२३ः ॥ स꣤दाऽ५ए । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ४। प॰ १०। मा॰ ८)(२४)॥ नै ॥ ११४७ ॥

५७१-२
प꣥वस्वदा ॥ व꣢वी꣡꣯तयाइ । इन्दो꣯धाऽ२३रा꣢ऽ३४ । भिरो꣯जसा꣥ऽ६ए꣥ । आ꣡का꣢ऽ३हा꣢ । ला꣡शाऽ२म् ॥
मा꣡धू꣢ऽ᳐३हा꣢इ । मा꣡न्त्सोऽ२३ ॥ म꣢नो꣡ऽ२३४वा꣥ । सा꣤ऽ५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ५)(२५)॥ णु ॥ ११४८ ॥
५७२-१ सुज्ञाने द्वे।   द्वयोरिन्द्र उष्णिक्सोमः ॥
सो꣥꣯म:पुना ॥ न꣢ऊ꣯र्मि꣡णा । अ꣢व्यंवा꣡राऽ२म् । विधा꣯व꣡ताइ ॥ अ꣢ग्रे꣯वा꣡चाऽ२: ॥ पव꣡ ।
माऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क꣡निक्र꣢ददे꣯उ꣡पा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ७। प॰ ८। मा॰ ६)(२६)॥ जू ॥ ११४९ ॥

५७२-२
सो꣥꣯म:पुना ॥ न꣢ऊ꣯र्मि꣡णोवा꣢ऽ᳐३ । ओ꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा । अ꣡व्यंवा꣯रं विधा꣢꣯वति ॥
अ꣣ग्रे꣢ऽ᳐३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३ । हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा । वा꣢꣯ च꣡ᳲपवमा꣢꣯नः ॥ क꣣ना꣢ऽ᳐३ । हो꣡वा꣢ऽ᳐३ ।
हो꣡ऽ२᳐ । वा꣣ऽ२३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्रा꣣ऽ२३४दा꣥त् ॥
(दी॰ १२। प॰ १८। मा॰ ३)(२७)॥ जि ॥ ११५० ॥

५७२-३ द्यौते द्वे।   द्युतोष्णिक्सोमः ॥
सो꣤꣯मःपुना꣯न꣤ऊ ॥ मि꣡णा । अव्यंवा꣯रंवि꣢धा꣡꣯वाऽ२३ती꣢ ॥ अ꣡ग्रे꣯वा꣯चाः ॥ प꣢व꣡मा꣯नाः ।
का꣢ऽ᳐३नि꣤क्र꣥ ॥ दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡त् ॥
(दी॰ ७। प॰ ७। मा॰ ४)(२८)॥ छी ॥ ११५१ ॥

५७२-४
सो꣢꣯म:पुना꣯नऊ꣯र्मिणा꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही ॥ अ꣢व्यंवा꣯रंविधा꣯वता꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही ॥
अ꣢ग्रे꣯वा꣯च:पवमा꣯ना꣣ऽ२३४ऐ꣥꣯ही ॥ का꣤नी꣥ । क्र꣢ददेऽ३४ । हि꣥याऽ६हा꣥ ॥ हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ११। प॰ ८। मा॰ ५)(२९)॥ गु ॥ ११५२ ॥

५७२-५ आतीषादीये द्वे।   द्वयोः प्रजापतिरुष्णिक्सोमः ॥
सो꣣꣯म꣤:पु꣥ना꣯ । न꣣ऊ꣢ऽ᳐३२र्मी꣣ऽ२३४णा꣥ ॥ अ꣡व्यंवा꣢꣯रम् । विधा꣡वति꣢ ॥ अ꣡ग्रा꣢꣭ऽ३२᳐इ ।
वा꣣ऽ२३४चा५: । प꣡वा꣭ऽ३२᳑ । मा꣣ऽ२३४ना꣥: । क꣣ना꣢ऽ३इक्रा꣤ऽ५᳚दाऽ६५६त् ॥
(दी॰ ३। प॰ ९। मा॰ ७)(३०)॥ ढे ॥ ११५३ ॥

५७२-६ आतीषादीयम्।
सो꣣꣯मःपु꣥ना꣯ । हो꣢ ᳐ । न꣣ऊ꣤꣯र्मिणा꣥ऽ६ए꣥ ॥ अ꣡व्यंवा꣯रंविधा꣢ऽ१वा꣢ऽ३ती꣢ । अग्रे᳐वा꣣ऽ२३४५ ।
चा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥ प꣢व꣡माऽ२३ना꣢ऽ३ः ॥ का꣡ऽ२᳐ना꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ क्र꣢ददे꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ९। मा॰ ५)(३१)॥ घु ॥ ११५४ ॥
५७३-१ सोमसामानि चत्वारि।   चतुर्णां सोम उष्णिक्सोमः ॥
प्र꣢पु꣡नाऽ२३ना꣤꣯यवे꣥꣯धसाइ ॥ हो꣡इ । होइ । सो꣯मा꣯यवचाउ꣪च्याताऽ२इ ॥ भृति꣡न्नभराम꣪तिभाऽ२इः ॥
जुजो꣡꣯षाऽ२३ता꣢ऽ᳐३४३इ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ९)(३२)॥ बो ॥ ११५५ ॥

५७३-२
प्र꣤पुना꣯नौ꣯होऽ५यवे꣯ध꣤साइ ॥ सो꣢꣯मा꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ऽ३४ । यवच꣥उच्यता꣤इ ॥ भृ꣢ता꣡औ꣢ऽ᳐३हो꣢ऽ३४ ।
नभ꣥रा꣯मति꣤भाइः ॥ जु꣢जाऽ᳐३१उवाऽ२३ ॥ षा꣣ऽ२३४ते꣥ ॥
(दी॰ ५। प॰ ७। मा॰ ८)(३३)॥ फै ॥ ११५६ ॥
५७४-१
गो꣣ऽ४म꣥न्नः । हो꣢इ᳐ । इ꣣न्दो꣤꣯अश्ववा꣥ऽ६दे꣥ ॥ सू꣡तस्सुदक्षधा꣢ऽ१नी꣢ऽ᳐३वा꣢ । शुचिंचवा꣣ऽ२३४५ ॥
ण꣢मधिगो꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ षू꣣ऽ२३४धा꣥ । र꣢या꣡ । औ꣢ऽ३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ५)(३४)॥ टु ॥ ११५७ ॥
५७५-१
हा꣤वास्मा꣥ ॥ भ्या꣣ऽ२३४न्त्वा꣥ । वा꣢सू᳐वी꣣ऽ२३४दा꣥म् । अ꣡भाऽ२᳐इवा꣣ऽ२३४ णी꣥: । अ꣣ना꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ।
षा꣣ऽ२३४ता꣥ ॥ गो꣡꣯भि꣢ष्टे꣯व꣡ ॥ ण꣢म꣣भि꣢वा꣡ऽ२३ ॥ स꣢या꣯मसिहो꣣ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ३। प॰ १०। मा॰ ५)(३५)॥ णु ॥ ११५८ ॥
५७६-१ यशाꣳसि त्रीणि।   त्रयाणां सोम उष्णिक् सोमः ॥
प꣥वते꣯हा ॥ र्य꣢तो꣡꣯हरिः । औ꣢ऽ᳐३हो꣢ऽ३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ । आ꣡ति꣢ह्व꣡रा꣰꣯ऽ२ꣳसिर꣡ꣳहि꣢या꣯ ।
औ꣣꣯हो꣢ऽ᳐३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ अ꣢भ्य꣡र्ष꣢स्तो꣯तृ꣡भ्यो꣢꣯वा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣢ऽ३१इ । औऽ२᳐हो꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । य꣢शो꣯य꣡शा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १०। प॰ १२। मा॰ ६)(३६)॥ फू ॥ ११५९ ॥

५७६-२
प꣣वा꣢ऽ३ । प꣤वते꣥꣯हा ॥ र्य꣢तो꣡꣯हरिः । औ꣢꣯हो꣡इ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣢इ । आ꣡ति꣢ह्व꣡रा꣰꣯ऽ२ꣳसिर꣡ꣳहि꣢या꣯ ।
औ꣯हो꣡इ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣢इ ॥ अभ्य꣡र्ष꣢स्तो꣯तृ꣡भ्यो꣢꣯वा꣡ । औ꣢꣯हो꣡इ । औ꣭ऽ३हो꣢इ । औ꣣꣯हो꣢ऽ३ ॥
रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ य꣢शो꣯य꣡शा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ १५। प॰ १६। मा॰ )(३७)॥ प ॥ ११६० ॥

५७६-३
प꣣व꣤ते꣥꣯हर्यतः । ह꣣री꣢ऽ᳐३ः । आ꣡ऽ२३४ । तिह्वरा꣥꣯ꣳसिर꣤ । हिया꣥ ॥ अ꣢भ्य꣡र्षाऽ२३४ । स्तो꣯तृ꣥ ॥
भ्यो꣣꣯वा꣢ऽ᳐३इ ॥ रा꣡ऽ२᳐वा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । या꣣ऽ२३४शा꣥: ॥
(दी॰ ६। प॰ १०। मा॰ ५)(३८)॥ ङु ॥ ११६१ ॥
५७७-१ भारद्वाजम्।   भरद्वाज उष्णिक् सोमः ॥
प꣢रि꣡को꣢ऽ३शं ꣤मधु꣥श्चुताम् ॥ सो꣡꣯म:पु꣢ना꣯नो꣡꣯अर्ष꣢ति । हो꣡ये꣢ऽ᳐३ ॥ अ꣢भिवा꣣ऽ२३४५ ॥
णी꣢꣯र्ऋ꣡षी꣢꣯ णा꣯ꣳस । प्ता꣡ना꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ षा꣣ऽ२३४ता꣥ ॥
(दी॰ ६। प॰ ७। मा॰ ३)(३९)॥ खि ॥ ११६२ ॥
॥ एकोनचत्वातिंशत्, दशमः खण्डः ॥ १० ॥ दशतिः ॥ ८ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने सप्तदशस्यार्द्धः प्रपाठकः ॥

३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — सप्तदशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः

॥ अथ एकादशः खण्डः॥ (ऋ-७, सा-३४)

५७८-१ वासिष्ठम्।   वसिष्ठः ककुप्सोमः ॥
पा꣤वा꣥ ॥ स्व꣡माधुमा । तामा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । ई꣣ऽ२३४न्द्रा꣥ । य꣢सो꣯मक्रतुवि꣡त्तमो꣢꣯म꣡दा꣢ऽ᳐३ः ॥
ओ꣡इ । माहा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ द्यु꣢क्ष꣡तमो꣢꣯म꣡दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ५)(१)॥ डु ॥ ११६३ ॥

५७८-२ सफे द्वे।   द्वयोर्देवाः ककुप् इन्द्रसोमौ ॥
पा꣢ऽ᳐३४ । वस्व꣥म꣤ । धु꣥मत्ताऽ६मा꣥: ॥ आ꣡इन्द्राऽ२ । यसो꣡माऽ२ । क्रतु꣡वाइत्ता꣢ऽ३मो꣤ऽ३ ।
मा꣢ऽ३दा꣢: ॥ म꣡हिद्युक्षाता꣢ऽ᳐३मो꣤ऽ३ ॥ मा꣢ऽ३४५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ ९। मा॰ ५)(२)॥ लु ॥ ११६४ ॥

५७८-३
प꣤व꣥स्वम꣤धु꣥मा꣯ । इ꣤हा ॥ त꣡मः । इन्द्रा꣯यसो꣯मक्रतुवित्त꣢मो꣡꣯माऽ२३दा꣢: । इ꣡हा꣢ ॥ महा꣡इद्यूऽ२३क्षा꣢ ।
इ꣡हा꣢ ॥ तमो꣡꣯माऽ२३दा꣢ऽ३४३ः । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ १०। मा॰ ५)(३)॥ मु ॥ ११६५ ॥

५७८-४ वासिष्ठम्।   वसिष्ठः ककुप्सोमेन्द्रौ ॥
प꣤व꣥स्वमा꣤꣯ । एऽ५ । धु꣤मा ॥ त꣡माः । इ꣢न्द्रा꣯यसोऽ᳐३ । हा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣢ । मा꣡क्रातूवीऽ२३दा꣢ऽ᳐३ ।
हा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣢ऽ᳐३४ । त꣣मो꣢ऽ᳐३४म꣣दा꣢: ॥ म꣡हाये꣢ऽ᳐३ ॥ द्यू꣡ऽ२᳐क्षा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ त꣢मो꣯म꣡दा꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ५। प॰ १४। मा॰ ४)(४)॥ भी ॥ ११६६ ॥

५७८-५ सफम्।   देवाः ककुप्सोमः ॥
प꣢व꣡स्वा꣢ऽ᳐३म꣤धु꣥ । म꣢त्ता꣣ऽ२३४मा꣥: ॥ इ꣢न्द्रा꣡꣯य꣢सो꣡माऽ२ । क्रतु꣡वाइत्ता꣢ऽ᳐३मो꣤ऽ३ । मा꣢ऽ३᳐२३४दा꣥: ॥
म꣢हा꣡इ ॥ द्युक्षाता꣢ऽ᳐३मो꣤ऽ३ । मा꣢ऽ᳐३४५दोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ८। मा॰ ५)(५)॥ गु ॥ ११६७ ॥
५७९-१ ऐषिराणि चत्वारि।   चतुर्णांमिषिरः ककुप्सोमः ॥
अ꣢भा꣡इ । द्यु꣢म्नाऽ᳐३म्बॄ꣤ऽ३ह꣢द्य꣣श꣥: ॥ इ꣢षाः꣡ । प꣢ते꣯दिदी꣯हिदेऽ᳐३वा꣤ऽ३दे꣢꣯व꣣यु꣥म् ॥ वि꣢को꣡ । श꣢म्म ॥
ध्य꣣मा꣢ऽ᳐३म्यू꣤ऽ५᳚वाऽ६५६ ॥
(दी॰ ३। प॰ ७। मा॰ ४)(६)॥ ठी ॥ ११६८ ॥

५७९-२
अ꣥ । भे꣤द्यूम्ना꣥म् ॥ बृ꣢हा꣡द्या꣢ऽ१शाऽ२: । इ꣡षास्पताइ । दीदी꣢ ᳐हा꣣ऽ२३४इदे꣥ । व꣣दा꣢इ᳐वा꣣ऽ२३४यू꣥म् ॥
वि꣢कौवा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ श꣡म्मध्य꣢माऽ३१उवाऽ२३ ॥ यूऽ२३४वा꣥ ॥
(दी॰ नास्ति। प॰ ९। मा॰ ८)(७)॥ लै ॥ ११६९ ॥

५७९-३
अ꣥भि꣤द्यु꣥म्न꣤म्बृ꣥ह꣤त् । इहा ॥ य꣡शः । इषस्पते꣯दिदी꣯हिदे꣯व꣢दे꣡꣯वाऽ२३यू꣢म् ॥ विकौ꣯हो꣯वाऽ᳐३हा꣢इ ॥
श꣡म्मा꣰꣯ऽ२ध्यमं ꣡युव꣢ । इ꣡डाऽ२३भा꣢ऽ᳐३४३ । ओ꣡ऽ२३४५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ७। प॰ ९। मा॰ ५)(८)॥ झु ॥ ११७० ॥

५७९-४
अ꣥भिद्युम्नंबॄऽ६ह꣥द्यशाः ॥ इ꣢षस्प꣡ताइ । दि꣢दी꣯हि꣡दाइ । वा꣢꣯ दे꣡꣯वयूम् । विको꣯शम्मध्यमाऽ२३ꣳहो꣡इ ।
यूऽ२३४वा । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ५। प॰ ९। मा॰ ६)(९)॥ भू ॥ ११७१ ॥
५८०-१ कार्णश्रवसानि त्रीणि।   त्रयाणां कर्णश्रवा ककुबश्वः ॥
आ꣥꣯सो꣯ता꣯पा ॥ रा꣡ऽ२᳐इषा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा । चा꣣ऽ२३४ता꣥ । अ꣡श्व꣢न्न꣡स्तो꣯मम꣢प्तु꣡रा꣰꣯ऽ२ꣳरजस्तु꣡रम् ॥
ओये꣢ऽ३ । वना꣢ऽ᳐३ ॥ ओ꣡ये꣢ऽ᳐३ । प्रक्षा꣢ऽ᳐३४ । औ꣥꣯हो꣯वा ॥ उ꣢दप्रु꣡ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ९। प॰ १०। मा॰ ४)(१०)॥ नी ॥ ११७२ ॥

५८०-२
आ꣥꣯सो꣯ता꣯पा ॥ रि꣢षि । च꣡ताऽ२ । ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊऽ२ । अ꣡श्व꣢न्न꣡स्तो꣯मम꣢ । प्तु꣡राऽ२म् ।
ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊऽ२ । रज । स्तु꣡राऽ२म् । ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊऽ२ ॥ वन । प्र꣡क्षाऽ२म् ।
ऊऽ२ । हाऽ२इ । ऊ꣡ऽ२᳐ ॥ उ꣣द꣢ । प् रू꣡ऽ२᳐ता꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२᳐३४पा꣥ ।
(दी॰ ६। प॰ २४। मा॰ ८)(११)॥ घ्लै ॥ ११७३ ॥

५८०-३
आ꣥꣯सो꣯ता꣯पा ॥ रि꣡ । षाइ । चता । अश्वान्नस्तो । माम꣢प्तू꣣ऽ२३४रा꣥म् । र꣣जा꣢ ᳐स्तू꣣ऽ२३४रा꣥म् ॥
वनो꣤हाइ ॥ प्रा꣡क्षामू꣢ऽ᳐३दा꣢ । हि꣡म्माये꣢ऽ३ ॥ प्रूऽ२३४ता꣥म् ॥
(दी॰ ३। प॰ ११। मा॰ ५)(१२)॥ टु ॥ ११७४ ॥

५८०-४ वाचस्सामानि त्रीणि।   त्रयाणां वाक्ककुबश्वः ॥
आ꣥꣯सो꣯ता꣯पा꣯रीऽ६षि꣥ञ्चता ॥ आ꣡श्वा꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ । न꣡स्तो꣯मम꣢प्तु꣡रा꣰꣯ऽ२ꣳरजस्तु꣡राऽ२३म् ॥ हो꣡इ ।
वाना꣢ ᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥ प्र꣢क्ष꣡मुद꣢प्रु꣡ता꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ५)(१३)॥ कु ॥ ११७५ ॥

५८०-५
आ꣣꣯सो꣢ऽ३४औ꣣꣯ हो꣤꣯वा꣥ ॥ ता꣡꣯पराइषि꣪ञ्चाताऽ२ । आ꣡श्वन्न꣢स्तो꣯ । मा꣡म꣪प्तूराऽ२᳐म् ।
र꣣जा꣢ ᳐स्तू꣣ऽ२३४रा꣥म् ॥ वनो꣤हाइ ॥ प्रा꣡क्षमु꣢दाऽ३१उवाऽ२३ ॥ प्रूऽ२३४ता꣥म् ॥
(दी॰ ५। प॰ ८। मा॰ ७)(१४)॥ बे ॥ ११७६ ॥

५८०-६ वाचस्साम।
आ꣣꣯ सो꣤꣯ ता꣥꣯पा । हो꣢ ᳐ । रि꣣षि꣤ञ्चता꣥ऽ६ए꣥ ॥ आ꣡श्वन्न꣢स्तो꣯ । मा꣡म꣪प्तूराऽ२म् । रा꣡जस्तु꣢रम् ॥
वा꣡न꣪प्राक्षाऽ२३म् ॥ ऊ꣡ऽ२३दा꣤ऽ३ । प्रू꣢ऽ᳐३४५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ९। मा॰ ५)(१५)॥ धु ॥ ११७७ ॥
५८१-१ कौल्मलबर्हिषे द्वे।   द्वयोः कुल्मलबर्हिः ककुप् वृषभः ॥
ए꣤ता꣥म् ॥ ऊ꣡त्याम् । म꣪दाऽ२᳐च्यू꣣ऽ२३४ता꣥म् । स꣢हा꣡स्रधा꣢ । रां ꣡वृषभा꣢ऽ᳐३म् । दि꣡वोऽ२᳐दू꣣ऽ२३४हा꣥म् ॥
वि꣡श्वाऽ२होऽ१इ । होइ ॥ वाऽ२३सू꣢ऽ᳐३ । ना꣡ऽ२᳐इबा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥ भ्रा꣣ऽ२३४ता꣥म् ॥
(दी॰ २। प॰ ११। मा॰ १०)(१६)॥ चौ ॥ ११७८ ॥

५८१-२
ए꣤ता꣥मू꣤त्या꣥म् ॥ म꣢दाऽ᳐३१उवाऽ२३ । च्यूऽ२३४ता꣥म् । स꣢ह꣡स्रधा꣢꣯रंवृषभीं ꣡दिवो꣢꣯दु꣡हा꣣ऽ२३म् ।
वा꣤इश्वा꣥वा꣤सू꣥ ॥ नि꣢बाऽ᳐३१उवाये꣢ऽ᳐३ ॥ भ्रा꣣ऽ२३४ता꣥म् ॥
(दी॰ २। प॰ ७। मा॰ ७)(१७)॥ छे ॥ ११७९ ॥

५८१-३ सादन्तीयम् (शङ्कु)।   प्रजापतिः ककुप् वृषभः ॥
ए꣥꣯त꣤मु꣥त्य꣤म् । एऽ५ । म꣤दा ॥ च्यु꣡ताम् । सहस्रधा꣯रंवृषभंदि꣢वो꣡꣯दूऽ२३हा꣢म् ॥
वा꣡इश्वाऽ२वा꣡सूऽ२३ ॥ नि꣢बो꣡ऽ२३४वा꣥ । भ्रा꣤ऽ५तोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ५)(१८)॥ डु ॥ ११८० ॥

५८१-४ कौल्मलबर्हिषाणि त्रीणि।   त्रयाणां कुल्मलबर्हिः ककुप् वृषभः ॥
ए꣥꣯त꣤मु꣥त्य꣤म् । ओहाइ । म꣥दच्यु꣤त꣥म् । ओ꣤हाइ ॥ सा꣢ह᳐स्रा꣣ऽ२३४धा꣥ । रं ꣢वा᳐र्षा꣣ऽ२३४भा꣥म् ।
दि꣢वो꣯दुहमो꣣ऽ२३४हा꣥इ ॥ वि꣡श्वाऽ२होऽ१इ ॥ वाऽ२३सू꣢ऽ᳐३ । ना꣡ऽ२᳐इबा꣣ऽ२३४औ꣥꣯हो꣯वा ॥
भ्रा꣣ऽ२३४ता꣥म् ॥
(दी॰ ४। प॰ ११। मा॰ १०)(१९)॥ तौ ॥ ११८१ ॥

५८१-५
ए꣥꣯तामु꣣त्य꣢म꣣दा꣤च्यु꣥ताम् ॥ सा꣡हस्रधा꣢ । रां ꣡वृ꣪षाभाऽ२म् । दिवोऽ२ । दु꣡हमोइ ॥
विश्वा꣯वसू꣯निबाऽ२३हो꣡इ ॥ भ्रात꣢माऽ३१उवाऽ२३ ॥ ऊ꣢ऽ᳐३२३४पा꣥ ॥
(दी॰ ३। प॰ ८। मा॰ ५)(२०)॥ ड्रु ॥ ११८२ ॥

५८१-६
ए꣣꣯ता꣢ऽ३४म् । उत्यम्म꣥दा꣯ । च्यू꣤ता꣥म् ॥ स꣢ह꣡स्रधा꣯र꣰ऽ२म्वृ । षभ꣡म् । दिवोऽ२३१२३ । दू꣡ऽ२३४हा꣥म् ॥
वि꣡श्वा꣯वसू꣯निबा꣢ऽ᳐३ओ꣡ये꣢ऽ᳐३ ॥ भ्रा꣡ऽ२३४ताम् । ए꣥꣯हियाऽ६हा꣥ ॥ हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ६। प॰ १२। मा॰ ७)(२१)॥ खे ॥ ११८३ ॥
५८२-१ लोमनी द्वे (दीर्घम्)।   द्वयोर्भरद्वाजः ककुप् सोमः ॥
सा꣤सू꣥ ॥ न्वे꣡꣯यो꣯वसूऽ२३ना꣢म् । यो꣡राऽ२या꣡माऽ२ । ने꣯ता꣯यइ꣡डाऽ२३ना꣢म् ॥ सो꣡ऽ२३माः꣢ ॥
य꣡:सुक्षि꣢ता꣡ऽ२३४इनो꣥ऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ४। प॰ ६। मा॰ ६)(२२)॥ तू ॥ ११८४ ॥

५८२-२
स꣤सुहा꣥उ ॥ न्वे꣡꣯यो꣯वसू꣯नाऽ२३ꣳहा꣢उ । यो꣡राऽ२या꣡माऽ२ ॥ ने꣯ता꣯यः ॥ इ꣡डा꣯नाऽ२३ꣳहा꣢उ ॥
सो꣡꣯मो꣯यस्सू꣢ऽ᳐३हा꣢उ ॥ क्षि꣣ती꣢꣯ना꣡म् । औऽ२३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ९। प॰ १०। मा॰ ७)(२३)॥ ने ॥ ११८५ ॥

५८२-३ सोमसामानि त्रीणि।   त्रयाणां सोमः ककुप् सोमः ॥
सः꣤ । स्वेसासू꣥ ॥ न्वे꣡यो꣯व꣢साऽ३१उवाऽ२३ । नाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ।
यो꣡꣯ रा꣰꣯ऽ२ या꣡꣯ मा꣰꣯ऽ२ने꣯ता꣡꣯य꣢इ꣡डा꣰꣯ऽ२नाऽ᳐३म् ॥ सो꣯मौ꣢वा᳐ओ꣣ऽ२३४वा꣥ ॥
य꣡:सुक्षि꣢ताऽ३१ उवाये꣢ऽ३ ॥ नाऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ९। प॰ ८। मा॰ ८)(२४)॥ दै ॥ ११८६ ॥

५८२-४
स꣢सु꣡न्वेऽ२३यो꣤꣯वसू꣥꣯नाम् ॥ यो꣢꣯रा꣡या꣢ऽ१माऽ२३ने꣢ । ता꣯यइ꣡डाऽ२३४५नाऽ६५६म् ॥
सो꣡꣯ मो꣰꣯ऽ२य꣡स्सुक्षि꣢ती꣯ना꣡म् । सो꣯माऽ२३꣡४꣡५꣡: ॥
(दी॰ ८। प॰ ५। मा॰ ५)(२५)॥ णु ॥ ११८७ ॥

५८२-५
स꣤सु꣥न्वे꣯याः꣯ । ए꣤वासू꣥ ॥ नां ꣢꣯यो꣡रा꣢ऽ१याऽ२३मा꣢ । ने꣯ता꣯यइ꣡डाऽ२३ ना꣢ऽ३४म् ॥ सो꣣꣯मा꣢ऽ३ः ॥
य꣡:सुक्षि꣢ । ता꣡ऽ२३४५इ ॥ ना꣣ऽ२३꣡४꣡५꣡म् ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ६)(२६)॥ गू ॥ ११८८ ॥
५८३-१ शैतोष्माणि चत्वारि।   चतुर्णां शीतोष्मः ककुप् सोमः ॥
त्व꣥ꣳहिया ॥ ग꣢दाइवियपवमा꣯नजनिमा꣯निऽ᳐३द्यू꣡माऽ२ । ता꣡माऽ२: ॥ आ꣢मा꣡ऽ२र्त्ता꣡त्त्वाऽ२३ ॥
य꣢घो꣡ऽ२३४वा꣥ । षा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ६। मा॰ ३)(२७)॥ चि ॥ ११८९ ॥

५८३-३
त्व꣤ꣳह्य꣥ङ्गदा꣤ ॥ वि꣡य । पवमा꣯नजनिमा꣯निद्यु꣢म꣡त्ताऽ२३माः꣢ ॥
अमा꣡र्ताऽ२३त्त्वा꣢ऽ᳐३ ॥ य꣢घो꣡ऽ२३४वा꣥ । षा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ २। प॰ ६। मा॰ २)(२९)॥ चा ॥ ११९१ ॥

५८३-४
त्व꣥ꣳहो꣢ऽ᳐३अ꣤ङ्ग꣥दै꣤꣯विया꣥ ॥ प꣢व꣡माऽ२ना꣡ । ज꣢नि꣡माऽ२ना꣡ये꣢ऽ᳐३४ । द्युम꣥ । ता꣢ऽ᳐३माः꣢ ॥
अ꣡मार्ता꣢ऽ᳐३त्त्वा꣢ऽ३ ॥ य꣢घो꣡ऽ२३४वा꣥ । षा꣤ऽ५योऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ १। प॰ ८। मा॰ ३)(३०)॥ गि ॥ ११९२ ॥
५८४-१ गायत्रपार्श्वम्।   देवाः ककुप् सोमः ॥
ए꣤षा꣥: ॥ स्या꣡धा꣯र꣢याऽ३१उवाऽ२३ । सूऽ२३४ता꣥: । अ꣡व्या꣰꣯ऽ२वा꣡꣯रे꣯भि꣢ᳲपवते꣯मदि꣡न्तमः꣢ ॥
क्री꣯डा꣡नू꣢ऽ१र्मीऽ२᳐: ॥ अ꣣पा꣢ऽ᳐३म् । हि꣡म्ऽ२३स्थिबा꣤ऽ३ ॥ आ꣡इवाऽ२३꣡४꣡५꣡ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ८)(३१)॥ गै ॥ ११९३ ॥

५८४-२ सन्तनि।   देवाः ककुप्युस्रिया अभिव्रजन्तेति विष्टारपंक्तिः सोमः ॥
ए꣤꣯षाहा꣥उ ॥ स्या꣡धा꣯र꣢याऽ३१उवाऽ२३ । सूऽ२३४ता꣥: । अ꣡व्या꣰꣯ऽ२वा꣡꣯रे꣯भि꣢ᳲपवते꣯मदि꣡न्तमा꣣ऽ२३ः ॥
क्री꣤꣯डन्हा꣥उ ॥ ऊ꣡र्मिर꣢पाऽ३१उवाऽ२३ ॥ ईऽ२३४वा꣥ ॥ छू ॥ १ ॥
य꣡उस्रिया꣰꣯ऽ२अ꣡पिया꣯अन्तरश्मनी꣣ऽ२३ ॥ नि꣤र्गाहा꣥उ ॥ आ꣡कृन्त꣢दाऽ३१उवाऽ२३ ॥
जाऽ२३४सा꣥ ॥ झु ॥ २ ॥
अ꣢भि꣡व्रजन्तत्नि꣢षे꣯ग꣡व्यमश्विया꣣ऽ२३म् ॥ व꣤र्मीहा꣥उ ॥ वा꣡धृष्ण꣢वाऽ३१उवाऽ२३ ॥
रूऽ२३४जा꣥ ॥ घि ॥ ३ ॥
(दी॰ १०। प॰ १५। मा॰ १४)(३२)॥ मी ॥ ११९४ - ११९५ ॥

५८४-३ सोमसामानि त्रीणि।   त्रयाणां सोमः ककुप्सोमः ॥
ए꣢꣯ष꣡स्यधा꣯ । राया꣢ऽ१सूताऽ२᳐: ॥ अ꣣व्या꣯वा꣢꣯रा꣡इ । भाइ:पवते꣢꣯ । म꣣दिन्त꣢माः꣡ ॥
क्री꣢꣯ड꣡न्नूऽ२३र्मी꣢ऽ३ः ॥ आ꣡ऽ᳐२३पा꣤ऽ३म् । आ꣢ऽ᳐३४५इवोऽ६᳚हा꣥इ ॥
(दी॰ ६। प॰ ८। मा॰ ८)(३३)॥ गे ॥ ११९६ ॥

५८४-४
ए꣢꣯ष꣡स्या꣢ऽ᳐३धा꣤꣯रया꣥꣯सुताः ॥ अ꣡व्याहोऽ२इ । वा꣡꣯रे꣯भि:पवते꣯मादि꣪न्तामाऽ२: ॥
क्री꣡꣯डाऽ२न्होऽ१इ । ऊऽ२३र्मीः꣢ ॥ अ꣣पा꣯मि꣢वा꣡ । औ꣢ऽ᳐३हो꣤वा꣥ । हो꣤ऽ५इ ॥ डा ॥
(दी॰ ८। प॰ ९। मा॰ ६)(३४)॥ ढू ॥ ११९७ ॥

५८४-५
ए꣤꣯षस्यधाऽ५रया꣯सु꣤ताः ॥ अ꣢व्या꣡꣯ वा꣢꣯रा꣡इ । भिᳲ꣢प꣣व꣢ता꣡ऽ२३इ । म꣢दि꣣न्तमाः꣢ ॥
क्री꣡꣯डन्नू꣯र्मिरपोवा꣢ऽ३ओ꣡ऽ२३४वा꣥ ॥ आ꣤ऽ५इवोऽ६᳚हा꣥इ ॥ ओ꣡म् ॥ अथ आरण्यकगानम् ॥
(दी॰ ६। प॰ ६। मा॰ ७)(३५)॥ के ॥ १०९८ ॥
॥ पञ्चविंशत्, एकादशः खण्डः ॥ ११ ॥ दशतिः ॥ ९ ॥
॥ इति ग्रामे गेय-गाने सप्तदशः प्रपाथकः ॥ १७ ॥
॥ इति ककुभुष्णिहः ॥
॥ इति पवमानाख्यं चतुर्थं गानं समाप्तम् ॥
॥ इति सौम्यं तृतीयं पर्वकाण्डं समाप्तम् ॥
॥ इति पवमानं काण्डम् ॥
॥ इति षष्ठः प्रपाठकः ॥ ६ ॥
॥ इति ग्राम-गेयगानं समाप्तम् ॥

॥ ग्रामेगेयगानम् सङ्ख्या (Parva / Prapataka / Kandah / Samam) ॥

खण्डः साम सङ्ख्या
१. आग्नेयं पर्व — प्रकृतिगानम् (गायत्रम्) २
गायत्रम् २
१. आग्नेयं पर्व — प्रथमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३४
प्रथम खण्डः १९
द्वितीयः खण्डः १५
१. आग्नेयं पर्व — प्रथमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३६
तृतीय खण्डः २१
तुरीय खण्डः १५
१. आग्नेयं पर्व — द्वितीयप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ४०
तुरीय खण्डः (उत्तरभागः) ७
पञ्चम खण्डः १६
षष्ठ खण्डः १०
सप्तम खण्डः ७
१. आग्नेयं पर्व — द्वितीयप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३१
सप्तम खण्डः (उत्तरभागः) ९
सप्तम खण्डः ९
अष्टम खण्डः १३
१. आग्नेयं पर्व — तृतीयप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३९
दशम खण्डः ७
एकादशम खण्डः १८
द्वादश खण्डः १४
२. ऐन्द्रं पर्व — तृतीयप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३१
प्रथम खण्डः २३
द्वितीय खण्डः ८
२. ऐन्द्रं पर्व — चतुर्थप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३४
द्वितीय खण्डः (उत्तरभागः) १४
तृतीय खण्डः २०
२. ऐन्द्रं पर्व — चतुर्थप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३६
तुरीय खण्डः १५
पञ्चम खण्डः २१
२. ऐन्द्रं पर्व — पञ्चमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३५
प्रथमो खण्डः ९
षष्ठ खण्डः २२
सप्तम खण्डः ४
२. ऐन्द्रं पर्व — पञ्चमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३५
सप्तम खण्डः (उत्तरभागः) ८
अष्टम खण्डः ११
नवम खण्डः ११
दशम खण्डः ५
२. ऐन्द्रं पर्व — षष्ठप्रपाठके प्रथमोऽद्धः ३७
दशम खण्डः (उत्तरभागः) ५
एकादश खण्डः ९
द्वादश खण्डः ११
प्रथम खण्डः १२
२. ऐन्द्रं पर्व — षष्ठप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३५
प्रथम खण्डः (उत्तरभागः) १९
द्वितीय खण्डः १६
२. ऐन्द्रं पर्व — सप्तमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३३
द्वितीय खण्डः (उत्तरभागः) ९
तृतीय खण्डः २३
तुरीय खण्डः १
२. ऐन्द्रं पर्व — सप्तमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३६
तुरीय खण्डः (उत्तरभागः) १६
पञ्चम खण्डः १६
षष्ठ खण्डः ४
२. ऐन्द्रं पर्व — अष्टमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३६
षष्ठ खण्डः (उत्तरभागः) १३
सप्तम खण्डः १०
अष्टम खण्डः ११
नवम खण्डः २
२. ऐन्द्रं पर्व — अष्टमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३४
नवम खण्डः (उत्तरभागः) १७
दशम खण्डः १७
२. ऐन्द्रं पर्व — नवमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३१
एकादश खण्डः १३
द्वादश खण्डः १८
२. ऐन्द्रं पर्व — नवमप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३५
द्वादश खण्डः (उत्तरभागः) १०
प्रथम खण्डः ११
द्वितीय खण्डः १३
तृतीय खण्डः १
२. ऐन्द्रं पर्व — दशमप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३४
तृतीय खण्डः (उत्तरभागः) २३
तुरीय खण्डः ११
२. ऐन्द्रं पर्व — दशमप्रपाठके द्वितीयोऽर्धः ३५
तुरीय खण्डः (उत्तरभागः) १७
पञ्चम खण्डः १५
खण्डः (३) ३
२. ऐन्द्रं पर्व — एकादशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३५
खण्डः (३) (उत्तरभागः) १४
सप्तम खण्डः २१
२. ऐन्द्रं पर्व — एकादशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३८
अष्टमः खण्डः १०
नवम खण्डः २१
दशम खण्डः ७
२. ऐन्द्रं पर्व — द्वादशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ४२
दशम खण्डः (उत्तरभागः) ९
एकादश खण्डः १७
द्वादश खण्डः १६
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — द्वादशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३१
प्रथमः खण्डः ३१
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — त्रयोदशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३८
प्रथमः खण्डः (उत्तरभागः) ३८
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — त्रयोदशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३५
द्वितीयः खण्डः १९
तृतीयः खण्डः १६
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — चतुर्दशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३६
चतुर्थः खण्डः २०
पञ्चमः खण्डः १६
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — चतुर्दशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३०
पञ्चमः खण्डः (उत्तरभागः) ३०
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — पञ्चदशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३६
पञ्चमः खण्डः (उत्तरभागः) २७
षष्ठः खण्डः ९
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — पञ्चदशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३०
षष्ठः खण्डः (उत्तरभागः) १५
सप्तमः खण्डः १५
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — षोडशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३९
सप्तमः खण्डः (उत्तरभागः) ६
अष्टमः खण्डः ३३
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — षोडशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३५
नवमः खण्डः ३५
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — सप्तदशप्रपाठके प्रथमोऽर्द्धः ३९
दशमः खण्डः ३९
३. पावमानं पर्व (काण्डम्) — सप्तदशप्रपाठके द्वितीयोऽर्द्धः ३४
एकादशः खण्डः ३४
आहत्य (Total) ११९७

॥ वर्णानुक्रमणिका ॥